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                <title>संतुलित करें अपनी जैविक घड़ी - योग संदेश</title>
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                <description>संतुलित करें अपनी जैविक घड़ी RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>संतुलित करें अपनी जैविक घड़ी,  ताकि प्रकृतिस्थ बनें, निरोग रहें</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डॉ. नागेन्द्र नीरज</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">निदेशक-योगग्राम</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3110/balance-your-biological-clock--so-that-you-can-become-natural-and-stay-healthy"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/1032.jpg" alt=""></a><br />
<table style="border-collapse:collapse;width:100%;border-width:1px;background-color:#bfedd2;border-color:#BFEDD2;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8705%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(191,237,210);">
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    <strong> प्रत्येक</strong></span><strong> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणी के अन्दर भी शरीर के एक-एक अंग के नियमन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियंत्रण एवं निर्देशन करने के लिये एक घड़ी होती है यह घड़ी व्यक्ति की नींद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य तथा सेक्स का भी नियमन एवं नियोजन करती है। वैज्ञानिकों ने उसे बायोलॉजिकल या सरकेडियन क्लॉक कहा है। बॉयोलॉजिकल क्लॉक के सम्बन्ध में विस्तृत अध्ययन एवं अनुसंधान के लिये विज्ञान की एक विशिष्ट शाखा क्रोनोबायोलॉजी विकसित की गयी है। क्रोनोबायोलॉजी का मुख्य आधार सूर्य तथा इसके चारों तरफ घूमने वाले चन्द्रमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मंगल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुध आदि ग्रह हैं।</span></strong></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   ह</span><span lang="hi" xml:lang="hi">मारा भावानात्मक मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य सुर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवस्था शरीर एवं दिमाग में होने वाले जैव रासायनिक परिवर्तनों पर निर्भर करता है। ये जैव रासायनिक परिवर्तन सूर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चन्द्रमा एवं अन्य ग्रहों पर होने वाली घटनाओं पर काफी कुछ निर्भर करते हैं। प्रत्येक प्राणी के अन्दर स्थित जैव घड़ी या जैविक लयबद्धता सूर्य एवं चाँद आदि ग्रहों से प्रभावित होता है। जैविक घड़ी के अनुसार ही हमारी भवनाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिन्तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्मरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहंकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक एवं भावनात्मक स्वास्थ्य निर्भर करता है। शरीर की जैविक घड़ी के साथ अन्य क्रियाकलापों का लय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताल मिलाकर चलने से आयु एवं स्वास्थ्य की सुरक्षा एवं जीवन का विकास होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जैविक घड़ी के कार्य:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर की रोग से जूझने की ताकत प्रतिरोधक शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शारीरिक संरचना एवं क्रिया विज्ञान तथा अन्य शारीरिक कार्यो की गतिविधियों को संचालित करने वाला चक्र शारीरिक चक्र या फिजिकल साइकल कहलाता है। इसकी अवधि 33 दिन मानी गयी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मानव की सृजनशीलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संवेदनशीलता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक स्वास्थ्य एवं मूड का नियमन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियंत्रण एवं निर्देशन करने वाला भावनात्मक या इमोशनल साइकल कहलाता है। इसकी अवधि 28 दिन मानी गयी है। इमोशनल साइकल ही महिलाओं में माहवारी चक्र को संचालित करता है। मनुष्य की स्मृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सजगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्राह्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रज्ञा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्लेषण एवं संश्लेषण का कार्य मानसिक या मेन्टल साइकल द्वारा