गिलोय एक चमत्कारी औषधि

गिलोय एक चमत्कारी औषधि

डॉ. अनुराग वार्ष्णेय  
उपाध्यक्ष- पतंजलि अनुसंधान संस्थान

हम यदि adverse drug reactions  की बात करते हैं तो सबसे पहले यह प्रश्न आता है कि दवाइयों या औषधियों के सुप्रभाव और दुष्प्रभाव को कैसे नापा जाता है? और उनके बीच के अनुपात के आधार पर दवाइयों का वर्गीकरण किया जाता है। हमारी हर्बल व आयुर्वेदिक दवाइयां हैं जिनके दुष्प्रभाव या तो होते नहीं है और होते हैं तो बहुत हाई डोज पर जाकर थोड़े-बहुत होते हैं। जबकि इनके सुप्रभाव बहुत अच्छे होते हैं। गिलोय को लेकर कुछ बहुत सारी अवधारणाएं मीडिया में बहुत दिन पहले चली थी और एक छोटी सी छह लोगों की स्टडी भी कहीं प्रकाशित हुई थी जिसमें यह बताया गया था कि कोविड के समय पर कुछ लोगों ने गिलोय का सेवन किया तो उनके लीवर में दिक्कत आई थी।
उस पर काफी विस्तार में पूरी पतंजलि रिसर्च फाउण्डेशन की टीम ने काम किया और यह पता लगाया कि उस स्टडी में कुछ कमियाँ थीं। उन्होंने जो निष्कर्ष निकाले, वो शायद सही नहीं थे। क्योंकि उन छह रोगियों में से चार रोगी पहले ही अलग-अलग बीमारियों से ग्रसित थे। जिसमें स्पष्ट था कि दो लोगों को डाइबिटीज टाइप-2 थी, दो लोगों को थायरॉइड संबंधी रोग था, एक को थैलेसीमिया माइनर था और बाकी दो लोग भी बहुत दिनों से अलग-अलग तरह की दवाई खा रहे थे। तो जिसको हम साइंस में कहते हैं cause and effect relationship मतलब जो effect आ रहा है उसका कारण क्या है? वह कारण इस स्टडी में स्थापित करना सम्भव नहीं हो पा रहा था। उनको जो दिखाई दे रहा था उसके पीछे कुछ भ्रांतियाँ थीं। उसी जनरल में हमने एक महीने के अंदर एक 'लेटर टू एडिटरपब्लिश किया और यह बताया कि उस study को जज करने का शायद वह तरीका ठीक नहीं है। यह एक बहुत ही एक अच्छे से discuss हुआ paper था जहाँ यह साफ हुआ कि गिलोय की toxicity वास्तव में होती ही नहीं है।
इसके बाद पतंजलि अनुसंधान संस्थान की एक और ऐसी स्टडी आयी जहाँ यह बताया गया कि वास्तव में गिलोय के बहुत सारे फायदे हैं और उस पर केन्द्रित होकर आगे चलना चाहिए। उसके बाद पूज्य आचार्य श्री से जब विचार-विमर्श हुआ तो उन्होंने कहा कि किसी भी टॉक्सिसिटी के अस्सेस्मेंट के लिए जो गोल्ड स्टैण्डर्ड २८ डेटॉक्स स्टडी होती हैं क्यों न हम गिलोय पर वैसी ही व्यापक स्टडी करें। गिलोय इतनी पुरानी औषधि है और आज से पहले किसी ने इस तरफ सोचा ही नहीं था कि इस पर भी एक detail toxological investigation होना चाहिए। शायद उस समय यह विचार रहा होगा कि यह सबसे सुरक्षित और सबसे प्रभावकारी औषधि है, तो शायद इस प्रकार के शोध की जरूरत ही नहीं है।
आधुनिक विज्ञान (Mordern science) में कहीं-कहीं चीजों को पुन: स्थापित करना पड़ता है चाहे वो तथ्य सामने ही क्यों न हों, तो इस संदर्भ में सबसे पहले हम लोगों ने जो detailed study की उसमें हमने अ_ाईस दिनों तक चूहों को एक हजार मिलीग्राम/ किग्रा. तक गिलोय दिया। जो Human Dose के लगभग पाँच गुने के बराबर है। Male, Female दोनों को अलग-अलग Group में गिलोय के प्रभाव को जाँचा और बहुत व्यापक स्टडी की। हम जो स्टडी करते हैं उसमें सबसे पहले हम उनका phytochemical analysis करते हैं और यह देखते हैं कि इसके अंदर active components क्या हैं और उनको हम signature के तौर पर ले सकते हैं क्या?
