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                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के  शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य - योग संदेश</title>
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                <description>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के  शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के  शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य... </title>
                                    <description><![CDATA[<h4 class="MsoNormal" style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">ध्यान</span></strong></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">            प</span><span lang="hi" xml:lang="hi">तंजलि के अष्टाङ्ग योग के अनुसार </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">योगाङ्गों में सातवां अंग है। यम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम और प्रत्याहार ये पाँच योग के बाह्य अंग माने जाते हैं तथा धारणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान समाधि ये तीन अन्तरङ्ग माने जाते हैं। अन्दर के विराट् साम्राज्य में प्रवेश करने हेतु </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धारणा</span>’, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्तर और बाह्य जगत् के बीच सेतु का काम करता है तो ध्यान उस अन्तर्जगत् में प्रथम प्रवेश द्वार के समान या प्रथम पदार्पण के समान है। संसार के भिन्न-भिन्न मत-सम्प्रदायों में साधना की विधियों में भेद हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन ध्यान के</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3152/shashwat-pragya-oct-2015"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/1293.jpg" alt=""></a><br /><h4 class="MsoNormal" style="text-align:center;" align="center"><strong><span lang="hi" style="color:rgb(186,55,42);" xml:lang="hi">ध्यान</span></strong></h4>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      प</span><span lang="hi" xml:lang="hi">तंजलि के अष्टाङ्ग योग के अनुसार </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">योगाङ्गों में सातवां अंग है। यम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम और प्रत्याहार ये पाँच योग के बाह्य अंग माने जाते हैं तथा धारणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान समाधि ये तीन अन्तरङ्ग माने जाते हैं। अन्दर के विराट् साम्राज्य में प्रवेश करने हेतु </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धारणा</span>’, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्तर और बाह्य जगत् के बीच सेतु का काम करता है तो ध्यान उस अन्तर्जगत् में प्रथम प्रवेश द्वार के समान या प्रथम पदार्पण के समान है। संसार के भिन्न-भिन्न मत-सम्प्रदायों में साधना की विधियों में भेद हो सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन ध्यान के विषय में मतभेद नहीं हो सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि ध्यान रूपी प्रवेश द्वार के बिना अन्तर्जगत् में प्रवेश हो ही नहीं सकता। अत: साधना की सभी विधियों में ध्यान अत्यावश्यक है। पतंजलि योगानुसार यम-नियम रूपी महाव्रतों का पालन करने के पश्चात् आसनसिद्ध हो जाने पर</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणायाम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के माध्यम से मन व प्राण के सभी मलों का नाश करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों को अपने-अपने विषयों से समेट कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन को शरीर के किसी स्थान विशेष में समाहित करके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस देश विशेष में ध्यायमान विषय को आलम्बन बनाकर ज्ञान की जो एकतानता है उसे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं- देश बन्धाश्चित्तस्य धारणा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्</span>’’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">योग दर्शन </span>3/1., .2) </strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् तेल की अजस्र गिरती हुई धारा के समान ध्यायमान विषय के ज्ञान का अखण्ड प्रवाह ही ध्यान है। यह ज्ञान किसी दूसरे विषय के ज्ञान से उस समय अर्थात् ध्यानकाल में सर्वथा अमिश्रित रहता है। सांख्यदर्शन में मन के निर्विषय होने को ही ध्यान कहा है </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यानं निर्विषयं मन:</span>’’-(<span lang="hi" xml:lang="hi">सांख्यसूत्र </span>6.25) <span lang="hi" xml:lang="hi">यहाँ निर्विषय का अर्थ है कि उस समय कोई सांसारिक विषय या इन्द्रियों का विषय चित्त में नहीं रहता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु वह बह्म ही इस समय चित्त के आलम्बन का विषय बना हुआ रहता है। साधना की दृष्टि से यह चित्त की सर्वोत्कृष्ट अवस्था है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि चित्त का कार्य है किसी विषय का आलम्बन लेकर उस पर चिन्तन करना। कठोपनिषद् में कहा है-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एतदालम्बनं श्रेष्मेतदालम्बनं परम्।