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                <title>युग धर्म व विश्व धर्म है वेद धर्म - योग संदेश</title>
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                <description>युग धर्म व विश्व धर्म है वेद धर्म RSS Feed</description>
                
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                <title>सनातन धर्म, वेद धर्म, योग धर्म व संन्यास धर्म के सूत्र</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2827/ssanatan-dharma--veda-dharma--yog-dharm--va-sanyas-dharma-ke-sutra"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-12/04.jpg" alt=""></a><br /><table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#BA372A;border-color:#BA372A;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(186,55,42);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(255,255,255);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी जी के रूप में एक संन्यासी का दिव्य संकल्प व गौरव देखकर लोगों में पतंजलि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी जी महाराज व संन्यास के प्रति आस्था बढ़ी है। पिछले दिनों लगभग 20 हजार लोगों ने फोन कर संन्यासी बनने की इच्छा व्यक्त की है। अभी 100 से अधिक भाई-बहनों को पूज्य स्वामी जी महाराज संन्यास की दीक्षा दे रहे हैं तथा साथ ही लगभग 500 लोगों को ब्रह्मचर्य की दीक्षा देकर हम देश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म और संस्कृति के पुरोधाओं को तैयार कर रहे हैं।</span></strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी जी महाराज की दिव्य प्रेरणा से पतंजलि संन्यासाश्रम के तत्वावधान में शताधिक (100 से अधिक) विद्वान भाई व विदूषी बहनें रामनवमी के पावन अवसर पर संन्यास धर्म को ग्रहण कर राष्ट्रसेवा के लिए अपने आपको आहूत कर रहे हैं। यह पतंजलि व ऋषियों का कुल बढ़ रहा है। पतंजलि व पूज्य स्वामी जी के रूप में एक संन्यासी का दिव्य संकल्प व गौरव देखकर लोगों में पतंजलि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी जी महाराज व संन्यास के प्रति आस्था बढ़ी है। पिछले दिनों लगभग 20 हजार लोगों ने फोन कर संन्यासी बनने की इच्छा व्यक्त की है। अभी 100 से अधिक भाई-बहनों को पूज्य स्वामी जी महाराज संन्यास की दीक्षा दे रहे हैं तथा साथ ही लगभग 500 लोगों को ब्रह्मचर्य की दीक्षा देकर हम देश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म और संस्कृति के पुरोधाओं को तैयार कर रहे हैं। ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहा तो जल्द ही ऋषियुग का अवतरण होगा और हम पूज्य महाराज जी के नेतृत्व में उसके लिए पुरुषार्थ कर रहे हैं। पतंजलि के लिए यह गौरवपूर्ण अवसर है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नवरात्रों की प्रतिपदा से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मंगलाचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्तिवाचन के साथ हमने यह यज्ञ अनुष्ठान प्रारंभ हुआ। चारों वेदों का महायज्ञ ऐसे श्रोत्रिय विद्वानों के द्वारा प्रारंभ हुआ जिनको चारों वेद कण्ठस्थ हैं और जब वे ऋग्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अथर्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यजु और सामवेद की ऋचाओं का पाठ एक स्वर व विधि विधान से करते देख ऐसा लगता है कि सभी देवताओं की सकारात्मक शक्ति यहाँ अवतरित हो रही हैं। ऐसा लग रहा है जैसे ऋषिग्राम में ऋषियों की परम्परा जीवंत हो रही है।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यास का सार</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि-ऋषिकाओं का वंश बढ़ाने के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने ऋषियों के उत्तराधिकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिनिधि बनने के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगधर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेद धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सनातन धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यास धर्म को राष्ट्रधर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युगधर्म और विश्वधर्म के रूप में प्रतिष्ठापित करने के लिए हजारों भाई-बहन संन्यास की परम्परा में दीक्षित हो रहे हैं। पतंजलि के इन साधु-संन्यासियों का और श्रद्धामयी इन साहसी बेटियों ने अपने संपूर्ण जीवन को गुरु और भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे बड़ा त्याग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे बड़ा तप क्या हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे अधिक वे और क्या न्यौछावर कर सकते हैं। जीते-जी अपने आप को गुरु  और भगवान के चरणों में समाहित कर देना बहुत बड़ा तप है। हमारे भावी संन्यासी भाई-बहनों ने यौवन में ही इस तप को अर्जित कर लिया।