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                <title>गुरु की महिमा कोई न जाने - योग संदेश</title>
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                <description>गुरु की महिमा कोई न जाने RSS Feed</description>
                
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                <title>गुरु की महिमा कोई न जाने</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="margin-bottom:0.0001pt;text-align:right;line-height:normal;" align="right"><span style="color:rgb(0,0,0);"><span lang="en-in" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-in">साध्वी देवप्रिया,<span>  </span></span></span></p>
<p style="text-align:right;"><span style="color:rgb(0,0,0);"><span lang="en-in" style="font-size:11pt;line-height:107%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-in">संकायाध्यक्षा एवं कुलानुशासिका- पतंजलि विश्वविद्यालय</span></span></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/517/no-one-knows-the-glory-of-the-guru"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-05/20.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="en-in" xml:lang="en-in">प्रति वर्ष आषाढ़ माह की पूर्णिमा को हम गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाते हैं। लेकिन कभी सदियों के बाद ऐसा संयोग बनता है कि असली शिष्य और किसी समर्थ गुरु का मिलन होता है, जिससे वे दो आत्माएँ ही नहीं अपितु यह समस्त धरा धन्य हो जाती है और तब सच्ची गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है। यह गुरु-शिष्य का मिलन बड़ा अद्भुत है, बड़ा महान् है और सम्बन्धों की शृंखला में सर्वोच्च सम्बन्ध है क्योंकि इस सम्बन्ध में पवित्रता, ज्ञान, अहंकार शून्यता विवेक, नि:स्वार्थता, सेवा व समर्पण की पराकाष्ठा होती है। आदिकाल से अद्य पर्यन्त ये घटनाएं घटित होती ही आयी हैं- गुरु वशिष्ठ व राम, घोर ऋषि व कृष्ण, श्रीकृष्ण व अर्जुन, समर्थ गुरु रामदास व छत्रपति शिवाजी, चाणक्य व चन्द्रगुप्त, रामकृष्ण परमहंस व विवेकानन्द, गुरु विरजानन्द व ऋषि दयानन्द आदि नाम इस पावनी परम्परा के गौरव हैं। यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि पहले गुरु का अस्तित्व होता है या शिष्य का? यह ऐसी ही जिज्ञासा है कि पहले माँ का अस्तित्व है या बच्चे का? स्थूल दृष्टि से देखें तो झट से उत्तर आता है कि गुरु और माँ का अस्तित्व पहले है लेकिन गम्भीरता से विचार करें तो दोंनों का अस्तित्व साथ-साथ विकसित होता है इसीलिए वेदमन्त्र में कहा- ‘‘सह वीर्यं करवावहै" क्योंकि जब तक बच्चा गर्भ में ना आये तब तक कोई महिला माँ नहीं बनती है। जैसे ही शिशु गर्भ में आता है वह माँ बनना शुरू हो जाती है और जैसे ही बच्चे का जन्म होता है, वह माँ बन जाती है अर्थात् मातृत्व प्रकट हो जाता है, माँ के स्तनों में दूध उतर आता है उसी प्रकार शिष्यत्व का जन्म होते ही गुरुत्व प्रकट हो जाता है। शिष्यत्व से विवेक, वैराग्य, आत्म निग्रह, निष्काम सेवा, तत्त्व चिन्तन, समर्पण और अध्यवसाय अर्थात् सत्य को पाने का दृढ़ निश्चय, उपरोक्त ये 10 गुण जब हममें आ जाते हैं तो शिष्यत्व अभिव्यक्त हो जाता है और तभी गुरुत्व भी प्रकट होता है उससे पहले नहीं। तभी गुरु हमारा रूपान्तरण करना शुरू कर देते हैं। किन्तु यह शिष्यत्व का जन्म होना बहुत बड़ी घटना है और इसकी समाप्ति भक्त बनने में होती है। </span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="en-in" xml:lang="en-in">भक्त का अभिप्राय है- प्रतिरूप होना उसी के जैसा होना या वही हो जाना। गीता में आधी गीता तक अर्जुन में शिष्यत्व का जन्म नहीं हुआ यद्यपि द्वितीय अध्याय में उसने कहा कि ‘‘शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्न" परन्तु यह कहकर भी अर्जुन उलटा, कृष्ण को ही उपदेश देते रहे जैसे कि यह कृष्ण से ज्यादा समझदार है। हम भी शिष्य तो बनना चाहते हैं लेकिन अपनी समझदारी का अहंकार भी कुछ कम नहीं है। रूपान्तरण तो