अन्य देशों की लूट पर ही टिके हैं यूरोपीय नेशन स्टेट

अन्य देशों की लूट पर ही टिके हैं यूरोपीय नेशन स्टेट

प्रो. कुसुमलता केडिया

     भारत के शिक्षित समुदाय में यह बड़ी भ्रांति फैली है कि शायद अपनी ही बौद्धिक क्षमता से यूरोप के राजनैतिक चिंतन का विकास हुआ है। परंतु सत्य इससे भिन्न है। वहाँ निरंतर विश्व के अन्य समाजों से अपनी अन्त:क्रिया के परिणामस्वरूप राजनैतिक चिंतन विकसित होता और बदलता रहा है। संसार के अन्य देशों के सम्पर्क में आने पर ही यूरोप में चर्च के पैशाचिक नियंत्रण से लड़ते हुये लोगों ने चर्च को सीमित करने के उपाय निकाले। इसके बाद भारत जैसे राष्ट्र के विशाल राज्यों को देखकर पहली बार उन्हें बड़े राज्य बनाने का विचार आया। सर्वप्रथम बिस्मार्क ने एक बड़ा जर्मन नेशन स्टेट बनाया। उसके बाद इंग्लैंड तथा अन्य नेशन स्टेट भी विकसित हुये। विश्व के सम्पर्क में आने के बाद उन्होंने अपने यहाँ उन्हीं विचारों को अपनी एक रंगत दी। इस प्रक्रिया में से नेशन स्टेट पहली बार लगभग 150 वर्ष पूर्व ही यूरोप में विकसित हुये हैं। नेशन स्टेट का विकास चर्च से लड़ते हुये ही हुआ है। वैज्ञानिकों तथा अन्य प्रबुद्ध लोगों ने चर्च की आधारभूत मान्यताओं को असत्य सिद्ध किया और तब चर्च को केवलफेथके दायरे तक सीमित कर दिया गया तथा बौद्धिक दृष्टि से राजनैतिक चिंतन विकसित होता रहा।
डार्विन ने चर्च की मान्यताओं की धज्जियाँ उड़ा दीं
चार्ल्स डार्विन ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथओरिजिन ऑफ स्पेसीजलिखा। जिसने चर्च की समस्त मान्यताओं की धज्जियाँ उड़ा दी और प्रतिपादित किया कि मनुष्य का विकास वानर और वनमानुषों से हुआ है। इससे विक्टोरिया युग में किया गयाअंग्रेजों के श्रेष्ठ नस्लहोने के दावे की किरकिरी हो गई और वह उपहास का विषय हो गया। सम्पूर्ण चर्च डार्विन के विरोध में हो गया। डार्विन के समर्थक और विरोधियों में भारी कलह मची। इसके बाद जॉन स्टुअर्ट मिल ने अपने प्रसिद्ध निबंधलिबर्टीमें मानवीय स्वाधीनता का प्रबल आग्रह किया। उन्होंने व्यक्ति की स्वाधीनता को पवित्र घोषित किया और नैतिक मर्यादाओं में रहते हुये व्यक्ति की स्वाधीन इच्छाशक्ति के लिये भरपूर अवकाश दिये जाने की वकालत की।
इंग्लैंड ऐसे बना नेशन स्टेट
इसी समय इतालवी लोगों ने अपना स्वाधीनता संग्राम चलाया। संयुक्त राज्य अमेरिका में भी प्रचंड गृह युद्ध फैल गया। इंग्लैंड में गुलामों को ढ़ोने के लिये बड़े जहाज बनाने का निर्णय लिया गया और उससे संयुक्त राज्य अमेरिका के दास प्रथा के समर्थकों को भारी मदद दी गई। बिस्मार्क ने जब डेनमार्क का एक हिस्सा जर्मनी नेशन स्टेट में मिला लिया तब इंग्लैंड में बहुत से लोगों ने मांग की कि हमें डेनमार्क का साथ देना चाहिये। परंतु प्रधानमंत्री पॉमर स्टोन ने असमर्थता दिखाई। जर्मनी की प्रतिस्पर्धा में इंग्लैंड के सम्पन्न लोगों ने भी इंग्लैंड को एक नेशन स्टेट बनाने का विचार किया और 1865 से 1874 के बीच पास किये गये कई विधेयकों के द्वारा इंग्लैंडनेशन स्टेटकी हैसियत में पहुंच गया।
