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                <title>बच्चे कैसे बनें महान - योग संदेश</title>
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                <description>बच्चे कैसे बनें महान RSS Feed</description>
                
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                <title>विश्व को जरूरत है नारी के श्रद्धासिक्त अभिसिंचन की  माता ही यदि हो अज्ञान, बच्चे कैसे बनें महान</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. विजय कुमार मिश्र</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3005/the-world-needs-the-devotional-empowerment-of-women--if-ignorance-is-the-mother--how-can-children-become-great"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/20.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   यहाँ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">माता का आशय राष्ट्र की नारी शक्ति से है और बच्चों का संबंध देश की प्रजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनता व जनसंख्या से। भारतीय ऋषियों ने नारी को राष्ट्र लक्ष्मी एवं विश्व की निर्मात्री शक्ति कहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह राष्ट्ररूपी परिवार की रीढ़ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धुरी है। उसकी उत्कृष्टता-विकृष्टता पर राष्ट्र की उत्कृष्टता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्थान एवं पतन निर्भर करता है। समुन्नत नारी ही विश्व को धरती का स्वर्ग बना पाती है। शास्त्रों में उसे ब्रह्मविद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ममता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशिक्षिका की गरिमा से नवाजा गया है। यहां तक कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संसार में जो कुछ भी सर्वोत्कृष्ट है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें नारीत्व प्रवाहमान बताया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हीं विभूतियों के समुच्चय के कारण नारी जहां कदम रखती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नव सृजन का प्रवाह फूट पड़ता है। सतत सक्रियता उमड़ पड़ती है। घर देवालय बन जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज नवसृजन से महक उठता है। जनमानस अभाव व दरिद्रता से मुक्त हो उठता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र दृढ़ संकल्पशीलता का पुंज बनकर खड़ा होता है और विश्व से वसुधैव कुटुम्बकम की प्रतिध्वनि गूंज उठती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ना री एक होकर भी अनेक आयामों से कार्य करती है। संबंधों में वह माता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगिनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पत्नी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कन्या सभी दायित्व एक ही साथ पूर्ण करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सामाजिक क्षेत्र में कर्मठता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदनशीलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्पक्षता की प्रतिमूर्ति बनकर खड़ी होती है। वहीं राष्ट्रीय व वैश्विक परिपे्रक्ष्य में असीम धैर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नि:श्रेयस के साथ निर्माण व अभ्युदय का दायित्व निभाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वह अनेक बार नैपथ्य में डाली गयी पर दिव्य सामर्थ्यबोध से पुन:-पुन: विश्वास रूपी नेतृत्व का आधार बनकर खड़ी हुई। वृहत्संहिता में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषाणां सहस्रं च सती नारी समुद्धरेत्</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का वर्णन है अर्थात् सती स्त्री अपने पति का ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने उत्कृष्ट आचरण की सामर्थ्य से सहस्रों पुरुषों का कल्याण करती है (यहां सती का आशय नारी की उत्कृष्टता से है। दूसरे शब्दों में कहें तो </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">नारी को स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसन्न</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समुन्नत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्कृष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वावलम्बी बनाये रखने का दायित्व समाज का है। उसकी क्षमता को विकसित करने में लगाया धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनोयोग एवं समय समाज एवं राष्ट्र को असंख्यों गुना होकर लौटता है। नारी जितना समर्थ बनेगी राष्ट्र की संतानें उतना ही सशक्तव समृद्ध होंगी क्योंकि वह निर्मात्री जो है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सीमाओं से परे होती है मां:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हर राष्ट्र के नागरिक नारी शक्तिके रक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रस से निर्मित होते हैं। उनमें विद्यमान चेतना का अभिसिंचन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिपोषण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कारों का विकास मां रूपी नारी द्वारा ही संभव बनता है। ऐसे में यदि नारी का रक्तव रस परिपोषित होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो नारी पोषित होगी। तभी नारी की संतानें स्वस्थ-समुन्नत पैदा होंगी और राष्ट्र व विश्व प्रखर पीढ़ी से भर उठेगा। यदि मां ही दुर्बल होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो विश्व से अनीति-अत्याचार मिटाने वाले सूरमा कहां से आयेंगे। ये सूरमा वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कलाकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्वान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दार्शनिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज सेवक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनेता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनीषी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योगपति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महापुरुष के रूप में हों या देश की सीमा रक्षा करने वाले वीर सिपाही। वे सभी मां की गोद में खेल-खेल कर ही धरती मां को पुष्पित-पल्लवित करते हैं। इसीलिए नारी किसी एक व्यक्तिकी जननी नहीं हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु उसे राष्ट्र मां</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व माता की गरिमा देना भी कम है। वास्तव में एक-एक नारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह किसी भी देश की सीमा में निवास क्यों न करती हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">है वह जगदजननी ही। क्योंकि मातृत्व शक्तिके कारण वह सदा सीमाओं से परे होती है। अत: उसे उचित सम्मान मिलना ही चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">वह देवी है:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नारी देवी कही गयी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देवता उसके अनुचर। इसलिए कि वह अल्प में ही संतुष्ट होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि अनुदान-वरदान वृहद स्तर पर लुटाती है। संसार में कबीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समर्थ गुरु रामदास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संत रविदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वंदा वैरागी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संत तुकाराम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य चाणक्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राम-कृष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि रमण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि अरविंद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरदार भगतसिंह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असफाक उल्ला खां</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रामप्रसाद बिस्मिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चंद्रशेखर आज़ाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी विवेकानंद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुभाष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गांधी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पं० श्री राम शर्मा आचार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">से लेकर वर्तमान राष्ट्रसंत योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषिकल्प श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण महाराज जैसे अनेक युग दृष्टा हैं जिन्होंने देवत्व की दिव्य धाराओं को साधिकार धरा पर उतारने में समर्थ हुए। वह सभी किसी न किसी मां की कोख से ही जन्में। इन दिव्य पुत्रों में देवत्व से परिपूरित संस्कार उनकी माताओं ने ही भरे हैं। इससे स्वत: सिद्ध होता है कि जो जीवन में देवत्व जागृत करे उसे देवी नहीं तो और क्या कहें</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यही है आत्मबोध का समय:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बड़े दुख का विषय है कि इतनी दिव्यता से ओतप्रोत नारी शक्तिके लिए </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संयुक्तराष्ट्र संघ</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">एक दिवस</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">घोषित करके उसके उत्थान की सोचना पड़ा। नारी जाति की यह दुर्बलता-दयनीयता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परावलम्बी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पददलित जिंदगी का कारण कहीं अलग नहीं हो सकते। इसी समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी विश्व की उसकी ही संतानों ने उसे उपेक्षा एवं पिछड़ेपन का न केवल शिकार बना दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके अंत: की गहराई तक अबला होने का भाव भरकर नारी वर्ग को हीनता के स्तर तक पहुँचाया। यद्यपि उसकी मौलिकता आज भी दिव्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जरूरत है नारी को आत्मबोध कराने की। उसकी भावना को समुचित सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्नेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोत्साहन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्कृ ष्ट संकल्पना से भरा जा सका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो नारी के व्यक्तित्व पर जमी राख हटेगी और वह पुन: अभ्युदय प्राप्त करेगी। जैसे अंगारे पर यदि राख की परत अंगारे की ज्वलनशीलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताप की प्रचंडता को प्रकट नहीं होने देती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ठीक  वैसे ही आज की नारी भी कोयले के ढेर में उपेक्षित पड़े हीरे की तरह हो गई है। अब व्यक्तिगत स्तर से संगठनात्मक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवैधानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारी व वैश्विक सहकार भाव से नारी को पुन: उसकी गरिमा दिलाना ही होगा। इसके लिए हर स्तर पर प्रयास जरूरी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नारी का सम्मान जहां है:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रथम जरूरत है घर-परिवार की चहरदीवारी के बीच ही उसे अपनों के बीच समुचित सम्मान मिले। पर्दा से कसी दासीभाव से हटकर उसे देखा जाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लड़का-लड़की के बीच भेदनीति बदली जाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे भावनात्मक पोषण एवं तर्क-तथ्यों के सहारे मौलिकता से जोड़ें। नारी की भावुक मानसिकता के दोहन एवं शोषण से उसे बचाया जाय। घर में पिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देवर सभी उसे प्रसन्नता प्रदान करें और उसे पारिवारिक दायित्वों के निर्णयों में भागीदार बनायें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार वह अप्रत्यक्ष रूप से लोहे की जंजीरों में जकड़ी दासी मानसिकता से मुक्तहोगी। इसी के साथ उसे सोने के जंजीरों से भी मुक्तकरना पड़ेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रमणी नहीं कर्मणी है:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक युग के अवसान का सबसे बड़ा दंड नारी जाति को मिला। उसकी न केवल प्रतिष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गरिमा खोई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु उसे भोग की वस्तु के रूप में परोसा जाने लगा। राजतंत्र से लेकर समाज तंत्र ने उसका दोहन ही किया। दोहन के पराकाष्ठा की परिणति उसे दास जैसी हीनता भरे जीवन के रूप में चुकाना पड़ा। आज वह परिस्थितियां बदलीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज हरम नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर नारी आज भी छली जा रही है। उसे सोने-चांदी से लादकर रूप-लावण्य की गुड़िया बनाई जा रही है। आश्चर्य कि इसमें वह नारी भी खुश है। यह दूसरे प्रकार का नारी जाति के प्रति धोखा है। जरूरत है नारी को ऐसी विसंगतियों से बचाने की।