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                <title>जीवन का शाश्वत सत्य - योग संदेश</title>
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                <description>जीवन का शाश्वत सत्य RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के  शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> चक्रव्यूह</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">    मिथ्या आकर्षणों से मुक्त  होकर यदि हम सामान्य विवेक से भी काम लें तो जीवन में आहार-व्यवहार</span>, </strong><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खान-पान से लेकर जीवन के हर एक सन्दर्भ में हम सही विकल्प का चुनाव करके एक स्वस्थ</span>, </strong><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्तिमय व आनन्दमय जीवन जी सकते हैं। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि जीवन में कोई समर्थ गुरू मिल जाए तो ये सब बहुत आसान हो जाता है।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      जी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">वन में हर एक कदम पर एक गहरा चक्रव्यूह है। शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार व संस्कारों के स्तर पर वैयक्तिक रूप से तथा पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसायिक</span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3102/shashwat-pragya-august-2015"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/710.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> चक्रव्यूह</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">  मिथ्या आकर्षणों से मुक्त  होकर यदि हम सामान्य विवेक से भी काम लें तो जीवन में आहार-व्यवहार</span>, </strong><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खान-पान से लेकर जीवन के हर एक सन्दर्भ में हम सही विकल्प का चुनाव करके एक स्वस्थ</span>, </strong><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्तिमय व आनन्दमय जीवन जी सकते हैं। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि जीवन में कोई समर्थ गुरू मिल जाए तो ये सब बहुत आसान हो जाता है।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   जी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">वन में हर एक कदम पर एक गहरा चक्रव्यूह है। शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार व संस्कारों के स्तर पर वैयक्तिक रूप से तथा पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसायिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक व वैश्विक स्तर पर भी एक बहुत बड़ा चक्रव्यूह है। यह अच्छा भी और बुरा भी। यदि हम एकाग्रचित्त होकर प्रसन्नता व पवित्रता के साथ चेतना के सभी स्तरों पर पूर्ण पुरुषार्थ करें और सभी सन्दर्भों में विवेकपूर्ण आचरण करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इन समस्त चक्रव्यूहों को हम भेदकर अपने अन्तिम लक्ष्य सभी अज्ञान या अविवेक पूर्ण कामनाओं से मुक्त होकर जीवन में पूर्णता की अनुभूति कर सकते हैं। यदि हम जागरूक ना हों तो पदे-पदे हमें संकटों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघर्षों व दु:खों का सामना करना पड़ेगा। शरीर में रोग हो जाए तो हर रोग का अलग डॉक्टर अलग-अलग दवा और उनका दुष्प्रभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही रोगों के कारण दूसरे रोगों के चक्रव्यूह में पड़कर बहुत प्रकार से दु:ख पाते हैं। इसी प्रकार इन्द्रियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार व संस्कारों का भी एक बहुत बड़ा चक्रव्यूह है। यदि हम विवेकशील व जागरूक होकर आगे नहीं बढ़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अवसाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव व अशान्ति का कभी भी न खत्म होने वाला चक्रव्यूह प्रारम्भ हो जाता है। जबकि विवेक व वैराग्य पूर्वक जितेन्द्रिय होकर अपने अन्त:करण या चित्त को शुद्ध करके हम इसी जीवन को जीवनमुक्तहोकर जी सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार सम्बन्धों की ठीक-ठीक समझ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसार के नियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कानून व संविधान तथा भगवान् के विधान को यदि ठीक-ठीक समझकर हम प्रतिपल होश में रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो घनघोर संकटों के बीच भी जीवन में संतुलन रखते हुए अपनी मंजिल को हम पा ही लेते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: विवेकशील मनुष्य को जागरूक व सहज होकर अपने स्वधर्म का पूरी पवित्रता से आचरण करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विकल्प:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कोई कहता है जीवन एक संग्राम है। कोई कहता है जीवन एक अनसुलझी पहेली है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कोई जीवन को संकल्प व विकल्पों के बीच सत्य की राह पर आत्म प्रेरणा को आधार बना कर बढ़़ता हुआ अपना अभ्युदय व नि:श्रेयस