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते।।    -(कठोपनिषद्)</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् समस्त आलम्बनों में ब्रह्म का आलम्बन ही सर्वश्रेष्ठ व बड़ा आलम्बन है। इस आलम्बन को पा लेने वाला व्यक्ति ब्रह्मलोक में महिमा को प्राप्त हो जाता है- अर्थात् ज्ञानी लोगों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्वानों व योगियों के बीच में वह व्यक्ति विशेष प्रतिष्ठा को प्राप्त होकर ईश्वर की कृपा का पात्र बन जाता है। ध्यान की उत्कृष्ट अवस्था ही योगङ्गों में अन्तिम अङ्ग समाधि में परिवर्तित हो जाती है- चित्त के आलम्बन का विषय जब केवल ज्ञानरूप न रहकर अर्थमात्र के रूप में निर्भासित होने लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान का अपना स्वरूप शून्य जैसे हो जाता है अर्थात् </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जानामि</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार की भी अनुभूति जब नहीं होती है अर्थात् ध्येयभूत अर्थ पर आत्यन्तिक एकाग्रता होने के कारण केवल उसी अर्थ के रूप में निर्भासित होने लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान की इस अवस्था को ही </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">समाधि</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं। वे ये धारणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान और समाधि तीनों एकत्र अर्थात् एक ही आलम्बनगत हो जाते हैं तब इसे </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संयम</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">त्रयमेकत्र संयम:</span>’’ <span lang="hi" xml:lang="hi">यह संयम शब्द योगदर्शन की अपनी तान्त्रिकी परिभाषा है और उस संयम पर विजय प्राप्त करने से प्रज्ञा का प्रकाश होता है- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">तज्जयात्  प्रज्ञालोक:</span>’’<span lang="hi" xml:lang="hi">। जैसे-जैसे संयम स्थिर होता जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी क्रम में समाधिजन्य प्रज्ञा विशारद अर्थात् निर्मलतर और निर्मलतम होती चली जाती है और उस ध्येयपदार्थ का स्वरूप इस योगी के समक्ष सर्वथा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वभावेन प्रकट हो जाता है। चेतना की इस अवस्था में ही योगी कह उठता है- </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मपश्चाद् दक्षिणतश्चोत्तरेण।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अधश्चोर्ध्वं च पस्रतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्।।  (मुण्डकोपनिषद् </span>2.2.12)</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह अमृत रूपी ब्रह्म ही मेरे सामने पीछे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाँयें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दक्षिण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊपर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीचे सर्वत्र प्रस्रत या विराजमान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सम्पूर्ण रूप ब्रह्म में ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्म ही वरिष्ठ अर्थात् सर्वश्रेष्ठ है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>''<span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वं खल्विदं ब्रह्म</span>’’ </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सब दृश्यमान् जगत् ब्रह्म का ही मूर्त्तरूप है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">रागोपहतिर्ध्यानम्-(सांख्य </span>3.30)</strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">सांख्यदर्शन के तृतीय अध्याय में कहा है कि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राग से उपहत हो जाना अर्थात् रागमुक्त हो जाना ही ध्यान है। सूत्र में राग शब्द पढ़ने से द्वेष का भी ग्रहण हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि राग और द्वेष एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। जब व्यक्ति को किसी के प्रति राग होता है तो उस राग में बाधा डालने वाले तत्त्वों से द्वेष भी अवश्य ही होता है। पर जब वैराग्य होने से कोई कामना ही चित्त में शेष नहीं बची तो राग कैसे उत्पन्न होगा क्योंकि जहाँ चाहत है वहाँ राग है और जब राग ही नहीं बचा तो द्वेष किसी से हो ही नहीं सकता। जब चित्त में राग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेष दोनों ही समाप्त हो गए इसका मतलब है अविद्या समाप्त हो गई और तब तो मात्र ब्रह्म रूपी विषय ही चित्त में रह गया। तब संसार भी विषय बने तो राग-द्वेष से मुक्त अपने यथार्थ रूप में उपस्थित होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी विषय का विशुद्ध ज्ञान का प्रवाह बने यही तो ध्यान है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान के मुख्य रूप से दो चरण हैं एक सम्पूर्ण अस्तित्व को भगवान् के ऐश्वर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महिमा