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                <title>व्यवहार व आचरण में परिवर्तन से बनेगा सही इंसान - योग संदेश</title>
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                <title>स्वभाव, व्यवहार व आचरण में परिवर्तन से बनेगा सही इंसान</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">स्वामी रामदेव</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3155/change-in-nature--behavior-and-conduct-will-make-you-a-right-person"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/782.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   समाज </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व निर्माण की दिशा में गतिशील हर तंत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती है सही व नेक इंसान का होना। सही व नेक इंसान ही संसाधन व तंत्र का सही हित में संधान कर सकता है। पतंजलि योगपीठ के विश्व निर्माण का केन्द्रक है व्यक्ति। व्यक्ति निर्माण के मार्ग से ही ऋषियों का यह देश भारत पुन: जगतगुरू के पद पर प्रतिष्ठित होने में सक्षम बनेगा। इसी संकल्पना से मनुष्य के व्यवहार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वभाव व आचरण के परिष्करण के लिए इस लेख में ऋषियों द्वारा अपनाये गये सूत्रों को प्रस्तुत किया जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे हर मनुष्य अपने जीवन की सबसे बड़ी चुनौती या समस्या जटिल स्वभाव में परिवर्तन</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कर सके और जीवन की सबसे बड़ी सफलता या उपलब्धि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा स्वभाव</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा व्यक्तित्व</span><span lang="hi" xml:lang="hi">’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राप्त कर सके।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वात्सल्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निराभिमानिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुरुषार्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सात्विकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मचर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चोरी न करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतोष रखना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुस्सा न करना इत्यादि हमारे मूल स्वभाव के लक्षण हैं। एक वाक्य में कहें तो जिस स्थिति में हम चौबीस घण्टे सहज भाव से रह सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही हमारा स्वभाव है और जिससे कुछ ही समय के बाद हम विचलित होकर उससे निकलना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छूटना चाहते हैं- वह स्वभाव आरोपित किया स्वभाव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा मूल स्वभाव नहीं है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">घर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगठन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र और पूरे विश्व में जो भी दु:ख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्लेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टकराव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनमुटाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झगड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परेशानी व पीड़ायें हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन सबका एक ही कारण है बुरा स्वभाव। अक्सर हम लोगों को यह कहते हुए सुनते हैं कि यह तो स्वभाव से ही लाचार है अथवा मैं अपना स्वभाव नहीं बदल सकता। मैं तो ऐसा ही हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या करूं इत्यादि।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं व्यक्ति माता-पिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घर-परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐश्वर्य सबकुछ छोड़ सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु बुरे स्वभाव को छोड़ना महाकठिन है। देश के प्रधानमंत्री</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रपति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योगपति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धनवान या विद्वान् बन जाना हमारे लिए जरूर कठिन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर स्वभाव को बदलना संसार में सबसे कठिन है। खास बात यह कि-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृतिरेषा भूतानां</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निवृत्तिस्तु महाफला।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रह किं करिष्यति।।</strong></span> (गीता.)