वोट का सीमित अधिकार
1865 ईस्वी तक इंग्लैंड में केवल धनियों को ही वोट देने का अधिकार प्राप्त था। वहाँ के गरीब लोग हर चुनाव के समय दंगे करते थे और धनियों को लूटते थे। चुनाव खुलेआम होते थे और गुप्त मतदान का कोई प्रावधान नहीं था। गरीब लोग इस या उस प्रत्याशी के मत में प्रदर्शन और उत्पात करते थे। इसके एवज में उन्हें कुछ खाने-पीने को मिल जाता था। जब अमेरिका में छिड़े गृहयुद्ध के कारण भारी मात्रा में कपास की आपूर्ति बंद हो गई तो लंकाशायर और मैनचेस्टर की मिलों में हडक़ंप मच गया और शहरों में उपद्रव होने लगे। इस दौर कोकपास के अकाल का दौर’(कॉटन फेमीन) कहा गया। इसी अवधि में प्रत्येक वयस्क पुरूष को मताधिकार देने की मांग ने जोर पकड़ा। इंग्लैंड के अनेक प्रमुख राजनीतिज्ञ आये दिन दल बदलने लगे। विलियम ग्लेडस्टोन पहले टोरी थे, बाद में लिबरल हो गये। इसी प्रकार बेंजामिन डिजराइली ने भी पार्टियां बदलीं। डिजराइली एक यहूदी थे परंतु बचपन में ही ईसाई बना दिये गये थे। वे परंपरागत व्यवस्था के प्रबल पक्षधर थे। डिजराइली और ग्लेडस्टोन में प्रचंड राजनैतिक प्रतिस्पर्धा चली। डिजराइली का भी मत था कि कमाऊ और समृद्ध व्यक्ति को ही वोट देने का अधिकार होना चाहिये। क्योंकि वे ही जिम्मेदार नागरिक होते हैं। साथ ही आयकर दाताओं और विश्वविद्यालय के स्नातकों, वकीलों और डाक्टरों को दो-दो वोट देने का अधिकार होना चाहिये। जबकि ग्लेडस्टोन की मांग थी कि केवल एक व्यक्ति को एक वोट ही देना चाहिये। अंत में डिजराइली ने ग्लेडस्टोन के तर्कों को स्वीकार किया और इंग्लैंड के प्रत्येक सम्पन्न पुरूष को एक-एक वोट देने का अधिकार दिया गया। गरीबों और स्त्रियों को वोट का अधिकार तब भी नहीं दिया गया था।
इंग्लैंड को क्यों बनाया गया यूनाइटेड किंगडम
इस बीच आयरलैंड में किसानों का आंदोलन तेज हो गया और वे भूमि पर स्वामित्व दिये जाने के लिये आंदोलन करने लगे। इंग्लैंड की सेना ने जब उनका दमन किया तब सैनिकों और किसानों में जगह-जगह झड़पें होने लगीं। अंतत: बलपूर्वक आयरलैंड को कुचलकर उसे इंग्लैंड का हिस्सा बना लिया गया। परंतु तब भी आयरिश लोगों में इतना दम था कि उन्होंने इंग्लैंड के साथ जो साझा राज्य बना उसमें अपनी अलग पहचान मान्य करने को विवश कर दिया। इस प्रकार इंग्लैंड और आयरलैंड की अलग-अलग पहचान बनी रही। इसी प्रकार स्काटलैंड के लोगों की भी अलग पहचान बनी रही और अंत में 123 द्वीपसमूहों वाला जो युनाइटेड किंगडम बना है उसमें इंग्लैंड, आयरलैंड और स्काटलैंड की अलग-अलग पहचान कायम है। तीनों अपने को अलग-अलग नेशन मानते हैं। इसीलिए उसे संयुक्त राज्य कहा गया है। कोई एक नाम आज तक नहीं दिया गया है, देना संभव भी नहीं है। उस अर्थ में यू.के. एक राष्ट्र नहीं है अपितु तीन राष्ट्रों का एक साझा राज्य है।
निरंतर कलह और युद्ध