या भगवान् की रचना के रूप में अनुभव करते हुए सबके मूल में ब्रह्म को अनुभव करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब स्वरूपों  में ब्रह्मस्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब सम्बन्धों में ब्रह्मसम्बन्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब सुखों में ब्रह्मसुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब ऐश्वर्यों में ब्रह्म का ही ऐश्वर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब शक्तियों में ब्रह्म की शक्ति अर्थात् समस्त ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐश्वर्य एवं सामर्थ्य के मूल में भगवान् को ही अनुभव करना यह भगवान् का सगुण साकार ध्यान या उपासना है तथा इन सब मूर्त्तरूपों के पीछे अमूर्त्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निराकार आत्मा या परमात्मतत्त्व का साक्षात्कार जो ज्ञानमात्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिन्मात्र व आनन्दमय ब्रह्म है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें समाहित होना यह निर्गुण  निराकार ध्यानोपासना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब यह चर्चा तो हुई उन लोगों की जो योगीजन हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्म का साक्षात्कार ही जिनका सर्वोपरि लक्ष्य है। पर प्रश्न यह उठता है कि जिनका लक्ष्य संसार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके लिए भी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">का कोई सदुपयोग है या नहीं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर है उनके लिए भी ध्यान बहुत उपयोगी है। हमारे यहाँ तो सामान्य बोल-चाल की भाषा में भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है। यदि कोई खाना खा रहा हो या पढ़ रहा हो या कहीं जा रहा हो तो घर के बड़े बोलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाई ध्यान से खाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान से पढ़ना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान से जाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका तात्पर्य यह है कि जिस समय जो कार्य कर रहे हो उस समय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी विषय के ज्ञान पर एकाग्र रहेंगे तो उसका प्रतिफल अधिक अच्छा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिक लाभकारी व अधिक प्रसन्नता प्रदान करने वाला होगा। अत: निष्कर्ष रूप में ध्यान मानव मात्र के लिए शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वाचिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहारिक व आत्मिक हर पहलू की दृष्टि से हमें एक नयी ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सन्तोष व सुख देने की पद्धति है। आजकल यद्यपि ध्यान के नाम पर अशास्त्रीय या अवैदिक पद्धतियाँ भी प्रचलित हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु वास्तव में ध्यान उसी व्यक्ति का घटित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो योग के पहले </span>6 <span lang="hi" xml:lang="hi">अङ्गों का यथोचित्त पालन कर चुका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस प्रकार नींद की विधि तो बतायी जा सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अच्छी नींद किसी को दिलायी नहीं जा सकती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तो परिणाम है जो व्यक्ति अपने कर्त्तव्य कर्मों का यथोचित्त पालन करता है उसे अच्छी नींद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके परिणाम स्वरूप मिलती है। उसी प्रकार ध्यान की विधि तो हमारे ऋषियों ने बता दी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उस की स्थिति में कोई बिना योगाङ्गों के अनुष्ठान के पहुंचा नहीं सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह तो परिणाम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अष्टाङ्ग योग के </span>6 <span lang="hi" xml:lang="hi">अङ्गों का यथोचित्त पालन करने वाले व्यक्ति के जीवन में ही ध्यान घटित होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर वह चाहे कोई संसारी हो या ब्रह्मचारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगी संन्यासी हो। ध्यान तो सभी के लिए अनिवार्य है।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3152/shashwat-pragya-oct-2015</link>
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                <pubDate>Thu, 01 Oct 2015 21:59:08 +0530</pubDate>
