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                <title>धीर की वाणी - योग संदेश</title>
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                <description>धीर की वाणी RSS Feed</description>
                
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                <title>धीर की वाणी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3162/voice-of-patience"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/1511.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  प्र</span><span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्ध गायत्री मन्त्र जिसे गुरु मन्त्र होने का गौरव प्राप्त है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें प्रार्थना की गई है कि मेरी वाणी शुभ से युक्त रहे। महाराज इस विषय को एक अन्य रूपक के द्वारा भी समझाते हैं। वे कहते हैं- यह वाणी देवलोक की कन्या है। इसे नग्न मत करो। वाणी रूपी कन्या के साथ की गई खिलवाड़ तुम्हें समूल नष्ट कर देगी। कन्याएँ अनग्ना ही सुशोभित होती हैं। नग्नता ही तो अश्लीलता (अश्रीलता=शोभा रहितता) है। कन्याओं को सभी के द्वारा रक्षणीया व परम पवित्र रखने का पूर्ण प्रयास किया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार इस वाणी के साथ व्यवहार करो! रक्षित व पवित्रता का मूर्त्त रूप ये कन्याएँ जैसे सबकी रक्षा करती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही रक्षित वाणी के द्वारा तुम्हारी रक्षा होगी। लोक में भी कहावत है- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर से नंगा सन्त</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वाणी का नंगा बदमाश।’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस विषय में एक है कि रक्षित वाणी कैसे रक्षा करती है। दृष्टान्त का भाव इस प्रकार है- एक युवती का विवाह हुआ। सास बड़ी क्रोधी थी और मुख की भी बड़ी कड़वी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु पुत्रवधू बड़ी समझदार और शान्त स्वभाव की थी। सास प्रात: से सायं काल तक खूब ताने देती थी। एक दिन सास ने बहू से कहा- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">न जाने तू किस मिट्टी की बनी हुई जड़ मूर्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो तुझ पर तनिक भी प्रभाव नहीं होता। मैं इतनी देर से चिल्ला रही हूँ और तू सुनकर भी चुप है।’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु बहू फिर भी शान्त रही। प्रतिदिन ऐसा होता और अड़ोस-पड़ोस के लोगों को भी तमाशा देखने को मिलता। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सास एक दिन फिर ऐसे ही बरस पड़ी। धरती पर लात मार कर बोली</span>, ''<span lang="hi" xml:lang="hi">इतना चिल्ला रही हूँ। तू मिट्टी से भी गई गुजरी है।’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">एक पड़ोसन से रहा न गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बोली- बुढ़िया ! गाय के पीछे क्यों पड़ी हुई है! तुझे अपनी जिह्वा का चसका लेना है तो फिर थोड़ा गली से बाहर आ जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेरे अरमान पूरे कर देते हैं। उस देवी रूप बहू ने यह बात सुनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुरन्त शान्त और मधुर वाणी से कहने लगी- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हें कुछ मत कहिए। ये मेरी माँ हैं। माँ ही अपनी बेटी को नहीं समझाएगी तो फिर कौन समझाएगा </span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">बहू की मधुर वाणी ने सास के सारे क्रोध पर पानी डाल दिया। सास को फिर कभी अपनी देवी को कुछ भी सुनाते नहीं देखा गया। यह है रक्षित वाणी की शक्ति।’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कल्पना की जा सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहू के विरोध में खड़े होकर सास जिस प्रकार वाणी की नग्नता पर उतर रही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार वह देवी भी उसी के स्वर में अपना स्वर मिलाने लगती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या कभी उन दोनों के क्रोध का अन्त होता</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रोध सबसे पहले मन में पैदा होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर मुख से गुजरता हुआ वाणी में आ जाता है और वहाँ से भी सरक कर हाथों या पैरों में आ पहुँचता है। मनुष्य प्राय: क्रोधाभिभूत होकर वाणी को नग्न कर देता है और उसके महादु:ख रूप परिणाम को भोगता रहता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महाराज से जब पूछा जाता है कि ऐसे प्रसङ्गों में क्या करें</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वे एक ही बात कहते हैं- तितिक्षा=सहिष्णुता रूपी दृढ़ कवच को धारण करो। ऐसे मौकों के लिए ही तो यह कवच बना है। सब कुछ हमारी इच्छा के अनुसार ही ठीक-ठीक होता चला जाए तो फिर सहिष्णुता की क्या आवश्यकता ! इस बात