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                <title>स्वर्णिम भविष्य की ओर भारत - योग संदेश</title>
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                <description>स्वर्णिम भविष्य की ओर भारत RSS Feed</description>
                
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                <title>स्वर्णिम भविष्य की ओर भारत</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य बालकृष्ण</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3182/towards-golden-future-india"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/205.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   पतंजलि विश्वविद्यालय के दीक्षारम्भ समारोह में उत्तराखण्ड के महामहिम माननीय राज्यपाल</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री कृष्णकान्त पॉल का भव्य आगमन हुआ। मुझे विश्वास है कि इस प्रकार के उच्च पदों पर आसीन उच्च पदाधिकारी वैदिक संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वदेशी एवं राष्ट्र के स्वाभिमान से अनुप्राणित होंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो निश्चित रूप से भारत अतीत के गौरव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान की सामर्थ्य व पुरुषार्थ के साथ स्वर्णिम भविष्य की ओर अग्रसारित होगा। आज महामहिम माननीय राज्यपाल महोदय ने जो सारगर्भित उद्बोधन पतंजलि विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं को दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं समझता हूँ राष्ट्र के प्रत्येक युवा के लिए व प्रत्येक नागरिक के लिए श्रवण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मनन व चिन्तन करने योग्य है। इसी अभिलाषा से उनके उद्बोधन को अक्षरश: यहाँ उल्लेखित किया जा रहा है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प</span><span lang="hi" xml:lang="hi">तंजलि विश्वविद्यालय के वर्तमान सत्र के दीक्षारम्भ संस्कार कार्यक्रम (</span>Deeksha Aarambh<span lang="hi" xml:lang="hi">) में आज शामिल होकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। वर्तमान में पतंजलि विश्वविद्यालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग एवं आयुर्वेद के क्षेत्र में सबसे बड़ा नाम है। स्वामी रामदेव जी और आचार्य बालकृष्ण जी ने जिस प्रकार योग एवं आयुर्वेद के माध्यम से देश-विदेश में भारतीय संस्कृति को एक नई पहचान दी है उसके लिए वे बधाई के पात्र हैं। कहते हैं सच्चा ज्ञान एक स्थिर तालाब की भांति नहीं होता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ समस्त ज्ञान भण्डार एक ही जगह रुक जाए संचित (</span>store<span lang="hi" xml:lang="hi">) कर लिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वरन सच्चा ज्ञान एक निर्मल बहती नदी की भांति होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका जल सभी के लिए होता है। स्वामी रामदेव जी पतंजलि योगपीठ और पतंजलि विश्वविद्यालय की स्थापना करके इसी महान उद्देश्य की पूर्ति कर रहे हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दीक्षारम्भ समारोह किसी भी विद्यार्थी के जीवन के सबसे महत्वपूर्ण अवसरों/मौकों में से एक होता है। इसका अर्थ बहुत सीधा सा है परन्तु इसका उद्देश्य अत्यंत गंभीर और उतना ही बड़ा है। दीक्षारम्भ का अर्थ है विद्या की साधना के प्रारम्भ में संकल्प लेना कि आप अपने गुरूजनों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिजनों एवं समाज की अपेक्षाओं के अनुरूप काम करते हुए समाज के हित में विद्या प्राप्त करेंगे। महर्षि दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कार विधि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में 16 संस्कारों का वर्णन किया है। संस्कार विधि में इन संस्कारों के किये जाने का समय तथा इनके महत्व का भी वर्णन है। दीक्षारम्भ संस्कार भी उन 16 संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राचीन भारत में विद्यार्थियों का उपनयन संस्कार तथा उसके बाद दीक्षारम्भ संस्कार किया जाता था। जिनमें विद्यार्थी कुछ प्रण लेते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे-मैं गुरू की आज्ञा का पालन करूंगा। मैं अपनी शिक्षा पर पूर्ण ध्यान केन्द्रित करूंगा। मैं गुरूकुल के नियमों को पालन करूंगा। मैं धरती पर शयन करूंगा आदि। यह सभी प्रतिज्ञायें विद्यार्थियों के दिल में अपने गुरू और गुरूकुल के लिए एक उच्च स्थान देकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मान सम्मान और आदर भाव पैदा करती हैं। गुरू और बड़ों का आदर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संयम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धैर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक सम्बंध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सब धर्मों के लोगों का इकट्ठे त्यौहार मनाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय सभ्यता के अभिन्न अंग हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत वर्ष दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है। समय के साथ सभी सभ्यताएं लुप्त होती चली गईं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन भारतीय सभ्यता-संस्कृति पिछले पाँच हजार सालों से अपनी पहचान बनाये हुए है।