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                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के  शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन की पूर्णता व सफलता के सूत्र</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">1. संकल्प में विकल्प नहीं आने देना चाहिए और अपने शुभ संकल्प को पूर्ण करने के लिए पूर्ण पुरुषार्थ करना चाहिए। शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धिक व आध्यात्मिक पुरुषार्थ में तो हम पूर्ण स्वतंत्र हैं। आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक व राजनैतिक दृष्टि से हमारे जीवन में थोड़ी अन्यों पर निर्भरता अवश्य होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु इससे सामान्य बाधा आती है और इसे हम पार कर लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थोड़ा कष्ट तो होता ही है। पुरुषार्थ में जीवन की पूर्णता है। बाह्य पुरुषार्थ हमें समृद्धि व आन्तरिक पुरुषार्थ हमें समाधि के शिखर तक</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3124/eternal-truth-emanating-from-the-eternal-wisdom-of-the-revered-yogarishi-his-holiness-swamiji-maharaj"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/1293.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन की पूर्णता व सफलता के सूत्र</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">1. संकल्प में विकल्प नहीं आने देना चाहिए और अपने शुभ संकल्प को पूर्ण करने के लिए पूर्ण पुरुषार्थ करना चाहिए। शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धिक व आध्यात्मिक पुरुषार्थ में तो हम पूर्ण स्वतंत्र हैं। आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक व राजनैतिक दृष्टि से हमारे जीवन में थोड़ी अन्यों पर निर्भरता अवश्य होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु इससे सामान्य बाधा आती है और इसे हम पार कर लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थोड़ा कष्ट तो होता ही है। पुरुषार्थ में जीवन की पूर्णता है। बाह्य पुरुषार्थ हमें समृद्धि व आन्तरिक पुरुषार्थ हमें समाधि के शिखर तक ले जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">2. जब हम निष्काम सेवा  व साधना करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भगवान् की तीन सबसे बड़ी विभूतियाँ हमें मिलती हैं। एक श्रेष्ठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्नत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सात्विक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण विवेकशील बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेधा या प्रज्ञा। दूसरी विभूति है श्रेष्ठ बलवान व पूर्ण निरोगी शरीर तथा तीसरी विभूति है श्रेष्ठ माता-पिता व समर्थ श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरुओं का आश्रय। इस जन्म में श्रेष्ठ भोगों को भोगने से सौभाग्य का उदय नहीं होने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु जितना भी हम भोग भोगते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उतने ही हमारे पुण्यों का क्षय हो जाता है। अत: एक पूर्ण सात्विक व पूर्ण विवेकशील व्यक्ति का यह कर्त्तव्य है कि वह 10%</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से प्रारंभ करके धीरे-धीरे 90 व 100%</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">समष्टि की सेवा के लिए जीवन जीए। समष्टि की सेवा ही निष्काम सेवा है। इसे ही वेदों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शनों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गीता व उपनिषद् में ब्रह्मकर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अचाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आप्तकाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्म काम या दिव्य कर्म आदि नाम दिए जाते हैं। अपने अविवेकपूर्ण इच्छाओं से मुक्त होकर हमें वेदाज्ञा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु आज्ञा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्राज्ञा अथवा आत्माज्ञा के अनुरुप ही जीवन जीना चाहिए। आत्मा में उठने वाली परमात्मा की एक भी आज्ञा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेरणा या निर्देश का हमें एक बार भी अनादर या उल्लंघन नहीं करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">3. हमें अपने जीवन में कुछ निर्णय पूरी दृढ़ता के साथ करने चाहिए और वैसे ही प्रामाणिक जीवन जीना चाहिए। इसी से जीवन में दिव्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महानता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषित्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देवत्व या पूर्णता आती है। जैसे स्थूल दोषों को तो हम जीवन में तुरन्त हटा सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत: मांसाहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिक्रिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झूठ अथवा शास्त्रीय शब्दों में कहें तो यम-नियमों के विपरीत आचरण। सूक्ष्म दोषों को पूरी जागरूकता के साथ तनु करते हुए दग्धबीज करने के लिए संकल्पित रहना चाहिए। एक दिन हमें जीवन में सफलता अवश्य मिलेगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक व अन्य परस्पर के सम्बन्धों में उदारता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परस्परता या सह-अस्तित्व के सिद्धान्त पर चलना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन ऋषियों के वैदिक सिद्धान्तों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने आचरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु एवं संगठन के प्रति हमें पूर्ण दृढ़ता