पर जिज्ञासुओं के द्वारा एक प्रश्न और उठाया जाता है कि जी! कितना सहन करें। कोई सीमा भी है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">महाराज इस प्रश्न का बहुत ही अद्भुत उत्तर देते हैं कि भाई! सहन करो। सहन करने में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कितना’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं होता। सहन के साथ </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कितना</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द जोड़ दिया जाए तो सहन करने का कुछ अर्थ ही नहीं रह जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस विषय में महाभारत (आदि पर्व) के ययाति उपाख्यान के उत्तर भाग में ययाति और इन्द्र का संवाद मिलता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अतीव महत्वपूर्ण है। उस प्रसङ्ग को यहाँ उद्धृत किया जा रहा है जिसे महाराज सुनाया करते हैं-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्राह्मणों के साथ वन में निवास करते हुए अनेक प्रकार का तप करके ययाति स्वर्ग में गये। वहाँ देवताओं ने उनका स्वागत-पूजन किया। एक बार इन्द्र ने ययाति से पूछा</span>, ''<span lang="hi" xml:lang="hi">हे राजन्! जब पुरु ने अपना रूप देकर आपसे जरा प्राप्ति की और आपने कालान्तर में उसे राज्य सौंपा तब सत्य कहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आपने उसे क्या कहा</span>?<span lang="hi" xml:lang="hi">’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ययाति ने उत्तर दिया</span>, ''<span lang="hi" xml:lang="hi">मैंने अपने प्रिय पुत्र पुरु से कहा</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">जो क्रोध नहीं करता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह क्रोध करने वाले से श्रेष्ठ है। जो सहनशील है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह उससे बढ़कर है जो सहन नहीं कर सकता। जो मानवेतर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन सबकी तुलना में मनुष्य प्रधान है। जो विद्वान् है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह न जानने वालों में प्रधान होता है। यदि कोई अपने से जली-कटी बातें कहे तो स्वयं वैसा नहीं करना चाहिए। जो उन बातों को सहन कर लेता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह उसके सब पुण्यों को हर लेता है। मनुष्य को चाहिए किसी का मर्म न दु:खाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी से कठोर बात न कहे। जो क्षुद्र है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे किसी वस्तु को ग्रहण न करे। जो वचन दूसरे को उद्वेग पहुँचाने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हृदय छीलने वाला है और नारकी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे कभी न कहे। जिसकी वाणी रूखी और मर्मान्तक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके शब्द शूल की तरह दूसरों को चुभते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे मनुष्य के मुख में साक्षात् नाश की देवी निऋर्ति रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे पुरुष को नितान्त श्रीविहीन समझना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य को चाहिए कि सदा अपना आचार आर्यों के जैसा रखे और सज्जनों का आचार ग्रहण करे। उसके सम्मुख सज्जन ही पूजा के लिए हों और पृष्ठ (पीठ) पर भी सज्जन ही रक्षा करने वाले हों। इस प्रकार सज्जनों से नाता जोड़ने वाला वह असज्जनों के तीखे वचनों को भी सहन करे। वचन रूपी बाण असज्जन के मुख से छूटते रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनसे मारा हुआ दूसरा व्यक्ति रात-दिन छटपटाता है। जो बाण दूसरे के मर्म को छेद देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन वचन रूपी बाणों को बुद्धिमान् व्यक्ति दूसरों पर कभी न चलावे। तीनों लोकों में इस प्रकार का कोई वशीकरण मन्त्र नहीं है जिस प्रकार मीठी बोली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दान और प्राणियों के साथ मैत्रीभाव है। इसलिए सदा तुम दूसरों को मीठी बात कहो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कभी कड़वी नहीं। जो पूजा के योग्य हैं उन्हें सम्मान दो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदा दूसरों को दान दो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं कभी याचक न बनो। यही वह आर्यवृत्त है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका मैंने राज्य देते समय पुरु को उपदेश दिया।’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्य मानवेतर प्राणियों से श्रेष्ठ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गन्धर्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्नर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिद्ध आदि सब मानव से घटकर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि मनुष्य के पास कर्म-शक्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके पास दैव के दिये हुए दस अंगुलियों वाले दो हाथ हैं।