18वीं शताब्दी ईस्वी के आरंभ से पहले फ्रांस और इंग्लैंड तो आपस में लड़ ही रहे थे, इंग्लैंड और आयरलैंड तथा इंग्लैंड और स्काटलैंड भी आपस में लड़ रहे थे। उधर, स्वयं इंग्लैंड के भीतर कैथोलिकों और प्रोटेस्टेंट में लगातार लड़ाइयाँ हो रही थीं। फ्रांस के लुई चौदहवें का इंग्लैंड के राजा विलियम से भयंकर युद्ध हुआ और हालैंड तथा नीदरलैंड के राजाओं से भी इन लोगों की भारी लड़ाइयाँ हुईं। ये लड़ाइयाँ तब तक कोई राष्ट्रीय सेनाओं की लड़ाइयाँ नहीं थीं अपितु अलग-अलग जागीरदारों की लड़ाइयाँ थीं।
20वीं शताब्दी ईस्वी में बने नेशन स्टेट के बाद संबंधित क्षेत्रों के प्राचीन झगड़ों को भी नये नेशन स्टेट से ही संबोधित किया जाने लगा। परंतु सत्य यह है कि इंग्लैंड का शासक बनने के पहले विलियम दक्षिणी फ्रांस की एक जागीर ऑरेंज के जागीरदार थे और इसी प्रकार डच नेशन के दो अलग-अलग राज्य थे- हॉलैंड और नीदरलैंड। इनमें भी परस्पर युद्ध चल रहे थे।
19वीं शताब्दी ईस्वी के आरंभ में ही ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैंड के राजाओं ने आपस में मिलकर साझा शासन का निर्णय लिया और उसे युनाइटेड किंगडम का नाम दिया। इंग्लैंड के उकसावे पर 1803 ईस्वी में सऊदी अरब के एक छोटे से इलाके के वहाब जागीरदार ने मक्का और मदीना पर कब्जा कर लिया और पूरे क्षेत्र का नाम सऊदी अरब रख दिया। 1804 ईस्वी में फ्रांसिस प्रथम ने ऑस्ट्रिया साम्राज्य की स्थापना की। 1805 ईस्वी में फ्रांस और स्पेन के समुद्री बेड़े आपस में लड़ मरे और अंत में भारतीय जहाजों की श्रेष्ठता के कारण ब्रिटेन ने फ्रांस और स्पेन दोनों को हरा दिया। इसी समय इजिप्त मिश्र पर भी ब्रिटिश प्रभाव बढ़ता गया और इजिप्त के मुहम्मद अली ने अपने राष्ट्र के आधुनिकीकरण की घोषणा की।
भारत के ज्ञान भंडार से प्रेरित होकर खुली पहली यूनिवर्सिटी
इस बीच जर्मनों ने भारत से हजारों मूल्यवान ग्रंथ तथा दस्तावेज प्राप्त कर अपने देश ले जाने का काम किया और फिर पहली बार बर्लिन में 1810 ईस्वी में एक छोटी सी यूनिवर्सिटी खोली गई जो वस्तुत: भारतीय प्राचीन विश्वविद्यालयों से ही प्रेरित थी और 1850 तक इसमें एक उल्लेखनीय आकार ले लिया। जिसमें लगभग 100 विद्यार्थी पढ़ रहे थे। इसी बर्लिन विश्वविद्यालय से पढक़र हीगल, बिस्मार्क और कार्लमाक्र्स निकले। जर्मनों ने पहली बार भारत में बड़े राज्य देखे और यह जानकारी जर्मनी में फैलाई। इसकी प्रेरणा से 1871 ईस्वी में बिस्मार्क ने जर्मनी की 300 जागीरों का विलय कर पहली बार जर्मन नेशन स्टेट की स्थापना की घोषणा की। इसकी प्रतिस्पर्धा में कुछ समय बाद यू.के. भी एक नेशन स्टेट बनने की प्रक्रिया में आगे बढ़ा। उसके पहले तक यू.के. एक नेशन स्टेट नहीं था।
तलवार और धनुष से ही लड़ा गया 19वीं शताब्दी का पहला युद्ध
19वीं शताब्दी ईस्वी में ही यूरोप में पहली बार बंदूक बनाई गई। जब नेपोलियन ने यूरोप को जीतने के लिये युद्ध किया था तो उसकी सेना में थोड़ी सी ही तोपें थीं। अधिकांशत: धनुषबाण और तलवार ही उस युद्ध में काम में लाये गये थे। 1814 ईस्वी में पहली रिवाल्वर भी बनी। 1816 ईस्वी में सम्पूर्ण यूरोप में भयंकर शीतलहरी फैली और उस वर्ष सम्पूर्ण यूरोप में ग्रीष्म ऋतु आई ही नहीं। तब तक बिजली का अविष्कार नहीं हुआ था। इसलिये यूरोप के लाखों लोग ठंड और भुखमरी से मर गये।