</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् व्यक्ति जीवन भर शास्त्रों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुजनों से अच्छी-अच्छी बातें जानता व सुनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन बावजूद अपना स्वभाव उसे वहीं लाकर खड़ा कर देता है। सुनना और जानना निरर्थक हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बुरी आदतें मुख्य रूप से दो स्तर पर होती हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>वैयक्तिक दोष-</strong> जो हमें ज्यादा दु:ख देते हैं तथा दूसरों को थोड़ा कम दु:ख देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे देर से उठना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आहार की अनियमितता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असंतोष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशुचिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नास्तिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकर्मणयता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यायाम आदि न करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरों से सेवा लेना इत्यादि व्यक्तिगत दोष हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>सामाजिक दोष-</strong> वाणी और व्यवहार से हिंसा करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चोरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झूठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब्रह्मचर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कदाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुराचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कठोर बोलना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चुगली करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तोड़फोड़ करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुटबाजी करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरों की खिल्ली उड़ाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झगड़े करना या करवाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरों पर शक करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईर्ष्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घृणा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नफरत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज या संगठन में फूट डालना आदि ये ऐसे दोष हैं जिनका हमें ज्ञान नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर ये अपने साथ-साथ परिवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्र और विश्व को भी कष्ट देने वाले होते हैं। इस प्रकार ये सामाजिक दोष हुए जिनसे मुक्त होना जरूरी है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक प्रश्न और है कि हमारी मूल प्रकृति के शुद्ध होते हुए भी हमारे स्वभाव में दोष क्यों आ जाता है</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका सीधा सा कारण है हमारे अंदर इन्द्रिय दोष या संस्कार दोष का होना। स्वभाव तो एक परिणाम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक कार्य है। इसके कारण दो प्रकार के हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञात  अथवा  दृश्य कारण- ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्ठा और कर्म का परिणाम </span><span lang="hi" xml:lang="hi">होता है स्वभाव अर्थात् जैसा ज्ञान-वैसी निष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी निष्ठा-वैसी प्रवृत्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी प्रवृत्ति-वैसा संस्कार और जैसे संस्कार-वैसा स्वभाव। ज्ञान जितना परिष्कृत होगा उतना ही स्वभाव बदलता जायेगा। अल्पज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिथ्याज्ञान के कारण ही हमारी निष्ठायें डगमगाती हैं और बार-बार भूल करने से हमारे वैसे ही संस्कार और स्वभाव बन जाते हैं। इसलिए ज्ञान का अतिरेक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्ठा की पराकाष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्म अर्थात अत्यन्त पुरुषार्थ हमें बुरे स्वभाव से बचा सकते हैं। जैसे किसी शुभ कर्म में हम इतने तल्लीन हो जायें कि गलत सोचनेे के लिए समय ही न मिले। इसी प्रकार हमारा स्वभाव हमारे संकल्पों का ही परिणाम है। दृढ़ संकल्प से हम बुरे से बुरे स्वभाव को भी बदल सकते हैं। पर जब तक हम कारण को नहीं समझेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक निवारण नहीं होगा। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>दूसरा अज्ञात अथवा अदृश्य कारण </strong>अनादिकाल से चले आ रहे जीवन प्रवाह की अनेक योनियों में से होकर हम मनुष्य योनि में आये हैं। उन सब योनियों के संस्कार भी सूक्ष्म रूप से हमारे चित्त में समाहित रहते हैं। बुरे स्वभाव को बदलने से पहले प्रश्न यह उठता है कि मैं अपने स्वभाव को क्यों बदलना चाहता हूँ। इसके अनेक उत्तर हो सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे गुरु ने कहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शास्त्रों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> में लिखा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरे लोग कहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाज ऐसा मानता है इसलिए अथवा मैं खुद ही अपने बुरे स्वभाव से परेशान हूँ या हानि देख रहा हूँ इसलिए। इनमें से दूसरा कारण स्वभाव परिवर्तन के लिए अधिक कारगर है। यह अवस्था आते ही स्वभाव में बदलाव सुनिश्चित हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वभाव व संस्कारों को ऐसे बदलें:</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मन:स्थिति तथा परिस्थिति के अनुसार स्वभाव परिवर्तन के कुछ तात्कालिक प्रचलित उपाय हैं और कुछ अंतिम या दीर्घकालिक उपाय हैं। तात्कालिक में जैसे गुस्सा आ रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो ठण्डा पानी पी