व कट्टरता रखनी चाहिए। इनमें कोई समझौता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ढुलमुल रवैया नहीं रखना चाहिए। उदारता व दृढ़ता के ये दो सिद्धान्त या आदर्श बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। इन दो सिद्धान्तों को न समझने से ही संसार में दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्याय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधर्म व अशान्ति है। मैं स्वयं इस सिद्धान्त को पूरी तरह जीता हूँ तथा मुझसे प्रीति करने वाले सभी पुण्यात्माओं से यह विनम्र आत्मनिवेदन करता हूँ कि सब ऐसे ही जिएं। हमें स्वयं के प्रति पूर्ण दृढ़ता रखनी ही पड़ेगी तथा समष्टि में एक सच्चिदानंद भागवत् तत्व की अनुभूति करते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबके प्रति उदारता का भाव रखते हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सबको पूर्ण दिव्यता के साथ पूर्ण सत्य की ओर बढ़ना होगा।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>सितम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Sep 2015 21:59:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के  शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> चक्रव्यूह</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">    मिथ्या आकर्षणों से मुक्त  होकर यदि हम सामान्य विवेक से भी काम लें तो जीवन में आहार-व्यवहार</span>, </strong><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खान-पान से लेकर जीवन के हर एक सन्दर्भ में हम सही विकल्प का चुनाव करके एक स्वस्थ</span>, </strong><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्तिमय व आनन्दमय जीवन जी सकते हैं। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि जीवन में कोई समर्थ गुरू मिल जाए तो ये सब बहुत आसान हो जाता है।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      जी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">वन में हर एक कदम पर एक गहरा चक्रव्यूह है। शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार व संस्कारों के स्तर पर वैयक्तिक रूप से तथा पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसायिक</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3102/shashwat-pragya-august-2015"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/710.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> चक्रव्यूह</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">  मिथ्या आकर्षणों से मुक्त  होकर यदि हम सामान्य विवेक से भी काम लें तो जीवन में आहार-व्यवहार</span>, </strong><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खान-पान से लेकर जीवन के हर एक सन्दर्भ में हम सही विकल्प का चुनाव करके एक स्वस्थ</span>, </strong><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्तिमय व आनन्दमय जीवन जी सकते हैं। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि जीवन में कोई समर्थ गुरू मिल जाए तो ये सब बहुत आसान हो जाता है।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   जी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">वन में हर एक कदम पर एक गहरा चक्रव्यूह है। शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार व संस्कारों के स्तर पर वैयक्तिक रूप से तथा पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसायिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक व वैश्विक स्तर पर भी एक बहुत बड़ा चक्रव्यूह है। यह अच्छा भी और बुरा भी। यदि हम एकाग्रचित्त होकर प्रसन्नता व पवित्रता के साथ चेतना के सभी स्तरों पर पूर्ण पुरुषार्थ करें और सभी सन्दर्भों में विवेकपूर्ण आचरण करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इन समस्त चक्रव्यूहों को हम भेदकर अपने अन्तिम लक्ष्य सभी अज्ञान या अविवेक पूर्ण कामनाओं से मुक्त होकर जीवन में पूर्णता की अनुभूति कर सकते हैं। यदि हम जागरूक ना हों तो पदे-पदे हमें संकटों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघर्षों व दु:खों का सामना करना पड़ेगा। शरीर में रोग हो जाए तो हर रोग का अलग डॉक्टर अलग-अलग दवा और उनका दुष्प्रभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही रोगों के कारण दूसरे रोगों के चक्रव्यूह में पड़कर बहुत प्रकार से दु:ख पाते हैं। इसी प्रकार इन्द्रियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार व संस्कारों का भी एक बहुत बड़ा चक्रव्यूह है। यदि हम विवेकशील व जागरूक होकर आगे नहीं बढ़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अवसाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव व अशान्ति का कभी भी न खत्म होने वाला चक्रव्यूह प्रारम्भ हो जाता है। जबकि विवेक व वैराग्य पूर्वक जितेन्द्रिय होकर अपने अन्त:करण या चित्त को शुद्ध करके हम इसी जीवन को जीवनमुक्तहोकर जी सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार सम्बन्धों की ठीक-ठीक समझ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसार के नियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कानून व संविधान तथा भगवान् के विधान