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                <title>योग की शिष्य-परम्परा - योग संदेश</title>
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                <description>योग की शिष्य-परम्परा RSS Feed</description>
                
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                <title>योग की गौरवशाली परम्परा एवं इतिहास</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">      योग</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वचेतना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वबल अर्थात् आत्मबल इत्यादि को पूर्णत: जाग्रत् करने का विशुद्ध विज्ञान हैै। उसकी प्रसुप्त शक्ति जाग्रत् होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब वह अपरिमित शक्तियों का स्वामी बन जाता है। योग मूलत: पूर्णतया सत्यबोध कराने वाली अध्यात्म-विद्या है। योग विद्या ही अपराविद्या व पराविद्या का मूल है। योग ही हमारे अभ्युदय व नि:श्रेयस् का आधार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग एक गूढ़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यन्त उपयोगी एवं व्यावहारिक विषय है। यह रूपान्तरण का विज्ञान (</span>Science of Transformation<span lang="hi" xml:lang="hi">) है। योग मात्र ऋषि-मुनियों और विचारशील-विवेकवान् लोगों के लिये ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि प्रत्येक व्यक्ति-किसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजदूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नौकरीपेशा <strong>गृहस्थ</strong></span></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3082/glorious-tradition-and-history-of-yoga"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/150.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   योग</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वचेतना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वबल अर्थात् आत्मबल इत्यादि को पूर्णत: जाग्रत् करने का विशुद्ध विज्ञान हैै। उसकी प्रसुप्त शक्ति जाग्रत् होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब वह अपरिमित शक्तियों का स्वामी बन जाता है। योग मूलत: पूर्णतया सत्यबोध कराने वाली अध्यात्म-विद्या है। योग विद्या ही अपराविद्या व पराविद्या का मूल है। योग ही हमारे अभ्युदय व नि:श्रेयस् का आधार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग एक गूढ़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यन्त उपयोगी एवं व्यावहारिक विषय है। यह रूपान्तरण का विज्ञान (</span>Science of Transformation<span lang="hi" xml:lang="hi">) है। योग मात्र ऋषि-मुनियों और विचारशील-विवेकवान् लोगों के लिये ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि प्रत्येक व्यक्ति-किसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजदूर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नौकरीपेशा <strong>गृहस्थ</strong></span><strong>, </strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>वानप्रस्थ एवं संन्यासी</strong> से लेकर विद्यार्थी आदि सभी के लिये ऋषियों की उत्कृष्ट देन है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि पतंजलि के अनुसार चित्त अर्थात् अन्त:करण की समस्त वृत्तियों के निरोध से उत्पन्न अवस्था ही योग है। मनुष्य अपने सम्पूर्ण बाह्य व्यवहार की सिद्धि हेतु पंच ज्ञानेन्द्रियों व पंच कर्मेन्द्रियों को बाह्यकरण रूप में उपयोग करता है तथा आन्तरिक व्यवहार व आचरण की सिद्धि के लिए मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि और अहंकार को साधन रूप में ग्रहण करता है। ये साधन अन्त:करण कहलाते हैं। योगदर्शन में चित्त पद के द्वारा चारों करण अर्थात् मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त और अहंकार एकसाथ गृहीत किये गये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यथा-चित्तमन्त:करणसामान्यम्।  इस चित्त में विभिन्न प्रकार के चित्र बनते रहते हैं। ये चित्र सांसारिक विषयों से सम्बद्ध होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हीं को चित्त की वृत्तियाँ कहते हैं। ये वृत्तियाँ जीवात्मा ही अपनी इच्छा से बनाती हैं और स्वयं ही अपनी इच्छा और प्रयत्न से रोक भी लेता है। बाह्य व आन्तरिक करणों के द्वारा जब वह बाह्य तथा आभ्यन्तर दोनों प्रकार के विचारों को रोक देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब जो अवस्था उत्पन्न होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह योग है। योग की अवस्था में आत्मा अपने शुद्धतम ज्ञानमय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आनन्दमय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण सुख व शान्तिमय मूल स्वरूप में रहता है। यही हम सब आत्माओं की मूल