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नारी शक्ति को बढ़ावा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यद्यपि आज वह उच्च शिक्षा में भी पारंगत हो रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जरूरत है उसकी गरिमा अनुसार बौद्धिक एवं व्यवहारिक प्रशिक्षण की। कभी वह युद्ध संचालन में कुशल थी। कैकई और दशरथ का उदाहरण सामने है। अत: उसे हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की जरूरत है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नारी में ऐसे कौशल भरे जाएं कि वह अपने जीवन के कुशल संचालन के साथ-साथ आवश्यकतानुसार उपार्जन भी कर सके। तथा यथा अवसर दूसरों को भी आश्रय व सहयोग दे सके। क्योंकि जिस समाज व देश में स्वाभिमानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रमशील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुसंस्कृत नारी समूह है वह समाज प्रगति करेगा ही।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जरूरी है श्रमशक्ति का निखार:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनेक देशों में पुरुषों द्वारा भोजन पकाने आदि घरेलू कार्यों में नारी का हाथ बटाने की श्रेष्ठ परम्परा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे उसे घर की सुव्यवस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छता में मदद मिलती ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु स्वयं के सुविकसित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुसंस्कृत एवं सुयोग्य बनने का समय भी मिलता है। पर विश्व की आधी आबादी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज भी अपनी श्रम शक्तिको उपेक्षित रखने के लिए विवश है। आवश्यकता है नारी की श्रम शक्तिको जागृत करके उसे सुनियोजित करने की। तभी विश्व का समुचित निर्माण संभव होगा। युग परिवर्तन के द्वार तभी खुलेंगे जब युग के साथ नारी कदम से कदम मिलाकर बढ़ेगी। मानव में देवत्व एवं धरती पर स्वर्ग लाने के लिए पहले नारी शक्तिको निखारना होगा। पर पहल इसके लिए पुरुष समाज को ही करनी पड़ेगी। स्वस्थ शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुसंस्कारी जीवन शैली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतुलित मनोबल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुभव और कौशल जागरण से गढ़ी गयी नारी ही राष्ट्रीय-वैश्विक दायित्व निभाने योग्य बन सकती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">परम पूज्य योगऋषि के पावन सान्निध्य में </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नारी जागरण :</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परम पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज के पावन सान्निध्य में पतंजलि योगपीठ नारी जागरण आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। वैसे तो पिछले दो दशकों से श्रद्धेय स्वामी जी महाराज के बहुआयामी विराट् कर्तृत्व में महिलाओं की अहम् भूमिका रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन दिसम्बर </span>2008<span lang="hi" xml:lang="hi"> में विधिवत् महिला पतंजलि योग समिति की स्थापना हुई। आज पूरे राष्ट्रभर में </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>25<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख महिलाएँ अपने गुरुवर के सपनों का भारत बनाने में पूर्ण ईमानदारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिम्मेदारी व समझदारी से हर क्षेत्र में पूर्ण समर्पण भाव से अपनी सेवाएँ अर्पित कर रही हैं। चाहे योगक्रान्ति रही हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहे सत्ता परिवर्तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद व स्वदेशी की क्रान्ति हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या फिर वर्तमान में चल रही शिक्षा क्रान्ति हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहनों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। आज प्रतिदिन सुबह-सुबह लाखों की संख्या में बहनें नि:शुल्क योग कक्षाएं लगाकर अपने वतन को आरोग्य अर्पित कर रही हैं तथा पूज्य गुरुवर के स्वस्थ भारत के स्वप्न को साकार कर रही है। दिन में आयुर्वेद-स्वदेशी के प्रचार-प्रसार के माध्यम से अपने देश की अर्थव्यवस्था को सशक्तबनाते हुए समृद्ध भारत निर्माण में अपनी आहुति प्रदान कर रही हैं। वैदिक धर्मानुसार बाल संस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वृक्षारोपण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आहारविद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुटीर उद्योग आदि अनेक प्रयास करते हुए अपने वतन तथा अपने गुरुदेव के अरमानों को पूर्ण करने हेतु इस विराट् यज्ञ में एक आहुति का काम कर रही हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज देश भर में लगभग प्रत्येक जिले व तहसील स्तर पर महिला पतंजलि योग समिति गठित हो चुकी है तथा पतंजलि योगपीठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरिद्वार में </span>100<span lang="hi" xml:lang="hi"> बहनें आजीवन ब्रह्मचारिणी रहकर राष्ट्रसेवा व भागवत सेवा की दीक्षा लेकर वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन व व्याकरण आदि का अध्ययन कर रही हैं। अपने माता-पिता के कुल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ-साथ ब्रह्मकुल या भागवत कुल को उत्कृष्टता की ओर ले जा रही है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही विश्वस्तर पर योग-प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद को आधार बनाकर तप पूर्ण जीवन से जोड़ा जा रहा है। लक्ष्य है दिव्य तपस्विनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रनिष्ठ इन नारियों को वैश्विक नारी जागरण के लिए खड़ा करके विश्व को समुन्नत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सशक्तबनाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व की आधी आबादी के रूप में नारी शक्ति को आगे लाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके हाथ में पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासनिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक एवं आध्यात्मिक आंदोलन का नेतृत्व सौंपना। तभी विश्व निर्माण का मार्ग प्रशस्त होगा। क्योंकि नारी निर्मात्री है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अपनी संतानों का निर्माण कर सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके लिए विश्व निर्माण कठिन नहीं। वैदिक परम्परा में भी नर-नारी दोनों साथ मिलकर कदम उठाते थे। आज युग पुन: पुकार रहा है कि विश्व की मातायें सृजन में लगें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>राष्ट्र निर्माण</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>मार्च</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2015 21:43:51 +0530</pubDate>
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