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                <title>काम-क्रोधादि  हमारी मिथ्या धारणा - योग संदेश</title>
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                <description>काम-क्रोधादि  हमारी मिथ्या धारणा RSS Feed</description>
                
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                <title>काम-क्रोधादि  हमारी मिथ्या धारणा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:right;"><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज</span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/3184/our-misconception-of-lust-and-anger"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2024-06/872.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">   <strong>  (</strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>कामात्क्रोधोऽभिजायते)</strong> काम पूरा हो जाए तो लोभ में परिवर्तित हो जाता है</span>, '<span lang="hi" xml:lang="hi">और-और</span>Ó <span lang="hi" xml:lang="hi">की टेक लगाना शुरु कर देता है और यदि पूरा न हो तो क्रोध का रूप धारण कर लेता है। काम के ये दो ही परिणाम हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें सत्य दृष्टि प्राप्त नहीं है वे काम से उत्पन्न लोभ के सागर में डूब जाते हैं या फिर उनके मार्ग में कोई आन्तरिक या बाह्य बाधा उपस्थित हो जाए तो क्रोध की पराकाष्ठा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्महत्या जैसा क्रूर-निर्दय-निर्मम-मूर्खतापूर्ण कृत्य करने पर उतारू हो जाते हैं। इस विशाल विश्व में प्रतिदिन हजारों की संख्या में ये घटनायें घट रही हैं। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महाभारत में कहा है-</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">न तपस्तप इत्याहुर्ब्रह्मचर्यं तपोत्तमम्। </span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्ध्वरेता भवेद् यस्तु स देवो न तु मानुष:।।</span></strong></h5>
<h5 style="text-align:justify;">'<span lang="hi" xml:lang="hi">तप</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम से अभिप्रेत वस्तु ब्रह्मचर्य ही है। इसके अतिरिक्त तप का और क्या रूप हो सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊर्ध्वरेता कोई मनुष्य नहीं बल्कि साक्षात् देवता ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाखों में मुश्किल से कोई एक आदमी ऐसा होगा जो अपनी प्रेम-पात्र स्त्री को पाने के लिए अपने सब आदर्शों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी उच्चतम दृष्टि और उस प्रत्येक वस्तु को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उसके लिए परमात्मा का प्रतिनिधित्व करती है त्याग न दे|</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इंजील में कहा गया है- </span>''<span lang="hi" xml:lang="hi">यदि व्यक्ति संसार पर विजय पाना चाहता है तो स्वैच्छिक मितव्ययी व्रत को धारण करे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शरीर पर विजय के लिए ब्रह्मचर्य तथा शैतान को जीतने के लिए आज्ञापालन को स्वीकार करे।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">काम के इस भयावह रूप को बल्कि काम ही नहीं उसके सभी साथी गण क्रोध-लोभ-मोह-अहङ्कार-ईर्ष्या- द्वेषादि सब के सब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस समस्त त्रिलोकी को हिला देने वाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कँपा देने वाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झकझोर देेने वाले रूप को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी को भी न बख्शने वाले प्रचण्ड रूप को हमने निकट से देखने-समझने का प्रयास किया। पर पाठकों को महान् आश्चर्य होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री महाराज का इस विषय में अलग ही दृष्टिकोण है। होना भी यही चाहिए। घटना एक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर देखने वाले अपनी-अपनी दृष्टि से उसे देख रहे हैं। अनन्त की ओर आरोहण करते हुए प्रत्येक यात्री के देश और काल का बिन्दु पृथक् होने से घटना का पृथक् दिखाई देना स्वाभाविक ही है। कोई एक व्यक्ति घटना से हजारों मील दूर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई अत्यन्त पास खड़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई उसे पार कर इतना आगे निकल गया है कि पीछे छूटी हुई घटना सर्वथा अदृश्य हो गयी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई उससे इतनी दूर खड़ा है कि अभी उसका धुँधला चित्र भी नहीं बन पा रहा। सो इस प्रकार सब द्रष्टाओं के दर्शन पृथक् ही होते हैं। जो शिखर पर पहुँच गया है उसका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जो अभी पर्वत की उपत्यका के भी समीप नहीं पहुँच पाया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन दोनों का एक ही दर्शन कैसे हो सकता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">स्त्री रूपी घटना एक ही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके पति को वह सुखकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाँ को दु:खकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीसरे उस व्यक्ति को जो उसे नहीं प्राप्त कर सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके लिए मोहकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि तत्त्व ज्ञानी को न सुखकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न दु:खकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न मोहकर ही प्रतीत होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तत्त्वज्ञानियों में भी एक उसको माता के रूप में देखता है जैसे कि हमारे श्री महाराज प्रकृति माँ के ही प्रतीक रूप में देखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि मनुष्य रूप में गुह्य ब्रह्म को जन्म देने वाली जगज्जननी है। दूसरे को केवल हाड़-मांस का एक विशिष्ट ढाँचा मात्र परमाणुओं का पुंज दिखाई देता है। सो काम-क्रोधादि के विषय में महाराज की दृष्टि यह नहीं है कि ये प्रचण्ड वेगवती शक्तियाँ हमारे विरोध में खड़ी होकर हमारे रास्ते को रोक रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उनका कहना है कि उन शक्तियों का कोई अस्तित्व ही नहीं है। शक्ति की कल्पना तो तभी होगी जब पहले </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">है</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कहकर स्वीकृति दी जाए। महाराज