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                <title>यौगिक उपाय - योग संदेश</title>
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                <title>स्वप्नदोष किशोर-युवाओं का मानस भ्रम या रोग</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. नागेन्द्र नीरज</span></strong><strong><span>, </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">निदेशक-योगग्राम</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3059/nocturnal-hallucinations-or-mental-illness-of-teenagers"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/681.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  स्वप्रदोष को लेकर विश्व भर में असंख्य लोग गुमराह हैं। जीवन जीने की ऋषि प्रणीत विरासत से अनजान होने के कारण यह भ्रम अधिक बढ़ा। तथाकथित चिकित्सक इसका लाभ उठाते हैं और तथाकथित रोगी कंगाली-बदहाली के दिन गिनता है। स्वप्रदोष को आयुर्वेद में स्वप्र प्रमेह</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">एलोपैथी में नाइट पॉल्यूसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वेट ड्रीम्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नेकटारनल एमिसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाइट डिस्चार्ज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाइट फॉल</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">यूनानी में बदख्वाब या एहकलाम कहते हैं। यह इतनी बड़ी बीमारी नहीं है जितना कि इसके सम्बन्ध में बढ़ा-चढ़ा कर कहा जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">तु-दौर्बल्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीघ्र-स्खलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुक्र-तारल्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीघ्र-पतन आदि एक-दूसरे से जुड़े हुए मन:स्नायविक दुर्बलता के रोग हैं। आयुर्वेद के अनुसार भोजन पचकर रस प्रदान करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अवचूषित एवं सात्म्यीकृत होकर रक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्तसे माँस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँस से मेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेद से अस्थि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थि से मज्जा तथा मज्जा से वीर्य का निर्माण होता है। वीर्य या रस ही ओज बन जाता है। मानव में पौरुष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पराक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्साह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शूरत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धैर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्य एवं चिन्तन की क्षमता सभी कुछ इसी ओज पर निर्भर है। वीर्य एक महत्वपूर्ण तथा अत्यन्त पराक्रमी धातु है। वीर्य शुक्राणु ही नहीं है। वीर्य जीवन का आधार है। वीर्य धातु का सबल एवं सशक्त होना ही इसकी सुरक्षा है। चटपटे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तेजक आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मदिरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विकृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामुक विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिन्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव तथा असंयमित जीवन से पाचन संस्थान दूषित होता है। पाचन संस्थान दूषित होने से सप्त धातु विकृत एवं दूषित होते हैं। तब गोनोरिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिफलिस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुजाक आदि रतिज (वी.डी.) रोगों के कारण शुक्र तथा वीर्य में विकृति आ जाती है। वे अधिक तरल हो जाते हैं। परिणामत: उत्तेजना तथा बिना उत्तेजना के ही वीर्य पतला होने से स्खलित होने लगता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रजनन विशेषज्ञ डॉ. टी.सी. आनन्द के अनुसार वाहनों से निकलने वाले धुएँ में मौजूद सीसे के जहरीले प्रभाव से भी शुक्राणु संक्रमित एवं प्रदूषित होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जॉन हॉपकिन्स विश्वविद्यालय (अमेरिका) द्वारा कुछ पुरुषों पर किये गये अध्ययन से ज्ञात हुआ कि पुरुष सेक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरॉन की सक्रियता एवं स्राव से पुरुषों में गणितज्ञ एवं इंजीनियर बनने की क्षमता बढ़ जाती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यूनिवर्सिटी ऑफ मेरी लैण्ड मेडिकल सिस्टम के मेडिसिन विभाग के प्रो. डॉ. थॉमस डोन्नर इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि टेस्टोस्टेरॉन पुरुषों में कामेच्छा को तीव्र तो करता ही है साथ ही उनकी माँसपेशियों तथा हड्डियों को सुदृढ़ एवं शक्तिशाली बनाता है। टेस्टोस्टेरॉन बौद्धिक क्रियाशीलता यानि बुद्धि-लब्धांक को भी बढ़ाता है। जबकि इसका अपना विज्ञान है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">युवावस्था में कामेच्छा नैसर्गिक एवं स्वाभाविक है। जरूरत है उचित शिक्षण द्वारा काम ऊर्जा को सृजनात्मक कार्यों- लेखन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्रकला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बागवानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुटीर उद्योग आदि में रूपान्तरित करने की प्रेरणा एवं प्रशिक्षण देने की। फिर भी जब अचेतन में दमित वासनाएँ प्रतिबंधित नहीं होती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन अपनी मनमानी करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही स्वप्रदोष है। स्वप्रदोष प्राय: पुरुषों का रोग है। कभी-कभी युवतियों में भी इसके लक्षण दिखते हैं परन्तु अत्यन्त कम।