प्रकृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल स्वभाव या मूल स्वरूप है। इसी निज स्वरूप को हमें योगाभ्यास अर्थात् कर्मयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानयोग व भक्तियोग से प्राप्त करना है। शुद्ध कर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शुद्ध ज्ञान व शुद्ध उपासना से हमें योग की सह-स्थिति प्राप्त होगी। इसी के लिए साधना व निष्काम सेवा मुख्य साधन हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार समत्व ही योग है। अशान्त व अनवस्थित मन जब सुव्यवस्थित होकर शान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकरस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सन्तुलित व समस्थिति को प्राप्त होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे योग कहते हैं। सामान्यत: मन अनुकूल व प्रतिकूल दोनों अवस्थाओं में सन्तुलन को खोकर व्यग्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्त-व्यस्त रहता है। जब मन की अशान्ति के कारण का निवारण हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उसी प्रतिक्रिया रहित तटस्थावस्था व स्थितप्रज्ञता को गीता योग कहती है। गीता में योग की एक और परिभाषा मिलती है-</span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">तं विद्याद् दु:खसंयोगवियोगं योगसिमज्ञतम्।</span> </strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् दु:ख के संयोग का वियोग होना ही योग है। </span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग: कर्मसु कौशलम्'</span></strong></span> <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेक पूर्वक अपने स्वधर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीरधर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवनधर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र व विश्व के प्रति अपने कर्त्तव्य कर्म को अपना धर्म मानकर करना यही स्वधर्म योग है। यही राष्ट्रधर्म व विश्वधर्म रूपी योग मानव मात्र के लिए एकमात्र कल्याण का मार्ग है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मैत्रयण्युपनिषद्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कठोपनिषद्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैवल्योपनिषद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गर्भोपनिषद</span>, </strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>योगशिखोपनिषद्</strong> में अपने और प्राण की एकता करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वरजरूपी महाशक्ति कुण्डलिनी को स्वरेतरूपी आत्मतत्त्व के साथ संयुक्तकरने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य अर्थात् पिघौला और चन्द्र अर्थात् इड़ा स्वर का संयोग करने तथा परमात्मा में जीवात्मा का मिलन या लय होन की प्रक्रिया को योग से अभिहित किया गया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>बौद्धयोग-</strong></span>साहित्य में योग के स्थान पर ध्यान और समाधि शब्दों के प्रयोग मिलते हैं। बौद्धयोग परम्परा में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान की प्रक्रिया को समाधि कहा जाता है। अत: बौद्धयोग में योग का अर्थ समाधि है। योगसूत्र की व्याख्या या भाष्य में महर्षि व्यास भी योग को समाधि ही कहते हैं-</span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग: समाधि:</span>’<span lang="hi" xml:lang="hi">। </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि चरक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गौतमीय तन्त्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हठप्रदीपिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीगुरुग्रन्थसाहिब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैनाचार्यों से लेकर आधुनिक युग के महान् योगी महर्षि अरविन्द तक में निम्न चेतना से ऊपर उठकर सदा उच्च चेतना अर्थात् भागवत् चेतना या दिव्य चेतना से युक्त होकर दिव्य जीवन जीने के मूल तत्व में योग के संकल्प मिलते हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान समय में विश्वविख्यात योगर्षि स्वामी रामदेव योग को समाधि से जोड़ते हैं और योग की पूर्ण व्यावहारिक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि योग आत्मदर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्म- साक्षात्कार या आत्मबोध की आध्यात्मिक पद्धति है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">योग जीवन-दर्शन है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">योग जीवन-प्रबन्धन है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">योग आत्मानुशासन है। योग मात्र शारीरिक व्यायाम नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु सम्पूर्ण जीवनशैली है। योग चित्त को निर्मल व निर्बीज करने की आध्यात्मिक विधा है। योग एक सम्पूर्ण चिकित्सा-विज्ञान है। योग जीवन का विज्ञान है। योग व्यक्ति समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र व विश्व की सम्पूर्ण समस्याओं का समाधान है। योग एवं कर्मयोग अर्थात् साधना एवं निष्काम सेवा ही योग के मुख्य साधन हैं। प्रतिपल ब्रह्म के एकत्व या ब्रह्मभाव में रहते हुए भगवान् की अन्त:प्रेरणा के अनुसार कर्म करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आचरण करना या जीवन जीना ही योगमय जीवन है।