शीतऋतु में होने वाले मुख्य रोग तथा उनके निवारण
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डॉ. दयाशंकर एवं डॉ. विशाला काला
पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार
आयुर्वेद के अनुसार 'शीर्यते इति शरीरम्’, अर्थात् जो क्षण-प्रतिक्षण क्षीण होता जाए, उसे शरीर कहते हैं। शरीर को व्याधि मुक्त रखना, उत्पन्न हुई विभिन्न व्याधियों का निवारण करना एवं स्वास्थ्य की स्थिति को बनाए रखना आयुर्वेद का मुख्य प्रयोजन है। मात्रापूर्वक आहार सेवन, ऋतुचर्या-दिनचर्या एवं सद्वृत्त के पालन से ही स्वास्थ्य रक्षण किया जा सकता है। |
आयुर्वेद सिद्धान्त 'यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे’ के अनुसार इस ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी है, वही हमारे शरीर में भी है। इसलिए लोक/ब्रह्माण्ड में होने वाले परिवर्तनों के अनुसार ही शरीर में भी परिवर्तन किए जाने चाहिए।
एक वर्ष में छ: ऋतुओं का वर्णन है, इस ऋतुओं के अनुसार ही आहार-विहार का पालन करने से बल एवं वर्ण की प्राप्ति होती है एवं ऋतु परिवर्तनजन्य व्याधियों से बचा जा सकता है। एक वर्ष में दो कालों का वर्णन है- आदानकाल एवं विसर्गकाल। आदानकाल में- शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म ऋतु एवं विसर्गकाल में- वर्षा, शरद, हेमन्त ऋतु होती हैं। इसमें से हेमन्त ऋतु का काल लगभग मध्य नवम्बर से मध्य जनवरी रहता है।
हेमन्त या शीत ऋतु में सामान्य परिचर्या
शीत ऋतु के लक्षण
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इस ऋतु में शीत हवाएँ चलती हैं। जिसके कारण ठण्डी व शीत बढऩे लगती है।
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शीतल वायु जब शरीर का स्पर्श करती हैं तो वायु के स्पर्श से शरीर के बाहर निकलने को उद्धत उष्मा शरीर के भीतर ही अवरूद्ध होकर रह जाती है, जिससे प्राणियों की जठराग्रि प्रदीप्त हो जाती है। शीत एवं शीत वायु से वात एवं कफ दोनों की वृद्धि होती है जिससे अत्यधिक भूख लगती है जिसके फलस्वरूप बल की वृद्धि होती है।
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इस ऋतु में मधुर रस एवं पृथ्वी तथा जल महाभूत युक्त आहार का सेवन करना चाहिए। इस ऋतु में मात्रापूर्वक एवं गुरु-स्निग्ध आहार का सेवन करना चाहिए।
हेमन्त ऋतु में पथ्य-आहार
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मीठे फल, अम्ल, लवण, गुरु, स्निग्ध आहार सेवन।
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आँवला, अंजीर, सेब, नींबू, संतरा, कीनू, पालक, कद्दू, चौलाई, मेथी, गोभी, गाजर, मक्का।
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नया चावल, चने का आटा, उड़द, कुलथ, मूँग दाल।
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आँवले व गन्ने का जूस।
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हलवा, घृत, दूध, मक्खन, दही, तैल, अंकुरित अनाज।
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सूखे मेवे, बादाम, काजू, पिस्ता, अंजीर, मखाने।
हेमन्त ऋतु में पथ्य-विहार
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प्रतिदिन गरम जल से स्नान।
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पीने के लिए भी गरम पानी का प्रयोग।
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उष्ण/गरम कपड़े पहनना, शीत हवा से बचना।
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शिर व पूरे शरीर में गरम तेल से मालिश।
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धूप में बैठना।
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व्यायाम करना।
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पंचकर्म में अभ्यंग, पादाभ्यंग, नस्य, उद्वर्तन, पिडिचिल।
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लेपनार्थ- अगरु का लेप लगाएँ।
हेमन्त ऋतु में अपथ्य
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लघु एवं शीत/वातवर्धक आहार-विहार का सेवन न करें।
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कम आहार न खाएँ, डाइटिंग न करें।
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कोल्ड ड्रिंक्स, आईसक्रीम, सत्तू व फ्राइड फूड का सेवन न करें।
हेमन्त या शीत ऋतु में सामान्य परिचर्या :
शीत ऋतु में हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, अस्थमा, संधिवात, तथा त्वक् विकार आदि मुख्य रोग हैं। इनके लक्षण, कारण व उपाय निम्र प्रकार हैं-