चाहते हैं किन्तु चाहते हैं अपने ही तरीके से, जो हमें अनुकूल पड़े, जो हमें प्रिय लगे। हमारा मन अपनी ही प्रकार की योजना बनाता रहता है और शिष्यत्व के जन्म की पहचान यह है कि हमारा मन चुप हो जाये, शान्त हो जाये तथा गुरु के हर फैसले पर उसे विश्वास होने लगे। इसी प्रकार गुरुत्व का जन्म अनन्त धैर्य के साथ होता है। अनन्त धैर्य होना इसलिए आवश्यक है क्योंकि वह अनन्त जन्मों के संस्कारों को बदल कर इसे मनुष्य से देवता बना रहा है। इस परिवर्तन में समय, शक्ति की आवश्यकता तो होती ही है। यदि धैर्य नहीं होता तो गुरु कहेगा- इतने दिन हो गये इसे ज्ञान सुनाते-सुनाते कोई परिवर्तन नजर नहीं आ रहा, मैं किसी अच्छे शिष्य को पकडक़र लाऊँगा। इसी प्रकार शिष्य में भी धैर्य की परम आवश्यकता है यदि इसमें पेसैन्स (धैर्य) नहीं होगा तो, पेसेन्ट बन जायेगा क्योंकि स्वास्थ का सम्बन्ध केवल शारीरिक ही नहीं अपितु मानसिक, बौद्धिक व आत्मिक भी है। यदि धैर्य नहीं होगा तो जब लोग ताने मारेंगे, हंसी उड़ायेंगे, निन्दा करेंगे तो आपके दिमाग पर इतना प्रभाव (लोड) पड़ेगा कि आप सह नहीं पायेंगे और या तो डिप्रेशन में चले जायेंगे या भाग जायेंगे। अथवा नास्तिक हो जायेंगे इसलिए कहा- ‘‘मा विद्विषावहै"। छान्दोग्य उपनिषद् के षष्ठं प्रपाठक, चतुर्दश खण्ड के प्रथम व द्वितीय मन्त्र में कहा कि जैसे कोई गान्धार देश के व्यक्ति की आँखों पर पट्टी बाँधकर किसी निर्जन स्थान में छोड़ दें और वह चिल्लाता फिरे कि अरे मुझे यहाँ लाकर किसी ने छोड़ दिया, मैं गान्धार का रहने वाला हूँ, कोई मेरी सहायता करो और तभी कोई व्यक्ति आकर उसकी आँखों की पट्टी खोल दे और वह कहे कि गान्धार इधर है तो वह गाँव-गाँव पूछता हुआ गान्धार पहुँच ही जाता है। ठीक इसी प्रकार जीवन में किसी श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ आचार्य सद्गुरु को पाकर आँखों पर अज्ञान की पट्टी बँधा हुआ, भटकता हुआ यह पुरुष अपने सत्रूप को पाने के लिए चिल्लाता है और जब सद्गुरु उस पट्टी को खोलकर राह दिखा देता है तब चलते-चलते अपने गन्तव्य को पा ही जाता है।</span></h5>
<p><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/2023-05/20.jpg" alt="20"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="en-in" xml:lang="en-in">मगर ऐसा गुरु कहाँ ढूँढे? कहाँ पायें? आप इसकी तनिक भी चिन्ता मत करना अपितु नचिकेता की भांति सच्ची लगन लगाकर, सच्ची अभीप्सा से भूख-प्यास आदि शारीरिक भोगों के प्रति आसक्ति का त्याग करके, उपवास करके धैर्य के साथ प्रतीक्षा करना, गुरु स्वयं मिलेंगे और सहज मिलेंगे। प्रश्न उठता है कि ऐसा गुरु मिल जाये तो पहचानेंगे कैसे? उत्तर है गुरु तीन काम साथ-साथ करता है। हमारे अन्दर दिव्यता का सृजन, दिव्य आधार और पूर्ण विध्वंस।</span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>‘<span lang="en-in" xml:lang="en-in">गुरुब्र्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवोमहेश्वर:, </span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:center;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="en-in" xml:lang="en-in">गुरुर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम:।</span>’</strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="en-in" xml:lang="en-in">इस श्लोक में महेश्वर अर्थात् विध्वंसक शब्द तीसरे नम्बर पर आया है पर वास्तव में नवनिर्माण के लिए पहला कार्य है- विध्वंस। जब तक मिट्टी के कच्चे झोपड़े को तोड़ेंगे नहीं तब पक्का सुन्दर महल बनेगा कैसे? और बनाने के पश्चात् उसका रख-रखाव करना बहुत जरूरी है इसी का नाम है विष्णु। इसलिए वेद में भी आचार्य का प्रथम रूप मृत्यु ही बताया है। सर्वप्रथम आचार्य हमारे दोषों को, दुराग्रहों को, दुर्बलताओं को तोड़ता है यहाँ से शिष्य गुरु के गर्भ में आ जाता है और जन्म होने के बाद द्विज और भक्त बन जाता है। भक्त हो जाना जीवन की पूर्णता है। भक्त से अभिप्राय है उसी के स्वरूप वाला हो जाना। इसलिए श्लोक में कहा ‘‘गुरुर्साक्षात् परबह्म" अर्थात् तब भक्त को गुरु में किसी इन्सान के नहीं अपितु भगवान् के