</span>‘</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग की प्राचीन परम्परायें:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अत्यन्त समृद्ध प्राचीन भारतीय वांगमय के अध्ययन-अनुसन्धान से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हिरण्यगर्भ</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">ही योग के आदि प्रवक्ता बताये गये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्य कोई नहीं। ऋग्वेद ने अद्वितीय हिरण्यगर्भ को सूर्यादि तेजस्वी पदार्थों का गर्भ-उत्पत्तिस्थान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्पादक कहा है। हिरण्यगर्भ को सम्पूर्ण प्राणियों का स्वामी गुरुओं का भी गुरु और पुरातन कहा है। महाभारत में भी योग के आदि प्रवक्ता के रूप में हिरण्यगर्भ को ही स्वीकारा गया है। यह योगिजन का नित्य पूज्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विभु व समष्टि-बुद्धि है। इसी को योगिजन महान् तथा विरिमच और अज (अजन्मा) भी कहते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">अद्भुत रामायण</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में हिरण्यगर्भ जगत् की अन्तरात्मा व श्रीमद्भागवतपुराण में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को योगोपदेश देते हुए कहते हैं कि यही योगकौशल का मूल स्रोत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग का प्रारम्भ परमात्मा हिरण्यगर्भ के द्वारा ही हुआ है। अत: योग का आदि व प्रथम गुरु ईश्वर भी वही है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अखिल विश्व के प्राचीनतम साहित्य वेद में योग की अनेक संकल्पनाओं का स्पष्ट उल्लेख विभिन्न स्थानों पर मिलता है। यजुर्वेद में शरीरस्थ पाँच वायुओं की तेज वृद्धि के लिए प्रार्थना की गई है। अनेक वैदिक ऋचाएँ प्रत्यक्षतया अथवा प्रकारान्तर से योग के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित करती हैं। यजुर्वेद के ११वें अध्याय के 1 से 5 तक के मन्त्र योग की उत्कृष्टता दर्शाते हैं। अथर्ववेद में कहा गया है कि विवेकशील व्यक्ति शरीर के सभी स्थानों से प्राण एकत्रित करके दिव्य लोक को प्राप्त करते हैं। वेदों में मुक्ति-प्राप्ति  के एकल साधन </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की चर्चा विस्तृत रूप में हुई है। वेदों की उत्पत्ति सृष्टि की उत्पत्ति के साथ-साथ हुई है। वर्तमान सृष्टि की आयु 1 अरब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">17 करोड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">29 लाख</span>, 49<span lang="hi" xml:lang="hi"> हजार 116 वर्ष (विक्रम संवत् 2071 ईस्वी संवत् 2015 में) हो चुकी है। अत: कतिपय विद्वान् योग-उत्पत्ति का काल भी इतना ही मानते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>अहिर्बुध्न्य-</strong></span>संहिता तथा अन्यान्य पुरातन ग्रन्थों से यह सिद्ध हो गया है कि शाश्वत योग की अक्षुण्ण परम्परा की शुरुआत भी हिरण्यगर्भ से ही हुई है। हिरण्यगर्भ से अग्नि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वायु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आदित्य और अंगिरा चार ऋषियों ने समाधि की उच्च-स्तरीय भूमियों में वेदमन्त्रों का साक्षात्कार किया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग के आधुनिक युग के पुरोधा महर्षि दयानन्द ने स्वीकारा है कि धर्मात्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि लोग जब-जब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस-जिस के अर्थ को जानने की इच्छा करके ध्यानावस्थित हो परमेश्वर के ध्यान में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके स्वरूप में समाधिस्थ हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब-तब परमात्मा ने अभीष्ट मन्त्रों के अर्थ को अनावृत्त किया और वही लोग उन मन्त्रों के ऋषि कहलाये। इस प्रकार योग की परम्परा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि-परम्परा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">से आगे बढ़ी। इसके अलावा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शिष्य-परम्परा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से भी भगवान् हिरण्यगर्भ प्रकाशित योग की अक्षुण्ण परम्परा आगे बढ़ती रही।