हृदय रोग एवं उच्च रक्तचाप
हृदय प्राणों का आधार माना गया है। आयुर्वेद में हृदय को त्रिमर्म का स्थान दिया गया है। वह प्राणवह एवं रसवह स्रोतों का मूल है। जब वातादि दोष हृदय में स्थित होकर रस धातु को दूषित कर हृदय के कार्यों में बाधा उत्पन्न करते हैं तो हृदय रोगों की उत्पत्ति होती है।
हेमन्त ऋतु में ठण्ड अत्यधिक होने के कारण वात एवं कफ की वृद्धि होती है, जिससे धमनियों के कफ का संचय होता है। कारणवश 'धमनीप्रतिचय’- Atherosclerosis & Narrowing of Blood Vessels होता है। फलस्वरूप हृदय रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। बाह्य ताप के कम होने से शरीर की धमनियों में आकुंचन (Vasoconstriction) होता है जिससे रक्त प्रवाह बढऩे से रक्तचाप बढ़ जाता है।
रोग के कारण
धूम्रपान करना, अति चिन्ता करना, अतिश्रम, तनाव, अत्यधिक लंघन, गुस्सा करना, अति तीक्ष्ण, उष्ण, अम्ल व मसालेदार भोजन व लवण रस का सेवन करना, अत्यधिक धूप में चलना।
रोग के लक्षण
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छाती में भारीपन होना, असुविधा या दर्द होना।
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थोड़ा चलने या बैठने पर साँस फूलना।
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अनियमित हृदय की धड़कन बढऩा तथा चक्कर आना।
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अरुचि, मुख का स्वाद खराब हो जाना।
उपाय
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धूम्रपान का त्याग करना।
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चिन्ता एवं क्रोध न करना।
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तला-भुना व चिकने आहार का सेवन न करना।
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लघु व्यायाम तथा जॉगिंग करें।
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लौकी स्वरस में काली मिर्च मिलाकर नियमित प्रयोग करें।
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अनुलोम-विलोम, कपालभाति, भस्त्रिका, भ्रामरी, गोमुखासन, भुजंगासन, पद्मासन तथा शवासन का नियमित अभ्यास करना।
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औषध योग
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दिव्य मुक्तावटी, हृदयामृत वटी, अर्जुन क्वाथ, अर्जुनारिष्ट, त्रिकटु चूर्ण, पंचकोल चूर्ण, मुक्ता पिष्टी, संगेयाशव पिष्टी, अकीक पिष्टी, प्रभाकर वटी, योगेन्द्र रस, जहरमोहरा पिष्टी इत्यादि।
पंचकर्म चिकित्सा
शिरोधारा, सर्वांग मृदु अभ्यंग व हृदय बस्ति का प्रयोग।
संधिगत वात (अर्थराइटिस)
आयुर्वेद में अर्थराइटिस को संधिगत वात से जाना जाता है। यह एक धातुक्षयजन्य व्याधि है, जिससे हमारे दैनिक कार्यों में बाधा उत्पन्न होती है। वर्तमान समय में वृद्ध ही नहीं अपितु युवावर्ग भी इस रोग से पीडि़त है। संधिगत वात वात-व्याधि का भेद है। यह वातदोष के अधिक प्रकुपित होने से होता है। हेमन्त ऋतु में अत्यधिक शीत होने के कारण वातदोष की वृद्धि होती है, जिसके फलस्वरूप संधियों में वेदन, जकड़ाहट अधिक होने लगती है। अर्थराइटिस के रोगी को विशेषकर इस ऋतु में अधिक कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
लक्षण
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घुटनों एवं शरीर के जोड़ों में पीड़ा होना।
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जोड़ों में सूजन तथा लालिमा आना।
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संधियों में भारीपन तथा आकुंचन व प्रसारण के समय अत्यधिक शूल होना।
अपथ्य
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अति शीत आहार- कोदो, यव, शीतल जल।
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राजमा, छोले, कटहल, उड़द इत्यादि।
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अत्यधिक व्यायाम, चलना।
उपाय
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शीत ऋतु में बहने वाली प्राग्वात (पूर्वी हवा) से बचें।
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अति व्यायाम, अत्यधिक चलना, अत्यधिक सीढ़ी चढऩा, घुटनों के सहारे बैठना बंद करें।
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आहार में घृत, दूध तथा स्निग्ध भोजन, वृंहण करने वाले आहार का सेवन करें।
औषध योग
दिव्य पीड़ांतक क्वाथ, महारास्नादि क्वाथ, निर्गुण्डी क्वाथ, दशमूल क्वाथ, दिव्य वातारि चूर्ण, अश्वगंधा चूर्ण, स्वर्णमाक्षिक भस्म, एकांगवीर रस, महावातविध्वंसक रस, वृह्तवातचिन्तामणि रस, योगराज गुग्गुल, महायोगराज गुग्गुल, लाक्षादि गुग्गुल, पीड़ांतक वटी, दशांग लेप, पीड़ांतक तेल, महानारायण तेल।