ही दर्शन होने लगते हैं। यह पर्व पूर्णिमा को ही मनाया जाता है अर्थात् ‘‘गुरुपूर्णिमा</span>’’<span lang="en-in" xml:lang="en-in">गुरु अमावस्या, गुरु प्रथमा अथवा गुरु एकादशी, कोई भी तिथी हो सकती थी, पूर्णिमा ही क्यों? क्योंकि रात्री के सम्पूर्ण तिमिर का नाश पूर्णिमा का चन्द्र ही कर पाता है। सूर्य और रात्री का मिलन तो सम्भव नहीं है, इसलिए चन्द्र ही रात्री तिमिर का नाश कर सकता है। सूर्य तो परम-पिता परमात्मा है और गुरु चन्द्रमा है, शिष्य रात्री के समान है। शिष्य का डायरेक्ट सम्बन्ध परमात्मा से नहीं होता बीच में गुरु जरूरी है। यद्यपि चन्द्रमा में भी प्रकाश तो सूर्य का ही है अपना निजी नहीं, पर रात्री के साथ मिलन चन्द्र का ही सम्भव है। इसी प्रकार गुरु में भी ज्ञान, सामथ्र्य, शक्तियाँ सब परमात्मा की ही हैं परन्तु परमात्मा का साक्षात प्रतिनिधि होता है गुरु, जो शिष्य को अपना ही जैसा बना देता है। अग्नि में पड़ा हुआ कोयला भी चमचमाने लगता है, यह अग्नि की महिमा है, यही गुरु की महिमा है। गुरु अपने शिष्य को अपने ही जैसा बना देता है और यदि शिष्य उससे भी आगे निकल जाये तो उसे परम प्रसन्नता होती है। अत: आइये इस गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर हम शिष्य बनने की शुरूआत करें।</span></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2021</category>
                                            <category>अगस्त</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Aug 2021 21:49:29 +0530</pubDate>
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                <title>गुरु की महिमा कोई न जाने</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="margin-bottom:3pt;text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">डॉ. साध्वी देवप्रिया</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">प्रोफेसर एवं </span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="margin-bottom:3pt;text-align:right;" align="right"><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">विभागाध्यक्षा- दर्शन विभाग</span>, </strong><strong><span lang="hi" style="font-size:10pt;line-height:115%;font-family:'Arial Unicode MS', sans-serif;" xml:lang="hi">पतंजलि विश्वविद्यालय</span></strong></p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.patanjaliyogsandesh.com/article/2078/guru-kee-mahima-koee-na-jaane"><img src="https://www.patanjaliyogsandesh.com/media/400/2023-09/302.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">   <strong> <span style="color:rgb(186,55,42);">प्रतिवर्ष आषाढ़</span></strong></span><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> माह की पूर्णिमा को हम गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाते हैं लेकिन कभी सदियों के बाद ऐसा संयोग बनता है कि असली शिष्य और किसी समर्थ गुरु का मिलन होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे वे दो आत्माएं ही नहीं अपितु यह समस्त धरा धन्य हो जाती है और तब सच्ची गुरु पूर्णिमा मन जाती है। यह गुरु-शिष्य का मिलन बड़ी अद्भुत घटना है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बड़ी महान् है और सम्बन्धों की शृंखला में सर्वोच्च सम्बन्ध है क्योंकि इस सम्बन्ध में पवित्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अहंकार शून्यता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नि:स्वार्थता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा व समर्पण की पराकाष्ठा होती है।