के दर्शन के अनुसार जिन चीजों का निराकरण हो जाए उनका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। समस्त निषेध वर्ग का यही स्वरूप है। जैसे अन्धकार कहने के लिए है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर वस्तुत: वह है ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि प्रकाश के द्वारा वह निराकृत हो जाता है। दूसरी ओर प्रकाश का कभी निराकरण नहीं किया जा सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल किसी चीज के बीच में आने से </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्धकार प्रतीत होने लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर प्रकाश तो उस अवस्था में भी बना रहता है। जबकि सब गन्दगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कूड़ा-करकट भी अन्तत: हटा दिया जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार स्वच्छता स्वत: सिद्ध है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल गन्दगी से ढक मात्र जाती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि कोई व्यक्ति निम्न प्रकृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान की स्थिति में खड़ा हो तो उसे शनै:-शनै: निम्न प्रकृति से उच्च प्रकृति में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोग से अपवर्ग में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान से ज्ञान में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असत्य से सत्य में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मृत्यु से अमृत में आरोहण करने के लिए कृत संकल्प होना होगा। सचेतन रूप से अपने अन्दर यह इच्छा जागृत करनी होगी कि अब तुझे यह खण्डित-खण्डित होकर प्राप्त होने वाला विषय-रस नहीं चाहिए जो परिणाम में सदा विषाद को ले आता है। यह इच्छा जितनी बलवती होगी उतना ही अज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असत्य या भोगमय जीवन (जिसके कि काम-क्रोधादि विविध रूप हैं) को अस्वीकार करने में सरलता व सहजता होती जाएगी। जैसे अन्धकार को हटाने के लिए प्रकाश अविनाभावी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार काम-क्रोधादि रूप अज्ञानमय जीवन को त्यागने के लिए ज्ञान रूप साधना की अत्यन्त आवश्यकता है। उसके बिना और कोई उपाय नहीं है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पर केवल ब्रह्मचर्य की प्रशंसा सुनने मात्र से ब्रह्मचर्य में स्थिति कभी नहीं हो सकती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब तक अब्रह्मचर्य के दु:खों व कष्टों को व्यक्ति स्वयं अनुभव न कर ले। प्राचीन शब्दावली में इसको अभ्यास व वैराग्य का नाम दिया गया है। विषयों को महादु:खदायी समझकर उधर से सदा के लिए मुख मोड़ लेने का नाम वैराग्य है। पर दु:ख दर्शन से ही वैराग्य का जन्म होता है। जैसे व्यक्ति को जब पता चल जाता है कि यह काला सर्प है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वहाँ से सहज ही तत्क्षण हट जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी प्रकार विषयों का यथार्थ स्वरूप जब व्यक्ति के मन में स्पष्ट हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उससे हटने के लिए संघर्ष नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सजगता काम देती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">महाराज का कहना है कि ब्रह्मचर्य-सिद्धि के लिए इस बेहोशी को हटाने की आवश्यकता है। किसी उपाय से बेहोशी टूटे और जब वह टूट जाए तो अब आगे के लिए व्यक्ति पूर्ण सजग हो जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुन: उसी स्वप्न लोक में या बेहोशी या प्रमाद की अवस्था में न जाए तो स्पष्ट है कि फिर इस विकार रूपी मगर से व्यक्ति का बचाव हो सकता है। प्रारम्भिक अवस्था में संघर्ष से यत् किञ्चित् थोड़ा-बहुत सहयोग मिलने की सम्भावना तो है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर वह केवल मूर्छा के टूटने पर ही सम्भव है। जो विषयों के प्रहार से मूर्छित होकर पड़ा हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस अवस्था में तो संघर्ष की कल्पना ही नहीं की जा सकती। अपनी दृढ़ इच्छा-शक्ति का प्रयोग करना ही तो संघर्ष का रूप है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर जब तक व्यक्ति को विषयों में रस दिखाई दे रहा है तो उसके विरोध में इच्छा-शक्ति कहाँ से जुटायी जाए</span>?</h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इस दयनीय व पराधीन अवस्था को प्राप्त व्यक्ति अपने समस्त उत्साह को खो बैठता है। इच्छा-शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्साह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जीवन की मूल्यता इन सबका एक-दूसरे के साथ आश्रय-आश्रयि भाव सम्बन्ध होता है। अन्त में मूल बात यहीं आकर टिकती है कि उपाय चाहे जो अपनाया जाए-किसी महापुरुष की वाणी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई शास्त्र वचन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विषयों के सम्बन्ध में अपने ही अनुभव से प्राप्त यथार्थ दृष्टि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दु:ख-दर्शन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्य प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्मल ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशुद्ध भक्ति जैसे भागवत तत्त्वों को प्राप्त करने की अभङ्ग अभीप्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर किसी भी उपाय से मन की मूर्छा या बेहोशी को तोड़ा जाए। शनै:-शनै: व्यक्ति को ज्ञान की वह दृढ़ आधार-भित्ति प्राप्त होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके लिए महाराज कहते हैं कि काम-क्रोधादि हैं ही नहीं। हमारी मिथ्या मान्यता का ही ये लाभ उठा रहे हैं। बस उसे ही हटा लेना है। व्यक्ति के द्वारा इस समस्त निषेधवर्ग के प्रति उदासीनता धारण करते ही ये काम-क्रोधादि उसी प्रकार से अव्यक्त में चले जायेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे सूर्योदय होने पर अन्धकार।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्यों न हम योग-प्राणायाम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आयुर्वेद अपनायें व इन मिथ्या धारणाओं से मुक्ति का अभ्यास करें।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>2015</category>
                                            <category>नवम्बर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Nov 2015 21:54:11 +0530</pubDate>
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