पंचकर्म
जोड़ों पर उपनाह का प्रयोग, एरण्ड पत्र पर सैंधव लवण, हल्दी तथा अजवायन लगाकर जोड़ों पर उपनाह बाँधें। जानुबस्ति, पत्रपोटली स्वेद इत्यादि। तेल से जोड़ों की मालिश करें।
योग-प्राणायाम
प्राणायाम- अनुलोम-विलोम, भस्त्रिका, कपालभाति।
आसन- भुजंगासन, पश्चिमोत्तानासन, घुटनों के सूक्ष्म व्यायाम, भद्रासन, मत्स्येन्द्रासन इत्यादि।
अस्थमा
अस्थमा प्राणवह स्रोतों में अवरोध उत्पन्न होने से नियमित रूप से होने वाली श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया में बाधा से होने वाला रोग है। शीत/हेमन्त ऋतु में शीत के अधिक बढ़ जाने से वात एवं कफ की वृद्धि हो जाती है। छाती में कफ बढ़ जाता है जो कि वायु के मार्ग को अवरुद्ध कर देता है। इससे साँस लेने में कठिनाई होने लगती है।
अस्थमा रोग के लक्षण
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साँस लेने में कष्ट के साथ बार-बार खाँसी का होना।
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छाती में पीड़ा होना।
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श्वास फूलने के कारण बोलने में कठिनाई होना।
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खाँसते समय कफ का निकलना तथा कफ निकलने पर आराम मिलना।
अस्थमा का कारण
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अवश्याय- ओस में घूमना, पूर्वी हवा का सेवन।
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धूल, पोलन ग्रेन, स्मोग तथा प्रदूषण इत्यादि।
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अत्यधिक शीतल आहार जैसे आइसक्रीम तथा कोल्ड ड्रींक्स का प्रयोग।
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ए.सी. का अत्यधिक प्रयोग।
अस्थमा से बचाव
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ओस, धूल, स्मोग तथा प्रदूषण से बचने के लिए मास्क का प्रयोग करें।
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शीतल आहार-विहार का सेवन न करें।
अस्थमा का आयुर्वेदिक उपचार
अस्थमा में श्वासारि क्वाथ, मुलेठी क्वाथ, दशमूल क्वाथ, श्वासारि रस, सितोपलादि चूर्ण, त्रिकटु चूर्ण, गोदन्ती भस्म, अभ्रक भस्म, श्वासारि प्रवाही, लवंगादि वटी, च्यवनप्राश अवलेह व वासा अवलेह इत्यादि अत्यंत उपयोगी औषधियाँ हैं।
योग-प्राणायाम
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जलनेति का नियमित प्रयोग, अनुलोम-विलोम, बद्धकोनासन, कपालभाति, नाड़ी शोधन, उष्ट्रासन, धनुरासन इत्यादि।
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पंचकर्म
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विरेचन का प्रयोग, छाती पर सैंधव लवण + तेल की मालिश कर नाड़ी स्वेदन
त्वक् विकार (त्वचा रोग)
त्वक् विकार का मुख्य कारण रक्त की दुष्टि है। रक्त एवं पित्त दोनों के गुणधर्म एक समान होते हैं। अत: शरद ऋतु में पित्त की दुष्टि होने से प्रकोप होने से रक्त की भी दुष्टि होती है और अनेक रक्तदुष्टि जन्य त्वक् रोगों की उत्पत्ति हाती है। यदि शरद ऋतु में उन रोगों का निवारण नहीं किया जाए तो वह शीत ऋतु में अधिक बढ़ जाती है।
त्वक् रोग के लक्षण
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त्वचा में शुष्कता आना, दाह, लालिमा तथा पाक होना।
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त्वचा में कण्डू होना, चकत्तों का उत्पन्न होना, स्फोट होना।
त्वक् रोग के कारण
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अत्यधिक पित्तवर्धक आहार-अम्ल, उष्ण तीक्ष्ण मसालेदार भोजन करना तथा भोजन के न पचने पर भी भोजन करना।
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अति भोजन करने के बाद व्यायाम करना।
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नमकीन-खट्टे एवं मीठे भोज्य पदार्थों का एक साथ सेवन।
त्वक् रोग हेतु उपाय
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त्वचा में किसी प्रकार का केमिकल, रंग इत्यादि का प्रयोग न करें। अनावश्यक क्रीम इस्तेमाल न करें।
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धूल, मिट्टी से एलर्जी होने से बचें।
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तंग कपड़े न पहनें तथा पसीने से बचें।
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तिक्त घृत पान करना चाहिए।