को यदि ठीक-ठीक समझकर हम प्रतिपल होश में रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो घनघोर संकटों के बीच भी जीवन में संतुलन रखते हुए अपनी मंजिल को हम पा ही लेते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: विवेकशील मनुष्य को जागरूक व सहज होकर अपने स्वधर्म का पूरी पवित्रता से आचरण करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विकल्प:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कोई कहता है जीवन एक संग्राम है। कोई कहता है जीवन एक अनसुलझी पहेली है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कोई जीवन को संकल्प व विकल्पों के बीच सत्य की राह पर आत्म प्रेरणा को आधार बना कर बढ़़ता हुआ अपना अभ्युदय व नि:श्रेयस सिद्ध कर लेता है। दुनिया के इस बाजार में अच्छे व बुरे दोनों ही चीख-चीख कर हमें अपनी ओर रिझाते व बुलाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चुनाव हमें करना है। शुभाशुभ या पापपुण्य के बीच हम कई बार इसलिए निर्णय नहीं कर पाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि बाहर के बाजार के शोर के बीच आत्मा की पुकार मंद पड़ जाती है। खाने-पीने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पढ़ने-लिखने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देखने-सुनने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहनने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न पहनने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उठने-बैठने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोने-जागने से लेकर जीवन के हर पहलू के बारे में अक्सर हम भ्रमित हो जाते हैं। खुशियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता व सुख के झूठे सपने दिखाकर लोग हमें बहका देते हैं और जीवन में हम सही विकल्प का चुनाव या निर्णय नहीं कर पाते और अन्तत: अन्त हीन दु:ख का सफर शुरू हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मिथ्या आकर्षणों से मुक्त होकर यदि हम सामान्य विवेक से भी काम लें तो जीवन में आहार-व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खान-पान से लेकर जीवन के हर एक सन्दर्भ में हम सही विकल्प का चुनाव करके एक स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्तिमय व आनन्दमय जीवन जी सकते हैं। यदि जीवन में कोई समर्थ गुरू मिल जाए तो ये सब बहुत आसान हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन का शाश्वत सत्य:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सत्य है कि हम शाश्वत के प्रतिनिधि हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम भगवान् की या ऋषि-ऋषिकाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वीर-वीराङ्गनाओं की सन्तानें हैं। हम ऋषियों की दिव्य ज्ञान परम्परा व आध्यात्मिक परम्परा के उत्तराधिकारी या प्रतिनिधि हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु अज्ञान व अहंकार के कारण हम अपने मूल स्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल प्रकृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या मूल स्वभाव से विमुख होकर बार-बार ठोकर खाते हैं और पछताते हैं। भगवान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माता-पिता या समर्थ गुरुसत्ता के विशेष अनुग्रह और स्वयं के अत्यन्त पुरुषार्थ से ही हम अन्तर्मुखी स्थितप्रज्ञ होकर परम सत्य या शाश्वत सत्य की ओर आगे बढ़ पाते हैं। भगवान् हम सब जीवों को अपनी दिव्य प्रेरणाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य संवेदनाओं एवं दिव्य सामर्थ्य से सदायुक्त रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे हम इसी जन्म में जीवन के शाश्वत सत्य को प्राप्त हो सकें। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अगस्त</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3102/shashwat-pragya-august-2015</link>
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                <pubDate>Sat, 01 Aug 2015 21:59:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के  शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">चक्रव्यूह</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span lang="hi" xml:lang="hi">      मिथ्या आकर्षणों से मुक्त होकर यदि हम सामान्य विवेक से भी काम लें तो जीवन में आहार-व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खान-पान से लेकर जीवन के हर एक सन्दर्भ में हम सही विकल्प का चुनाव करके एक स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्तिमय व आनन्दमय जीवन जी सकते हैं। यदि जीवन में कोई समर्थ गुरू मिल जाए तो ये सब बहुत आसान हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      जीवन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> में हर एक कदम पर एक गहरा चक्रव्यूह है। शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार व संस्कारों के स्तर पर वैयक्तिक रूप से तथा पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसायिक</span>, </h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3079/shashwat-pragya-july-2015"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/1621.