जैसे इन्सानों में फिंगर प्रिंट से किसी व्यक्ति को पहचाना जाता है, उसी प्रकार औषधि में भी ' chemical finger print’ होते हैं। पौधे के पाउडर रूप को भी ' chemical finger print’ से पहचाना जा सकता है। इस प्रकार chemical finger printing का बड़ा महत्व है। इस बार हमने इस स्टडी में, जैसे हर बार करते हैं chemical finger printing किया और देखा कि इसके अंदर जो दो या तीन बड़े-बड़े marker है जो हर बार right amount में श्चह्म्द्गह्यद्गठ्ठह्ल होते हैं। उसके बाद एक लंबी स्टडी हमने Good Laboratory Practice (GLP) के तहत एक third party site पर की। यह स्टडी एक remote location पर की गई और प्रयोग की गई ड्रग को हमने coded form में भेजा। मतलब जो लोग यह टेस्ट कर रहे थे उनको नहीं पता था कि वे गिलोय पर काम कर रहे हैं और कुल मिलाकर हमने इसमें 72 चूहों पर प्रयोग किया जिनमें 36 मेल और 36 फीमेल थे। अलग-अलग प्रकार की dosing की थी और बहुत detailed investigation किए थे।
सामान्यत: हम शरीर के लगभग तीस अंगों पर फ़ोकस करते हैं पर इस बार चुनौति थोड़ा अलग प्रकार की थी तो हम और गहराई में गए और इस बार चवालीस अलग-अलग अंग पर काम किया।  शरीर के जितने भी ब्लड फंक्शन्स हम नापते हैं, जो भी क्लिनिकल डॉयग्रोस्टिक मार्कर्स हैं, लीवर फंक्शन टेस्ट, किडनी फंक्शन टेस्ट, थॉयराइड प्रोफाइल, लिपिड प्रोफाइल, अलग-अलग हार्मोन्स, ग्लूकोज, पूरा CSB वो सब भी हमने एक-एक चूहे पर किया और यह नापने का प्रयास किया कि जब हम इन पर गिलोय का प्रयोग करते हैं तो गिलोय का शरीर के अंगों पर क्या प्रभाव पड़ता है। हमने इसमें तीन अलग डोज दिए, 100, 300 और 1000 मिलीग्राम/किलोग्राम और देखा कि अलग-अलग डोज से अलग-अलग प्रभाव तो नहीं आ रहे हैं?