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग की शिष्य-परम्परा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग की शिष्य-परम्परा का प्रारम्भिक महत्त्वपूर्ण संकेत मुण्डकोपनिषद् में मिलता है। उसमें कहा है कि देवों में मुख्य देव सर्वप्रथम ब्रह्मा हुये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सारे जगत् का कर्त्ता और सब लोकों का रक्षक है। उन्होंने सब विद्याओं में प्रतिष्ठित प्रधान ब्रह्मविद्या अर्थात् योगविद्या अपने ज्येष्ठपुत्र अथर्वन् को कही। अथर्वन् ने अंगिरस् को बताई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंगिरस् ने भारद्वाज सत्यवाह को बताई। भारद्वाज सत्यवाह से यह एक-दूसरे के बाद परम्परा से चली आ रही है।  पवित्रन्त:करण वाले सनक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सनातन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सनन्दन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसुरि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वोढु व पंचशिख आदि विद्वान् सर्वकर्मसंन्यास रूप ब्रह्मयोग अथवा ज्ञानयोग के अनुयायी हुए। यही ब्रह्मयोग कालान्तर में सांख्ययोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजयोग एवं अध्यात्मयोग आदि नामों से प्रसिद्ध हुआ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग की कर्मयोग परम्परा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हिरण्यगर्भ प्रवर्तित योग की दूसरी शाखा कर्मयोग की परम्परा में किञ्चित् व्युत्थित चित्त से युक्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसार के कार्यों को करते हुए मोक्ष की ओर अग्रसरित होने वाले विवस्वान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इक्ष्वाकु व अन्य राजर्षि हुए। इस शाखा का मूल तात्पर्य यह है कि जो सर्वकर्मसंन्यासी नहीं बन सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह कर्मों का ईश्वर में अर्पण करते हुए कार्य फलों की आसक्ति से रहित व समाहितचित्त होकर परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है। इस शाखा का उल्लेख छान्दोग्योपनिषद् में मिलता है। इसी शाखा का उल्लेख गीता में भी मिलता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगेश्वरश्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं-हे अर्जुन! मैंने (आत्मस्वरूप) किसी नई निष्ठा को अपनाने को नहीं कहा है। तुझे अपना विश्वसनीय मित्र समझ यह लुप्तप्राय सनातन-योग का उत्तम रहस्य बताया है। जब बड़े-बड़े विद्वान्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजा-महाराजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि-महर्षि लोग महाभारत-युद्ध में मारे गये और बहुत से मर गये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब विद्या और वेदोक्त धर्म का प्रचार नष्ट हो चला। दुर्भाग्यवश महाभारत काल के पश्चात् यह सनातन-योग की परम्परा पुन: यथावत् नहीं रह पायी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">योग में सम्प्रदायवाद व संस्कृति:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वेदोक्तधर्म का प्रचार-प्रसार नष्टप्राय होने से समाज में क्रमश: अलग-अलग मत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पन्थ व सम्प्रदायों की स्थापना होने लगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे लोग </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">समझ बैठे। उसके लिए जीना वे अपना स्वधर्म समझने लगे और अर्थ का अनर्थ करते हुए इस बात को खूब फैलाया कि<strong> </strong></span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:</span>’</strong></span><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>। </strong></span>यही कारण है कि योग की पावनी परम्परा सम्पूर्ण समाज में अच्छी तरह से फैल नहीं पायी। यद्यपि सभी सम्प्रदायों ने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग-संस्कृति</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">को सर्वोच्च स्वीकार करके किसी न किसी रूप में इसे आत्मसात् किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथापि साम्प्रदायिक आग्रहों की वजह से तथा वेदोक्तधर्म को भलीभाँति न समझ पाने के कारण वे साम्प्रदायिकता के बन्धन नहीं तोड़ पाये। फिर भी सभी सम्प्रदायों के अन्दर विद्यमान उच्च मूल्य एवं मान्यताएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तन व अन्त:करण को स्वच्छ रखते हुए जन्म-जन्मान्तरों के बन्धन से छूटने की समग्र अवधारणा तथा साधना की वैज्ञानिक पद्धतियाँ और कुछ न होकर </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">ही है। बाद में महर्षि पतंजलि ने वेद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपनिषद्</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांख्य आदि वैदिक ग्रन्थों में यत्र-तत्र बिखरी हुई योगविषयक सामग्रियों में से कुछ शब्दश: तथा कुछ किञ्चित् शाब्दिक परिवर्तनों के साथ एक जगह एकत्रित करते हुए क्रमिक तथा सुव्यवस्थित रूप में ग्रन्थबद्ध करने का महान् कार्य