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">चक्रव्यूह</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span lang="hi" xml:lang="hi">   मिथ्या आकर्षणों से मुक्त होकर यदि हम सामान्य विवेक से भी काम लें तो जीवन में आहार-व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खान-पान से लेकर जीवन के हर एक सन्दर्भ में हम सही विकल्प का चुनाव करके एक स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्तिमय व आनन्दमय जीवन जी सकते हैं। यदि जीवन में कोई समर्थ गुरू मिल जाए तो ये सब बहुत आसान हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   जीवन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> में हर एक कदम पर एक गहरा चक्रव्यूह है। शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार व संस्कारों के स्तर पर वैयक्तिक रूप से तथा पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसायिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक व वैश्विक स्तर पर भी एक बहुत बड़ा चक्रव्यूह है। यह अच्छा भी और बुरा भी। यदि हम एकाग्रचित्त होकर प्रसन्नता व पवित्रता के साथ चेतना के सभी स्तरों पर पूर्ण पुरुषार्थ करें और सभी सन्दर्भों में विवेकपूर्ण आचरण करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इन समस्त चक्रव्यूहों को हम भेदकर अपने अन्तिम लक्ष्य सभी अज्ञान या अविवेक पूर्ण कामनाओं से मुक्त होकर जीवन में पूर्णता की अनुभूति कर सकते हैं। यदि हम जागरूक ना हों तो पदे-पदे हमें संकटों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघर्षों व दु:खों का सामना करना पड़ेगा। शरीर में रोग हो जाए तो हर रोग का अलग डॉक्टर अलग-अलग दवा और उनका दुष्प्रभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही रोगों के कारण दूसरे रोगों के चक्रव्यूह में पड़कर बहुत प्रकार से दु:ख पाते हैं। इसी प्रकार इन्द्रियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार व संस्कारों का भी एक बहुत बड़ा चक्रव्यूह है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हम विवेकशील व जागरूक होकर आगे नहीं बढ़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अवसाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव व अशान्ति का कभी भी न खत्म होने वाला चक्रव्यूह प्रारम्भ हो जाता है। विवेक व वैराग्य पूर्वक जितेन्द्रिय होकर अपने अन्त:करण या चित्त को शुद्ध करके हम इसी जीवन को जीवनमुक्तहोकर जी सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार सम्बन्धों की ठीक-ठीक समझ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसार के नियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कानून व संविधान तथा भगवान् के विधान को यदि ठीक-ठीक समझकर हम प्रतिपल होश में रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो घनघोर संकटों के बीच भी जीवन में संतुलन रखते हुए अपनी मंजिल को हम पा ही लेते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: विवेकशील मनुष्य को जागरूक व सहज होकर अपने स्वधर्म का पूरी पवित्रता से आचरण करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विकल्प:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कोई कहता हैं जीवन एक संग्राम है। कोई कहता है जीवन एक अनसुलझी पहेली है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कोई जीवन को संकल्प व विकल्पों के बीच सत्य की राह पर आत्म प्रेरणा को आधार बना कर बढ़़ता हुआ अपना अभ्युदय व नि:श्रेयस सिद्ध कर लेता है। दुनिया के इस बाजार में अच्छे व बुरे दोनों ही चीख-चीख कर हमें अपनी ओर रिझाते व बुलाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चुनाव हमें करना है। शुभाशुभ या पापपुण्य के बीच हम कई बार इसलिए निर्णय नहीं कर पाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि बाहर के बाजार के शोर के बीच आत्मा की पुकार मंद पड़ जाती है। खाने-पीने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पढ़ने-लिखने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देखने-सुनने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहनने न पहनने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उठने-बैठने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोने-जागने से लेकर जीवन के हर पहलु के बारे में अक्सर हम भ्रमित हो जाते हैं। खुशियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता व सुख के झूठे सपने दिखाकर लोग हमें बहका देते हैं और जीवन में हम सही विकल्प का चुनाव या निर्णय नहीं पाते और अन्तत: अन्त हीन दु:ख का सफर शुरू हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मिथ्या आकर्षणों से मुक्त होकर यदि हम सामान्य विवेक से भी काम लें तो जीवन में आहार-व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खान-पान से लेकर जीवन के हर एक सन्दर्भ में हम सही विकल्प का चुनाव करके एक स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्तिमय व आनन्दमय जीवन जी सकते हैं। यदि जीवन में कोई समर्थ गुरू मिल जाए तो ये सब बहुत आसान हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन का शाश्वत