यह बहुत विस्तृत जांच थी। छह महीने केवल इसी काम में लग गए। उसके बाद लगभग एक महीना इसके विश्लेषण में लगा क्योंकि आंकड़े बहुत सारे थे। toxicology के आंकलन में सबसे पहला parameter वजन माना जाता है। हमने देखा कि २८ दिन तक दवा खिलाने से जानवरों के वजन में परिवर्तन तो नहीं हो रहा? क्योंकि पहला मार्कर यही है कि उनका खाना-पीना अगर खराब है या वे सही प्रकार से जी नहीं पा रहे हैं तो उनके शरीर का वजन कम हो जाता है, जो कि हम एनिमल्स में सामान्यत: देखते हैं। गिलोय के केस में अब तक एक हजार मिलीग्राम/किलोग्राम डोज पर भी किसी भी चूहे का वजन कम नहीं हुआ था। किसी भी चूहे में न मृत्यु पायी गयी और न ही उनके खानपान में  बदलाव पाया गया। जो सामान्य चूहे थे, वो अपने हिसाब से खा रहे थे और गिलोय का कोई भी दुष्प्रभाव उन पर नहीं था। उनके खाने में कोई भी दिक्कत नहीं आई थी।
यहाँ अध्ययन केवल सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया गया था। इन जानवरों में हमने कोई बीमारी पैदा नहीं की थी। न ही ये चूहे मोटे थे। इनको मधुमेह भी नहीं था। ये बिलकुल स्वस्थ व सामान्य चूहे थे जिन्हें कोई भी दिक्कत नहीं थी। उसके बाद हमने इनके महत्वपूर्ण अंगों पर होने वाले प्रभाव का अध्ययन किया। हमारे पांच बड़े महत्वपूर्ण अंग जो शरीर के मूलभूत ऑर्गन माने जाते हैं वे हैं- मस्तिष्क, हृदय, फेफड़े, लीवर और किडनी। इन पांचों को व्हाइटल ऑर्गन्स कहा जाता है।
व्हाइटल ऑर्गन्स में नर और महिला दोनों पर हमने अलग-अलग अध्ययन किया। हमने इनको १००, ३०० और १००० मिलीग्राम/किलोग्राम गिलोय के सत्व की डोज दी। जो नॉर्मल चूहे थे और जो ट्रीटेड चूहे थे इनके किसी भी व्हाइटल ऑर्गन्स में कैसा भी कोई चेंज नहीं पाया गया, यह एक बड़ी बात थी। क्योंकि पहले जो रिपोर्ट आई थी उसके अनुसार गिलोय के प्रयोग से लीवर के फंक्शन खराब होना बताया गया था।
इसमें इतनी ज्यादा डोज में भी लीवर में आर्किट्रक्चरल कोई चेंज नहीं पाया गया, हिस्टोपैथोलॉजिकल रूप से वो बिलकुल ऐसे थे जैसे कि अनट्रीटेड चूहे थे।
उसके बाद हमने इनके सेक्स ऑर्गन्स का अध्ययन किया। हमने पाया कि मेल्स में टेस्टिस, एपिडिडीमिस, प्रोस्टेट, सेमिनल वेसिकल्स और फिमेल्स में ओवरी, ओविडक्ट, यूट्रस, सर्विक्स, वजाइना, मेमोरी ग्लैंड आदि में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। हमने इन्डोक्राइन व एक्सोक्राइन ग्लैंड पर भी अध्ययन किया।
इस बार हमने डिटेल स्टडी की क्योंकि हमें यह स्थापित करना था कि इस औषधि के इस्तेमाल से किसी भी प्रकार का परिवर्तन या दुष्प्रभाव नहीं है। उस डिटेल लेवल की स्टडी में हमने देखा कि इन ग्लैंड के हिस्टोपैथोलॉजी में किसी टाइप का भी चेंज नहीं पाया गया। फिर हमने स्किन पर, स्पाइनल कॉर्ड पर, साइटिका नर्व पर, आँखों पर तथा आँखों के साथ ऑप्टिक नर्व पर भी हिस्टोपैथोलॉजिकल अध्ययन किया। इसके साथ ट्रेकिया जहाँ हमारे विंड पाइप हैं, जो लंग्स तक हमारे हवा पहुँचाने वाले ट्यूब हैं, इनमें भी मेल और फीमेल दोनों एनिमल्स पर किसी भी तरह के एडवर्स इफेक्ट, कोई भी साइड इफेक्ट, कोई भी स्ट्रक्चरल चेंज नहीं पाए गए और फिर अलग-अलग की-ऑर्गन, ऐओर्टा जो एक बड़ी