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">युग धर्म व विश्व धर्म है वेद धर्म</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय स्तर पर हमने रामनवमी को सन्यास के लिए राष्ट्रीय पर्व जैसा बना दिया है। आज लाखों-करोड़ों लोगों के मन में संन्यास के प्रति श्रद्धा का भाव जगा है। संन्यास धर्म का हमारे सनातन धर्म में बहुत बड़ा एक शिखर स्थान है। करोड़ों की आबादी में से संन्यासी तो मु</span>_<span lang="hi" xml:lang="hi">ी भर बनेंगे लेकिन वे पूरी दुनिया को धर्म का मार्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेद का मार्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप का मार्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संयम का मार्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य का मार्ग दिखाएँगे। पूज्य स्वामी जी ने इन चार पांच शब्दों को एक साथ जोड़कर योग धर्म नाम दिया है। वेद धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यास धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सनातन धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा धर्म और इनको साथ जोड़कर युग धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व धर्म बना दिया है। यह एक ऐसा क्रम है जो लोगों की समझ में आसानी से आ जाता है। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आंतरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक व राजनीतिक संविधान</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हिंदू धर्म विश्व धर्म बनेगा या नहीं बनेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंदू राष्ट्र बनेगा या नहीं बनेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसको लेकर के बहुत तरह के राजनीतिक और बहुत तरह के वैचारिक सिद्धांत प्रश्न उठाते हैं। लोग पूछते हैं कि देश  हिंदुत्व से चलेगा या संविधान से चलेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">पूज्य स्वामी जी ने इसके लिए एक नया शब्द दिया कि देश और देश का शासन-प्रशासन चलेगा संविधान से और हमारे जीवन की आंतरिक व्यवस्था चलेगी हमारे वेद के विधान से। हमारे लिए राष्ट्र का संविधान सर्वोपरि है किन्तु हमारा एक आंतरिक संविधान भी तो है। हमारे सनातन धर्म में हमारा आध्यात्मिक संविधान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक राजनीतिक संविधान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और यह तो यह होना ही चाहिए। राजकाज कैसे चलेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">शासन-प्रशासन कैसे चलेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके लिए संविधान है लेकिन शासन प्रशासन के साथ-साथ </span>99<span lang="hi" xml:lang="hi">त्न हमारे जीवन के वह घटक होते हैं जो आत्मा अनुशासन से चलते हैं। यह हमारा योग धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेद धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सनातन धर्म और हम सब के लिए तो हमारा संन्यास धर्म ही हमारा आंतरिक जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक तथा वैचारिक संविधान है। सनातन धर्म ही शाश्वत सत्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह दृष्टि हमें पूरी दुनिया में डालनी है और पूरी दुनिया इसका अनुसरण करेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और कोई रास्ता भी तो नहीं है इसके अलावा। इस दृष्टि के साथ हमें सनातन धर्म के सच्चे संन्यासी विशेषताओं के अनुगामी बनना है। हम ऋषियों के अनुगामी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषियों के वंशधर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिनिधि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके प्रतिरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक सच्चे उत्तराधिकारी बनकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके सारी आध्यात्मिक विरासत को अपने जीवन में डालकर हमें एक बहुत ही पुण्य पथ पर आरोहण पाना है।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यास</span> <span lang="hi" xml:lang="hi"><span lang="hi" xml:lang="hi">परम्परा</span></span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का गौरव</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यास जीवन का बहुत ऊंचा आरोहण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन में संन्यासी होने से बड़ा कोई तप और त्याग नहीं हो सकता है। अपने जीवन को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी जवानी को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी सारे कामनाओं को आहूत कर देना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह बहुत बड़ा त्याग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुत बड़ा तप है। इसीलिए इसी भाव चेतना से जब पिछली बार संन्यास दीक्षा कार्यक्रम में पूज्य गुरु शरणानंद जी महाराज आए तो आपको साष्टांग प्रणाम करके यह कहा था कि अब आप साधु हो गए हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आप सब नारायण के रूप हो। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे अंतर्मन में जो आप सबके लिए जो गौरव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह शब्दों की सीमाओं से परे है। वहाँ हम नि:शब्द हो जाते हैं। इतना बड़ा आपका त्याग है या तो ऐसे हमारे सभी तपोनिष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैराग्यवान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तितिक्षु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुमुक्षु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेदनिष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुनिष्ठ आप सब भाई और ऐसे ही हमारी परम तपस्विनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विदुषी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मवादिनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धामई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह बहने बेटियां जो अपने जीवन को इस अनुष्ठान के लिए आहूत कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसन्नता का उत्सव मना रहे हैं कि अभी भी हमारा सनातन धर्म गौरवशाली है। आप सबके तप व त्याग से करोड़ों लोगों के हृदय में उमंग जागती है। उनके भीतर एक जुनून</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आशा और विश्वास जगता है। यह बहुत बड़ी बात है कि हमारे सनातन धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा वेद धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे संस्कार हमारी परंपरा जिंदा रहेगी।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यास धर्म सेवा धर्म</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कई लोग अपने कुल व वंश के लिए आशान्वित होते हैं कि उनके कुल-वंश यशस्वी हों। प्रत्येक भारतीय एसे संन्यासी बनें या न बनें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे उसमें तामसिकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजसिकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे उसमें कभी कोई दोष भी हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जब सनातन धर्म की बात आती है तो उसका भी सीना गौरवान्वित हो जाता है। और जब वह किसी सनातन धर्म के सच्चे संन्यासी को देखता है तो उस पापी का भी सिर उसके चरणों में झुक जाता है और वह कहता है कि नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">होना तो यही चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन यही है। संन्यास में इतनी वीरता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें इतना तप-त्याग है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके पीछे अपने पूर्वजों की कितनी बड़ी पुण्याई है। जब मैं इस संन्यास धर्म की जड़ में जा कर देखता हँू कितने हजारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाखों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ों पूर्वजों की पुण्याई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तिगत जीवन में तप और सार्वजनिक जीवन में वैभव के संकल्प के साथ हम आगे बढ़ते हैं तो यह जीते जी ब्रह्मलोक में भगवान के आश्रय में सन्निधि में जीते ही मोक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीते जी स्वर्ग में रहने का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीते जी जीवन की सारी पूर्णतायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सारे अभिष्ट पुरा करने का कोई अनुष्ठान है जिससे जीवन का प्रयोजन जिससे पूरा हो जाता है। जीवन की समग्र उपयोगिता करो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह शरीर भोग-विलास के लिए नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदर्शन के लिए नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह इन्द्रियाँ विषय-भोग के लिए नहीं है।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यास साधना</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंद्रियों का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन का सबसे बड़ा उपयोग किसी में होता है तो वह संन्यास है। बाकी तो दुरुपयोग कर रहे हैं। सच्चा सदुपयोग जीवन की पूर्ण उपयोगिता आखिर जीवन का अंतिम साध्य क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यास से बड़ा कोई तप त्याग नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यास से बड़ा कोई धर्म नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यास से बड़ी कोई सेवा नहीं साधना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साध्य नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिष्ट नहीं। उस संन्यास को आप सभी धारण कर रहे हो और इसमें भी बेटियों में भी काफी उत्साह है। हमको वेदों की परिकल्पना के अनुरूप विद्वान और विदुषियों के रूप में वेदनिष्ठ रहते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्म निष्ठ रहते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ संन्यासी बनना है। सनातन धर्म में संन्यासी के दो सबसे बड़े तत्व कहे गए हैं- क्षोत्रिय व ब्रह्मनिष्ठ। आपको श्रुति व शास्त्रों में निष्णात होना है और गुरु निष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मनिष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मनिष्ठ रहना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपत्काम होकर संकल्पित होना है और धीरे-धीरे संकल्प से सिद्धि तक पहुंचना है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2023</category>
                                            <category>अप्रैल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Apr 2023 21:58:50 +0530</pubDate>
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