सिद्ध कर लेता है। दुनिया के इस बाजार में अच्छे व बुरे दोनों ही चीख-चीख कर हमें अपनी ओर रिझाते व बुलाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चुनाव हमें करना है। शुभाशुभ या पापपुण्य के बीच हम कई बार इसलिए निर्णय नहीं कर पाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि बाहर के बाजार के शोर के बीच आत्मा की पुकार मंद पड़ जाती है। खाने-पीने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पढ़ने-लिखने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देखने-सुनने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहनने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न पहनने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उठने-बैठने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोने-जागने से लेकर जीवन के हर पहलू के बारे में अक्सर हम भ्रमित हो जाते हैं। खुशियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता व सुख के झूठे सपने दिखाकर लोग हमें बहका देते हैं और जीवन में हम सही विकल्प का चुनाव या निर्णय नहीं कर पाते और अन्तत: अन्त हीन दु:ख का सफर शुरू हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मिथ्या आकर्षणों से मुक्त होकर यदि हम सामान्य विवेक से भी काम लें तो जीवन में आहार-व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खान-पान से लेकर जीवन के हर एक सन्दर्भ में हम सही विकल्प का चुनाव करके एक स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्तिमय व आनन्दमय जीवन जी सकते हैं। यदि जीवन में कोई समर्थ गुरू मिल जाए तो ये सब बहुत आसान हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन का शाश्वत सत्य:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सत्य है कि हम शाश्वत के प्रतिनिधि हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम भगवान् की या ऋषि-ऋषिकाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वीर-वीराङ्गनाओं की सन्तानें हैं। हम ऋषियों की दिव्य ज्ञान परम्परा व आध्यात्मिक परम्परा के उत्तराधिकारी या प्रतिनिधि हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु अज्ञान व अहंकार के कारण हम अपने मूल स्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल प्रकृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या मूल स्वभाव से विमुख होकर बार-बार ठोकर खाते हैं और पछताते हैं। भगवान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माता-पिता या समर्थ गुरुसत्ता के विशेष अनुग्रह और स्वयं के अत्यन्त पुरुषार्थ से ही हम अन्तर्मुखी स्थितप्रज्ञ होकर परम सत्य या शाश्वत सत्य की ओर आगे बढ़ पाते हैं। भगवान् हम सब जीवों को अपनी दिव्य प्रेरणाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य संवेदनाओं एवं दिव्य सामर्थ्य से सदायुक्त रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे हम इसी जन्म में जीवन के शाश्वत सत्य को प्राप्त हो सकें। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शाश्वत प्रज्ञा</category>
                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अगस्त</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3102/shashwat-pragya-august-2015</link>
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                <pubDate>Sat, 01 Aug 2015 21:59:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के  शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">चक्रव्यूह</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span lang="hi" xml:lang="hi">      मिथ्या आकर्षणों से मुक्त होकर यदि हम सामान्य विवेक से भी काम लें तो जीवन में आहार-व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खान-पान से लेकर जीवन के हर एक सन्दर्भ में हम सही विकल्प का चुनाव करके एक स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्तिमय व आनन्दमय जीवन जी सकते हैं। यदि जीवन में कोई समर्थ गुरू मिल जाए तो ये सब बहुत आसान हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      जीवन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> में हर एक कदम पर एक गहरा चक्रव्यूह है। शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार व संस्कारों के स्तर पर वैयक्तिक रूप से तथा पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसायिक</span>, </h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3079/shashwat-pragya-july-2015"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/1621.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;" align="center"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">चक्रव्यूह</span></strong></span></h4>