लें। किसी को देखकर ईर्ष्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">द्वेष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घृणा उत्पन्न होती है तो ईश्वर का स्मरण कर लें इत्यादि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सदा-सदा के लिए स्वभाव परिवर्तित करने हेतु कुछ उपाय इस प्रकार हैं-</span></h5>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने अनुभव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति व अन्त:करण की प्रेरणा से प्राप्त ज्ञान का आदर करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात् इन सभी स्रोतों से प्राप्त ज्ञान के अनुसार ही जब हम जीवन जीयेंगे तो हमारे स्वभाव में दोष पैदा ही नहीं होगें। हम अपनी मूल प्रकृति से जुड़े रहेंगे। हम खुद भी शान्त रहेंगे और दूसरों को भी अशान्त नहीं करेंगे। गुरु के प्रति अखण्ड निष्ठा होने पर उनके द्वारा प्रदत्त मार्गदर्शन से अत्यंत दोषपूर्ण स्वभाव भी बदल जाता है।</span></h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5><span lang="hi" xml:lang="hi">यह तथ्यपूर्ण है कि जब हम अपने दोष को हृदय से स्वीकार कर लेते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसका निवारण भी कर लेते हैं। महापुरुष एक बार दु:ख का दर्शन करके सदा-सदा के लिए उससे मुक्त हो जाते हैं जैसे महर्षि दयानन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि रमण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महात्मा बुद्ध इत्यादि। अपने दोषों की स्वीकारोक्ति के साथ कुछ क्रियायें भी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे-</span></h5>
</li>
</ul>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ध्यान व प्रार्थना करें-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong> </strong>नियमित ध्यानयोग व प्रभात संकल्प का अभ्यास करें। ध्यान व प्रार्थना यदि प्रामाणिकता के साथ सच्चे हृदय से निकलती हैं तो उसका उत्तर हमें अवश्य मिलेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सत्संग के द्वारा-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> ऐसे तेजस्वी महापुरुष जिनका प्रभाव हमारे हृदय पर पड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके संग से भी स्वभाव परिवर्तित हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण पुरुषार्थ-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong> </strong>कर्माशय सूक्ष्म होने से कर्माशय को तो हम नहीं बदल सकते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु पूर्ण पुरुषार्थ से अपने प्रारब्ध को बदल सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे समझें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वाध्याय-</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong> </strong>जो आप्तपुरुष आज हमारे बीच में सशरीर नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके वचनों को बार-बार पढ़कर वैसा ही आचरण करने से भी स्वभाव परिवर्तित हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रायश्चित द्वारा:</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> प्राय: निश्चय से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चित्त-तप करना अर्थात् निश्चय के साथ जो तप किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह प्रायश्चित है अर्थात् बिना किसी और को बताये उपवास आदि के द्वारा अपने आपको स्वयं दण्डित करने से भी मनुष्य भविष्य में वैसी भूल करने से बच जाते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि सामान्य भाषा में हम कहें तो व्यक्ति का स्वभाव ही है कि जिसमें वह सुख देखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस कार्य में प्रवृत्त होता है और जहाँ हानि देखता है उससे बचना चाहता है। पर हो सकता है जिसमें वह सुख देख रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें सुख न हो जैसे- बीड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिगरेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शराब आदि पीने वाला उसमें सुख देखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसीलिए उसमें प्रवृत्त होता है लेकिन वास्तव में उसमें सुख नहीं है किन्तु जैसा भी अल्प ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिथ्या ज्ञान उसके पास है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके अनुसार वह अपने लाभ वाला कार्य मानकर ही करता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">हम सचमुच अपने बुरे स्वभाव को बदल सकते हैं:</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अपने स्वभाव में आज तक कुछ न कुछ परिवर्तन न किया हो संसार में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है। जब हम एक दोष को छोड़ सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरे दोषों को भी छोड़ सकते हैं। शान्तचित्त होकर ध्यानावस्था में अच्छे संस्कारों को उभारकर बुरे संस्कारों को क्षीण करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही स्वभाव परिवर्तन का अंतिम व सशक्त उपाय है। तो इसके लिए हम क्यों न अभी से तत्पर हो लें।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Oct 2015 21:53:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[योग संदेश विभाग]]></dc:creator>
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