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिस प्रकार युवावस्था में यौन ग्रंथियों के सक्रिय होने से दाढ़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूँछें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काँख तथा गुप्तांगों में बाल आना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वर में परिवर्तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वीर्य निर्माण तथा स्वप्रदोष ऐसी ही स्थितियाँ हैं। स्वप्रदोष एक प्राकृतिक प्रक्रिया होने के कारण ही इसका रोग के रूप में आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में कहीं भी उल्लेख नहीं है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पर </span>'<strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अति सर्वत्र वर्जयेत्</span>’</strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे ध्यान में रखना चाहिए। महीने में स्वप्रदोष अनेक बार होने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो तुरन्त सावधान हो जाना चाहिए। बार-बार स्वप्रदोष होना मनोदैहिक लैंगिक स्नायविक रोग मानकर इसका शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मिक एवं स्नायविक उपचार करना आवश्यक है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बार-बार स्वप्रदोष का कारण:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कब्ज़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुदाकृमि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मंदाग्रि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपचन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुजाक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुर्दे तथा वृषण में गाँठ तथा अन्य रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पथरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलोदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्लीहोदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपदंश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बवासीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अजीर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शोक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रात को देर तक जगना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिन में काफी देर तक सोये रहना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रम विहीन बैठे-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">बै</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ठाले जीवन यापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बार-बार मूत्रेन्द्रिय का स्पर्श करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निरन्तर गन्दे एवं कामोत्तेजक चिन्तन में लीन रहना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अश्लील उपन्यास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पत्र-पत्रिकाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कविताएँ एवं साहित्य पढ़ना तथा सुनना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विभिन्न चैनलों पर प्रसारित होने वाले कामोत्तेजक दृश्यों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीतों तथा संवादों को देखना एवं सुनना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामुक वस्त्रों एवं अन्य सामग्री का प्रचलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्भ निरोधक साधनों का विज्ञापन आदि कारणों से दिमाग में स्थित सेक्स का केन्द्र निरन्तर उत्तेजित होते रहने से स्वप्रदोष की पुनरावृत्ति बार-बार होती है। चाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉफी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तले-भुने आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मदिरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मछली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैदा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लहसुन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्याज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हलवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मावा तथा गरिष्ठ एवं उत्तेजक आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अति आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्म-मिर्च</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मसाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पान मसाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुपारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धूम्रपान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नशीली-उत्तेजक मादक औषधियाँ आदि स्नायविक दुर्बलता पैदा करती हैं चूंकि इसका सीधा संबंध मनुष्य की सोच चिंतन से है। यदि विचार साधे न गये तो स्वप्रदोष स्थायी होने लगता है। वीर्य अधिक निर्बल एवं पानी की तरह पतला हो जाता है। आदर्शवादी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सकारात्मक सोच वीर्य जैसी जीवनी शक्ति को पोषित करता है पर जैसे ही अचिन्त्य व अश्लील चिंतन शुरू होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही आंतरिक मंथन नकारात्मक दिशा में होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वप्रदोष प्रारम्भ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वप्रदोष काल:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विख्यात यौन विज्ञानी अल्फ्रेड किन्स का मानना है कि प्राय: हर