युद्धों और एजेंट्स के द्वारा राज्य का विस्तार
इस बीच इंग्लैड के सबल समुदायों ने और लूटपाट में निपुण व्यापारियों ने तथा अन्य यूरोपीय लोगों ने भी यूरोप से बाहर के लोगों को लूटनेे के तरीके जान लिये थे और हर जगह उसका प्रयोग कर रहे थे। इंग्लैंड तथा इटली की प्रेरणा से चीन में एक नये ईसाई बने व्यक्ति ने घोषणा की कि वह ईसामसीह का जूनियर है और उसने सम्पूर्ण चीन को ईसाई बनाने के लिये अवतार लिया है। चर्च की प्रेरणा से और छल-कपट से चीन में ईसाई मिशनरियों और चर्चों का जाल बिछ गया और बड़ी संख्या में लोग ईसाई बनने लगे। तब ईसाइयों के नेता के रूप में अमेरिका से पढ़ कर लौटे चीनी सज्जन सनयात सेन उभरे और उन्होंने चीनी राष्ट्रवाद का नारा दिया तथा मांचू साम्राज्य को विदेशी करार दिया और चीन की स्वाधीनता की लड़ाई छेडऩे की घोषणा की। यूरोप ने सनयात सेन को चीन का सबसे बड़ा नेता बनाकर उभारा और जापान के विरूद्ध चीन को खड़ा करने का प्रयास करने लगा।
जर्मन से लडऩे के कारण लेनिन और स्तालिन को इंग्लैंड-फ्रांस ने बढ़ाया
इस बीच प्रथम महायुद्ध हो चुका था और यूरोपीय ईसाई देश आपस में भयंकर रक्तपात कर रहे थे। जर्मनी का दावा था कि जहाँ-जहाँ हूण हैं, वह सब उसका ही क्षेत्र है और इसलिये उस सब क्षेत्र में उसे शासन करने का अधिकार है। आधिपत्य की इस लड़ाई में जर्मनी के साथ जापान गया और तुर्की के उस्मान वंश ने भी जर्मनी का साथ देने की घोषणा की। भारतीय सेनाओं के कारण इंग्लैंड और फ्रांस का पक्ष इस लड़ाई में जीत गया और उसने जार के विरूद्ध लेनिन और स्तालिन को आगे बढ़ाया तथा युद्ध के बाद उन दोनों को एक बड़ा इलाका घेरकर सोवियत संघ बनाने की अनुमति दे दी।
भारतीय सेनाओं के बल पर जीते इंग्लैंड-फ्रांस
द्वितीय महायुद्ध में पुन: जापान और जर्मनी के मोर्चे के विरूद्ध इंग्लैंड और फ्रांस तथा संयुक्त राज्य अमेरिका का संयुक्त मोर्चा सक्रिय हुआ और जापान के विरूद्ध स्तालिन के शिष्य माओ जे दुंग ने इंग्लैंड और फ्रांस का साथ देने का आश्वासन दिया। फलस्वरूप युद्ध के उपरांत माओ की कम्युनिस्ट पार्टी को केवल सम्पूर्ण चीन पर कब्जा करने दिया गया, अपितु मंगोलिया, मंचूरिया के दक्षिणी इलाके तथा युन्नान प्रांत को हड़पने दिया। बाद में नेहरू ने तिब्बत को माओ को सौंप दिया। इस तरह 20वीं शताब्दी ईस्वी में दोनों ही महायुद्धों में मित्र शक्तियों की विजय के पीछे भारतीय सेनायें ही कारण रहीं और इसीलिये उन्हीं सेनाओं के भय से तथा अमेरिकी राष्ट्रपति के दबाव से इंग्लैंड को भारत से जाना पड़ा। जाते-जाते वे अपने शिष्यों को यहाँ गद्दी सौंप गये।
भारत तक पहुँचने के लिये अपेक्षाकृत छोटे मार्ग की खोज में ही स्वेज नहर का निर्माण 1859 से 1869 ईस्वी की अवधि में किया गया। इंग्लैंड और फ्रांस के इशारे पर उत्तर-पश्चिमी चीन में मुसलमानों के विद्रोह को बढ़ावा दिया गया।
युद्ध के लक्ष्यों के लिये बनायी गई अन्तर्राष्ट्रीय संस्थायें
