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                <title>नवजीवन प्रदान करने वाले परम सत्य को चरितार्थ करने में बाधाएं - योग संदेश</title>
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                <title>नवजीवन प्रदान करने वाले परम सत्य को चरितार्थ करने में बाधाएं</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. सुमन</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मुख्य कें द्रीय प्रभारी</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">महिला पतंजलि योग-समिति</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3083/obstacles-in-realizing-the-ultimate-truth-that-gives-new-life"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/1501.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   अपनी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति में परिवर्तन करना कोई आसान कार्य नहीं है। इसके लिए गतिशील संकल्प को दृढ़ बनाना बहुत कठिन है। इस दुरूह कार्य को करने में निम्न प्राण व प्रकृति जो बाधाएँ डालते हैं उनका कुछ दिग्दर्शन करवाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">निम्नतर प्राण की वृत्ति अपने पुराने अभ्यासगत तरीके से चिपके रहना चाहती है:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   वह अभी भी अपने पुराने स्वरूप से गठबन्धन किये हुए और परम प्रकाश के विरूद्ध विद्रोह करती है। निम्न प्राण हर बार जब उसे निरूत्साहित किया जाता है तो वह अपनी स्वतन्त्रता का अधिकार जताता है और अपने ही अनगढ़ और अहंकार पूर्ण विचारो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामनाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तरंगों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आवेगों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या सुविधाओं का जब चाहे तब समर्थन और अनुसरण करने की स्वतन्त्रता का अधिकार जताता है। वह गुप्त रूप से या शब्दों में अपने मानव असंस्कृत स्वभाव का अनुसरण करने का दावा करता है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान और असंगति से युक्त जो उसका स्वरूप है वही बने रहने का अधिकार घोषित करता है ओर वह इन समस्त अशुद्ध तथा निम्न स्तर पदार्थो को वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म आचरण में अभिव्यक्त करने के अधिकार की मांग करता है। कभी-कभी सिद्धान्त रूप में उसकी मांग नहीं करता बल्कि व्यवहार में उसका दावा करता है। अपने बोलने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोचने तथा अनुभव करने के पुराने अभ्यासगत तरीकों को समर्थन करता है तथा चरित्र में जो कुछ विकृत और विरूप हो गया उसे शाश्वत बनाने का प्रयत् न करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मिथ्याभिमान तथा उग्र राजसिक भावना:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मिथ्याभिमान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घमण्ड तथा स्वाग्रही उग्र राजसिक भावना ये अपने-आपको भागवत शक्ति और उसके कार्य के बीच ला खड़ा करते हैं और विरोधी शक्तियों को बुलाते हैं छोटे पैमाने में मिथ्यामिभान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घमण्ड तथा राजसिक उग्रता के दोष प्राय: सभी मानव स्वभाओं में विद्यमान रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये भिन्न आकार ग्रहण कर लेते हैं ओर सच्चे आध्यात्मिक परिवर्तन के लिए बहुत बड़ी बाधा बन जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अनाज्ञाकारिता और अनुशासनहीनता यह तपस्या के मार्ग में बहुत बड़ी बाधा है:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निम्न प्रकृति का एक भाग हमेशा असंयत अनियमित तथा स्वाग्रही होता है और वह अपने आवेग तथा विचार से भिन्न किसी भी तरह के नियम कानून और अनुसशासन के आरोपण को स्वीकार करने में अनिच्छुक होता है इसका परिणाम होता है साधक अपने गुरू का आज्ञाकारी बनने का दावा व प्रतिज्ञा तो सतत करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसका क्रिया और व्यवहार उसके एकदम विपरित होता है। और जो हमसे पीछे वाले साधक हैं उनके लिए एक बुरा उदाहरण भी हम प्रस्तुत