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                <title>विद्यार्थियों के परीक्षाकाल में जरूरी है अभिभावकों की सहानुभूति - योग संदेश</title>
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                            <item>
                <title>विद्यार्थियों के परीक्षाकाल में जरूरी है अभिभावकों की सहानुभूति</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. नरेन्द्र कुमार</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3004/parents--sympathy-is-necessary-during-students--examination-period"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/14.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   दु</span><span lang="hi" xml:lang="hi">श्चिंता एक ऐसी मन:स्थिति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो आजकल बच्चों में परीक्षा में बैठते समय या उससे पूर्व आ धमकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके कारण उनमें बेचैनी और मानसिक तनाव की स्थिति पैदा हो जाती है। आत्मविश्वास कमज़ोर पड़ता है तथा हीनता के कारण परिणाम के प्रति आशंका जन्म लेती है और वे परीक्षा में अच्छी प्रकार से कार्य-निष्पादन (</span>performance<span lang="hi" xml:lang="hi">) नहीं कर पाते। दुश्चिन्ता के कारण बालक में निराशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हतोत्साह (</span>Nervousness<span lang="hi" xml:lang="hi">) की संभावना भी देखने में आती है। छात्रों को चक्कर आने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साँस उखड़ने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नब्ज के तेज होने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तदबाव (</span>Blood Pressure<span lang="hi" xml:lang="hi">) अधिक होने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यधिक पसीना आने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूर्छित हो जाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर में दर्द होने जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है। इससे बचाव के लिए अध्यापक एवं माता-पिता द्वारा जागरूक रहकर पता लगाना आवश्यक है कि कहीं परीक्षा के दिनों में मानसिक तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आशंका के कारण उनके बच्चों को परीक्षा देने में बाधा तो नहीं आ रही। परीक्षा में औचित्यपूर्ण सफलता लाने एवं मानसिक तनाव को दूर करने हेतु अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ सहानुभूतिपूर्वक निम्रलिखित प्रयास भी अवश्य करना चाहिए-</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">परीक्षा में जाने से पूर्व बच्चों का माँ-बाप के साथ बराबर संवाद बना रहना आवश्यक है और आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करते रहना चाहिए। साथ ही घर में हँसी-खुशी का माहौल रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों को अपनी क्षमताओं का अहसास कराते रहें और इस बात की चिन्ता से अपने बच्चों को मुक्त रखें कि उनके मित्र ने कितना अधिक कर लिया है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चे भी परीक्षा के पूर्व तक बातचीत करके यदि कुछ तनाव अनुभव कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे दूर करें।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अभिभावकों को यह भी ध्यान रखना है कि परीक्षा के दिनों में छात्रों को पौष्टिक आहार एवं पेय पदार्थ उपलब्ध होता रहे।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इस दौरान बच्चे यदि विधिवत् रूप से (</span>Systematically) <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिदिन समय सारणी बनाकर अपना अध्ययन करें तो वे तनाव से बच सकते हैं।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार विद्यालयों में परीक्षा से कुछ दिन पूर्व काउंसिलिंग होनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें तनावभरी स्थिति न बने। छात्रों को अपनी प्राथमिकताएँ (</span>Priorities<span lang="hi" xml:lang="hi">) तय करने की सलाह दी जाय।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">परीक्षाओं के दौरान बैठने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंखे आदि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीने के पानी की ठीक व्यवस्था होनी चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अभिभावक मिल-बैठकर बनायें दिनचर्या:</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">अधिकांश छात्र परीक्षा के दिनों में बहुत कम सोते हैं और परीक्षा के दिन से पूर्व की रात्रि बिना सोए हुए व्यतीत करते हैं। वे नींद न लेना अच्छा समझते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि यह बात ठीक नहीं है। बालक की अध्ययनशीलता की अभिभावकों को प्रशंसा करनी चाहिए और परीक्षा के दौरान उसे रात्रि में अधिक जागने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देर तक सोने के लिए हतोत्साहित करना चाहिए।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5> <span lang="hi" xml:lang="hi">नियमित योग के अंतर्गत प्राणायाम और व्यायाम करने से निश्चय ही अवसाद दूर होता है। नियमानुसार विधिवत सर्वांग आसन और अनुलोम-विलोम प्राणायाम का अभ्यास छात्रों के मानसिक तनाव को दूर करने में काफी हद तक सहायक सिद्ध होता है।