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                <title>प्रज्ञापराध - योग संदेश</title>
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                <description>प्रज्ञापराध RSS Feed</description>
                
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                <title>प्रज्ञापराध</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3000/pragyaparadh"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/53.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   आ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">युर्वेद के एक महान् ग्रन्थ चरक संहिता में हमें शिक्षा के रूप में एक सुन्दर वाक्य सुनने को मिलता है- </span><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञापराधो मूलं सर्वरोगाणाम्</span>’</strong><span lang="hi" xml:lang="hi">। शरीर व मन में विकारों के रूप में पैदा होकर जो कष्ट देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्ति को तोड़ डालते हैं वे रोग कहलाते हैं (रुजन्ति ते रोगा:)। जैसे शरीर-सम्बन्धी सैकड़ों प्रकार के रोग होते हैं- ज्वर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाँसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जुकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेट दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमर दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वात विकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कफ विकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पित्त विकार इत्यादि। उसी प्रकार काम-क्रोध-लोभ-मोह-मान-मद-ईर्ष्या-असूया इत्यादि अनेकानेक मानस रोग भी होते हैं। आचार्य चरक यह देख रहे हैं- रोग चाहे शारीरिक हों या मानस वे अकारण नहीं आते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनका कोई न कोई कारण होता है। यद्यपि कारण दो प्रकार के हो सकते हैं- नित्य या आगन्तु। पर रोगों का कारण नित्य होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो न तो उसे हटाया जा सकता और न ही उससे बचा जा सकता। कारण यदि आगन्तु है तो उसे हटाया भी जा सकता है और सावधानी रखी जाए तो बचा भी। आगन्तु कारण के भी दो रूप हो सकते हैं- सामान्य और विशेष। सामान्य वह होता है जो सब जगह मिले और विशेष वह जो कहीं मिले कहीं न मिले। महामति आचार्य चरक ने सभी शारीरिक व मानस रोगों का एक सामान्य-साझा कारण खोजकर बतलाया। वह है </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञापराध</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। आचार्य ने यह बात यथाप्रसंग सम्पूर्ण शास्त्र में बार-बार दोहराई है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञापराध क्या होता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य ने स्वयं ही अपने महान् कण्ठ से यह बतलाने की भी कृपा की है। वे कहते हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">धीघृतिस्मृतिविभ्रष्ट: कर्म यत् कुरुतेऽशुभम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञापराधं तं विद्यात् सर्वदोषप्रकोपणम्।। (शा. १.१०२)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धृति और स्मृति से च्युत हुआ व्यक्ति जब कोई अशुभ कर्म करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वात-पित्तादि सभी शारीरिक दोष और रजस्-तमस् आदि मानस दोष प्रकुपित हो जाते हैं यही </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञापराध</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">बुद्ध्या विषमविज्ञानं विषमं च प्रवर्तनम्।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">प्रज्ञापराधं जानीयान्मनसो गोचरं हि तत्।। (शा. १०.१०९)</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि से विषम देखना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो चीज जैसी है उसे वैसा न देखना और फिर गलत समझ के कारण गलत प्रवृत्ति का होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गलत आचरण करना ही </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञापराध</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">है। यह </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञापराध</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">मन के क्षेत्र में आता है अर्थात् मन के द्वारा ही इसे देखा जा सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धृति और स्मृति ये तीनों ही प्रज्ञा के भेद हैं। प्रज्ञा की तीनों शक्तियाँ जब ठीक-ठीक काम करती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ही व्यक्ति प्रज्ञावान् कहा जाता है। तीनों में से कोई एक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दो या तीनों ही भ्रष्ट हो जाती हैं तो इसे ही </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञापराध</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं। आचार्य ने इन तीनों का ही पृथक्-पृथक् लक्षण व पृथक्-पृथक् स्वरूप दर्शाया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">धीविभ्रंश क्या है</span>?’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस बारे में आचार्य कहते हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">विषमाभिनिवेशो यो नित्यानित्ये हिताहिते।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">ज्ञेय: स बुद्धिविभ्रंश: समं बुद्धिर्हि पश्यति।। (शा. १.