व्यक्ति सेक्स के सपने देखकर स्वप्रदोष का शिकार होता है। जो व्यक्ति जितना शिक्षित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धिवादी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझदार तथा ऊँची कल्पना शक्ति वाला होता है उसे उतने ही ज्यादा स्वप्रदोष होते हैं। पुरुषों में 20 वर्ष की आयु में तथा स्त्रियों में 35 वर्ष की आयु में सेक्स एवं अश्लीलता से जुड़े ज्यादा सपने आते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राय: 15 से 25 वर्ष की उम्र तक स्वप्रदोष के लक्षण ज्यादा उग्र होते हैं। वैसे बीमारी के रूप में स्वप्रदोष कभी भी हो सकता है। रात्रि के अंतिम पहर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साढ़े तीन से छ: बजे के मध्य जिसे ब्रह्म मुहूर्त कहा गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वप्रदोष की शिकायत ज्यादा होती है। इस काल में सोये रहने से मन का अर्धचेतन एवं अचेतन हिस्सा ज्यादा सक्रिय रहता है। परिणामत: स्वप्रदोष इसी काल में ज्यादा होते हैं। इसीलिए ब्रह्मचर्य पालन तथा स्वप्रदोष से बचने के लिए ब्रह्म मुहूर्त में उठना अनिवार्य है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वायुदोष की वृद्धि होने से वीर्य पतला हो जाता है तथा थोड़ी सी उत्तेजना से ही बार-बार निकल जाता है। कई लोगों में रात्रि को 2-3 बार स्वप्रदोष होने लगता है। जो स्वास्थ्य को नष्ट करने वाला लक्षण है। इसमें शुक्र धारण करने वाले प्रजनन अंग अत्यधिक दुर्बल हो जाते हैं। जिन्हें शक्तिशाली बनाने से ही स्वप्रदोष से मुक्त हुआ जा सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभाव:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बार-बार स्वप्रदोष होने पर शरीर क्षीणकाय तथा पित्त वर्ण दिखने लगता है। आलस्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुस्ती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिर दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाण्डुता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सारे शरीर में दर्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओज रहित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कान्तिहीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुरझाया चेहरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीव्र हृदय की धड़कन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दृष्टि तथा स्मरण शक्ति का ह्रास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकाग्रता की कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुंठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदासी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिड़चिड़ापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निराशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निरुत्साह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असमय एवं अकारण बाल सफेद होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनन तंत्र की दुर्बलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिक ताप की अनुभूति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जननयंत्र संचालक स्नायविक (एरेक्शन तथा एमिसन) केन्द्र में अस्वाभाविक उत्तेजना से स्नायविक दुर्बलता तथा नर्वस ब्रेक डाऊन के लक्षण दिखते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लिम्बिक सिस्टम भी समझें:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कामेच्छा का मूल केन्द्र दिमाग के बीचों बीच वाले क्षेत्र </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">लिम्बिक सिस्टम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में होता है। इसे सेक्स आर्गेन ब्रेन भी कहते हैं। लिम्बिक सिस्टम द्वारा ही काम-केलि-क्रीड़ा (स्द्गष्ह्वड्डद्य स्नह्वठ्ठष्ह्लद्बशठ्ठ) नियंत्रित होती है। स्वप्रावस्था में समागम की स्थिति में रीढ़ के माध्यम से उत्तेजनात्मक पैरासिम्पैथेटिक आवेग ज्ञानेन्द्रिय तथा जननेन्द्रिय में उद्दीपन परिवर्तन लाते हैं। परिणामत: गुप्तांग उत्तेजित हो उठते हैं। सेक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरॉन आदि का स्राव बढ़ जाता है। काल्पनिक संभोग जैसी स्थिति होने से सिम्पैथेटिक आवेग का तीव्र उद्दीपन तथा सुषुम्ना की रिफ्लेक्स क्रिया के कारण शुक्र-स्खलन प्रारम्भ हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">20 वर्ष की आयु में रूमानी मधुर सपने ज्यादा आते हैं। किन्स ने यह भी पता लगाया कि 83 प्रतिशत किशोर तथा युवा स्वप्रदोष के शिकार होते हैं। इससे अचेतन मन में दफनाए गए दमित सेक्स सम्बन्धी भ्रान्तिपूर्ण विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिन्ता तथा सोचने-समझने से कमजोरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुंठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थकान तथा अन्य लक्षण दिखते हैं। जागने पर चेतन में ग्लानि पैदा होती है कि कुछ गलती हो गयी जिसके कारण मन में गाँठें एवं कुंठा बन जाती है। इस प्रकार की कुंठाएँ शारीरिक एवं मानसिक रोग को जन्म देती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">माना जाता है कि वीर्य खोने से चेहरे का लावण्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ओज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौन्दर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेजस्विता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कान्ति तथा प्रतिभा कम हो जाती है। शरीर रुग्ण हो जाता है। शक्ति क्षीण हो जाती है। आँखें धंस जाती हैं। उनके नीचे काले धब्बे बन जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ वीर्य के लक्षण:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वस्थ अण्डकोष हमेशा 2 से 3 अरब शुक्राणु उत्पादन के दौर से गुजर रहे होते हैं। 