</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अभिभावक शिक्षक एवं छात्र तीनों को अध्ययन-दिनचर्या या समयचक्र बनाने में परस्पर सहायता करनी चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">साधारणतया परीक्षा के दौरान रात्रि में नींद न आने की बालक शिकायत करते हैं। इससे उनमें लगातार थकान एवं एकाग्रता का अभाव देखने में आता है। अत: छात्रों को परामर्श दिया जाना चाहिए कि वे निश्चिन्त होकर अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अनापेक्षित परिणाम का दबाव न दें:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परीक्षाएँ ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि परीक्षा का अनपेक्षित परिणाम भी विद्यार्थियों में मानसिक तनाव उत्पन्न कर देता है। अच्छा परिणाम न पाने के कारण बच्चों को ताने और व्यंग सुनने का डर सताने लगता है। ऐसी स्थिति में अभिभावक यह ध्यान दें कि उनकी भूमिका बच्चे को दिलासा देकर अवसाद (</span>Depression<span lang="hi" xml:lang="hi">) एवं ऐसे डर से बाहर लाने की होनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि अवसाद बढ़ाने की। बच्चे को डाँटने-डपटने और आलोचना करने से उसका मनोबल कमजोर होता है। बच्चे को यह भी एहसास दिलाना चाहिए कि परीक्षा-परिणाम के ठीक न होने के कारण माता-पिता का रवैया नकारात्मक नहीं होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे वह निराशा एवं हीन भावना से ग्रसित न हों।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परीक्षा-परिणाम को लेकर अभिभावक भी बच्चों के सामने तनावग्रस्त न हों। ध्यान रहे ऐसे समय बच्चों को सहानुभूति और दिलासा देने की जरूरत होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विषय चुनाव की स्वतंत्रता:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परीक्षा समुचित परिणाम के साथ संपन्न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए प्रवेश के समय ही बच्चों को अपनी अभिरुचि एवं रुझान के अनुरूप विषय चुनने की स्वतंत्रता देनी चाहिए। जहाँ इससे उसकी एकाग्रता बढ़ेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं वे मानसिक तनाव एवं मनोरोगों से दूर रहेंगे। विषय महत्वपूर्ण नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु उसके प्रति छात्रों का समर्पण माने रखता है। अत: अभिभावकों को चाहिए कि वे अपने बच्चों पर अनावश्यक दबाव न डालें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उन्हें अध्ययन का समुचित वातावरण दें और उनके साथ प्यार से पेश आएँ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी महत्वाकांक्षा बच्चों पर न थोपें:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देखा गया है अभिभावकों की बच्चों से अत्यधिक महत्वाकांक्षा होती है। यदि बच्चा उनकी आकांक्षा के अनुरूप खरा नहीं उतरा तो उसकी आलोचना की जाती है। जो उसे अवसाद (डिप्रेशन) की ओर ले जाती है और वह हताशा से घिरता रहता है। ऐसे में बच्चे पलायनवादी प्रवृत्ति अपना लेते हैं। उच्च रक्तचाप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूख न लगना आदि लक्षण दिखाई पड़ने लगते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अधिक गृहकार्य देने के कारण भी तनाव आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके कारण बच्चे अनिद्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिड़चिड़ेपन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूख न लगने आदि समस्याओं से घिरते जाते हैं। ऐसे अवसाद के शिकार बच्चों को परामर्श (काउंसलिंग) की विशेष आवश्यकता होती है। ऐसे मामलों में परिवार में माता-पिता या भाई-बहन का उनके प्रति मित्रवत व्यवहार ही बच्चे की सहायता कर सकेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों में योग-प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परमात्म सत्ता के प्रति यथासंभव आस्था जगाएँ। प्रोत्साहित करें। बच्चे के स्वभाव के अनुरूप किसी विषय में असफल होने पर अन्य संभावनाएँ भी खोजें। केवल एक असफलता के कारण बच्चे को निरुत्साहित न करें। क्योंकि यही उसकी प्रतिभा के मूल्यांकन का अंतिम मापदंड नहीं है। उसे प्रेमपूर्वक असफलता के कारणों को समझाएँ ताकि बच्चा किसी भी असफलता का साहसपूर्वक सामना करना सीख सके और भविष्य में असफल होने पर अवसाद के कारण हार मानकर बैठ न जाए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वस्तुत: माता-पिता एवं शिक्षक का संतुलित एवं मनोवैज्ञानिक सहानुभूतिपरक व्यवहार जहां बच्चे में सुधार ला सकता है वही योग-प्राणायाम उसके विकास में सहायक सिद्ध हो सकता है। तब उत्तम परिणाम के लिए किसी को चिंतित होना नहीं पड़ेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बच्चों की चिड़चिड़ाहट को समझें:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ब</span><span lang="hi" xml:lang="hi">च्चे परीक्षाकाल में मानसिक तनाव की स्थिति में होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उनका मन पढ़ाई से उचट जाता है। कई घण्टों तक सिर में दर्द रहना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटी-छोटी बातों पर नाराज होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यधिक पसीना आना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेचैनी अनुभव करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी काम में रुचि न होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हतोत्साहित या चिड़चिड़ापन और नकारात्मक सोच रखना आदि लक्षण पाए जाने पर उसे मनोचिकित्सक के पास ले जाना चाहिए। यदि उपर्युक्त लक्षणों के पाए जाने पर उचित निदान न किया जाए तो छात्र के गलत रास्ते पर जाने का भय रहता है। छात्रों से जरूरत से ज्यादा आशा करने के कारण भी वे मानसिक तनाव के कारण अवसाद की स्थिति में आ सकते हैं। अत: अभिभावक जब भी बच्चों में लगातार तनाव के कारण चिड़चिड़ापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटी-छोटी बातों में बहुत क्रोध करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नींद न आना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूख-प्यास न लगना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खोया-खोया सा रहना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकेलापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुमसुम बैठे रहना आदि लक्षणों को देखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उन्हें बच्चों की भावनाओं एवं मानसिकता को समझने की कोशिश करनी चाहिए।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>कार्यशाला</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>मार्च</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2015 21:45:10 +0530</pubDate>
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