किया। तत्पश्चात् पातंजलयोग की गौरवशाली परम्परा समाज में आगे बढ़ती हुई आज हम तक पहुँची है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विभिन्न सम्प्रदायों में योग परम्परा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म शाश्वत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म को धारण करने हेतु अपनायी जाने वाली शाश्वत साधना पद्धति योग है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">योग से स्व (चेतना) का निरन्तर विकास (उत्कर्ष) होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें किसी बाह्य आलम्बन की जरूरत नहीं पड़ती और यदि पड़ती भी है तो उसका किसी अन्य के साथ कोई मतभेद नहीं होता। योग के मूलतत्त्वों में कोई अन्तर नहीं होता। उसकी विविध सम्प्रदाय अपने-अपने तरीके से व्याख्या करते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार विभिन्न सम्प्रदायों ने योग की अपने अनुरूप व्याख्या की है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु मूल स्रोत सभी का एक ही है। योग का लक्ष्य कल्याण है। योग शाश्वत है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सम्प्रदाय में शाब्दिक भिन्नता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सम्प्रदाय में यौगिक सिद्धान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साधना-प्रविधि के साथ-साथ धार्मिक क्रियाकलाप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्रत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपवास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्यौहार व रीति-रिवाज आदि को अपनाया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि योग में सभी सम्प्रदायों के शाश्वत सिद्धान्त व साधनात्मक पक्ष पर ही ध्यान दिया जाता है न कि रीति-रिवाज आदि पर।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग का तात्पर्य है-शाश्वत प्रायोगिक प्रविधियों अर्थात् व्यावहारिक विज्ञान। जो सम्यक् दृष्टि अर्थात् दर्शन पर आधारित है। योग साधन और साध्य दोनों ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें सार्वभौमिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सार्वकालिक एवं सार्वजनीन हित समाहित होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वह प्रक्रिया जिसके अभ्यास से व्यक्ति अपने परम लक्ष्य मोक्ष की दिशा में निरन्तर अग्रसर हो</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके माध्यम से व्यक्ति की चेतना का ऊर्ध्वारोहण व रूपान्तरण होता हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे साधने के लिए किसी बाह्य आलम्बनों की आवश्यकता न पड़ती हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही योग है। उस प्रक्रिया अर्थात् योग को उस मत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पन्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्प्रदायादि के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यथा-जैनयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धयोग व शैवयोग आदि उसी के स्वरूप हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्ध सम्प्रदाय के अन्दर प्रचलित योग की परम्परा को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धयोग-परम्परा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा जैन सम्प्रदाय के अन्दर प्रचलित योग की परम्परा को </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जैनयोग-परम्परा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहा जाता है। उपर्युक्त तीनों परम्पराओं की साधना पद्धतियों में शारीरिक क्रियाओं की अपेक्षा मानसिक क्रियाओं को अधिक महत्त्व दिया गया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">बाइबल एवं कुरान में योगतत्व:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार बाइबल के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शैलोपदेश</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में कहा गया है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">धन्य हैं वे जो धर्म के भूखे और प्यासे हैं एवं जिनके हृदय शुद्ध है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वे तृप्त किए जायेंगे एवं परमेश्वर (गॉड) को देखेंगे।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे यह सिद्ध होता है कि ईसाई सम्प्रदाय में भी योग के मूलभूत तत्त्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस्लाम धर्म की मूलोक्ति है-</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अल्लाह एक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस एक अल्लाह के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा मुहम्मद उसी अल्लाह का पैगम्बर (सन्देशवाहक/उपदेशक) है।</span>’ '<span lang="hi" xml:lang="hi">अल्लाह वह जीवन्त नित्य सत्ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जगत् व्यवस्था को सम्भाले हुए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तव में उसके सिवा कोई अन्य सत्ता नहीं है।