‘</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इतना सुनकर इन्द्र ने ययाति को छेड़ते हुए पुन: प्रश्न किया</span>, ''<span lang="hi" xml:lang="hi">हे राजन्! सब कर्मों से छुट्टी पाकर और घर त्याग कर जब तुम वन में गये तब की बात तुमसे पूछता हँू। तुम्हारा तप किसके बराबर था</span>?<span lang="hi" xml:lang="hi">’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">यह प्रश्न सुनकर ययाति के मन में अहङ्कार की एक रेखा दौड़ गई। उसने कहा</span>,''<span lang="hi" xml:lang="hi">देवताओं में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गन्धर्वों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनुष्यों में और महर्षियों में मैं किसी को ऐसा नहीं देखता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका तप मेरे जैसा हो।’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्र ने चट उनकी बात पकड़ ली और कहा- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">तुमने जो अपने सदृश हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अपने से श्रेष्ठ हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जो अपने से घटकर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन सबके प्रभाव को जाने बिना कैसे सबका तिरस्कार कर डाला </span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए तुम्हारा पुण्य सीमित हो गया। औरों को सीमित समझने से तुम भी सीमित हो गए। तुम्हारा पुण्योपार्जित लोक भी अन्त वाला हो गया। अब तुम क्षीण होकर नीचे गिरोगे।’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस पर ययाति ने इन्द्र के समक्ष एक बहुत ही सुन्दर माँग रखी- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">हे इन्द्र! यदि देवर्षियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गन्धर्वों और मनुष्यों का अपमान करने से मैंने अपना पुण्यलोक खो दिया है और मुझे सुरलोक से विहीन होना ही है तो हे देवराज! मैं चाहता हूँ कि मैं सज्जनों के बीच जाकर गिरूँ।’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्र ने उनकी यह बात स्वीकार की और ययाति स्वर्ग से गिरकर सद्धर्म का जो विधान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी रक्षा करने वाले अष्टक राजर्षि के पास उपस्थित हुए। अष्टक ने उनसे पूछा- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">इन्द्र के समान रूपवान् हे युवक! तुम कौन हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अग्नि की तरह स्वतेज से दीप्त हो</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">तुम्हें सूर्यपथ से नीचे आते हुए देखकर हम सब भ्रम में पड़ गए हैं कि अग्नि और सूर्य जैसे अमित प्रकाश वाला यह कौन आ रहा है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हम सब तुम्हारे पतन का कारण जानने के इच्छुक हैं। तुम कौन हो और क्यों आये हो </span>?<span lang="hi" xml:lang="hi">’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ययाति ने उत्तर दिया- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं नहुष का पुत्र और पुरु का पिता ययाति हूँ। सब भूतों का अपमान करने के कारण अल्प-पुण्य बनकर देवताओं और सिद्धर्षियों के लोक से च्युत हो गया हूँ। मैं आयु में तुम सबसे बड़ा हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए मैंने तुम्हें अभिवादन नहीं किया। जो विद्या में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तप में और आयु में वृद्ध होता है वही द्विजों में पूज्य समझा जाता है।’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अष्टक ने कहा- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">क्या तुम यह कहते हो कि जो आयु में बड़ा है वह वृद्ध है </span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं इसे नहीं मानता। मेरी दृष्टि में जो आयु में वृद्ध होते हुए विद्वान् भी हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही पूज्य है।’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रसङ्ग में ययाति और अष्टक की प्रश्नोत्तरी के रूप में महाभारतकार ने नीति-प्रधान जीवन और प्रज्ञावान् पुरुष के आचार की सुन्दर व्याख्या दी है। ययाति ने अपने जीवन में अनेक प्रकार के अनुभव किये थे। उनका कुछ निचोड़ इस वार्त्तालाप में पाया जाता है। ययाति ने अपने दृष्टिकोण की व्याख्या करते हुए कहा- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मों का प्रतिकूल आचरण ही पाप कहा गया है। जो कर्म जिस प्रकार से करना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे उसके उचित ढंग से न करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही बुराई का कारण है। जो व्यक्ति कर्म में श्रद्धा नहीं रखता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका वह कर्म भी पाप-युक्त हो जाता है। जो सज्जन हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे कभी असज्जनों का अनुसरण नहीं करते। उनकी आत्मा उन्हें अनुकूल मार्ग पर ले चलती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन में अनेक प्रकार के भाव आते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे दैव के अधीन हैं। ऊँच-नीच-सुख-दु:ख इत्यादि सम-विषम परिस्थितियों में मनुष्य की निजी चेष्टा कुछ काम नहीं देती। मन में समझ लेना चाहिए कि विधाता वाम (विपरीत) है। ऐसा सोचकर धीर व्यक्ति अपने आपको खिन्न नहीं होने देता। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राणी दैवाधीन होकर सुख या दु:ख पाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने मन से नहीं। अतएव नियति को बलवान् समझकर न दु:ख से सन्तप्त हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न सुख से हर्षित हो। धीर पुरुष सदा अपने आपको सम अवस्था में रखे। हे अष्टक! भय से कभी मुझे मोह नहीं होता। मेरे मन में किसी प्रकार का सन्ताप नहीं होता। विधाता लोक में मुझे जिस तरह चलाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे ही मैं ध्रुव भवितव्यता मानता हूँ। सुख और दु:ख दोनों अनिवार्य हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर मुझे किस बात का सन्ताप हो</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं जानता हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए और किस प्रकार के कर्म करने से मेरे मन को पछतावा न होगा। मैं इस बात से अपने आपको सावधान रखता हूँ कि </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परिणाम में सन्ताप देने वाले काम से बचूँ। चाहे वह काम वाणी का है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर का या मन का। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अष्टक ने प्रश्नों का क्रम जारी रखते हुए कहा- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">हे ययाति! तुम्हारे कहने का ढंग ऐसा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे कोई क्षेत्रज्ञ धर्म की व्याख्या कर रहा हो। बताओ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुमने किन-किन लोकों का कैसे-कैसे उपयोग किया</span>?<span lang="hi" xml:lang="hi">’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ययाति ने उत्तर दिया- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">मैं इस पृथिवी पर सार्वभौम राजा था। मैंने अनेक लोकों को जीता और दीर्घ काल तक यहाँ निवास करके फिर मैं परलोक पहुँचा। वहाँ मैं इन्द्र की सहस्र द्वारों वाली और शत योजन लम्बी-चौड़ी अमरावती में दीर्घकाल तक रहा। उसके बाद प्रजापति के दिव्य अमरलोक में मैंने निवास किया। तब देवों का एक विकराल दूत मेरे पास आया और डपट कर बोला-</span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">हट! हट! हट!’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके ऐसा कहते ही मैं क्षीण पुण्य होकर नन्दन वन से नीचे लुढ़क गया और मैंने अन्तरिक्ष से गिरते हुए अपने पीछे देवताओं की यह वाणी सुनी- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">अहो! कैसे कष्ट की बात है कि पुण्यकर्मा ययाति भी पुण्य के चूक जाने से गिर रहा है।’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मैंने उनसे कहा- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे साथ इतनी ही भलाई करो कि मैं गिर कर भी सज्जनों के बीच में पहुँच जाऊँ’’। हे अष्टक! इस पर उन्होंने आपकी यज्ञ-भूमि की ओर संकेत किया और मैं इस हविर्गन्ध देश में आ गया ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अष्टक ने पूछा- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">नन्दनवन में इच्छानुसार सैकड़ों-हजारों संवत्सर निवास करके तुम्हें पृथिवी की ओर फिर क्यों आना पड़ा</span>?<span lang="hi" xml:lang="hi">’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ययाति ने उत्तर दिया- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">यह तो सीधा नियम है। जिस प्रकार मनुष्य का धन क्षीण हो जाने पर उसके सम्बन्धी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मित्र और स्वजन उसे छोड़ देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैसे ही मनुष्य का पुण्य समाप्त हो जाने पर सब देव-संघ और उनके अधिपति झट उसे छोड़ देते हैं। ये सब लोक अन्तवान् हैं और मनुष्य के पुण्य भी समाप्त होने वाले हैं। जब पुण्य चुक जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लपलपाती हुई लालसा लिये हुए मनुष्य को पुन: इसी भूमि पर आना पड़ता है। यद्यपि वह अन्य प्रकार से क्षीण होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तथापि भोगों के प्रति उसकी तृष्णा बढ़ जाती है। अतएव बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिए कि इस लोक में दुष्ट और निन्दित कर्म का परित्याग कर दे।’