सम्पादित होता है। इसकी अवधि 33 दिन की होती है। क्रोनोबायोलॉजिस्ट का मानना है कि फिजिकल साइकल 21 दिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इमोशनल साइकल 28 दिन तथा मेंटल साइकल 31 दिन का होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तीनों चक्र धरातल से ऊपर उठते हुए उच्च शिखर पर पहुँचते हैं। पुन: वापस क्रमश धीरे-धीरे धरातल पर आते हैं। पुन: ऊपर की ओर अंतिम चोटी पर पहुँच कर पुन: धीरे-धीरे धरातल पर आते हैं। इस प्रकार शारीरिक क्षमता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक एवं भावनात्मक क्षमता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूड आदि शिखर एवं निम्र तल पर आते-जाते हैं। मियामी अमेरिका के मनोरोग विशेषज्ञ अर्नोल्ड एन.लाइबर ने </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">दी ल्यूनर इफेक्ट</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तक में नये दृष्टिकोण के अनुसार लिखा है कि हमारी त्वचा अर्द्ध पारगम्य झिल्ली सेमी परमियबल मेम्ब्रेन होने के कारण विद्युत चुम्बकीय शक्ति का आवागगमन रहता है तथा शरीर के अंगों के मध्य क्रियाशीलता एवं संतुलन बना रहता है। डॉ.लाइबर के अनुसार ग्रह-नक्षत्रों तथा तारों का प्रभाव विशेष रूप से हार्मोन्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एन्जाइम्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यूरोट्रान्समीटस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इलेक्ट्रोलाइट्स आयनों तथा स्नायु कोशिकाओं को ऊर्जा प्रदान करने वाले विद्युत कणों तथा क्रियाशीलता पर होता है। सौरमंडल की विभिन्न इकाइयों सूर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाँद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मंगल आदि की तरह शरीर की प्रत्येक कोशिका का हल्का विद्युतीय चुम्बकीय क्षेत्र होता है। यह क्षेत्र ग्रह-नक्षत्रों से निकलने वाली विद्युत चुम्बकीय विकिरण ऊर्जा एवं क्षेत्र से प्रभावित होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उनके अनुसंधान के अनुसार दिल के रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिप्रेशन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुश्चिन्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिडचिड़ापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदासी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मविश्वास की कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माहवारी सम्बन्धी रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मौसम परिवर्तन से उत्पन्न अवसाद एवं अन्य रोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनिद्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कैन्सर आदि शारीरिक एवं मानसिक रोग जैविक लय ताल को सही करके उन्हें रोगमुक्त किया जा सकता है। पूर्णिमा के दिन जैविक घड़ी के अव्यवस्थित हो जाने से पगलपन का दौरा उग्र हो सकता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">दिल का दौरा:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राय: दिल का दौरा प्रात:काल में पड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उस समय शरीर में ऑक्सीजन की कमी होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमरे में कार्बनडाईऑक्साइड ज्यादा होती है। खून खूब गाढ़ा होता है। रक्तचाप बढ़ा हुआ होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. रोनाल्ड पोर्टमैन के अनुसार ऐसे उच्च रक्तचाप एवं दिल के रोगियों का दवा लेने या देने का खास समय रात्रि को उपयुक्त रहता है। उस समय जैविक घड़ी दवा ग्रहण करने के अनुकूल होती है। दिल के रोगी के लिये प्रात: 6 से 12 बजे तक सबसे ज्यादा खतरा तथा शाम 6 बजे से आधी रात तक कम खतरा होता है। वर्ममान में रात में देरी से सोने की आदत के कारण वर्तमान में लोगों की जैविक घड़ी अत्यन्त अस्त-व्यस्त हो गयी है। रात्रि को नहीं सोने से जैव घड़ी अस्त-व्यस्त होने के साथ-साथ गेस्ट्रोइन्टेस्टाइनल तथा कार्डियोवस्कुलर अर्थात् दिल की धमनियों के रोग तेजी से पनपते हैं। जैविक घड़ी अस्त-व्यस्त होने से चिड़चिड़ापन एवं उत्तेजना बढ जाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्य क्षमता पर प्रभाव:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पेन्सिलवनिया स्थित वेस्टर्न साइकोलॉजी इन्स्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने अद्भुत खोज की है। इन खोजों के अनुसार रात्रि के समय मनुष्य की सोचने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझने की ताकत कम हो जाती है। पुन: सुबह ब्रहामुहूर्त के साथ वह बढ़कर पूर्ववत् हो जाती है। इसी शोधपूर्ण अध्ययन से यह भी ज्ञात हुआ है कि रात्रि में मनुष्य की काम करने की क्षमता भी कम हो जाती है। यह सारा कमाल शरीर की जैविक लयबद्धता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बायोरिद्म या सरकेडियन क्लॉक द्वारा संचालित होता है। शोधकर्त्ता कुछ स्वयंसेवियों को ऐसे प्रकाशरोधी कमरे में अनुसंधान हेतु ले गये जहाँ रात-दिन का अनुमान लगाना भी असंभव हो गया। एक जैसी परिस्थिति पैदा की गयी। प्रायोग के दौरान उन्हें सोने नहीं दिया गया। दिन-रात से बेखबर उन स्वयंसेवकों की चिन्तनशीलता की गति प्रति घंटा तीन मिनट की दर से मापी गयी। परिणाम आश्चर्यजनक था। जब रात आयी तो उन लोगों की सोचने-समझने की क्षमता कम हो गयी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु अगली सुबह यह बढकर पूर्ववत् हो गयी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जैव रसायनों पर प्रभाव:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रात्रि को देर तक जागने से शरीर के जैव रसायनों में भी घातक परिवर्तन होता है। रात्रि को जागने का एक बहुत बड़ा कारण बिजली का कृत्रिम प्रकाश है। बोस्टन के वीमेन्स अस्पताल के डॉ. चार्ल्स सीजर के शोधों के अनुसार कृत्रिम रोशनी हमारे शरीर की जैविक घड़ी को खतरनाक ढंग से दुष्प्रभावित कर 4 से 5 घंटा पीछे कर देती है। इसके चलते व्यक्ति को नींद विलम्ब से आती है तथा आँख जल्दी खुल जाती है। अमेरिकन जर्नल ऑफ हाइपरटेंसन के शोध कर्मियों ने बताया की नींद आने की हालत में रात भर करवटें बदलते रहने से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खास कर सुबह के समय उच्च रक्तचाप बढ़ जाता है। इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ पेविया के शोधपूर्ण अध्ययन के अनुसार रात भर नींद नहीं आने की स्थिति में दिन के कामों में व्यस्त रहने के दौरान ब्लडप्रशेर की बढ़ने की संभावना ज्यादा रहती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भरपूर नींद नहीं ले पाने से अनिद्रा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनिर्णय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उलझन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुश्चिन्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवसाद तथा दिल के अनेक रोग होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. सीजर का मानना है कि आठ घंटा भरपूर नींद अवश्य लेनी चाहिए। सोने के पहले न्यूनतम बिजली की रोशनी में रहें। अकूट घटाटोप धुप अँधेरे में सोयें। इससे आपकी जैविक घड़ी नींद लाने में सहायता करेगी तथा सुबह आप चुस्त एवं तदुरूस्त महसूस करेंगे। नींद हमारे जीवन का अहम हिस्सा है। गहरी नींद सोने से दिमाग अल्फा स्टेट ऑफ माइण्ड पर पहुँच जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे अल्फा तंरगें उत्सर्जित होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो तन तथा मन को अपूर्व शांति एवं स्वास्थ्य प्रदान करती हैं। नींद में गुर्दों द्वारा विषैले विजातीय पदार्थो को बहार निकल फेंकने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। नींद में शरीर की अनावश्यक गर्मी को बाहर कर तापमान तथा रक्तचाप को नियंत्रित किया जाता है। खर्च की गयी ऊर्जा तथा जीवनशक्ति की पुन: प्राप्ति होती है। पोर्टलैण्ड के डॉ. अल्फ्रेड लेवी तथा उनके सहायोगी डॉ. नार्मन राजेन्थाल ने उन लोगों पर सूर्य की किरणों का प्रयोग करके देखा जिनकी जैविक घड़ी अस्त-व्यस्त हो गयी थी। सूर्य की किरणें जैविक घड़ी पीनियल गंथि को नियमित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियंत्रित तथा निर्देशित करती हैं। मेसाचुसेट्स तकनीक संस्थान के डॉ. हरिस लिबरमैन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. बर्टमैन ने भी अपने प्रयोगों से सिद्ध किया है कि रवि रश्मियों की तीव्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी स्पेक्ट्रम तथा समय जैविक घड़ी को प्रभावित करते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महिलाओं के मासिक धर्म पर प्रभाव:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मासिक धर्म प्रारम्भ होने से पहले महिलाओं में रोग के संलक्षण समूह दिखते हैं। ये दो प्रकार के प्री मेन्सुरल सिण्ड्रोम पी.ए.एस. तथा प्री मेन्सुरल डिफोरिक डिसआर्डर्स पी.एम.डी.डी. होते हैं। इनमें कुछ मानसिक तथा भावनात्मक संलक्षण जैसे उदासी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निराशा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुंठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दर्द आदि ज्यादा परिलक्षित होते हैं। पी.