</span></strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आदिकाल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> से अद्यपर्यन्त ये घटनाएं घटित होती ही आयी हैं-गुरु वशिष्ठ व राम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घोर ऋषि व कृष्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीकृष्ण व अर्जुन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समर्थ गुरु रामदास व छत्रपति शिवाजी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चाणक्य व चन्द्रगुप्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रामकृष्ण परमहंस व विवेकानन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु विरजानन्द व ऋषि दयानन्द आदि नाम इस पावनी परम्परा के गौरव हैं। यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि पहले गुरु का अस्तित्व होता है या शिष्य का</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यह ऐसी ही जिज्ञासा है जैसे कि पहले माँ का अस्तित्व है या बच्चे का</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थूल दृष्टि से देखें तो झट से उत्तर आता है कि गुरु और माँ का अस्तित्व पहले है लेकिन गम्भीरता से विचार करें तो दोनों का अस्तित्व साथ-साथ विकसित होता है इसीलिए वेदमन्त्र में कहा-</span>'<span lang="hi" xml:lang="hi"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>सह वीर्यं करवावहै</strong></span>’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि जब तक बच्चा गर्भ में न आये तब तक कोई महिला माँ नहीं बनती। जैसे ही शिशु गर्भ में आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह माँ बनना शुरु हो जाती है और जैसे ही बच्चे का जन्म होता है वह माँ बन जाती है अर्थात् मातृत्व प्रकट हो जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माँ के स्तनों में दूध उतर आता है। उसी प्रकार शिष्यत्व का जन्म होते ही गुरुत्व प्रकट हो जाता है। शिष्यत्व से अभिप्राय है-श्रद्धा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सत्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिप्सा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पवित्रता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैराग्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्म निग्रह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्काम सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तत्त्व चिन्तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समर्पण और अध्यवसाय अर्थात् सत्य को पाने का दृढ़ निश्चय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपरोक्त ये १० गुण जब हममें आ जाते हैं तो शिष्यत्व अभिव्यक्त हो जाता है और तभी गुरुत्व भी प्रकट होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे पहले नहीं। तभी गुरु हमारा रूपान्तरण करना शुरु कर देते हैं। किन्तु यह शिष्यत्व का जन्म होना बहुत बड़ी घटना है और इसकी समाप्ति भक्त बनने में होती है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भक्त का अभिप्राय है-</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिरूप होना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी के जैसा हो जाना या वही हो जाना। गीता में आधी गीता तक अर्जुन में शिष्यत्व का जन्म नहीं हुआ यद्यपि द्वितीय अध्याय में उसने कहा कि </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शिष्यस्ते अहं शाधि मां त्वां प्रपन्न’</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">परन्तु यह कहकर भी अर्जुन उलटा कृष्ण को ही उपदेश देते रहे जैसे कि वह कृष्ण से ज्यादा समझदार है। हम भी शिष्य तो बनना चाहते हैं लेकिन अपनी समझदारी का अहङ्कार भी कुछ कम नहीं है। रूपान्तरण तो चाहते हैं किन्तु चाहते हैं अपने तरीके से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हमें अनुकूल पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो हमें प्रिय लगे। हमारा मन अपनी ही प्रकार की योजना बनाता रहता है और शिष्यत्व के जन्म की पहचान यह है कि हमारा मन चुप हो जाये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शान्त हो जाये तथा गुरु के हर फैसले पर हमें विश्वास होने लगे।</span></h5>
<table style="border-collapse:collapse;width:100.026%;border-width:1px;background-color:#CED4D9;border-color:#CED4D9;" border="1"><colgroup><col style="width:99.8555%;" /></colgroup>
<tbody>