९९)</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नित्य में अनित्य और अनित्य में नित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हित में अहित और अहित में हित देखना ही विषमाभिनिवेश (अयथाभूतत्वेन निश्चय) है। यदि कोई यह पूछे कि यह बुद्धिविभ्रंश कैसे है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इसके उत्तर में यही कहना होगा कि बुद्धि सर्वदा सम (यथाभूत) ही देखती है। बुद्धि की यह योग्यता है कि जो चीज जैसी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसको वैसा देखे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु बुद्धि यदि अपनी इस योग्यता का निर्वाह ठीक से नहीं कर पा रही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इस असमदर्शन को बुद्धिविभ्रंश कहना उचित ही है। योगशास्त्र ने बुद्धिविभ्रंश को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अविद्या = अविवेक = विपरीत ज्ञान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इन नामों से स्मरण किया है। न्यायदर्शन में इस स्थिति को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मोह या मिथ्याज्ञान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहा गया है। अर्थात् </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वह बुद्धि जो अपने हित-अहित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नित्य-अनित्य को ठीक-ठीक नहीं देख पा रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हितकारक खान-पान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आहार-विहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहार आदि को अहितकारक समझ रही है और जो अहितकारक है उसे हितकारक।</span>‘ <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार जो बुद्धि आत्मादि नित्य तत्त्वों को नित्य और शरीरादि अनित्य पदार्थों को अनित्य नहीं समझ पा रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे भी प्रज्ञापराध का एक महत्त्वपूर्ण घटक धीविभंश कहा जायेगा। श्रीमद्भगवद्गीता १८ अध्याय के ३१</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">३२वें श्लोक में राजसी-तामसी बुद्धि के नाम से धीविभ्रंश का वर्णन है-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">अयथावत् प्रजानाति बुद्धि: सा पार्थ राजसी।।३१।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिस बुद्धि से मनुष्य धर्म और अधर्म को तथा कार्य तथा अकार्य को यथार्थ नहीं जानता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हे पार्थ! वह बुद्धि राजसी है। जबकि-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धि सा पार्थ तामसी।।३२।।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् तामसी बुद्धि तमोगुण (अन्धकार) से आवृत्त होने के कारण सब कार्यों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बातों को विपरीत ही मानती है। अधर्म को धर्म और धर्म को अधर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छी वस्तु को बुरी वस्तु और बुरी को अच्छी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परम तत्त्व को तुच्छ और तुच्छ को परम- इस प्रकार सब कुछ विपरीत मानती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञापराध का दूसरा घटक है धृतिभ्रंश। धृतिभ्रंश का वर्णन करते हुए आचार्य कहते हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विषयप्रवणं सत्त्वं धृतिभ्रंशान्न शक्यते।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नियन्तुमहितादर्थाद् धृतिर्हि नियमात्मिका।। (शा. १.१००)</span></strong></span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि धृतिभ्रंश हो रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो विषयों में डूबे हुए मन को अहित अर्थ से कभी रोका नहीं जा सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि धृति ही तो नियन्त्रण करने वाली शक्ति है। मन व इन्द्रियों का नियंत्रण करने में अशक्त धृति अपने कर्म से भ्रष्ट हुई </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धृतिभ्रंश</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम से कही जाती है। जब कभी व्यक्ति का मन अशुभ में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधर्म में या अपने संकल्पित पथ से अन्य पथ पर जाने लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियाँ अपने विषयों में दौड़ने लगती हैं तो धृति उन्हें रोककर रखती है। भाव यह है- मनुष्य के पास यह एक अद्भुत सामर्थ्य वाली शक्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके द्वारा वह अपने को अकार्य से रोक कर रखता है। मनु ने भी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं.</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म के दस लक्षण बताते समय धृति को सबसे प्रथम स्थान पर रखा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उसके बिना धर्ममार्ग में प्रवेश ही नहीं है। संस्कृत में धृ धातु </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पकड़ कर रखना</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस अर्थ में प्रयुक्त होती है जैसे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हस्ते धृत्वा गच्छति</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">हाथ में पकड़ कर जा रहा है।</span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीमद्भगवद्गीता में धृति के तीन भेद बताए गये हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">धृत्या यया धारयते मन: प्राणेन्द्रियक्रिया:।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योगेनाव्यभिचारिण्या धृति: सा पार्थ सात्त्विकी।।३३।।