एम.डी.डी. में नींद के लिये आवश्यक मेलाटोनिन हार्मोन का अभाव हो जाता है। इसमें सम्पूरक मेलाटानिन देकर उपचार करने की व्यवस्था की जाती है। परन्तु इससे पूर्ण समाधान नहीं हो सका है। यह रोग संलक्षण जैविक घड़ी से जुड़ा हुआ है। अत: जैविक घड़ी को ठीक करने के लिये अँधेरे में योगाभ्यास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिथिलीकरण शवासन तथा धूप स्नान ही सर्वोतम उपाय है। जैविक घड़ी को पुनर्संयोजन एवं नियमन करने के लिये क्लोरोफिल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीटा कैरोटिन युक्तआहार तथा लहसुन एवं प्याज की गाँठ का प्रयोग उपयोगी होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इन आहारों में सूर्य-किरणें संगृहीत रहती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जैविक घड़ी को नियंत्रित एवं नियमित करती हैं।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/410.jpg" alt="4" width="600" height="408"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">शुक्राणुओं पर प्रभाव:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इटली के माडेना विश्वविद्यालय के शोधकर्त्ताओं के अनुसार प्राणियों का शरीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिमाग तथा मन की क्रियाशीलता जिस प्रकार सुबह होती है वैसी शाम को नहीं होती है। जैसी दिन में होती है वैसी रात को नहीं होती है। हामैन रिप्रोडक्शन जर्नल में उक्त वैज्ञानिकों का शोध लेख प्रकाशित हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें बताया गया है कि दोपहर के समय पुरुषों के शुक्राणुओं में काफी वृद्धि होती है। तीन दिन तक ब्रहाचर्य रहने तथा दैनंदिनी लिखने वाले 31 वर्ष के कुछ स्वयंसेवकों पर किये गये विभिन्न प्रयोगों से इस निष्कर्ष पर पहुँचा गया है कि सुबह के बजाय दोपहर के बाद के समय में 1 करोड़ 70 लाख शुक्राणुओं की सक्रियता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रियाशीलता एवं संख्या में वृद्धि होती है। शाम 5 से  5.30 बजे तक यह सक्रियता 35 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। संतान चाहने वाले दम्पत्तियों के लिये शाम 5 से 5.30 बजे तक का समय मिलन हेतु श्रेष्ठतम बताया गया है। जो लोग संतान रहित हैं या जिन्हें संतान उत्पन्न करने के अयोग्य माना गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके लिये संतान प्राप्ति हेतु शाम 5 से 5.30 बजे का समय जैविक घड़ी के अनुकूल है। सुबह सात बजे शुक्राणुओं की सक्रियता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संख्या गति एवं क्रियाशीलता काफी कम होती है। शरीर की जैविक घड़ी के अनुसार संतति नियमन के लिये सुबह का समय एवं गर्भाधान के लिए शाम 6 से 7 बजे का समय समागम हेतु उपयुक्त होता हैं। इन वैज्ञानिकों के अनुसार महिलाओं की जैविक घड़ी के अनुकूल अंडाशय से अंडा निकलने अर्थात् म्बिोत्सर्ग का समय भी शाम ३ से 7 बजे होता है। शाम 5 बजे पति-पत्नी उर्वरता की चरम सीमा पर होते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कैंसर कोशिकाओं पर प्रभाव:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए ये कीमोथैपरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्जरी या रेडियेशन दिया जाता है। इन उपचारों को जैविक घड़ी के अनुकूल नियत समय पर दिया जाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ये उपचार कैंसर कोशिकाओं पर ज्यादा प्रभावी होते हैं तथा स्वस्थ कोशिकाओं को कम-से-कम हानि पहुँचाती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे बड़ी आँत के कैंसर की दवाइयाँ रात को ली जायें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ज्यादा लाभ होगा क्योंकि दिन में आँत की स्वस्थ कोशिकाओं का निर्माण ज्यादा होता है। माहवारी के दौरान या माहवारी के तुरन्त बाद कैंसर सर्जरी कराने से सफलता की दर बढ़ जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इन दिनों डिम्बीकरण की प्रक्रिया धीमी होती है। कैंसर के पनपने का खतरा भी कम हो जाता है। माहवारी खत्म होने के 13 से 21 दिन पूर्व कैन्सर सर्जरी का खतरा बढ़ जाता है। कैंसर के उपचार के दौरान जैविक घड़ी का ध्यान रखने से उपचार से होने वाले दुष्प्रभाव जैसे चक्कर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उल्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाल झड़ना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्यादा