</span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong>'<span lang="hi" xml:lang="hi">यूनान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिश्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोमा सब मिट गये जहाँ से</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अब तक मगर है बाकि नामों निशां हमारा</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी</span>,</strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:center;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">                                                                       -इकबाल</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा संभव इसलिए हो पाया है क्योंकि हमारे जीवन मूल्य (</span>Values<span lang="hi" xml:lang="hi">) और संस्कृति और </span>Culture <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुत मजबूत थे। </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">वसुधैव कुटुम्बकम</span>’ (Vasudhaiv Kutumbkum<span lang="hi" xml:lang="hi">) और </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वे भवन्तु सुखिन:</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">की विचार धारा ने देश में प्यार और भाई-चारा हमेशा कायम रखा है। हमें अहिंसा (</span>Non Violence<span lang="hi" xml:lang="hi">) और धैर्य (</span>Non Violence<span lang="hi" xml:lang="hi">) जैसी </span>Human Qualities<span lang="hi" xml:lang="hi"> भी मिली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी संस्कृति की वजह से अलग-अलग धर्मों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पंथों को मानने वाले लोग एक होकर सच्चे भारतीय के रूप में सैकड़ों सालों से साथ रह रहे हैं। हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करना चाहिए। यही एक कारण था कि भारत में शांति का प्रसार हुआ और देश में यदि शांति हो तो समृद्धि भी आती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लगभग 1000 वर्ष पहले तक भारत दुनिया का सिरमौर था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व गुरु कहा जाता था। आज यह सोचकर अचरज होता है कि केवल 300 साल पहले तक पूरी दुनिया के त्रष्ठक्क (सकल घरेलू उत्पादन) का 25 प्रतिशत हिस्सा भारत का होता था।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा के क्षेत्र में भी भारत वर्ष का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है। तक्षशिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नालंदा और विक्रमशिला जैसे महान् विश्वविद्यालय की धरती है यह देश। ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कला हर क्षेत्र में भारत का कोई जवाब नहीं था। जैसे अब हमारे युवा बाहर जाकर पढ़ते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार पहले विदेशों से युवा और विद्वान यहाँ भारत वर्ष आकर पढ़ते थे और शोध करते थे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा में मूल्यों का होना बेहद जरूरी है। भारत सैकड़ों सालों से ही ज्ञान-विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साहित्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संगीत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कला व संस्कृति के क्षेत्रों में अग्रणी रहा है। विश्व के सभी देश भारत को अपने आध्यात्मिक गुरु व मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार करते थे। विज्ञान और कला के क्षेत्र में भी हम बहुत आगे थे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दिल्ली में कुतुब के निकट चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय का लौह स्तम्भ आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक चुनौती है। लगभग 1600 साल पहले बनाई गई यह लौह लाट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो लगभग 24 फुट ऊंची तथा 06 टन वजन की है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें जंग का नामो-निशान तक नहीं है। एक आज के लोहे हैं जो आठ-दस सालों में जंग से खराब होना शुरू हो जाता है और एक यह लाट प्राचीन विज्ञान का प्रतीक बन कर खड़ी हुई है। इसी तरह से भारत की स्थापत्य और वास्तु कला के प्रमाण के रूप में प्राचीन समय के किले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भवन सालों से मजबूती से खड़े हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और एक आज की इमारतें हैं जिनमें चार-पाँच सालों के बाद ही मरम्मत का काम शुरू हो जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अजंता एलोरा की गुफाएं आप में से कईयों ने देखी होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सैकड़ों साल पूर्व की गई चित्रकारी के रंग आज भी वैसे ही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देखकर लोगों को आश्चर्य होता है। यदि भारत के गौरवशाली अतीत और विरासत की बात शुरू की जाये तो आज का पूरा दिन कम पड़ जायेगा। खगोल विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एस्ट्रॉनॉमी इतना उन्नत था कि पृथ्वी और सूर्य के मध्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पृथ्वी और अन्य तारों के मध्य दूरी की गणना बिलकुल सटीक की जाती थी। आज भी हमारे पंचांग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण की सटीक भविष्यवाणी करते हैं। भारत के वैदिक गणित को आज अन्य देश भी अपना रहे हैं। आर्य भट्ट और वाराहमिहीर जैसे गणितज्ञों ने जो सिद्धांत सैकड़ों वर्ष पूर्व सिद्ध कर दिये थे उनका लोहा संसार आज भी मानता है। चरक और सुश्रुत जैसे महान् चिकित्सक हमारे ही देश में हुए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक अन्य महत्वपूर्ण बात/ जो आज इस मंच से मैं साझा करना चाहता हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत वर्ष का प्राचीन ज्ञान- विज्ञान मुख्यत: संस्कृत भाषा में लिखा और रखा गया है। समय के साथ जब बाहरी शासकों ने भारत पर शासन किया संस्कृत का प्रसार आम लोगों से दूर हो गया और इसी कारण यह महत्वपूर्ण ज्ञान भी भारत के लोगों से दूर हो गया। हमारी संस्कृति के मूल्य और सिद्धांत हमसे दूर हो गये। इन सिद्धांतों को एक बार फिर से लोगों तक पहुँचाने की आवश्यकता है। हमारी इस प्राचीन विरासत को संस्कृत के अलावा अन्य भाषाओं में भी लोगों तक पहुँचाया जाये यह जरूरी है। आज जैसे युवा स्नातकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रिसर्च स्कॉलर्स और पतंजलि विश्वविद्यालय जैसे </span>Institutes <span lang="hi" xml:lang="hi">की भूमिका इसीलिए बढ़ जाती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे युवा मित्रों! विद्या अर्जन से दो लाभ होते हैं। एक अस्थायी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तात्कालिक लाभ जिसे हम भौतिक या </span>Materialistic<span lang="hi" xml:lang="hi">लाभ कह सकते हैं। दूसरा चेतना अथवा आत्मा का विकास जिसे हम आध्यात्मिक अथवा </span>Spiritual Growth <span lang="hi" xml:lang="hi">भी कहते हैं। जहाँ विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चिकित्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कला आदि आपको सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक रूप से प्रबल बनाते हैं वहीं दूसरी ओर विवेक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सद्भाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">करुणा जैसे आत्मिक गुण आपको मानव मात्र के रूप में मजबूत करते हैं। यदि हम केवल भौतिक विकास की ओर भागेंगे तो हमारा आध्यात्मिक विकास पीछे रह जायेगा और चरित्र के गठन की नींव भी शायद कमज़ोर पड़ जायेगी।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ईशा उपनिषद् कहता है- विद्या चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह अविद्या मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते अर्थात् विद्या यानि कि आध्यात्मिक ज्ञान (</span>Spiritual<span lang="hi" xml:lang="hi">) और अविद्या यानि कि भौतिक (</span>Materialistic<span lang="hi" xml:lang="hi">) ज्ञान दोनों को एक साथ समझो-अपनाओ।