इस बीच युद्ध में सहायक सेवा दल के रूप में रेडक्रॉस नामक संस्था बनाई गई और इसे विश्व में कहीं भी युद्ध के बीच में सेवा के लिये जाने का अधिकार घोषित किया गया जो प्रकारान्तर से अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में हस्तक्षेप का ही अधिकार था। स्वेज नहर के बनने से भूमध्य सागर और लाल सागर के बीच एक कड़ी बन गई जिससे भारत पहुँचने का मार्ग सरल हो गया और इंडोनेशिया आदि तक पहुँचना भी आसान हो गया।
संसार की पहली मजदूर हड़ताल
1871-72 ईस्वी में भारत के पारसीक क्षेत्र में भी भीषण अकाल पड़ा जिसमें 20 लाख लोग मर गये। 1874 ईस्वी में आयरलैंड में होमरूल आंदोलन तेज हो गया। उधर यूरोप से धन तथा सम्पदा की खोज में अमेरिका पहुँचकर वहाँ के स्थानीय निवासियों की लूट और भयंकर उत्पीडऩ की बात मध्य अमेरिका में जो संयुक्त राज्य अमेरिका नामक राज्य बना, उसमें भूमि और फसलों की उपलब्धता के कारण तथा जीवन की कतिपय आधारभूत सुविधाओं की सुलभता के कारण यूरोपीय लोगों ने अपनी आबादी तेजी से बढ़ाई और लगातार अमेरिका में अपनी सीमायें भी बढ़ाते रहे। परंतु उसी समय अमेरिकी इंडियन्स (रेड इंडियन) से बंधुआ मजदूरी कराते हुये रेल लाइनों के निर्माण का जो काम यूरोपीय कंपनियाँ करा रही थीं उसके विरूद्ध राष्ट्रव्यापी हड़ताल उन रेलकर्मियों ने कर दी, जिससे हडक़ंप मच गया। यह संसार की पहली राष्ट्रीय मजदूर हड़ताल मानी जाती है और इसके फैलने से सभी यूरोपीय लोग माक्र्सवाद की बात से ही घबराने लगे क्योंकि माक्र्स ने पूंजीवाद के पतन और सर्वहारा क्रांति की घोषणा कर दी थी।
विश्वासघात से कम्युनिस्टों ने सत्ता हथियाई: अंग्रेजों ने साथ दिया
उधर जार ने रूस में विरोधियों की बड़े पैमाने पर हत्या शुरू कर दी। इसके विरूद्ध रूस के किसानों ने भीषण विद्रोह किया और युद्ध छेड़ दिया। यूरोपीयों के द्वारा प्रशिक्षित स्तालिन और लेनिन के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी ने इस राजनैतिक युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और धीरे-धीरे किसानों की सेना के बीच घुसपैठ करने में सफल हो गये। अंत में प्रथम महायुद्ध में इंग्लैंड, फ्रांस और अमेरिका का साथ देने के पुरस्कार स्वरूप उन्हें बहुत बड़े इलाके पर कब्जे की छूट दी गई जिससे सोवियत संघ का निर्माण हुआ। कम्युनिस्टों ने शीघ्र ही किसान आंदोलन के अपने साथियों की हत्यायें शुरू कर दीं और सत्ता पर एकाधिकार बना लिया।
किसानों की हत्यायें और क्रूरता
किसानों को दिये गये सारे आश्वासन कम्युनिस्टों ने झुठला दिये। वस्तुत: किसानों की हत्यायें ही शुरू कर दी गईं। उनसे उनकी जमीन छीन ली गई। तर्क यह दिया गया कि निजी सम्पत्ति शोषण की जड़ है और इसलिये समस्त सम्पत्ति राज्य की है जो उसका न्यायपूर्ण वितरण करेगा। सम्पत्ति पर सामूहिक स्वामित्व की नई धारणा प्रस्तुत कर किसानों को अपने ही खेतों पर खेत मजदूर की तरह काम करने को विवश कर दिया गया और सम्पत्ति का प्रबंधन कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं के हवाले कर दिया गया। जो कि नये जमीदार वर्ग बन गये। मिलोवान जिलास ने अपनी पुस्तकदि न्यू क्लासमें इस नये वर्ग का विस्तार से वर्णन किया है। किसानों के परंपरागत जीवन को भी नष्ट कर दिया गया। उनका खेतों पर से स्वामित्व खत्म कर दिया गया। उनमें से बहुत से लोग सर्वहारा बनकर बेरोजगार मजदूर की तरह काम करने के लिये शहरों में जाने लगे।