70 से 80 दिनों में वे परिपक्व हो जाते हैं। अण्डकोष में थोड़ी सी भी विकृति या खराबी होने पर अरबों की संख्या में शुक्राणु प्रदूषित हो जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेदज्ञ सुश्रुत के अनुसार स्वस्थ एवं शुद्ध वीर्य स्फटिक के समान श्वेत वर्ण का</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षारीय प्रतिक्रिया वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्रव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्निग्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधु की गन्ध वाला होता है। चरक के अनुसार मात्रा में अधिक शुक्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिक सघन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गाढ़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेसदार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्निग्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुर्गन्ध रहित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारी तथा श्वेत रंग का वीर्य स्वस्थ वीर्य कहलाता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार शुक्र में ७० से ८० प्रतिशत पानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शेष फॉस्फोरस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोटीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फॉस्फेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुक्राणु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुक्र कण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एल्ब्युमिन यानि अण्डे की सफेदी वाला तत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लीकर सेमिनस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ हार्मोन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वर्ण अंश आदि रहते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वप्रदोष के उपाय:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वप्रदोष के रोगियों को प्राय: कब्ज़ की शिकायत रहती है। उपचार में सर्वप्रथम रोगी को आधा घण्टे के लिए पेड़ू तथा सिर पर मिट्टी की पट्टी रखें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब भी नहायें उसके पूर्व नल से या लोटे से पेड़ू तथा रीढ़ के नीचे वाले हिस्से पर 5-10 लोटे ठण्डा पानी डालें। तत्पश्चात् स्नान करें। इससे रीढ़ के स्नायु उद्दीप्त होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिवर्त्त प्रभाव से अण्डकोष की शुक्राणु-उत्पादक कोशिकायें शक्तिशाली होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी कार्य क्षमता बढ़ जाती है और स्वप्रदोष से राहत मिलती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रात्रि को सोने से पूर्व मूत्र-त्याग करें। दोनों पैर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेट तथा पीठ के पीछे खूब ठण्डे पानी से धो-पोंछकर सोयें। पेट तथा पीठ के बल लेटें। यथासंभव बायीं करवट सोयें। रात्रि को सोने से पूर्व 5-10 मिनट खुले सकारात्मक विचारों के साथ टहलें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्पश्चात् मंगल मैत्री भावना करते हुए सो जायें। सोने के पूर्व चिन्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईर्ष्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेष आदि संवेगों को एक तरफ रखकर सोयें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>यौगिक उपाय</strong></span>:</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वप्रदोष को दूर करने में उड्डियान बन्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल बन्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अश्विनी मुद्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नौलि क्रिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जानुशीर्षासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिमोत्तानासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्धासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वज्रासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुप्त वज्रासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पद्मासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग मुद्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेरुदण्ड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्नायु शक्ति विकासक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विपरीतकरणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वांगासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हलासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मयूरासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीर्षासन तथा शवासन सकारात्मक चमत्कारिक प्रभाव डालते हैं। रीढ़ को सीधा रखते हुए बैठें। साँस निकालते हुए पेट को पीठ से लगाने का प्रयास करें। आन्तरिक बल द्वारा गुदा तथा मूत्रेन्द्रिय को खींचें। यह क्रिया सुबह-शाम ३ से ५ मिनट खाली पेट करें। प्राणायाम तथा ध्यान का अभ्यास किसी योग्य योग चिकित्सक के निर्देशन में करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्ममुहूर्त में जागरण:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छा शक्ति को जाग्रत कर प्रात:काल ५ बजे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से स्वप्रदोष में अद्भुत लाभ मिलता है। मन को उत्तेजित करने वाले अश्लील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तेजक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिल्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टी.