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज भारत वर्ष के सामने बहुत सी चुनौतियां हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो बहुत से सकारात्मक पक्ष भी हैं। हमारा सबसे मजबूत पहलू है हमारा </span>Demographic Divident<span lang="hi" xml:lang="hi">/ (जनतान्त्रिकीय विकास)। आने वाले समय में भारत विश्व का सबसे अधिक युवा देश होगा जिसकी जनसंख्या में युवाओं की संख्या सबसे अधिक होगी। इस युवा शक्ति को सही दिशा में ले जाने की जरूरत है। यदि हमारा युवा वर्ग मजबूत है तो देश भी किसी से पीछे नहीं रहेगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मेरे युवा दोस्तों! शिक्षा किसी भी राष्ट्र की प्रगति के लिए महत्वपूर्ण उपकरण (</span>Tool<span lang="hi" xml:lang="hi">) है। मानव विकास तथा सकारात्मक सामाजिक परिवर्तनों (</span>Positive Social Change<span lang="hi" xml:lang="hi">) के लिए शिक्षा से बेहतर कोई माध्यम नहीं है। ज्ञान वह शक्तिशाली हथियार है जिसके माध्यम से आप पूरी दुनिया बदल सकते हैं। आपके जीवन का यह पड़ाव शिक्षा ग्रहण करने का और चरित्र गठन करने का है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके साथ-साथ जैसे हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने कहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमें </span>Skill Development <span lang="hi" xml:lang="hi">की आवश्यकता है ताकि विद्या के बाद काम मिल सके।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सच्ची शिक्षा के दो लक्ष्य होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक बुद्धिमत्ता और दूसरा चरित्र। </span>Swami Vivekanand <span lang="hi" xml:lang="hi">ने कहा है कि सिद्धांतों के बिना शिक्षा एक मनुष्य को चालाक दैत्य सा बना देती है और शिक्षा का असली अभिप्राय व्यक्ति को चरित्रवान बनाना और उसे हर प्रकार से सक्षम बनाना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रसिद्ध मार्टीन लूथर किंग जूनियर ने एक बार कहा था वह कथन आज के इस कार्यक्रम में उपस्थित आप सब छात्रों के लिये भी उपयुक्त है कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आप जो ज्ञान लेंगे उससे समाज का भला कैसे होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह आपको हमेशा सोचते रहना है।’</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मैं इस बात को भली भाँति समझता हूँ कि आज के संदर्भ में प्राचीन गुरुकुलों की बात पूरी तरह से व्यवहारिक (</span>Practical<span lang="hi" xml:lang="hi">) नहीं है। जब गुरु की सेवा करते विद्यार्थी ब्रह्मचर्य का पालन करते विद्या के साथ ही नैतिक मूल्यों की शिक्षा भी ग्रहण करते थे। आज एक भौतिकवादी युग में आपकी सफलता के मापदंड बदल चुके हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आप तर्क कर सकते हैं कि नौकरी पाने के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार चलाने के लिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अच्छा होने से अधिक जरूरी है </span>Skilful<span lang="hi" xml:lang="hi"> यानि प्रशिक्षित होना। यह सत्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु एक समाज एवं राष्ट्र के रूप में हमारा अस्तित्व कहीं मूल्यविहीन न हो जाये इसलिए इसमें हमें एक संतुलन (</span>Skilful<span lang="hi" xml:lang="hi">) रखना है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फेसबुक और ट्विटर के जमाने में हम सैकड़ों अजनबियों के दोस्त तो हो गये हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु अपने घर वालों की पहुँच के बाहर हो गये हैं। मंगल और चांद तक जाने वाले रॉकेट यान तो बना लिये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु अपने पड़ोस में रहने वाले गरीब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वंचित व्यक्ति को नहीं पहचानते।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक तकनीकि युग में मानव की क्षमताएं ईश्वर के बराबर कही जाने लगी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु मानवता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाईचारा और सेवाभाव का मूल मंत्र हम भूलते जा रहे हैं। इसी प्रकार से हमारा ध्यान आस-पास फैले हुए कूड़ा-करकट और गंदगी की ओर भी जाये। स्वच्छ वातावरण ही प्रगतिशील होने का सच्चा प्रतीक है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मेरा मानना है कि किसी भी विद्यालय अथवा शिक्षण संस्थान में जीवन मूल्यों की शिक्षा अवश्य दी जानी चाहिए। यह शिक्षा वास्तव में परिवार से प्रारम्भ होती है। इसका विस्तार सर्वप्रथम प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने वाले स्कूलों और फिर हाईस्कूल और इण्टर कॉलेजों में भी अनिवार्य रूप से होना चाहिए।