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पष्टत: इस्लाम का अल्लाह और योग का ईश्वर एक ही प्रतीत होता है। मुसलमानों के पवित्र ग्रन्थ कुरान के अनुसार </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अल्लाह ने ईमान वालों पर यह बहुत बड़ा अहसान किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि उनके बीच उन्हीं में से एक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">रसूल</span>’ (<span lang="hi" xml:lang="hi">अल्लाह या ईश्वर का सन्देशवाहक) उठाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उन्हें उसकी </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आयते</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सुनाता है। उनकी आत्मा को शुद्ध और विकसित होने का अवसर प्रदान करता है और उन्हें किताब और हिकमत अर्थात् तत्त्वदर्शिता (तत्त्वज्ञान) की शिक्षा देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि इससे पहले वे खुली गुमराही में पड़े हुए थे।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस्लाम धर्म के इन मूल तत्त्वों की साम्यता योग तत्त्वों से स्पष्ट ही दृष्टिगोचर होती है। क्योंकि ईमान अर्थात् अस्तेय और शुद्धता यानी शौच एवं हिकमत अर्थात् तत्त्वज्ञान तो योग के प्राण तत्त्व है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संतों की अपनी योग परम्परा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतवर्ष में समय-समय पर ऐसे महान् व्यक्तित्व भी उत्पन्न हुए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने अपने को किसी भी सम्प्रदाय के साथ जोड़े बगैर ही समाज में अपने सार्वभौमिक व वैज्ञानिक सत्य सिद्धान्तों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मान्यताओं व विचारों को फैलाया। वे समाज में सन्त के रूप में प्रसिद्ध हैं। ऐसे सन्त-समुदाय के अन्दर प्रचलित योग की परम्परा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सन्तयोग-परम्परा</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">कहलाती है। इस परम्परा में बहुत सारे सन्त हुए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें से कुछ लोग शारीरिक क्रियाओं को गौण मानते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कुछ लोग इसे दृढ़ता के साथ प्रमुख मानते हैं और कुछ लोग दोनों का समन्वय स्वीकार करते हैं। इनके अलावा शारीरिक क्रियाओं को विशेष महत्ता देकर की जानेवाली योग-साधना की परम्परा भी विकसित हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनमें से </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">हठयोग-परम्परा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तथा </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">नाथयोग-परम्परा</span>’: <span lang="hi" xml:lang="hi">का प्रभाव समाज में अधिक देखने को मिलता है। इन प्रमुख योग-परम्पराओं के अतिरिक्त और भी कई प्रकार की योग-परम्पराएँ विकसित होकर पूरी दुनिया के अन्दर फैल रही हैं। जब इस धराधाम में महर्षि दयानन्द का आविर्भाव होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब उन्होंने उस खण्डित ऋषियों की योग-साधना की परम्परा को पुन: मूलाधार से जोड़ने का युगान्तकारी कार्य किया और योग के आधुनिक युग का सूत्रपात किया। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो आज उसी परम्परा में शिक्षित-दीक्षित योगर्षि स्वामी रामदेव जी महाराज ने अपने कठोर तप व पुरुषार्थ से उस योग की परम पावनी परम्परा को देश व दुनियाँ के करोड़ों पुण्यात्माओं तक पहुँचाने का अभूतपूर्व कार्य ही नहीं किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपितु वे विश्व के अन्तिम व्यक्ति तक योग को पहुँचाने के लिए प्राणार्पण से कृतसंकल्पित हैं। हमारा अहोभाग्य है कि हमारा जन्म वर्तमान में हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ चहुँ ओर योग की गंगा कलकल ध्वनि के साथ प्रवाहित हो रही है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योगमार्ग के सरलीकरण के लिए विभिन्न योगियों ने अपने अनुभव के आधार पर अनेक उपाय सुझाये हैं। उन्होंने पृथक् आचार-मीमांसा की स्थापना की है। सरलीकरण की इसी प्रवृत्ति ने अनेक योग-विधाओं को जन्म दिया। योग-विधाओं के पालन करने और कराने के लिए योगियों ने अपने पृथक्-पृथक् मठ और सम्प्रदाय स्थापित किये हैं। पुरातन शाश्वत योग को अपनाने वाले अनेक सम्प्रदाय आधुनिक समाज में विद्यमान हैं। इनमें से कुछ सम्प्रदाय प्राचीन हैं तथा कुछ मध्यकाल से चले आ रहे हैं। प्राचीन भारत में योग को अपनाने वाले अनेक सम्प्रदायों में से शैव सम्प्रदाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नाथ सम्प्रदाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैष्णव