वी. तथा ऐसी चर्चा आदि से बचें। जब भी मन में दुर्विचार उठें उस समय पढ़ने-लिखने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेन्टिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बागवानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खेल आदि सृजनात्मक कार्यों में लग जायें। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">खाली मन शैतान का घर</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: कुछ-न-कुछ करते रहना ही इसका हल है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बदलें आहार पद्धति:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वप्रदोष के रोगी को गरम तथा उत्तेजक आहार का सेवन पूर्णतया बन्द कर देना चाहिए। इसमें फास्टफूड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चटपटा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तला-भुना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चटोरापन आदि आता है। सुपाच्य एवं प्राकृतिक आहार का प्रयोग करें। स्वप्रदोष काफी विकृति स्थिति में पहुँच गया हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वैसी स्थिति में एक दिन मौसमानुसार फल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फलों का रस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब्जियों का रस तथा जलोपवास पर रखें। पुन: इसी क्रम में आठ दिन पश्चात् सामान्य आहार पर आयें। योगासन या टहलने के 20 मिनट बाद सामान्य आहार में बादाम 7</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंजीर 5</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुनक्का 15 तथा मौसमानुसार फल 300 ग्राम तथा एक गिलास दूध में डेढ़ चम्मच शहद मिलाकर लें। पालक के रस में गूँधे मोटे आटे की रोटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब्जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सलाद तथा दही लें। मध्याह्न काल में मौसमानुसार फल या फलों का रस तथा अपराह्न काल में मौसमानुसार सब्जी का रस या सूप लें। सब्जियों में गाजर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पालक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टमाटर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चुकन्दर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लौकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुदीना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धनिया (15-15 ग्राम) का रस का सूप लें। सांयकालीन भोजन ६-७ बजे तक कर लें। रोटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब्जी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सलाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चटनी आदि लें। खाकर तुरन्त सोने से स्वप्रदोष होने की शिकायत ज्यादा बढ़ जाती है। स्वप्रदोष के रोगी साने के पूर्व दूध नहीं लें। सायंकालीन भोजन हल्का ही लें। पतंजलि निर्मित जौ का दलिया कारगर साबित हुआ है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ आवश्यक खनिज:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक शोधों के अनुसार जस्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विटामिन-ई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बी तथा ए के अभाव में शुक्राणुओं की संख्या एवं गतिशीलता में कमी आ जाती है। वीर्य पतला हो जाता है तथा स्वप्रदोष की शिकायत होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. कर्टिश हंट ने अपने प्रयोगों से यह सिद्ध किया है कि जस्ते का सीधा सम्बन्ध वीर्य से है। एक प्रयोग के दौरान देखा गया कि रोज की खुराक में १० मिग्रा. जस्ते को घटाकर एक मिग्रा. करने से शुक्राणुओं की मात्रा एक तिहाई रह गयी क्योंकि वीर्य की मात्रा घटने से फर्टिलिटी कम हो जाती है। डॉक्टर हंट के अनुसार प्रतिदिन १०-१५ मिग्रा. जस्ता वाला आहार अवश्य लें। जस्ते का श्रेष्ठतम स्रोत सूर्यमुखी तथा कद्दू का बीज है। इसके अतिरिक्त सभी प्रकार के अंकुरित अनाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताजे फल एवं ताजी हरी सब्जियों में जस्ता मिलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विभिन्न शोधों एवं प्रयोगों में पाया गया है कि शुक्राणुओं तथा वीर्य की सुरक्षा के लिए विटामिन-सी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विटामिन-इ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एण्टी ऑक्सीडेज एन्जाइम चमत्कारिक आहार है। तले-भुने फास्ट फूड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँसाहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंडा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वसा वाले आहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शराब तथा धूम्रपान के ज्यादा प्रयोग से फ्री-रेडिकल्स ज्यादा बनते हैं। फ्री-रेडिकल्स कोशिकाओं में जंग पैदा करते हैं जो फुर्तीले शुक्राणुओं को आपस में चिपका कर नष्ट कर देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुक्राणुओं के डी.एन.ए. को भी परिवर्तित कर देते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्यों न हम ऋषि प्रणीत परम्पराओं एवं आयुर्वेद सम्मत आहार लें और ऐसे रोगों से बचकर जीवन को स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संकल्पशील बनायें। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>रोग विशेष</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जून</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 01 Jun 2015 21:49:05 +0530</pubDate>
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