करते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कपटाचार और मिथ्याभाषण:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ये अपनी ही बनायी कीचड़ में साधक को फंसा देते हैं। जो लोग ऋजु और निष्कपट नहीं हैं वे गुरू या भगवान् की सहायता से लाभ नहीं उठा सकते हैं क्योकि वे स्वयं ही उससे मुंह मोड़ लेते हैं। इस मार्ग में वही आगे बढ़ पायेंगे जो ऋजु और सत्यवादी हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">निरन्तर अपने अहं का समर्थन करने की खतरनाक आदत:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मन अपने ही विचार को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पद-प्रतिष्ठा को समर्थन करने के लिए खड़ा रहता है। इसके लिए वह किसी भी प्रकार का तर्क करने के लिए तैयार रहता है। भले इसके लिए उसे किसी छल-छद्म ढ़ोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आडम्बर का सहारा भी क्यों न लेना पड़े। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति की इन कठिनाइयों पर विजय कैसे पायी जाये:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति की चाहे जैसी भी कठिनाइयां क्यों न हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके साथ जूझने की प्रक्रिया चाहे जितनी लंबी और कष्टकर क्यों न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे परम सत्य के विरूद्ध अन्त तक नहीं ठहर सकती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बशर्ते कि सत्ता के इन भागों में सच्चा भाव सच्ची वृत्ति तथा सच्चा प्रयास हो या आ जाये। लेकिन अगर साधक आत्म-अहंकार स्वाग्रह या तामसिक जड़ता के कारण अपनी आँखे बन्द किये रखे या परम प्रकाश के विरूद्ध अपने हदय को कठोर बनाये रखे तो जब तक वह वैसा करता रहेगा कोई भी उसकी मदद नहीं कर सकेगा। दिव्य परिवर्तन के लिये समस्त सत्ता की स्वीकृति आवश्यक है और स्वीकृति की समग्रता तथा संपूर्णता ही सर्वागीण समर्पण को लाती है। लेकिन निम्न प्राण की यह स्वीकृति मात्र एक मानसिक स्वीकरण या कोई गुजरता हुआ भावनात्मक समर्थन नहीं होना चाहिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे अपने-आपको एक स्थायी मनोभाव तथा सतत और संगत क्रिया में अनूदित करना चाहिये।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">आवश्यक उद्यम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्विविध जीवन नहीं:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस योग को केवल वे ही अन्त तक कर सकते हैं जो इसके बारे में पूरी तरह सच्चे हैं और अपने-आपको भगवान् में पाने के लिये अपने तुच्छ मानवीय अहंकार तथा उसकी मांगों को समाप्त करने के लिए तैयार हैं। इसे चंचलता या शिथिलता की भावना से नहीं किया जा सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्य बहुत ऊँचा और कठिन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निम्न प्रकृति में विरोधी शक्तियाँ न्यूनतम अनुमति या लघुतम उद्घाटन का लाभ उठाने के लिये एकदम से तत्पर रहती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके लिए बहुत सतत तथा तीव्र अभीप्सा और तपस्या की आवश्यकता होती है। यदि मानव-मन के विचार धृष्टतापूर्वक अपने-आपको प्रस्थापित करें या सत्ता के निम्नतम भाग अपनी मांगों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहजवृत्तियों और दावों की मनमानी तुष्टि करना चाहें-सामान्यत: जिनका समर्थन मानव स्वभाव के नाम से किया जाता है तो यह योग नहीं किया जा सकता। अगर तुम अज्ञान की इन निम्नतम वस्तुओं को भागवत परम सत्य या सत्य पथ पर स्वीकार्य किसी निम्र कोटि के सत्य के साथ तादाम्य करने का हठ करो तो यह योग नहीं किया जा सकता। अगर तुम अपने पुराने रूप या उसकी पुरानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणिक या भौतिक रचनाओं व आदतों से चिपके रहो तो यह योग नहीं किया जा सकता। तुम्हे निरन्त अपने पुराने रूपों को पीछे छोड़ना पड़ता है और हमेशा उच्च से उच्चतर सचेतन स्तर से देखना और जीना होता है। अगर तुम अपने मानव मन या प्राणिक अहंकार की स्वतन्त्रता के लिए आग्रह करो तो यह योग नहीं किया जा सकता। जब तक मनुष्य साधारण जीवन बिताना चाहता है तब तक अगर वह ऐसा करना पसंद करे तो उसकी सत्ता के सभी अंगों को यह अधिकार है