<tr>
<td style="border-width:1px;border-color:rgb(206,212,217);">
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>हम सब उस विराट् ब्रह्माण्ड में व्याप्त उस एक ही महान् शक्ति के एक छोटे से कण हैं, लेकिन उससे भिन्न नहीं हैं, उसकी इच्छा ही हमारी इच्छा है, और उस शाश्वत के ही प्रतिनिधि, मूत्र्तरूप होते हैं गुरु, इसलिए गुरु की इच्छा ही शिष्य की, अन्तेवासी की इच्छा होती है। </strong></span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>जब कोई पत्ता अपने आपको वृक्ष से पृथक् (ष्ठद्बह्यष्शठ्ठठ्ठद्गष्ह्ल) करता है तो पीला पड़ जाता है, मुरझाने लगता है, यही हाल हमारा भी है। जब हमारा अहङ्कार अपने को गुरु भिन्न कर लेता है तो तमाम तरहे के कष्ट, पीड़ाएं, उदासीनताएं व अवसाद (ष्ठद्गश्चह्म्द्गह्यह्यद्बशठ्ठ) हमें घेर लेते हैं। </strong></span></h5>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी प्रकार गुरुत्व का जन्म अनन्त धैर्य के साथ होता है। अनन्त धैर्य होना इसलिए आवश्यक है क्योंकि वह अनन्त जन्मों के संस्कारों को बदलकर इसे मनुष्य से देवता बना रहा है। इस परिवर्तन में समय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति की आवश्यकता तो होती ही है। यदि धैर्य नहीं होगा तो गुरु कहेगा- इतने दिन हो गये इसे ज्ञान सुनाते-सुनाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई परिवर्तन नजर नहीं आ रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं किसी अच्छे शिष्य को पकड़कर लाऊँगा। इसी प्रकार शिष्य में भी धैर्य की परम आवश्यकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि इसमें धैर्य (</span>Patience)<span lang="hi" xml:lang="hi"> नहीं होगा तो रोगी (</span>Patient)<span lang="hi" xml:lang="hi"> बन जाएगा क्योंकि स्वास्थ्य का सम्बन्ध केवल शारीरिक ही नहीं अपितु मानसिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बौद्धिक व आत्मिक भी है। यदि धैर्य नहीं होगा तो जब लोग ताने मारेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हंसी उड़ायेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निन्दा करेंगे तो आपके दिमाग पर इतना प्रभाव (Load) पड़ेगा कि आप सह नहीं पायेंगे और या तो अवसाद (</span>Depression)<span lang="hi" xml:lang="hi"> में चले जायेंगे या भाग जायेंगे अथवा नास्तिक हो जायेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए कहा- </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">मा विद्विषावहै’। छान्दोग्य उपनिषद् के षष्ठ प्रपाठक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चतुर्दश खण्ड के प्रथम व द्वितीय मन्त्र में कहा कि जैसे कोई गान्धार देश के व्यक्ति की आँखों पर पट्टी बाँधकर किसी निर्जन स्थान में छोड़ दें और वह चिल्लाता फिरे कि अरे मुझे यहाँ लाकर किसी ने छोड़ दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मैं गान्धार का रहने वाला हूँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई मेरी सहायता करो और तभी कोई व्यक्ति आकर उसकी आँखों की पट्टी खोल दे और वह कहे कि गान्धार इधर है तो वह गाँव-गाँव पूछता हुआ गान्धार पहुँच ही जाता है। ठीक इसी प्रकार जीवन में किसी श्रोत्रिय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रह्मनिष्ठ आचार्य सद्गुरु को पाकर आँखों पर अज्ञान की पट्टी बँधा हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भटकता हुआ यह पुरुष अपने सत्रूप को पाने के लिए चिल्लाता है और जब सद्गुरु उस पट्टी को खोलकर राह दिखा देता है तब चलते-चलते अपने गन्तव्य को पा ही जाता है।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरु एक विशाल वृक्ष की भाँति है और ईश्वर उस वृक्ष की जड़ है जो दिखती तो नहीं पर वृक्ष के फलने-फूलने का मूल कारण है। शिष्यगण अन्तेवासी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भक्त वो सब शाखाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पत्ते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फल और फूल हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनका अस्तित्व वृक्ष और जड़ से कदापि भिन्न नहीं होता।