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                <title>सनातन धर्म की विविधता - योग संदेश</title>
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                <description>सनातन धर्म की विविधता RSS Feed</description>
                
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                <title>धर्मो रक्षति रक्षित:</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. चंद्र बहादुर थापा<span>  </span>वित्त एवं विधि सलाहकार- </span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">भारतीय शिक्षा बोर्ड एवं विधि परामर्शदाता पतंजलि समूह</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2859/dharmon-rakshati-rakshate"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-12/04.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति और धर्म</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति का नियम है परिवर्तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके कारण पृथ्वी में प्रणव ध्वनि </span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ॐ’</span> </strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi">से प्रदत्त पञ्च तत्व </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पृथ्वी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वायु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्नि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आकाश</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसको आधुनिक वैज्ञानिकों ने परमाणु के अवयव </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इलेक्ट्रान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यूट्रॉन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोटोन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फोटान और वैक्यूम</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम दिए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">के सबसे सरल  परमाणु संख्या </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> हाइड्रोजन सेल से विकास होते-होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अरबों वर्षों से अनगिनत महाप्रलय और प्रलय के साथ साथ शताब्दियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्ध-शताब्दियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दशाब्दियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रति वर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रत्येक ऋतुओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ तक की प्रतिक्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">में होने वाले पृथिवी के किसी कोने में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी दिशा में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी गोलार्ध में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी महाद्वीप या महासागर में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अथवा सम्पूर्ण पृथ्वी के  महालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रलय</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">महामारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महायुद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपदा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नर संहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीव संहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आदि विभीषिकाओं को झेलते हुए एक कोषीय प्रोटोज़ोआ से विकसित होते होते अति-परिस्कृत मानव और सृष्टिकर्ता के प्रतिरूप तक के स्थिति में पहुंचे सभी निर्जीव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सजीव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वनस्पति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देव और ईश्वर तक के परिकल्पना में पहुँच कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिटते-पनपते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिष्कृत होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज के स्थिति में पहुंचे हैं। इसी परिपेक्ष में अनेक मानव सभ्यताएँ विकसित हुई और समय के साथ साथ विलुप्त भी हो गईं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मानव अकाट्य रूप से प्राणियों में उत्कृष्टतम प्रतिरूप है और पृथ्वी में ईश्वर सत्ता के सृजन में और विनाश में प्रतिभागी है। शास्त्रों में यह ईश्वर सत्ता से लड़ता-भिड़ता भी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके कथानक सनातन के पुराणों में दशावतार अथवा अन्य अवतार से लेकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्य साहित्यों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यथा वर्तमान युग के अधिकतम राज्यों और जनसँख्या ने मानने वाले बाइबिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुरान और कम्युनिस्ट-मेनिफेस्टो में भी मिलते हैं। विश्व के कोने-कोने में बिखरे हुए मानव प्रजाति के अपने-अपने उत्थान और पतन के अकथ्य और असंख्य कथानक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थतम की उत्तरजीविता</span>Ó (<span lang="hi" xml:lang="hi">स्ह्वह्म्</span>1<span lang="hi" xml:lang="hi">द्ब</span>1<span lang="hi" xml:lang="hi">ड्डद्य शद्घ ह्लद्धद्ग स्नद्बह्लह्लद्गह्यह्लह्य) अनुरूप अपने अपने प्रजाति के अंतिम सदस्य सदा अपने विकास और विस्तार करना चाहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके लिए स्वयं की सुरक्षा के साथ अपने समूह की सुरक्षा सर्व प्रथम प्राथमिकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और परमेश्वर प्राप्ति अंतिम लक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसको भारतीय पद्धति </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सनातन धर्म</span>Ó <span lang="hi" xml:lang="hi">कहता है। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म का शाब्दिक अर्थ और लक्षण</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म एक संस्कृत शब्द है - ध + र् + म = धर्म। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ध</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">देवनागरी वर्णमाला का </span>19<span lang="hi" xml:lang="hi">वां अक्षर और तवर्ग का चौथा व्यंजन है। भाषाविज्ञान की दृष्टि से यह दन्त्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पर्श</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घोष तथा महाप्राण ध्वनि है। संस्कृत (धातु) धा + ऽ विशेषण- धारण करने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पकड़ने वाला होता है। जो धारण करने योग्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही धर्म है। नैसर्गिक भाव से पृथ्वी समस्त प्राणियों को धारण किए हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्माण्ड सभी तारे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नक्षत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इत्यादि को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा परमात्मा तत्व समस्त को धारण किये हैं। कहा गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धारयति- इति धर्म:! अर्थात जो सबको संभाले हुए है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही धर्म है। सवाल उठता है कि कौन क्या धारण किए हुए हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">धारण करना सही भी हो सकता है और गलत भी। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म की अनुवाद अंग्रेजी भाषा में रिलिजन तथा इस्लाम में मजहब की गई है। मजहब का अर्थ संप्रदाय होता है। उसी तरह रिलिजन का समानार्थी रूप विश्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आस्था या मत हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन धर्म नहीं। धर्म का अर्थ रिलिजन और मजहब के अर्थ से अत्यंत व्यापक है। रिलिजन और मजहब को पंथ कहा जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि ये दोनों धर्म के पर्यायवाची के रूप में प्रयोग शब्द किसी संप्रदाय विशेष के तौर तरीके या मत/विचार विशेष को बताते हैं जो अन्य समूह या संप्रदाय के तौर तरीके या मत/विचार से भिन्न होते हैं। जबकि धर्म जीव-व्यवहार में प्रत्येक प्रजाति के व्यवहार में भिन्नता नहीं रखता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समान रूपसे धारण किये रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसीलिए इसको सनातन धर्म कहा जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कहा गया है - धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षित:। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ।। अर्थात्</span>, ''<span lang="hi" xml:lang="hi">जो पुरूष धर्म का नाश करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी का नाश धर्म कर देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जो धर्म की रक्षा करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी धर्म भी रक्षा करता है। इसलिए मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस भय से धर्म का हनन अर्थात् त्याग कभी न करना चाहिए।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">यतोऽभ्युदयनि:श्रेयससिद्धि: स धर्म:। धर्म वह अनुशासित जीवन क्रम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें लौकिक उन्नति (अविद्या) तथा आध्यात्मिक परमगति (विद्या) दोनों की प्राप्ति होती है। मनु ने धर्म के दस लक्षण बताए हैं- धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दशकं धर्मलक्षणम्।। (धृति (धैर्य)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षमा (दूसरों के द्वारा किए गए अपराध को माफ कर देना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षमाशील होना)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दम (अपनी वासनाओं पर नियन्त्रण करना)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्तेय (चोरी न करना)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शौच (आंतरिक और बाहरी शुचिता)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रिय निग्रह: (इन्द्रियों को वश में रखना)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धी (बुद्धिमत्ता का प्रयोग)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान की पिपासा)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य (मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वचन और कर्म से सत्य का पालन) और अक्रोध (क्रोध न करना)</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">ये दस धर्म के लक्षण हैं।) सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न ब्रूयात् सत्यमप्रियं। प्रियं च नानृतं ब्रूयात्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एष धर्म: सनातन:।। सत्य बोलें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रिय बोलें पर अप्रिय सत्य न बोलें और प्रिय असत्य न बोलें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसी सनातन रीति है।।