सम्प्रदाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाक्त सम्प्रदाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संन्यासी सम्प्रदाय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कापालिक सम्प्रदाय व अघोर सम्प्रदाय आदि प्रसिद्ध रहे हैं। इन सब में योग की परम्परा अनवरत रूप में चली आ रही है। इसी अक्षुण्ण योग परम्परा के अन्तर्गत विकसित हुई राजयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्तियोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञानयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन्त्रयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लययोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अष्टांगयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हठयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समत्वयोग व ध्यानयोग आदि अनेकानेक योग की पद्धतियाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मोक्ष या कैवल्य प्राप्ति के लिए साधक को अपने-अपने ढंग से सहायता करती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ऋषि-संस्कृति में योग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतवर्षीय ऋषि-संस्कृति में बहुत-सी ऐसी परम्पराएँ सृष्टि के प्रारम्भ से ही विद्यमान रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मनुष्य की चेतना को उच्चतम बिन्दु की ओर प्रवाहित करते हुए उसे कल्याण के शिखर पर प्रतिष्ठित करती हैं। उन्हीं परम्पराओं में से सर्वोच्च योग-परम्परा का हमेशा से महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> इतना ही नहीं</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">योग-परम्परा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">वैदिक सनातन ऋषि-परम्परा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हिन्दू-परम्परा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्ध-परम्परा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैन-परम्परा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्ध-परम्परा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सन्त-परम्परादि समस्त धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यता व संस्कृति आधारित परम्पराओं में प्राण रूप में हमेशा से समाहित रही है। योग-साधना को कमोवेश दुनियाँ की सभी परम्पराओं ने अपनाया है। अत: इसका महत्त्व सार्वकालिक व सार्वभौमिक रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राचीन भारतवर्षीय ऋषि-परम्परा में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द में जीवात्मा या परमात्मा का संयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राण और अपान का संयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चन्द्र और सूर्य का मिलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिव और शक्ति का सामरस्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्तवृत्ति निरोध अथवा अन्य किसी भी प्रकार से उसका लक्षण किया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल में विशेष भेद नहीं है। इस प्रकार योग का तात्पर्य है-ससीम को असीम के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्षुद्र को महान् के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नर को नारायण के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामना को दिव्य भावना के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वार्थ को परमार्थ के साथ जोड़ देना। योगाभ्यास का समूचा पुरुषार्थ साधक को उसी अवस्था के योग्य बनाने के लिए ही निर्मित किया गया है। योग को अपनाकर न जाने कितनों का जीवन धन्य हुआ है एवं वे जीवन के शिखर पर जा पहुँचे हैं। वस्तुत: समस्त धर्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सभ्यता व संस्कृति जिन सूत्रों पर अपनी यात्रा पूरी करते आये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे सब योग पर ही आश्रित हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पुरातत्वीय अवशेषों में योग:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सिन्धुकालीन पुरावशेषों में योग से सम्बद्ध कई साक्ष्य मिले हैं। मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मोहर में सींग युक्त त्रिमुखी पुरुष को एक सिंहासन पर योगमुद्रा (पद्मासन) में बैठे दिखाया गया है। मणिबन्ध से भुजा तक उसके दोनों हाथ कंकणों (चूड़ियों) से अलंकृत हैं। उसके दाहिनी तरफ  एक हाथी एवं एक बाघ और बायीं तरफ  एक गैंडा तथा एक भैंसा खड़े हुए दिखलाये गये हैं। सिंहासन के नीचे दो हिरण खड़े दिखलाये गये हैं।