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए सच्चा शिष्यत्व उस दिन प्राप्त हो पाता है जब हमारी अलग से कोई इच्छा नहीं रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पत्तों की शाखाओं की अलग से क्या इच्छा होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब अलग अस्तित्व ही नहीं है। हाँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सच है कि पत्ते एक निश्चित समय पर बदलते रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुराने जाते रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नये आते रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर वृक्ष वही रहता है। ऐसे ही वृक्ष हैं-गुरुनानक देव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महात्मा बुद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् महावीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महर्षि दयानन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवेकानन्द</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">श्री अरविन्द और वे तमाम ऋषि परम्परा के ऋषिगण एवं गुरु परम्परा के गुरुजन। यद्यपि पत्ते अलग-अलग होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने-अपने स्थान पर रहते हुए हँसते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खेलते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किन्तु हैं उस विशाल अस्तित्व का एक भाग। हम सब उस विराट् ब्रह्माण्ड में व्याप्त उस एक ही महान् शक्ति के एक छोटे से कण हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उससे भिन्न नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी इच्छा ही हमारी इच्छा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उस शाश्वत के ही प्रतिनिधि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूत्र्तरूप होते हैं गुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए गुरु की इच्छा ही शिष्य की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्तेवासी की इच्छा है। जब कोई पत्ता अपने आपको वृक्ष से पृथक् (</span>Disconnect)<span lang="hi" xml:lang="hi"> करता है तो पीला पड़ जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुरझाने लगता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यही हाल हमारा भी है। जब हमारा अहङ्कार अपने को गुरु भिन्न कर लेता है तो तमाम तरह के कष्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पीड़ाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उदासीनताएं व डिप्रैशन हमें घेर लेते हैं। आज भी इस गौरवशाली गुरु परम्परा में अनेकों गुरुजन देश व दुनियाँ में इस मानवता के पथ प्रदर्शक बनकर उनका मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं और उसी गुरु परम्परा में हमारे गुरुदेव एक दैदीप्यमान सूर्य की भाँति हम सब शिष्यजनों को जीवनदान दे रहे हैं। आइये इस महान् सत्य की अनुभूति करते हुए हम गुरु के मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लक्ष्य व सेवा के साथ अपने मन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लक्ष्य व सेवा को एकाकार करते हुए उस परम आनन्द व परमशान्ति का अनुभव करें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान् करे वह गुरुपूर्णिमा अर्थात् शिष्यत्व का गुरुत्व के साथ शाश्वत मिलन होकर हम समस्त बन्धनों से मुक्त हो जायें।</span></h5>
<h5 style="text-align:justify;"> </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>योग संदेश</category>
                                            <category>संस्कृति एवं संस्कार</category>
                                            <category>2018</category>
                                            <category>जुलाई</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Jul 2018 21:39:22 +0530</pubDate>
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