खून को ले के जाने वाली ट्यूब है, जो सीधे हार्ट को कंनेक्ट करती है, यूरिनरी ब्लैडर, स्कैटल मसल्स, जो हमारी बाइसेप्स मसल्स हैं, फेमर बोन जॉइंट और स्टरनम जो छाती की बड़ी वाली हड्डी है, बोन मेरो आदि इन सबको भी हमने अलग-अलग तरीके से प्रोसेस कर अध्ययन किया और यह देखा कि कहीं कैसा भी कहीं भी छोटी सी कोई ऐसी फाइंडिंग तो नहीं है, कोई एडवर्स इफेक्ट्स तो नहीं हैं। हमें इस पूरे केस में गिलोय का मेल और फीमेल दोनों जेंडर्स में कहीं भी किसी भी तरह का साइड इफेक्ट नहीं पाया गया। अध्ययन में यह पाया गया कि गिलोय की हाई डोज को 28 दिन तक लेने के बावजूद यह सब सुरक्षित थे और यह बड़ी बात है। क्योंकि टॉक्सिकोलॉजी स्टडीज में पानी भी ज्यादा पियो तो टॉक्सिक हो जाता है। पानी या ऑक्सीजन भी ज्यादा जाए तो टॉक्सिक हो जाता है, घी भी ज्यादा खाओ तो टॉक्सिक हो जाता है, अमृत भी ज्यादा ले लो तो जहर का काम करता है और जहर थोड़ा खाओ तो दवा का काम करता है। जीवन के तत्व बड़े गहरे हैं।
कुछ लोगों की शिकायत है कि जब गिलोय खाते हैं तो उनके पेट में थोड़ी सी जलन होती हैै। इस बार हमने डिटेल में गट सिस्टम का हिस्टोपैथोलॉजी किया। गले से लेकर नीचे तक परीक्षण किया कि कहीं अल्सर तो नहीं हो रहा है? कोई एसिडिटी तो नहीं हो रही? छोटी आंत, स्टोमक, ज्यूजिनम, बड़ी आंत, इलियम के आलू के चिप्सनूमा स्लाइस काटकर उनको stain  करके हर एक टिश्यू को अलग तरीके से देखा और तीनों डोज पर दोनों जेंडर के अंदर कोई भी कैसी भी फाइंडिंग हमें एलिमेंट्री कैनाल में नहीं मिली।
पहले जो अध्ययन हम 30 अंगों पर करते थे इस बार वह 44 अंगों पर किया। ऊपर से नीचे तक सभी कुछ आ गया इसमें। पिट्यूटरी ग्लैंड से लेकर आँख, कान, दिमाग, लीवर, किडनी, लंग, हार्ट, आँते सब कुछ ले लिया। आंतों के आठ अलग-अलग हिस्से लिए। हड्डियां, बोन मैरो, ब्लड के सारे कम्पोनेंट सब कुछ ले लिया और इसके साथ-साथ पूरा डायग्रोस्टिक टेस्ट किया जिसको हम बॉयो कैमिकल मार्कर कहते हैं, लिपिड प्रोफाइल, किडनी प्रोफाइल आदि।
जितने भी हार्ट के फंक्शन्स हैं, पूरे blood count,  WBC, RBC, सही पाए गए। इस प्रकार यह एक बड़ी study थी जिसमें दोनों जेंडर्स पर क्लिनिकल, कैमिकल और Hiptopathological markers पर जांच हुई। उसके पश्चात एक joint data set तैयार हो गया और उसको आगे लेकर गए और इस अध्ययन को हाल ही में विश्वप्रसिद्ध शोध पत्र frontier in pharmocology  में प्रकाशित किया गया है।
यह गिलोय को लेकर taxological study का पहला अनुसंधान (finding) है, जहाँ हमनें बताया कि 28 दिन तक GLP टॉक्स के तहत यह drug completly safe है।
इसका NOEL जो एक technically word आता है, 100mg/kg पाया गया जो इस guideline के हिसाब से हमारी top dose थी। हमनें दिखाया कि यह औषधि या extract बिल्कुल safe है और preclinically इसको comfortable मानेंगे।