रक्तस्त्राव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यकृत व गुर्दे का क्षतिग्रस्त होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्थिमज्जा का सिकुड़ जाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिल की बीमारी तथा बार-बार ज्वर आना आदि लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/223.jpg" alt="22" width="900" height="305"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">जैविक घड़ी भी होती है प्रभावित :</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य की जैविक क्रियाओं तथा जैविक घड़ी की मुख्य चाभी नेत्र के मध्य भू्रमध्य स्थित पीनियल ग्रंथि है। बायोलॉजिकल क्लॉक दिमाग के एक खास क्षेत्र सप्रशिएसमेटिक न्यूक्लिअस द्वारा संचालित होती है। इसे योग विज्ञान में आज्ञा चक्र कहा गया है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्योदय के साथ तापमान बढ़ना प्रारम्भ होता है। साथ ही जैविक घड़ी नियंत्रक पीनियल ग्रंथि की सक्रियता से सेरोटोनिन का स्त्राव भी बढ जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिणामत: तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि में सजगता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सक्रियता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौजन्यता एवं संतुलन पैदा होता है। सूर्यास्त के साथ तापमान भी कम होने लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अँधेरा जितना गहन होता है। उतना ही पीनियल ग्रंथि मेलाटोनिन का स्त्राव बढ़ा देती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे शरीर का तापमान कम होने लगता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तापमान के परिवर्तन से खून के रसायनों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हार्मोन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यूरोट्रांसमीटर्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शारीरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक तथा दिमागी सक्रियता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सजगता से जैविक घड़ी में परिवर्तन आता है। सूक्ष्म-से-सूक्ष्म जो घटनाएँ ब्रहााण्ड में घटित होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसका प्रभाव भी जैविक घड़ी पर होता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनियमित एवं अनियंत्रित जीवनशैली जैसे काफी देर तक जागना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रात-रात भर जाग कर टी.वी या सिनेमा देखना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रात्रि में काम करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोने के समय जागना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जगने के समय सोना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जगने पर भी प्रमादवश बिस्तर पर पडे रहना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूख लगने पर भोजन नहीं करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर काम में जल्दबाजी करने तथा चिन्तातुर होने से जैविक घड़ी की चाभी अस्त-व्यस्त हो जाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जरूरत है अपनी प्रत्येक क्षण की मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिमागी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शारीरिक एवं भावानात्मक सक्रियता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सजगता एवं संवेदनाओं का सूक्ष्म निरीक्षण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परीक्षण तथा अवलोकन करते हुए चार्ट बनायें। तत्पश्चात अपने क्रियाकलाप नियंत्रित करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग-प्राणायाम अपनायें और जीवन को नियंत्रित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नियमित एवं नियोजित कर संतुलित विकास का मार्ग प्रशस्त करें। </span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>स्वास्थ्य समाचार</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अगस्त</category>
                                    

                <link>https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3110/balance-your-biological-clock--so-that-you-can-become-natural-and-stay-healthy</link>
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                <pubDate>Sat, 01 Aug 2015 21:41:44 +0530</pubDate>
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