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्शल महोदय ने इसे ऐतिहासिक योग के प्रथम ज्ञाता शिव का आदिरूप स्वीकार किया है। उस मूर्ति के ऊपर सात अक्षरों का एक अभिलेख है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। मोहनजोदड़ो से ही प्राप्त मिट्टी की एक अन्य मोहर पर  योगासीन मुद्रा में एक मानवाकृति अंकित है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके अगल-बगल में पुरुष हाथ जोड़े खड़े हैं। इन पुरुषों के पीछे सर्प के फन दिखलाये गये हैं।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">मोहरों पर यौगिक लक्षणों से युक्त चित्रों के अलावा मोहनजोदड़ों से सिलखड़ी की बनी हुई 15 सेन्टीमीटर लम्बी एक पाषाण प्रतिमा भी प्राप्त हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें यौगिक लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं। इस मूर्ति में प्रदर्शित पुरुष के नेत्र अर्द्धोन्मिलित हैं। नासाग्र दृष्टि के आधार पर इसे योगी की मूर्ति कहा गया है।</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे प्रतीत होता है कि उस समय एकाग्रता (धारणा) के अभ्यास के लिए नासाग्र दृष्टि (अगोचरीमुद्रा) का अभ्यास किया जाता होगा। प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जॉन मार्शल</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि मोहनजोदड़ो में जिस नरदेवता की मूर्ति मिली है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह त्रिमुखी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह देवता पीठासन पर योगमुद्रा में बैठा हुआ है। उसके दोनों पैर इस प्रकार मुड़े हुए हैं कि एड़ी से एड़ी मिल रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंगूठे नीचे की ओर मुड़े हुए हैं एवं हाथ घुटने के ऊपर आगे की ओर फैले हुए हैं। इस तथ्य पर विचार करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सिन्धुकालीन सभ्यता में यौगिक विचारधारा का प्रचलन किसी न किसी रूप में अवश्य रहा होगा। इन्हीं बातों के आधार पर कुछ विद्वानों की मान्यता है कि योग सिन्धुकालीन सभ्यता की देन है। उनकी ऐसी मान्यता इसीलिए बनी थी कि वे सिन्धु-सभ्यता को वेद के पूर्व की सभ्यता मानते थे</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आधुनिक शोध-अनुसन्धानों से यह स्पष्ट हो गया है कि सिन्धु-सभ्यता वैदिक-सभ्यता के पश्चात् विकसित हुई वेदमूलक सभ्यता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सिन्धु-सभ्यता से उपलब्ध पुरातात्त्विक प्रमाणों में योग के क्रियापक्ष का निरूपण मुख्यत: आसन व मुद्राओं के माध्यम से हुआ है। योग-साधना हेतु योगशास्त्रों में वर्णित योगांगों का अभिन्न हिस्सा है-आसन व मुद्रा। साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि सिन्धु सभ्यता में अष्टांग योग व हठयोग आदि योग की विभिन्न पद्धतियाँ प्रचलन में थी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक भारत में योग काल:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग के इतिहास का आधुनिक काल ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय इतिहास के आधुनिक काल की भी शुरुआत 1857 से ही मानी गयी है। महर्षि दयानन्द सरस्वती के उदय के पश्चात् योग का आधुनिक काल प्रारम्भ हो जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से यह काल प्रारम्भ होकर वर्तमान में भी चल रहा है। आधुनिक काल के योग के आचार्य के रूप में स्वामी दयानन्द सरस्वती (सन् 1824-1883 ई.) का उल्लेख सर्वप्रथम करना उचित होगा। स्वामी दयानन्द जी ने अपने मुख्य ग्रन्थों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यथा-सत्यार्थ प्रकाश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्याभिविनय व संस्कार-विधि आदि के माध्यम से योग के सिद्धान्त व साधना से सम्बद्ध भ्रान्त-धारणाओं का खण्डन करते हुए योग के वास्तविक पुरातन आर्ष स्वरूप का निदर्शन कराया। उनके शिष्य स्वामी लक्ष्मणानन्द ने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यानयोग-प्रकाश</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">में उनकी शिक्षा को प्रस्तुत किया है। सन् 1875 से महर्षि दयानन्द द्वारा स्थापित आर्य समाज अपनी हजारों संस्थाओं के माध्यम से देश-विदेश में निरन्तर वैदिक ऋषि-परम्परा पर आधारित योग की शिक्षा दे रहा है। महर्षि दयानन्द के सिद्धान्तों से प्रेरित होकर स्वामी श्रद्धानन्द के द्वारा स्थापित गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय सन् 1902 ई. से ही अनवरत समाज में योग-शिक्षा व वैदिक-शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार कर रहा है। इसी तरह से देश-विदेश में अनेक गुरुकुलों के द्वारा वैदिक-पद्धति पर योग की शिक्षा-दीक्षा दी जा रही है। इन गुरुकुलों से सैकड़ों योग्य योगाचार्य एवं आचार्य निकल चुके हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो समाज में योग की अलख जगा रहे हैं। वर्तमान में विश्व प्रसिद्ध योगर्षि स्वामी रामदेवजी इसी गुरुकुल-परम्परा से ही प्रशिक्षित हैं। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2015 21:55:56 +0530</pubDate>
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