कि वे अपने निजी तरीके से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने ही खतरों तथा संकटों का सामना करते हुए स्वयं को अभिव्यक्त और संतुष्ट करें। लेकिन योग पथ पर प्रवेश करने की बात दूसरी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस पथ का सम्पर्ण उद्देश्य है इन मानवीय वस्तुओं के स्थान पर अधिक महान् सत्य के विधान तथा शक्ति को लाना और जिस की पद्धति का मर्म है-भागवत शक्ति के प्रति आत्म-समर्पण करना और फिर भी इस तथाकथित स्वतंत्रता जो अमुक अज्ञानमय वैश्व शक्तियों की अधीनता से बढ़कर और कुछ नहीं है-की मांग करने का अर्थ है विवेक शून्य विरोध में रस लेना द्विविधि जीवन बिताने के अधिकार की मांग करना।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दो चुनाव:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जो इस योग के साधक होने की घोषणा करते हैं आगर वे अपने-आपको हमेशा अज्ञान की उन शक्तियों के केन्द्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यंत्र या प्रवक्ता बनायें रखें जो इसके सिद्धांत तथा उद्देश्य का विरोध करती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हें अस्वीकार करती है और उनका उपहास करती हैं तो उनके लिये यह योग करने की और भी कम संभावना होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समस्त विरोधों के बावजूद यह अतिमानसिक शक्ति भौतिक चेतना तथा जड़-भौतिक जीवन में अभिव्यक्ति होने के लिए नीचे की ओर दबाव डाल रही है। दूसरी ओर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने समस्त झूठे दम्भ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंधकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन्दता या अक्षम उग्रता के साथ यह निम्नतर प्राणिक प्रकृति जो अपने-आपको बनाये रखने के लिये डटी हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवतरण के मार्ग में बाधक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतिमानसिक या अतिमानवीय चेतना और सृजन की किसी भी सच्ची वास्तविकता या सच्ची संभावना में विश्वास करना अस्वीकार करती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वह भगवान् की उपस्थिति को अस्वीकार करती है क्योंकि वह जानती है कि उस उपस्थिति के बिना कार्य असंभव है वह जोर-जोर से अपने ही विचारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्णयों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कामनाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहज वृत्तियों को प्रस्थापित करती है और अगर इनका खण्डन किया जाये तो वह संदेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्वीकृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निन्दात्मक आलोचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्रोह तथा अस्त-व्यस्तता को फैला कर प्रतिकार करती है। आज हमारे सम्मुख ये दो चीजें हैं जिनमें प्रत्येक मनुष्य को चुनाव करना होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">चुनाव अनिवार्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य या रसातल:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि यह विरोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भागवत सत्य के अवतरण के विरूद्ध यह निस्सार बाधा और अवरोध हमेशा के लिये नहीं टिका रहा सकता। प्रत्येक मनुष्य को अंत में इस ओर या उस ओर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परम सत्य के पक्ष में या उसके विपक्ष में आना ही होगा। अतिमानसिक उपलब्धि निम्नतर अज्ञान के दुराग्रह के साथ-साथ नहीं बनी रह सकती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्विविध प्रकृति में प्राप्त सतत संतुष्टि के साथ इसका कोई मेल नहीं बैठता। अत: चुनाव अनिवार्य है- सत्य या रसातल।</span></h5>
<h5 style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">साभार: श्री अरविन्द्र की पुस्तक से</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>योग एवं आयुर्वेद</category>
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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2015 21:54:32 +0530</pubDate>
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