<h5 style="text-align:justify;" align="center"><span lang="hi" xml:lang="hi">   मिथ्या आकर्षणों से मुक्त होकर यदि हम सामान्य विवेक से भी काम लें तो जीवन में आहार-व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खान-पान से लेकर जीवन के हर एक सन्दर्भ में हम सही विकल्प का चुनाव करके एक स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्तिमय व आनन्दमय जीवन जी सकते हैं। यदि जीवन में कोई समर्थ गुरू मिल जाए तो ये सब बहुत आसान हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   जीवन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> में हर एक कदम पर एक गहरा चक्रव्यूह है। शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्रियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार व संस्कारों के स्तर पर वैयक्तिक रूप से तथा पारिवारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसायिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनैतिक व वैश्विक स्तर पर भी एक बहुत बड़ा चक्रव्यूह है। यह अच्छा भी और बुरा भी। यदि हम एकाग्रचित्त होकर प्रसन्नता व पवित्रता के साथ चेतना के सभी स्तरों पर पूर्ण पुरुषार्थ करें और सभी सन्दर्भों में विवेकपूर्ण आचरण करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इन समस्त चक्रव्यूहों को हम भेदकर अपने अन्तिम लक्ष्य सभी अज्ञान या अविवेक पूर्ण कामनाओं से मुक्त होकर जीवन में पूर्णता की अनुभूति कर सकते हैं। यदि हम जागरूक ना हों तो पदे-पदे हमें संकटों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघर्षों व दु:खों का सामना करना पड़ेगा। शरीर में रोग हो जाए तो हर रोग का अलग डॉक्टर अलग-अलग दवा और उनका दुष्प्रभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ ही रोगों के कारण दूसरे रोगों के चक्रव्यूह में पड़कर बहुत प्रकार से दु:ख पाते हैं। इसी प्रकार इन्द्रियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार व संस्कारों का भी एक बहुत बड़ा चक्रव्यूह है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हम विवेकशील व जागरूक होकर आगे नहीं बढ़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अवसाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तनाव व अशान्ति का कभी भी न खत्म होने वाला चक्रव्यूह प्रारम्भ हो जाता है। विवेक व वैराग्य पूर्वक जितेन्द्रिय होकर अपने अन्त:करण या चित्त को शुद्ध करके हम इसी जीवन को जीवनमुक्तहोकर जी सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार सम्बन्धों की ठीक-ठीक समझ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसार के नियम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कानून व संविधान तथा भगवान् के विधान को यदि ठीक-ठीक समझकर हम प्रतिपल होश में रहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो घनघोर संकटों के बीच भी जीवन में संतुलन रखते हुए अपनी मंजिल को हम पा ही लेते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अत: विवेकशील मनुष्य को जागरूक व सहज होकर अपने स्वधर्म का पूरी पवित्रता से आचरण करना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विकल्प:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कोई कहता हैं जीवन एक संग्राम है। कोई कहता है जीवन एक अनसुलझी पहेली है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कोई जीवन को संकल्प व विकल्पों के बीच सत्य की राह पर आत्म प्रेरणा को आधार बना कर बढ़़ता हुआ अपना अभ्युदय व नि:श्रेयस सिद्ध कर लेता है। दुनिया के इस बाजार में अच्छे व बुरे दोनों ही चीख-चीख कर हमें अपनी ओर रिझाते व बुलाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चुनाव हमें करना है। शुभाशुभ या पापपुण्य के बीच हम कई बार इसलिए निर्णय नहीं कर पाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि बाहर के बाजार के शोर के बीच आत्मा की पुकार मंद पड़ जाती है। खाने-पीने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पढ़ने-लिखने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देखने-सुनने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहनने न पहनने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उठने-बैठने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोने-जागने से लेकर जीवन के हर पहलु के बारे में अक्सर हम भ्रमित हो जाते हैं। खुशियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता व सुख के झूठे सपने दिखाकर लोग हमें बहका देते हैं और जीवन में हम सही विकल्प का चुनाव या निर्णय नहीं पाते और अन्तत: अन्त हीन दु:ख का सफर शुरू हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मिथ्या आकर्षणों से मुक्त होकर यदि हम सामान्य विवेक से भी काम लें तो जीवन में आहार-व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खान-पान से लेकर जीवन के हर एक सन्दर्भ में हम सही विकल्प का चुनाव करके एक स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्तिमय व आनन्दमय जीवन जी सकते हैं। यदि जीवन में कोई समर्थ गुरू मिल जाए तो ये सब बहुत आसान हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन का शाश्वत सत्य:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सत्य है कि हम शाश्वत के प्रतिनिधि हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम भगवान् की या ऋषि-ऋषिकाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वीर-वीराङ्गनाओं