सत्य:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सत्य है कि हम शाश्वत के प्रतिनिधि हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम भगवान् की या ऋषि-ऋषिकाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वीर-वीराङ्गनाओं की सन्तानें हैं। हम ऋषियों की दिव्य ज्ञान परम्परा व आध्यात्मिक परम्परा के उत्तराधिकारी या प्रतिनिधि हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु अज्ञान व अहंकार के कारण हम अपने मूल स्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल प्रकृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या मूल स्वभाव से विमुख होकर बार-बार ठोकर खाते हैं और पछताते हैं। भगवान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माता-पिता या समर्थ गुरुसत्ता के विशेष अनुग्रह और स्वयं के अत्यन्त पुरुषार्थ से ही हम अन्तर्मुखी स्थितप्रज्ञ होकर परम सत्य या शाश्वत सत्य की ओर आगे बढ़ पाते हैं। भगवान् हम सब जीवों को अपनी दिव्य प्रेरणाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य संवेदनाओं एवं दिव्य सामर्थ्य से सदायुक्त रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे हम इसी जन्म में जीवन के शाश्वत सत्य को प्राप्त हो सकें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जड़ी बूटी दिवस:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्ण सृष्टि स्वयं में नियन्त्रित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मर्यादित एवं अनुशासित है। सृष्टि के सूक्ष्म-से-सूक्ष्म परमाणु से लेकर बड़े-बड़े घटक या इकाईयाँ ये पूरा ब्रह्माण्ड विधाता के विधान या शाश्वत नियमों में बँधा हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्यता से भरा हुआ है। मुनष्य शरीर की भी एक-एक सूक्ष्म कोशिकाओं से लेकर पूरा शरीर तन्त्र सृष्टि की सबसे अद्भुत रचना है। मनुष्य के पिण्ड में भगवान् ने ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण शक्तियों का समावेश कर दिया और सारी दिव्यता देने के साथ-साथ मनुष्य को भगवान् ने पूर्ण स्वतंत्रता भी दे दी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह स्वतंत्रता मनुष्येतर जीवों व अन्य सृष्टि के घटकों को प्राप्त नहीं है। वे सब भगवान् के विधान में ही बंधे हुए उसकी उपासना करते हुए पूर्ण क्रियाशील हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिस मनुष्य को भगवान् ने अपरिमित ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदना व सामर्थ्य से युक्तकर पूर्ण स्वाधीनता दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अपने अविवेकपूर्ण आचरण से सृष्टि में विध्वंस करने में लगा है। अपनी अविवेकपूर्ण मांगों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महत्त्वाकांक्षाओं या तृष्णाओं को पूरा करने के लिए सृष्टि में विध्वंस करने लगा और पिछले </span>200<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ वर्षों में प्रकृति का जो विनाश नहीं हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह मात्र लगभग पिछले </span>200<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों में हो गया। आज जंगल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जड़ी-बूटियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेड़-पौधों का विनाश करने से लेकर मनुष्य ने अपने क्षणिक सुखों के लिए एक लम्बे विनाश को आमन्त्रण दे दिया है। आज पूरी प्रकृति में मनुष्य ने अपनी दुष्कृति से विकृति पैदा कर दी है। हवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिट्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आकाश व अन्नाद्रि जीवन के सारे मूल तत्त्वों को विकृत कर दिया है। यदि अभी हम नहीं संभले तो आने वाली मनुष्य जाति के लिए हम घनघोर संकट के बीज बोकर जायेंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आइए प्रकृति माता को बचाइये। यह प्रकृति भगवान् की उत्कृष्ट कृति है। यह भगवान् की रचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् का ही प्रत्यक्ष रूप यह प्रकृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् का ही मूर्त्त रूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सगुण-साकार रूप है। हम एक-एक पेड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पौधे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वनस्पति व जड़ी-बूटियों की ऐसे देखभाल करें जैसे भगवान् की पूजा करते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति माता के व ऋषियों के हम पर अनन्त उपकार हैं। प्रकृति के उपकारों से उऋण होने के लिए संगठन के पाँचों इकाईयों से जुड़े योग साधक भाई-बहन इसे एक सघन अभियान के रूप में चलायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही प्रकृति के प्रति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् व ऋषियों के प्रति हमारी पूजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा व आराधना है कि हम अधिक-से-अधिक वृक्षारोपण कर प्रकृति का संरक्षण करें। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2015 21:59:24 +0530</pubDate>
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