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                <title>हारमोंस - योग संदेश</title>
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                <description>हारमोंस RSS Feed</description>
                
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                <title>हारमोंस, ग्रंथियों में छिपे  स्वस्थ-निरोग लम्बी जिंदगी के रहस्य</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. नागेन्द्र कुमार नीरज</span></strong><strong><span>, </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">निर्देशक-योगग्राम</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3001/secrets-of-a-healthy-and-long-life-hidden-in-hormones-and-glands"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/552.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  अमेरिका</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की इडाहो यूनिवर्सिटी के प्राणिशास्त्री </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्टीव ऑस्टेड</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">ने अनुसंधान कर दावा किया है कि 2000 ई. में जन्मा उनका वारिस २१५० तक यानी १५० वर्ष तक जिन्दा रहेगा। डॉ. आस्टेड का मानना है कि कई प्राणियों की उम्र में तिगुनी वृद्धि हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो मनुष्य की औसत उम्र भी उसी रफ्तार से बढ़ेगी। यद्यपि शिकागो यूनिवर्सिटी के सेन्टर ऑफ एजिंग के अनुसंधानकर्ता </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एस. जय औल्शैस्की</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का मानना है कि मनुष्य की औसत आयु बढ़ रही है तथा बढ़ेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु उतनी नहीं जितना ऑस्टेड दावा करते हैं। कैलिफोर्निया स्थित </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बक इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के वैज्ञानिक साइमन मैलोव ने ऑस्टेड के आशावादितापूर्ण कथन एवं प्रयोग को महत्वपूर्ण करार दिया। उनका मानना है कि भोजन में कैलोरी कम करके तथा दीर्घ जीवन प्रदान करने वाले पोषक तत्वों को बढ़ा कर जीवन डोर लम्बी खींची जा सकती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इ</span><span lang="hi" xml:lang="hi">सी क्रम में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कनेक्टीकट यूनिवर्सिटी</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के वैज्ञानिकों ने एक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रूट फ्लाई</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के जीन में परिवर्तन कर उसका जीवन ३७ दिन से बढ़ाकर ७० से ११० दिन करने में सफलता पाई है। अगर इसी तरह का कोई जीन मानव में परिवर्तित कर दिया जाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ऑस्टेड के कथन को सत्य होने से कोई भी नहीं रोक पायेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यद्यपि किसी भी प्राणी की स्वाभाविक आयु वयस्क होने में लगे कुल समय का छह गुणा मानी जाती है। इस प्रकार व्यक्ति२५ वर्ष में वयस्क होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसकी स्वाभाविक आयु १५० वर्ष होनी ही चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो यौगिक क्रियाओं द्वारा संभव भी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अंत:श्रावी ग्रंथियों का रहस्य:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस संकल्पना पूर्ति में शरीर की अंत:स्रावी ग्रंथियों का विशेष महत्व है। कभी-कभी ये ग्रंथियाँ अराजक एवं असंतुलित ढंग से कार्य करने लगती हैं। जिसके दुष्परिणामस्वरूप ही बौनापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दैत्याकार शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाल्यावस्था (८-९ वर्ष) में ही गर्भधारण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुढ़ापा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थि विकृति स्त्रियों को मूँछें आना व पुरुषों में मूँछें नहीं आना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लिंग परिवर्तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काम-वासना की अत्यधिक उत्तेजना अथवा पूर्ण निष्क्रियता आदि अनेक प्रकार की विचित्रताएँ परिलक्षित होती हैं। जबकि योगाभ्यास से इनमें संतुलित स्राव होने के प्रमाण मिले हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब साधारण से साधारण मानव महामानव बनने में समर्थ होगा। ये रहस्यमयी अंत:स्रावी ग्रंथियाँ निम्र हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पिट्यूटरी ग्रंथि- </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे ६ प्रकार के नियंत्रक तथा कुछ अन्य प्रकार के हार्मोन निकलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जीवन की समस्त क्रियाओं को प्रभावित करते हैं। इसके द्वारा अन्य ग्रंथियाँ भी नियंत्रित होती हैं। इसलिये इसे रानी ग्रंथि भी कहा जाता है। इसमें कुछ हार्मोन का स्राव कम होने से बौनापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोटापा तथा अधिक स्राव से दैत्याकार शरीर (जिम्नाटिज्म) एवं एक्रोमिगली हो सकती है। निकलने वाले हार्मोन जीव विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शारीरिक जल समतोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तचाप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेशाब नियंत्रण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्भाशय कुंचन को प्रभावित करते हैं। इसकी स्थिति मस्तिष्क में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाइपोथेलेमस के पास है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पिनियल ग्रंथि-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> योगियों ने इसे तीसरी आँख (आज्ञाचक्र) कहा है। सन् १९५८ में येल मेडिकल स्कूल के बी. लर्नर ने पिनियल से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मेलेटोनिन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">हार्मोन को पृथक् कर इसके महत्व को सार्वभौम बनाया। यह हार्मोन भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध एवं अन्य भावनात्मक संवेगों को नियंत्रित करता है। युवावस्था के साथ ही यह अपना कार्य पिट्यूटरी ग्लैण्ड को सौंप देता है। मन:चिकित्सक डेनियल ने एक अन्य </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सेरोटेनिन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">हार्मोन को इससे पृथक् किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी संरचना एल.एस.डी. से मिलती है। यह ग्रंथि भूमध्य में स्थित है। केला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खजूर आदि मीठे फलों को खाने से सेरोटेनिन का स्राव बढ़ जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदासी एवं अनिद्रा की शिकायत दूर होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>थायरॉयड ग्रंथि-</strong> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">थायरॉक्सिन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">हार्मोन निकलता है। इसके कम निकलने से बच्चों में जड़ वामनता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रौढ़ों में मिक्सोडमा नामक भयंकर रोग होते हैं। शारीरिक व मानसिक विकास रुक जाता है। चिड़चिड़ापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कब्ज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाल झड़ना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोटापा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेशियों की कमजोरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिरोवेदना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आलस्य आदि लक्षण दिखते हैं। आधारभूत चयापचय (</span>Basal Metabolism<span lang="hi" xml:lang="hi">) कम हो जाता है। ऐसी स्थिति में कृत्रिम थायरॉक्सिन दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हानिकारक साबित होता है। जैसे रक्तमें थायरॉक्सिन बढ़ने से चयापचय की क्रिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊतकों द्वारा दहन क्रिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर का तापक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पसीना निकालने की क्रिया तीव्र हो जाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पैराथायरॉयड ग्रंथि-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> यह थायरॉयड के पीछे चार पिण्डक के रूप में होता है। इससे पैराथायरॉयड हार्मोन निकलता है। इसकी कमी से कैल्शियम तथा फॉस्फोरस चयापचय अव्यवस्थित हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे हड्डियाँ अच्छी तरह विकसित नहीं होतीं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">थायमस ग्रंथि-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong> </strong>बच्चों में यह वृषण से सम्बन्धित है। वैज्ञानिकों का खोजी दल इस ग्रंथि से निकलने वाले </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">थायमोसिन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">हार्मोन की चमत्कारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को देखकर आश्चर्यचकित हैं। स्व. अब्राहम व्हाइट तथा डॉ. गोल्डस्टीन ने १९६६ ई. में थायमोसिन की खोज की। इस समय १५० से भी अधिक खोजी दल इस नैसर्गिक औषधि पर कार्यरत हैं। यह शरीर में टी-लिम्फोसाइट्स नामक एक प्रबल कीटाणुनाशक रसायन बनाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो शरीर की प्रतिरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ एवं सशक्तबनाती है। प्रयोगों से देखा गया है कि थायमोसिन की कमी से बच्चों में शारीरिक विकास का धीमा पड़ना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीघ्र ही रोगों के चंगुल में फँसना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैन्सर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नपुंसकत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीघ्र मृत्यु आदि अनेक घातक रोग हो जाते हैं। २५ से ५५ वर्ष की उम्र के बीच थायमोसिन का निकलना कम होने लगता है। यद्यपि इसकी सक्रियता से व्यक्तिसदा युवा बना रह सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लैंगरहैन्स द्वीप गंथि-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong> </strong>पैंक्रियास में एक द्वीप आकार की संरचना होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें अल्फा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीटा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डेल्टा और थीटा कोशिकाएँ होती हैं। इनमें पृथक्-पृथक् हार्मोन निकलते हैं। अल्फा व बीटा कोशिकाओं से एक-दूसरे के भिन्न गुण वाले ग्लुकोन तथा इन्सुलिन हार्मोन निकलते हैं। ये शर्करा की चयापचय क्रिया को प्रभावी बनाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एड्रीनल ग्रंथि-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong> </strong>यह गुर्दे के ऊपरी सिरे पर स्थित होता है। इसके बाहरी भाग कार्टेक्स से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कार्टिन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">या एड्रिनो कार्टिकल हार्मोन निकलता है। काॢटन हार्मोन कोलेस्ट्रॉल से बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर हाइड्रो साइक्लोपेन्टाटेनोफेनानथेरिन मूल पदार्थ से एड्रीनल कार्टेक्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्टिसोल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्टिकोस्टेरॉन नामक ग्लूको कोर्टिकॉयड्स हार्मोन पैदा करता है जो कार्बोहाइड्रेट के चयापचय को नियंत्रित एवं नियमित करता है। दूसरा एल्डोस्टेरॉन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिहाइड्रोएपियनड्रोस्टेरॉन नामक मिनरल्स कॉर्टिकोइड्स हार्मोन निकलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सोडियम तथा पोटेशियम के चयापचय को सुधारता है। तीसरे ग्रुप में एड्रोजेन्स (१७ कीटोस्टोरोइड्स)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एस्ट्रोजेन्स (एस्ट्राडिओल) तथा प्रोजेस्टीन्स (प्रोजेस्टेरॉन) हार्मोन पैदा करता है। तीसरे ग्रुप के तीनों हार्मोन प्रजनन प्रक्रिया में भाग लेते हैं। रक्तके लवणों में संतुलन बनाये रखने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शर्करा के चयापचय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गौण लैंगिक लक्षणों का विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषत्व की वृद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भ्रूणावधि के परिवर्द्धन व विकास आदि कार्यों का सम्पादन इन हार्मोनों द्वारा होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">और भी बड़े काम की एड्रीनल ग्रंथि:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी ग्रंथि से स्रावित हारमोंस की कमी से एडीसन व्याधि होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे भयानक पेशीय क्लान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक अवसाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्वचा का पीलापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाचन-संस्थान की गड़बड़ी तथा निम्र रक्तचाप आदि लक्षण दिखते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एड्रीनल ग्रंथियों के मध्य भाग मेडूला से एड्रीनल (</span>C<span lang="hi" xml:lang="hi">3</span>H<span lang="hi" xml:lang="hi">2</span>O<span lang="hi" xml:lang="hi">3</span>N<span lang="hi" xml:lang="hi">) नारएड्रीनलिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैटेकोलामिन तथा डोपामिन हार्मोन निकलते हैं। एड्रीनल (एपिनेफ्रिन) हार्मोन प्लीहा त्वचा की रक्तवाहिनियों को संकुचित करता है। अस्थि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँसपेशियों को फैलाता है। दिल की धड़कन को बढ़ाता है। साँस की नलियों को खोलता है। फेफड़ों की माँसपेशियों को शिथिल करता है। यकृत में संचित ग्लाइकोजिन को ग्लूकोज में बदलने के लिये प्रेरित करता है। खून में फैटी एसिड को बढ़ाता है। आमाशय एवं आँत की प्रक्रिया को विक्षुब्ध करता है। नारएड्रीनलिन (नारएपिनेफ्रिन) हार्मोन सूक्ष्म धमनियों एवं शिराओं को संकुचित करता है। रक्तप्रवाह की प्रतिरोध शक्तिकी वृद्धि करता है। रक्तचाप बढ़ाता है। हृदय गति को मंद करता है। डोपामिन धमनियों को फैलाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्डियेक आउटपुट को बढ़ाता है। गुर्दे में रक्तप्रवाह को तेज करता है। कैटे कोलामिन शरीर के अन्य भाग से भी निकलता है। ये आरेखित पेशियों के संकुचन पर नियन्त्रण रखते हैं। इसका स्राव अधिक होने पर (चिन्ता व क्रोध के समय) उच्च रक्तचाप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीव्र हृदय गति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आँसू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पित्त तथा पसीना तीव्र गति से निकलता है। भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तेजना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्महत्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पागलपन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनिद्रा जैसे लक्षण भी दिखते हैं। सिम्पेथैकि संस्थान के स्नायुओं से निकलने वाले हार्मोन </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सिंपेथिन</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा एड्रीनलिन हार्मोन की क्रियाओं में काफी समानता है। इसके प्रभाव से रक्तका थक्का बन जाता है। रक्त-वाहिनियाँ सँकरी हो जाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे मस्तिष्क एवं हृदय सम्बन्धी अनेक विकृतियाँ दिखती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गोनड्स ग्रंथि- यह जननांग का आधार है। अण्डाणु एवं शुक्राणु के अतिरिक्तगोनड्स पुरुषों में पुरुष हार्मोन जैसे एण्डरोस्टिरोन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एण्ड्रोजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टेस्टोस्टेरॉन तथा टेस्टोस्टिरोन तथा महिलाओं में इस्ट्रोन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एस्ट्रोजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पोजेस्टिरोन तथा रिलैक्सिन महिला हार्मोन स्रावित करता है। इन हार्मोन्स के आधार पर ही पुरुष-स्त्री गुणों का विभाजन होता है। पुरुष हार्मोन के कारण ही दाढ़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूँछ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारी आवाज तथा शरीर का विशेष आकार-प्रकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्त्रियों के प्रति आकर्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवा उमंग आदि गौण लैंगिक लक्षण पुरुषों में दिखते हैं। स्त्रियों में स्त्री हार्मोन से स्त्रीमद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रजोचक्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्तनों का विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रमणी प्रवृत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नारी सुलभ उमंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामशक्तिव कमनीयता के गुण दिखते हैं। रिलेक्सिन हार्मोन प्रसव में सहायक होता है। कभी-कभी पुरुषों में स्त्री हार्मोन की अधिकता होने से उनमें स्त्रियोचित गुण तथा महिलाओं में पुरुष हार्मोन की अधिकता से पुरुषोचित गुण दिखते हैं। लिंग परिवर्तन इसी आधार पर होता है। मनोवैज्ञानिक एडलर काम सम्बन्धी शोधों से इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि सुन्दर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आकर्षक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमनीय व्यक्तित्व होते हुए भी अनेक स्त्रियों में काम व रमणीयता का अभाव होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके चलते उनका दाम्पत्य जीवन दु:खी रहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आँतों का म्यूकस मेम्ब्रेन भी कोलेसिस्टोकाइनिन तथा सिक्रिटिन नामक हार्मोन पैदा करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो भोजन की पाचन क्रिया को व्यवस्थित करते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योगाभ्यास से ग्रंथियों पर नियंत्रण:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिकों का मत है कि योगाभ्यास के द्वारा इन हार्मोंस ग्रंथियों पर सहज नियंत्रण होता चलता है। अनुसंधानानुसार आसन करते समय प्रत्येक क्रिया के प्रति होश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतस् में साक्षी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चेहरे पर मुस्कुराहट होनी चाहिए। योगाभ्यासी कर्म + साक्षी भाव + मुस्कुराहट-अहंकार = कर्मयोग के समीकरण को सदैव स्मरण रखें अर्थात् प्रत्येक क्रिया के प्रति होश बनाकर रखना चाहिए। इस प्रकार से प्रत्येक यौगिक क्रिया संगीतपूर्ण होने लगती है। अंतस् में साक्षी भाव जाग्रत होता है और योगस्थ होने में न केवल सहायता मिलती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु जीवन रास्ते पर आने लगता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत:</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> योग का अपना विज्ञान है। शरीर के अंगों को यौगिक आसनों से विशेष प्रभावित होते सहज देखा जा सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिस प्रकार मलमूत्र आदि दुर्गन्धित पदार्थ धरती से संयोग कर बीजों के माध्यम से पुष्पों में प्रविष्ट कर सुगन्ध में परिवर्तित हो जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार जीवन में प्रकट होने वाली क्रोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विक्षिप्तता आदि दुष्प्रवृत्तियाँ योग द्वारा जीवन में क्षमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहकारिता के पुष्पों में रूपान्तरित हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन को सुगन्ध व संगीत से भर देती हैं। योग दुष्प्रवृत्तियों का दमन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूपान्तरण करता है। यही नहीं योगाभ्यास हारमोंस ग्रंथियों में संतुलन लाकर दीर्घ जीवन का मार्ग खोलता है। यह १५० वर्षीय जीवन का राज भी इसी में है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>स्वास्थ्य समाचार</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>मार्च</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2015 21:50:44 +0530</pubDate>
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