की सन्तानें हैं। हम ऋषियों की दिव्य ज्ञान परम्परा व आध्यात्मिक परम्परा के उत्तराधिकारी या प्रतिनिधि हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु अज्ञान व अहंकार के कारण हम अपने मूल स्वरूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल प्रकृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या मूल स्वभाव से विमुख होकर बार-बार ठोकर खाते हैं और पछताते हैं। भगवान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माता-पिता या समर्थ गुरुसत्ता के विशेष अनुग्रह और स्वयं के अत्यन्त पुरुषार्थ से ही हम अन्तर्मुखी स्थितप्रज्ञ होकर परम सत्य या शाश्वत सत्य की ओर आगे बढ़ पाते हैं। भगवान् हम सब जीवों को अपनी दिव्य प्रेरणाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य संवेदनाओं एवं दिव्य सामर्थ्य से सदायुक्त रखें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे हम इसी जन्म में जीवन के शाश्वत सत्य को प्राप्त हो सकें। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जड़ी बूटी दिवस:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्पूर्ण सृष्टि स्वयं में नियन्त्रित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मर्यादित एवं अनुशासित है। सृष्टि के सूक्ष्म-से-सूक्ष्म परमाणु से लेकर बड़े-बड़े घटक या इकाईयाँ ये पूरा ब्रह्माण्ड विधाता के विधान या शाश्वत नियमों में बँधा हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्यता से भरा हुआ है। मुनष्य शरीर की भी एक-एक सूक्ष्म कोशिकाओं से लेकर पूरा शरीर तन्त्र सृष्टि की सबसे अद्भुत रचना है। मनुष्य के पिण्ड में भगवान् ने ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण शक्तियों का समावेश कर दिया और सारी दिव्यता देने के साथ-साथ मनुष्य को भगवान् ने पूर्ण स्वतंत्रता भी दे दी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह स्वतंत्रता मनुष्येतर जीवों व अन्य सृष्टि के घटकों को प्राप्त नहीं है। वे सब भगवान् के विधान में ही बंधे हुए उसकी उपासना करते हुए पूर्ण क्रियाशील हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिस मनुष्य को भगवान् ने अपरिमित ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदना व सामर्थ्य से युक्तकर पूर्ण स्वाधीनता दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अपने अविवेकपूर्ण आचरण से सृष्टि में विध्वंस करने में लगा है। अपनी अविवेकपूर्ण मांगों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इच्छाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महत्त्वाकांक्षाओं या तृष्णाओं को पूरा करने के लिए सृष्टि में विध्वंस करने लगा और पिछले </span>200<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ वर्षों में प्रकृति का जो विनाश नहीं हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह मात्र लगभग पिछले </span>200<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों में हो गया। आज जंगल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जड़ी-बूटियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेड़-पौधों का विनाश करने से लेकर मनुष्य ने अपने क्षणिक सुखों के लिए एक लम्बे विनाश को आमन्त्रण दे दिया है। आज पूरी प्रकृति में मनुष्य ने अपनी दुष्कृति से विकृति पैदा कर दी है। हवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिट्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आकाश व अन्नाद्रि जीवन के सारे मूल तत्त्वों को विकृत कर दिया है। यदि अभी हम नहीं संभले तो आने वाली मनुष्य जाति के लिए हम घनघोर संकट के बीज बोकर जायेंगे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आइए प्रकृति माता को बचाइये। यह प्रकृति भगवान् की उत्कृष्ट कृति है। यह भगवान् की रचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् का ही प्रत्यक्ष रूप यह प्रकृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् का ही मूर्त्त रूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सगुण-साकार रूप है। हम एक-एक पेड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पौधे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वनस्पति व जड़ी-बूटियों की ऐसे देखभाल करें जैसे भगवान् की पूजा करते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् के</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति माता के व ऋषियों के हम पर अनन्त उपकार हैं। प्रकृति के उपकारों से उऋण होने के लिए संगठन के पाँचों इकाईयों से जुड़े योग साधक भाई-बहन इसे एक सघन अभियान के रूप में चलायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही प्रकृति के प्रति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् व ऋषियों के प्रति हमारी पूजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा व आराधना है कि हम अधिक-से-अधिक वृक्षारोपण कर प्रकृति का संरक्षण करें। </span></h5>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2015 21:59:24 +0530</pubDate>
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