यह बहुत बड़ी बात है। योग, यज्ञ, आयुर्वेद, नेचुरोपैथी, सनातन संस्कृति, भारत तथा भारतीयता के जो विरोधी हैं, वे हमारी अच्छी चीजों को भी गलत ढंग से प्रेजेंट करके, हमारे वेद के मन्त्रों, को, शास्त्रों के सूत्रों को, श्लोकों को, हमारी चौपाइयों को, हमारे जीवन मूल्यों को, बहुत गलत तरीके से बात करते हैं और उनको गलत साबित करने की कोशिश करते हैं। जिस पाप अधर्म को वह जी रहे हैं उस अधर्म को धर्म कह कर, अच्छे को बुरा और बुरे को अच्छा कह कर, पाप को पुण्य, पुण्य को पाप कह कर और उसको कुचलने का षड्यंत्र करते हैं, बहुत तरह की चीजें चलती हैं, यद्यपि गिलोय के ऊपर यदि कुल मिलाकर देखा जाए तो 100 से ज्यादा रिसर्च कर चुके हैं। अलग-अलग बीमारियों में, कोरोना में क्या असर है? अस्थमा में क्या असर है? उसका immunity पर उसका क्या असर है? उसका मोटापे पर क्या असर है? उसका शुगर पर क्या असर है? कैंसर पर क्या असर है? आँवला, एलोवेरा, गिलोय, तुलसी, नीम, हल्दी, गोधन, यह सब सप्तामृत हैं। इन पर हमने बहुत शोध किया है।
frontier in pharmocology में प्रकाशित जब यह पेपर जब आचार्य श्री के facebook पेज पर post किया तो काफी लोगों ने उसको like किया, काफी लोगो ने follow up किया। कुछ लोगों ने अपने अच्छे comments भी दिए। एक सज्जन का comment था आप गिलोय की toxology के बारे में बता रहे हैं, effects के बारे में नहीं बता रहे हैं, इसका फायदा क्या होता है? वो भी तो बताइये। यह आलरेडी पब्लिक डोमेन में है।
एक study हमने कोविड के समय गिलोय पर की थी जिसमें हमने zebra fish के मॉडल में कोरोनिल के साथ-साथ गिलोय घनवटी का इस्तेमाल करके बताया कि गिलोय के इस्तेमाल से कोविड के वायरस के संक्रमण को, उसके expression को और उसके शरीर पर प्रभाव को नियंत्रित किया जा सकता है।
यह दिखाने के लिए Humanized Zebra Fish Model का प्रयोग किया गया है। जेबरा फिश के अंदर जो swim bladder है जिसमें हवा भरी होती हैं उसको convert  किया और उसको ह्युमन लंग्स के रूप में प्रयोग किया। उसके अंदर human lungs के cells को inject करके उनको ह्युमन आईजिनोग्राफटीड animals बनाया और फिर हमनें sars-cov-2 वायरस के spike protein को inject करके कोविड जैसे symptom उन symptom में पैदा किए। जब वो symptom तैयार हो गए तो उनको गिलोय घनवटी के हमने 3 अलग-अलग डोज दिए, जो human relevent dose के एक तिहाई थे और human relevent dose के 3 गुणा थे। हमने 3 तरीके के उसको देखने का प्रयास किया और पाया कि जब-जब जिन-जिन animals को हमने यह औषधि दी तो उनके अंदर जो भी functionality थी, जो भी disease dependent marker थे, वो सब सामान्य होने शुरू हो गए। सूजन कम हो गयी, inflammatory cells infection कम हो गया और उसके साथ-साथ ऐसा भी हमको देखने को मिला कि जो ऐसे cells थे जिनकी वजह से inflammation आता है उनका concentration change हुआ। हमने यह भी पाया कि कोविड के संक्रमण से Zebra Fish में जो बुखार आ रहा था, वह भी गिलोय घनवटी ने Dose Dependent तरीके से कम किया।
यह एक pharmicological activity थी और इसके साथ-साथ हमने देखा कि जिन-जिन animals में कोविड वायरस के spike protien थे, उनमें death आनी शुरू हो गयी थी। वो animal 10 दिन के अंदर लगभग 25-30% मरने शुरू हो गए थे। उन death की recovery भी गिलोय घनवटी ने की। यह स्टडी भी हमने पिछले वर्ष frontier in phamocolgy में प्रकाशित की थी।
 

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