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी भी लगातार बढ़ी है। निजी क्षेत्र को इस बात का ख्याल रहना चाहिए कि उच्च शिक्षा लाभ कमाने का क्षेत्र नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सेवा का क्षेत्र है। इसके जरिये हम समाज के कमज़ोर तबके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खासतौर से आरक्षित वर्गों और अल्पसंख्यकों की व्यापक मदद कर सकते हैं। लड़कियों की उच्च शिक्षा के लिए भी निजी क्षेत्र को अत्यधिक प्रयास करने की जरूरत है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जैसा कि एक कहावत है एक शिक्षक दरवाजा खोल सकता है लेकिन उस दरवाजे के अन्दर प्रवेश आपको खुद ही करना है। आपके गुरूजन आपको शिक्षा का मार्ग दिखाएंगे लेकिन उस पर चलना आपको है। पतंजलि विश्वविद्यालय के छात्र के रूप में आपको योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद एवं अन्य आधुनिक ज्ञान प्राप्त करने का अच्छा अवसर मिला है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु इस कार्य के लिए आपको अपनी समस्त शिक्षा व्यवस्था में वैज्ञानिकता तर्क और प्रमाणों को बिना किसी संदेह के शामिल करना होगा। भावनाओं एवं परम्पराओं को आमजन की नज़र में स्थापित करने के लिए वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना होगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि योग एवं आयुर्वेद की परम्पराएं पूर्ण रूप से वैज्ञानिक हैं तथा इनको विज्ञान की कसौटी पर खरा उतारा जा सकता है लेकिन इसी तथ्य को एक आम आदमी के मानस पटल पर भी अंकित करना होगा।</span></h5>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2024-06/hhuh.jpg" alt="hhuh" width="1050" height="552"></img></span></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग और आयुर्वेद के सिद्धांतों का सबसे बड़ा पक्ष इनकी प्रतिरोधक क्षमता (</span>Preventive Capacity<span lang="hi" xml:lang="hi">) है। कहते हैं </span>vention is better than cure <span lang="hi" xml:lang="hi">यह बात हमारे ऋषि मुनि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञानी वर्षों से ही जानते थे। ऐसी कितनी ही जड़ी-बूटियाँ और वनस्पतियाँ हैं जिनके नियमित सेवन से आप बड़ी से बड़ी बीमारियों को रोक सकते हैं।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तराखण्ड के संदर्भ (</span>Context<span lang="hi" xml:lang="hi">) में योग और प्रीवेन्टिव के रूप में आयुर्वेद का बड़ा महत्व है। यहाँ की पावन भूमि इन सब जड़ी-बूटियों के लिए बहुत ही उपयुक्त है। यह हिमालय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गंगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यमुना की भूमि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे देवभूमि कहा जाता है। यहाँ पर स्थित पतंजलि जैसे संस्थानों की भविष्य के लिए बड़ी भूमिका है और मुझे विश्वास है कि आपका उसमें महत्वपूर्ण योगदान होगा।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद हमारी सस्ती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शाश्वत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्दोष व सम्पूर्ण चिकित्सा विधाएं हैं। योग व आयुर्वेद को देश की प्रमुख चिकित्सा पद्धति के रूप में स्थापित करना होगा। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आने वाले समय में पतंजलि योगपीठ एवं पतंजलि विश्वविद्यालय की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होने वाली है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुझे हर्ष है कि आज बड़ी संख्या में युवा वर्ग योग आयुर्वेद एवं आधुनिक प्रौद्योगिकी (</span>Technology<span lang="hi" xml:lang="hi">) के लिए आकर्षित हो रहा है। मुझे विश्वास है कि आप सभी इस संस्थान में शिक्षा प्राप्त कर अपने जीवन लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल होंगे। जैसा कि भारतीय संस्कृति एवं परम्परा में किसी भी मांगलिक शुभकार्य के प्रारम्भ में प्रतिभागियों को शुभकामना देते हुए कहा जाता है कि-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तदेव लग्रम सुदिनम तदेव</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">तारा बदम चन्द्र बलम तदेव</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विद्या बलं दैव बलं तदेव</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लक्ष्मी पते तेन्द्रि युगम स्मरामि।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">Tadev Laganam Sudinam Tadev</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">Tara Balam Chandra Balam Tadev</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="en-gb" xml:lang="en-gb">Vidya Balam Daiv Balam Tadev</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;">Lakshmi Pate Tenghri Yugam Smarami</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
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                <pubDate>Sun, 01 Nov 2015 21:57:45 +0530</pubDate>
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