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चार कर्म यदि ठीक प्रकार से किये जाएँ तो उनसे मनुष्य को अभय की प्राप्ति होती हैं। वे कर्म ये हैं- अग्निहोत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मौनभाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्ययन और सेवा। किन्तु इनको भी यदि ऐंठ से भरकर बेढंगेपन से किया जाए तो ये ही मनुष्य के लिए भयंकर हो जाते हैं। सम्मान से प्रसन्न न होना चाहिए। इस संसार में भले आदमी भलों का सम्मान करते हैं। दुष्टों में साधु बुद्धि होती ही नहीं। दान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यज्ञ और अध्ययन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये मेरे व्रत के अन्तर्गत हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इन्हें मैं अभय का मार्ग समझता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु यदि वे ही मान की इच्छा से किये जाएँ तो त्याज्य हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अष्टक के इस प्रश्न के उत्तर में कि आचार्य की शुश्रुषा करने वाला ब्रह्मचारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गृहस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वानप्रस्थ और भिक्षु ये सत्पथ पर चलकर किस प्रकार देव-तुल्य बन जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ययाति ने संक्षेप में उत्तर दिया-</span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु का कर्म करने के लिए जिसे प्रेरणा की आवश्यकता न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु से पहले उठने वाला और बाद में सोने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब वह कहे तभी अध्ययन करने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मृदु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दान्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिर चित्त वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अप्रमादी और स्वाध्यायशील ब्रह्मचारी सिद्धि का अधिकारी है।’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गृहस्थों की पुरातनी उपनिषद् विद्या यह है कि धर्मानुसार प्राप्त धन से यज्ञ करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदा दान दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतिथियों को भोजन कराएँ और दूसरों के द्वारा अदत्त धन का ही ग्रहण करें।अपने परिश्रम से जीविका करने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाप से निवृत्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आहार और कर्म में संयमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरे को दान देने वाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी को न सताने वाला मुनि अरण्य में रहता हुआ सिद्धि प्राप्त करता है।जो किसी शिल्प के सहारे जीविका नहीं चलाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो घर नहीं बनाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जितेन्द्रिय है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो गृहस्थी नहीं बटोरता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो थोड़ा-थोड़ा विचरते हुए देशाटन करता है और अकेला रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही सच्चा भिक्षु है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वानप्रस्थ मुनियों और उनके मौन धर्म की व्याख्या करते हुए उसने कहा- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">जंगल में रहते हुए जो गाँव को पीछे छोड़ देता है अथवा गाँव में रहते हुए जो जंगल को पीछे छोड़ देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही मुनि है।’’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार की स्थिति कैसे सम्भव है </span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके उत्तर में ययाति ने कहा</span>, ''<span lang="hi" xml:lang="hi">जो जंगल में रहने वाला मुनि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह किसी भी ग्राम्य आचार में नहीं पड़ता । यों वह जंगल में बसकर गाँव को पीछे छोड़ देता है। और यदि वह गाँव में बसते हुए केवल उतना ही भोजन करे जिससे प्राण यात्रा हो और केवल उतना ही चीवर ग्रहण करे जितना शरीर ढकने के लिए आवश्यक हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जाति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अग्निहोत्र और गृहवास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इनका मोह न करे तो गाँव में बसते हुए भी वह जंगल को पीछे छोड़ देता है।’’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके बाद स्वर्ग से भ्रष्ट हुए ययाति को अष्टक एवम् अन्य लोग अपने-अपने पुण्यों से उपार्जित लोक अर्पित करते हैं किन्तु ययाति ने यह कहकर सबको अस्वीकार कर दिया कि जिसके लिए मैंने स्वयं पहले कर्म नहीं किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं उससे चिपटने की कभी इच्छा नहीं करता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>अक्टूबर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Oct 2015 21:40:50 +0530</pubDate>
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