</span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म का धारण</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कहा जाता है की सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्तेय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मचर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपरिग्रह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शौच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतोष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाध्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षमा आदि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म के नियमों का पालन करना ही धर्म को धारण करना है जैसे ईश्वर प्राणिधान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संध्या वंदन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रावण माह व्रत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीर्थ चार धाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मकर संक्रांति-कुंभ पर्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंच यज्ञ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा कार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूजा पाठ</span>, 16<span lang="hi" xml:lang="hi"> संस्कार और विशेषकर ईसाई और इस्लाम अनुयायियों में धर्म प्रचार आदि। परन्तु ये सभी कार्य व्यर्थ हैं यदि कोई सत्य के मार्ग पर नहीं हो। सत्य को जानने से अहिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्तेय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मचर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपरिग्रह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शौचादि सभी स्वत: ही जाने जा सकते हैं। अत: सत्य ही धर्म है और धर्म ही सत्य है। जो संप्रदाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजहब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रिलिजन और विश्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य को छोड़कर किसी अन्य रास्ते पर चल रहा है वह सभी अधर्म के ही मार्ग हैं। इसीलिए सनातन के मौलिक शाखा हित्दुत्व में कहा गया है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सत्यंम शिवम सुंदरम</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span><span lang="hi" xml:lang="hi">।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: किसी तात्कालिक लाभ अथवा प्रलोभन अथवा डर-त्रास अथवा किसी के प्रभाव में आकर सनातन सास्वत नैसर्गिक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को न तो त्यागना चाहिए न ही गिरोह बंदी कर अपने से भिन्न विचारधारा रखने अन्य व्यक्ति या समूह को प्रलोभन देकर या डरा धमकाकर या अन्य प्रभाव से अपनी गुटबन्दी में शामिल करना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि यह </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को मारने का कार्य होगा और ऐसे व्यक्ति या समूह को देर सवेर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ही मार डालेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह प्रकृति का नियम सत्य है। जिससे अलौकिक उन्नति तथा पारलौकिक कल्याण की प्राप्ति हो वह धर्म है। धर्म से ही लोक और समाज का धारण होता है। धर्म से ही अभ्युदय होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुशासनहीन समाज या व्यक्ति पतन के गर्त में गिरेगा । हमारे सत्कर्म ही प्रारब्ध बनते हैं और वही दूसरे जन्म के ऐश्वर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैभव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुख के कारण होते हैं। इसके विपरीत अधर्म को धारण करने वाले दु:ख पीड़ा को प्राप्त होते हैं। धर्म के आचरण से भोगवृत्ति का नाश होता है। हृदय की शुद्धि होती है। इस प्रकार कर्मों में असंगता की प्राप्ति होती है जहां कर्मों में असंगता की सिद्धि हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोक्ष स्वत:सिद्ध हो जाता है।   </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वभाव और गुण </span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तव में धर्म जीव के मूल स्वभाव की खोज है। धर्म एक रहस्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवाद है और आत्मा की खोज है। धर्म स्वयं की खोज का नाम है। जब भी हम धर्म कहते हैं तो यह ध्वनित होता है कि कुछ है जिसे जानना जरूरी है। कोई शक्ति है या कोई रहस्य है। धर्म है अनंत और अज्ञात में छलांग लगाना। धर्म है जन्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मृत्यु और जीवन को जानना। सनातन की मूल शाखा हिन्दू संप्रदाय में धर्म को जीवन को धारण करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझने और परिष्कृत करने की विधि बताया गया है। धर्म को परिभाषित करना उतना ही कठिन है जितना ईश्वर को। दुनिया के तमाम विचारक जिन्होंने धर्म पर विचार किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अलग-अलग परिभाषाएं दी हैं। इस नजरिए से वैदिक ऋषियों का विचार सबसे ज्यादा उपयुक्त लगता है कि सृष्टि और स्वयं के हित और विकास में किए जाने वाले सभी कर्म-धर्म हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सनातन पद्धति में स्वाभाव और गुण को व्यक्ति के दैवी और आसुरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दो प्रकार के सम्पदा के रूप में निरूपण की गई है जिसको श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में विस्तृत रूप से वर्णन किया गया है (जो महाभारत का अंश है)। इसके अनुसार दैवी सम्पदा मोक्ष अर्थात परमेश्वर प्राप्ति तथा आसुरी सम्पदा सांसारिक बन्धन प्राप्ति के कारक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसीलिए प्रत्येक आत्मा को दैवी सम्पदायुक्त हो कर परमपिता के प्राप्ति के गुण स्वाभाव रूपी धर्म अपनाना चाहिए। तानहं द्विषत: क्रूरान्संसारेषु नराधमान्। क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।। उन द्वेष करने वाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रूर स्वभाव वाले और संसार में महान् नीच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपवित्र मनुष्यों को मैं बार-बार आसुरी योनियों में गिराता ही रहता हूँ। आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि-जन्मनि। मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्।। हे कुन्तीनन्दन! वे मूढ मनुष्य मेरे को प्राप्त न करके ही जन्म-जन्मान्तर में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर उससे भी अधिक अधम गति में अर्थात् भयङ्कर नरकों में चले जाते हैं। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सनातन धर्म की विविधता</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय सभ्यता सनातन धर्म की विविधता और सौहार्द्य का द्योतक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने इस भूमि पर अनेकानेक विचारों और परम्पराओं के एक विकाशशील सहअस्तित्व को अक्षुण रखा है। तर्क-वितर्क के माध्यम से ज्ञान-विज्ञान और दर्शन के प्रति जो प्रगतिवादी और प्रयोगवादी दृष्टिकोण भारतीय विचारकों ने रखा है वह ही भारतीय सभ्यता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और आज विश्व भर में तमाम विकसित और सभ्य देशों और संस्थानों में ऐसा ही सौहार्द्य और तार्किक विचार अपनाया जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें भारत और भारतीय विचारकों का भी अतुलनीय योगदान है। आज भारतीय सभ्यता के पुराने होने पर नहीं उसके मूल स्वरूप के आधार और दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तर्क</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्रार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रगति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहअस्तित्त्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौहार्द्य जैसे आधुनिक मानवीय मूल्य होने पर हमें गर्व करने की ज्यादा जरुरत है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक साक्ष्य देखें तो विश्वभर में और भारत में आज से </span>20,000<span lang="hi" xml:lang="hi"> साल पहले केवल ऐसे कबीले थे जो खेती करना नहीं जानते थे और घुमंतू जीवन जीते हुए शिकार करके अपना पेट भरते हुए और गुफाओं में रहते हुए उनका काम चला। </span>12,000<span lang="hi" xml:lang="hi"> साल पहले घुमंतू प्राणियों ने नदियों किनारे भारत की सर्वप्रथम सभ्यता बसाई और आदिवासी जीवन से खेतिहर जीवन में निवास प्रारंभ किया। इनके छोटे-छोटे गांवों का कालांतर में शहरों में परिवर्तन हुआ। इस तरह भारत की प्रारंभिक नगर-व्यवस्था विकसित हुई जिसे हम आज सिंधु घाटी सभ्यता नाम से जानते हैं। सिंधु घाटी सभ्यता का सुमेर और अन्य सभ्यताओं से व्यापार होने लगा और फिर ईरान के आसपास पायी जाने वाली कुछ सभ्यताओं के साथ मूल निवासियों का मेलजोल </span>4000<span lang="hi" xml:lang="hi"> साल पहले उस अवस्था में पहुंचा जहां से काफी मात्रा में यूरोपीय डीएनए लेकर लोगों की खेप आकर सिंधु घाटी के स्थापित शहरों में बस कर रहने लगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यूरोपीय और सिंधु घाटी के मेलजोल से उस एक सांस्कृतिक परिपाटी का विकास हुआ जिसमें संस्कृत भाषा को अपनाकर आर्य संस्कृति का निर्माण हुआ जिसका कालांतर में वर्चस्व हो गया। मूलभूत सिंधु घाटी रहवासी दक्षिण की ओर पलायन करने लगे हालांकि उत्तर और दक्षिण दोनों के बीच पर्याप्त संबंध थे और दोनों के बीच डीएनए का काफी आदान प्रदान हुआ। इस तरह वैदिक धर्म की स्थापना हुई जिसमें उल्लिखित कर्मकांड के अनुसार तत्कालीन ब्राह्मण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षत्रिय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और शूद्र अपना पृथक् सामाजिक कार्य और जीविका रखते हुए जीवन यापन करने लगे। कर्मकांड की सत्ता और ज्ञान की वर्गीकृत सीमितता से विद्रोह की स्थिति उत्पन्न हुई। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वेदांत</span>Ó <span lang="hi" xml:lang="hi">नामक विचार में (उपनिषद् साहित्य में) वैदिक कर्मकांड से ऊपर जाकर कुछ मनीषियों ने वेदों-के-अंत सूत्रों को रचा ताकि अब उपनिषदों के दार्शनिक विचार पर लोग आ जाएं और कर्मकांड की परिपाटी से ऊपर उठकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक पूजा-पाठ से परे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानवीय अस्तित्व पर विचार करें और दार्शनिक महत्त्व के विषयों पर चिंतन-मनन करना प्रारम्भ करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए वैदिक परंपरा से पूरी तरह मुक्त और मानव से मानव में किसी भी तरह के अन्तर को नकारने वाले विचारक और उनकी धार्मिक परंपरा स्थापित हुई जिसमें श्रमण धारा के विचारक महावीर और बुद्ध सबसे प्रमुख रहे। दूसरी ओर साँख्य (उपनिषदिक) और चावार्क (स्वतंत्र) जैसे अन्य अनीश्वरवादी दर्शन भी परंपरा से स्वतंत्र होकर फलीभूत हुए। कालांतर में बुद्ध के विचार का फैलाव और ख्याति बहुत तेजी से फैली और इससे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्थापित वैदिक परंपरा</span>Ó <span lang="hi" xml:lang="hi">को स्वयं को पुनर्स्थापित करने की प्रक्रिया प्रारंभ करनी पड़ी जिसमें रामायण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महाभारत और आदि शंकराचार्य ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक परंपरा से कई जातियां</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कई गोत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शैव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैष्णव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाक्त इत्यादि होते गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्ध आगे जाकर हीनयान-महायान इत्यादि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जैन दिगंबर-श्वेतांबर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इत्यादि हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आगे जाकर हिन्दू रक्षण हेतु सिक्ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और समरसता हेतु साईं बाबा भी आए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतोषी माता भी आयीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओशो व रजनीश भी</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">और वैदिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेदांत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इत्यादि सारे एक साथ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैन की उत्पत्ति या बौध संस्कृति की उत्पत्ति के बाद वे विलुप्त नहीं हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक सुदृढ़ सशक्त धारा के रूप में बह निकले जो मूल धारा के समांतर थी। ऐसे विकास में कभी-कभी मूल धारा विलुप्त हो भी जाती है जैसे सिंधु घाटी सभ्यता की भाषा और परंपरा अपने मूलरूप में लुप्त हो गयी जबकि उसका प्रभाव वैदिक हिंदू संस्कृति पर बना रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा बौद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैन और सिक्ख आए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्य समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्म समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">के वैदिक रुझान उपजे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रामकृष्ण मिशन के वेदांत और उपनिषद आधार पर बने विचार आगे बढ़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और आज सारे विचार हमारे सामने उपलब्ध हैं बिलकुल उसी तरह जैसे कि विकास क्रम में एक कोशिका से बहु-कोशीय जीव और तमाम जैविक तंत्र बना जिसमें कुछ विलुप्त होते गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ परिवर्तित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ मिश्रित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और कुछ समांतर जीवन जीते रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यथा शार्क मछली एक तरह का जिंदा जीवाश्म है जो प्रागैतिहासिक काल से कभी विलुप्त नहीं हुआ और आज भी मानव के समांतर जीवन जी रहा है। </span></h5>
<h4 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वधर्मे निधनं श्रेय:</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शार्क मछली की प्राचीनता अध्ययन के लिए सर्वथा उचित है परन्तु प्राचीन होने से वह श्रेष्ठतम और अनुकरणीय प्राणी नहीं हो जाती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रेष्ठतम और अनुकरणीय बनने के लिए सनातन के तरह मूल धर्म में सत्यता के साथ टीके रहना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी ईश्वर को भी आना पड़ता है- यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।। अर्थात्</span>,  <span lang="hi" xml:lang="hi">जब-जब धर्म की हानि होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तब मैं आता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब-जब अधर्म बढ़ता है तब-तब मैं साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सज्जन लोगों की रक्षा के लिए मै आता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुष्टों के विनाश करने के लिए मैं आता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म की स्थापना के लिए मैं आता हूँ और युग-युग में जन्म लेता हूँ।  </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:।।</strong> अच्छी प्रकार आचरण में लाए हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है। जो व्यक्ति अपना धर्म छोड़कर दूसरे का धर्म अपनाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अपने कुलधर्म का नाश कर देता है। कुलधर्म के नाश से आने वाली पीढ़ियों का आध्यात्मिक पतन हो जाता है। इससे उसके समाज का भी पतन हो जाता है। सामाजिक पतन से राष्ट्र का पतन हो जाता है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे व्यक्ति और उसकी पीढ़ियों को मौत के बाद तब तक सद्गति नहीं मिलती जब तक कि उसके कुल को तारने वाला कोई न हो।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:।।</strong> जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है। श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।। अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि स्वभाव से नियत किये हुए स्वधर्म कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता। सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता:।। अतएव हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि धुएँ से अग्नि की भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से युक्त हैं। असक्तबुद्धि: सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृह:। नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति।। सर्वत्र आसक्ति रहित बुद्धिवाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पृहारहित और जीते हुए अन्त:करणवाला पुरुष सांख्ययोग के द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त होता है । </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समर्थ को न दोष गोसाईं</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे पूर्वजों की थाती वेदयुक्त ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्मयुक्त कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगयुक्त जीवनचर्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्रयुक्त आचार-व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परमेश्वर में दृढ़ विश्वास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं में दैवी सम्पदा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज मे उपकार के भाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इत्यादि गुणों के साथ - </span>ú <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वे भवन्तु सुखिन:। सर्वे सन्तु निरामया:। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चित् दु:ख भाग्भवेत्।। - सभी सुखी होवें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी रोगमुक्त रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभी का जीवन मंगलमय बनें और कोई भी दु:ख का भागी न बने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">के भाव के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सनातन धर्म</span>Ó <span lang="hi" xml:lang="hi">के कारण ही लगभग </span>1100<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ष के बाद भी सनातन अब विश्वपटल में अंगड़ाई लेकर गतिमान हो रहा है। संसार योग दिवस मना रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यज्ञ और आयुर्वेद सहित प्राच्य शिक्षा पद्धति को महत्व दिया जा रहा है। विश्व भारत की तरफ दिशा-निर्देश के लिए देख रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् अब सूर्योदय हो चूका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमें अपने अपने क्षेत्रों (खेतों) में किसान के तरह खर-पतवार साफ करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जोतने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सींचने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीजारोपण करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेड़बंदी करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाली सुरक्षा करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फसल को किट-पतंगों और जंगली जानवरों से बचाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फसल पकने पर सुरक्षित भण्डारण करते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अगले फसल के लिए तैयारी करने के लिए निरंतर सतर्क रहना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म करना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म और कर्म ईश्वर प्राप्ति के साधन हैं।  हमारी कुशलता और सफलता देखकर </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi">०० वर्ष पहले से अलग हुए सनातनी ईसाई-ख्रीस्त पंथी और </span>1444<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ष पहले अलग हुए ईस्लाम-पैगम्बर पंथी भी शनै: शनै: घर वापसी करेंगे</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं भी करेंगे तो हमारे आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को बरगलाकर अपने समूह में शामिल करने अथवा सनातनियों को मिटाने की कोशिश नहीं करेंगे - समर्थ को न दोष गोसाईं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि योगपीठ का योगदान</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म सत्ता ने गुरुकुल शिक्षित प्रशिक्षित दो युवा वर्तमान में योगऋषि परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज और आयुर्वेद शिरोमणि परम पूज्य आचार्य बालकृष्ण जी महाराज को देवभूमि उत्तराखंड के पवित्रतम स्थल गंगोत्री से सनातन के पुनर्जागरण के लिए अभिसिञ्चित कर महान् तीर्थ हरिद्वार के कृपालु बाग कनखल आश्रम से कर्म क्षेत्र में उत्प्रेरित किया। </span>1995<span lang="hi" xml:lang="hi"> में दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट और </span>2005<span lang="hi" xml:lang="hi"> में पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट की स्थापना से आज </span>2023<span lang="hi" xml:lang="hi"> के द्वितीय मास तक इन दो महापुरुषों की जोड़ी ने विश्व के लगभग सभी देशों में वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यज्ञ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद तथा सनातन पद्धति को ज्ञात कराया है। प्रतिवर्ष </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून को विश्व योगदिवस मनाए जाने सम्बन्धी घोषणा के लिए सूत्रधार भी ये दो युवा ही थे तथा विश्वव्यापी महामारी कोरोना (</span>Covid-<span lang="hi" xml:lang="hi">19) में कोरोनिल तथा स्वासारी के साथ अन्य रोग निरोधक आयुर्वेद तथा वैकल्पिक प्राच्य उपचार पद्धति से करोड़ों जनमानस को सुरक्षित करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईश्वरीय कार्य ही थे। पतंजलि समूह द्वारा न केवल भारत अपितु नेपाल सहित विदेश में भी यज्ञ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैकल्पिक उपचार पद्धति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय मूल्य-मान्यताओं आधारित शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदूषण रहित वातावरण तथा कृषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाद्य उपज और खाद्य प्रसाधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निरोगी काया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी जागरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सनातन के पुनर्स्थापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इत्यादि के लिए समूह की कंपनियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ट्रस्टों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पतंजलि विश्वविद्यालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय शिक्षा बोर्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यकुलम्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुकुलम् जैसे संस्थानों के माध्यम से अथक परिश्रम किया जा रहा है जिसके लिए अपार जन समर्थन देश-विदेश में सर्वत्र मिल रहा है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह है<strong> </strong></span><span style="color:rgb(35,111,161);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धर्मो रक्षति रक्षित:</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span> </strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi">के उत्कृष्ट उदहारण। अस्तु।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
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                <pubDate>Wed, 01 Mar 2023 21:42:34 +0530</pubDate>
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