</span></strong></span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जिस अव्यभिचारिणी धृति के द्वारा मोक्ष के साधनभूत भगवद् उपासना रूप योग से मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण और इन्द्रियों की सब क्रियाएँ धारण की जाती हैं अर्थात् मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण और इन्द्रियों की सब चेष्टाएँ जिसके द्वारा शास्त्रविरुद्ध प्रवृत्ति से रोकी जाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह धृति सात्त्विकी है। सात्त्विकी धृति द्वारा धारण की हुई इन्द्रियाँ ही शास्त्र विरुद्ध विषय में प्रवृत्त नहीं होती।</span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">कहने का तात्पर्य यह है कि अपने को नियन्त्रण में रखने वाला मनुष्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस अव्यभिचारिणी धृति के द्वारा एकाग्रता रूप योग से मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण व इन्द्रियों की चेष्टाओं को धारण किया करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोके रहता है। इस प्रकार की धृति सात्त्विकी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसङ्गेन फलाकाङक्षी धृति: सा पार्थ राजसी।।३४।।</span></strong></span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">योगेश्वर स्वयं कहते हैं कि हे अर्जुन! फलाकाङ् क्षी पुरुष जिस धृति से अत्यन्त आसक्ति पूर्वक धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काम और अर्थ को धारण करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह धृति राजसी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यया स्वप्रं भयं शोकं विषादं मदमेव च।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">न विमुञ्चति दुर्मेधा धृति: सा तामसी मता।।३५।।</span></strong></span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जिस धृति के द्वारा दुर्बुद्धिग्रस्त मनुष्य स्वप्र (निद्रा)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भय (त्रास)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषाद और मद को नहीं छोड़ता। अर्थात् विषय सेवन को ही अपने लिये बहुत बड़ा पुरुषार्थ मानकर उन्मत्त की भाँति मद को मन में सदा कर्तव्य रूप समझता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन सबको नहीं छोड़ता। अर्थात् धारण ही किये रहता है। उसकी धृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तामसी मानी गयी है।</span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि स्मृतिभ्रंश का निरूपण इस प्रकार है-</span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">तत्त्वज्ञाने स्मृतिर्यस्य रजोमोहावृतात्मन:।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">भ्रश्यते स स्मृतिभ्रंश: स्मर्तव्यं हि स्मृतौ स्थितम्।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="right"><strong><span style="color:rgb(186,55,42);">(<span lang="hi" xml:lang="hi">शा. स्थान १.१०१)</span></span></strong></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">रजोगुण-तमोगुण से आवृत आत्मा वाले जिस व्यक्ति की तत्त्व ज्ञान में स्मृति भ्रष्ट हो जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह स्मृतिभ्रंश का लक्षण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि स्मर्तव्य विषय स्मृति में स्थित रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मृति के अपराध से स्मर्तव्य विषय का विस्मरण हो जाता है। योगशास्त्र में भी स्मृति साधन को ज्ञान प्राप्ति का अन्यतम साधन बताया गया है- अर्थापत्ति से वहाँ यह बात ध्वनित होती है कि स्मृति नहीं तो ज्ञान भी नहीं (श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञा.)। यो.सू. १.२०</span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">चरक में सूत्रस्थान के उपसंहार के रूप में एक बड़ा ही सारगर्भित र्मार्मक संदेश उपलब्ध है-</span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">समग्रं दु:खमायत्तमविज्ञाने द्वयाश्रयम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सुखं समग्रं विज्ञाने विमले संप्रतिष्ठितम्।।</span></strong></span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">श्लोक में पठित </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अविज्ञाने</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द शब्दान्तर से प्रज्ञापराध की ओर ही इङ्गित कर रहा है। भाव यह है- शरीर व मन का समग्र दु:ख अविज्ञान=मिथ्याज्ञान या प्रज्ञापराध पर ही टिका हुआ है। इसी प्रकार शरीर व मन का सम्पूर्ण सुख-शुद्ध ज्ञान में प्रतिष्ठित है। श्रीमद्भगद्गीता में प्रज्ञा (शुद्धबुद्धि/सात्त्विकबुद्धि) की महिमा इस प्रकार वर्णित है कि-</span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:left;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धि सा पार्थ सात्त्विकी।।</span></strong></span></h5>
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् प्रवृत्ति और निवृत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्य और अकार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भय और अभय तथा बन्ध और मोक्ष- इन सब को जो बुद्धि ठीक-ठीक जानती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हे पार्थ! वह बुद्धि सात्त्विकी है। जैसा कि पहले ही कहा गया कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मृति</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञा की ये तीन अवस्था विशेष हैं। प्रज्ञावान् व्यक्ति इन तीनों को स्वस्थ रखता हुआ पूर्ण सुखमय जीवन व्यतीत करता है। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>मार्च</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2015 21:53:24 +0530</pubDate>
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