क्रूरतायें छिपाने के लिये मोहक नारेबाजियाँ
परंतु किसानों का उत्पीडऩ सोवियत क्रांति के बाद ही नहीं प्रारंभ हुआ। इंग्लैंड और फ्रांस सहित सभी यूरोपीय देशों में किसानों का उत्पीडऩ निरंतर 14वीं शताब्दी ईस्वी से ही चल रहा था और हर जगह भीषण किसान विद्रोह होते रहे। जिनका दमन बार-बार किया गया। यद्यपि 19वीं शताब्दी ईस्वी तक सम्पूर्ण यूरोप खेतिहर समाज ही बना रहा। भूमि पर एक समूह का स्वामित्व छीनकर उस पर दूसरे समूह का आधिपत्य होता रहा और यह क्रम निरंतर ही चलता रहा। तब भी, किसी भी प्रकार की औद्योगिक समृद्धि यूरोप में 19वीं शताब्दी ईस्वी के मध्य तक नाममात्र को ही हो पाई थी।
जैसा पूर्व में उल्लेख हुआ है, 19वीं शताब्दी ईस्वी के आरंभ में नेपोलियन ने सम्पूर्ण यूरोप पर फ्रेंच राज्यतंत्र का आधिपत्य लादने का प्रबल प्रयास किया। समता और स्वाधीनता की सारी नारेबाजी केवल कार्यकर्ताओं को मोबिलाइज करने की रणनीति थी। आरंभिक सफलता के बाद ही राजनैतिक छीनाझपटी शुरू हो गई। 31 जनवरी 1793 ईस्वी को डेन्टन ने घोषणा की कि फ्रांस की सीमायें समुद्र से लेकर राइन नदी, आल्पस और पिरिनी पर्वत शृंखला तक है। इस प्रकार हालैंड, नीदरलैंड, बेल्जियम, जर्मनी के बहुत बड़े इलाकों को अपने अधीन करने की यह घोषणा की। इसीलिये इंग्लैंड से उनका टकराव हो गया। (माइकेल रेपर्ट कृत 19वीं शताब्दी ईस्वी का यूरोप, अध्याय 3, पृष्ठ 32-33, मेकमिलन प्रकाशन, 2005)
जब लुई 16वें को जनवरी 1793 ईस्वी में फांसी दी गई तब यूरोप में गुस्सा फैल गया। उस समय पहली बार इंग्लैंड में कुछ लोगों ने इंग्लिश जाति (नेशन) की बात शुरू की। स्पेन के शासक ने भी फे्रंच शासकों के विरूद्ध युद्ध की घोषणा की। फ्रेंच सेनायें नीदरलैंड, जर्मनी और बेल्जियम में घुस गईं तथा हॉलैंड को मजबूरी में संधिपत्र पर हस्ताक्षर करना पड़ा। बेल्जियम पर फ्रेंच की पकड़ मजबूत हो गई। पोलैंड का विभाजन कर दिया गया और प्रशा अपने विस्तार की योजना बनाने लगा।
फ्रेंच सेनायें 1796 ईस्वी में जर्मनी में उत्पात मचाने लगीं। इसके साथ ही सेनापति नेपोलियन बोनापार्ट ने इटली की सीमाओं में आस्ट्रिया के विरूद्ध दबाव बढ़ाया। आस्ट्रिया ने नेपोलियन के साथ संधि कर ली। राइन नदी के बायें किनारे पर फ्रांस का आधिपत्य ऑस्ट्रिया ने मान्य किया। ईसाई रोमन साम्राज्य बिखरने लगा।
बोनापार्ट ने मई 1798 में इजिप्त पर आक्रमण किया। जिससे ब्रिटेन को खतरा नजर आने लगा। अंत में ब्रिटेन और ऑस्ट्रिया ने रूस, पुर्तगाल, नेपल्स तथा तुर्की के साथ संधि की। ब्रिटिश भारतीय नौसेनाओं ने 1798 ईस्वी में इजिप्त में बोनापार्ट की सेना को घेर लिया और अगले वर्ष रूसी सेनाओं ने आस्ट्रिया के साथ मिलकर फ्रेंच सेनाओं को इटली से खदेड़ दिया।
लगातार चले युद्धों में ईसाई रोमन साम्राज्य की रियासतें 365 से घटकर 40 हो गईं। इस युद्ध के परिणाम स्वरूप विभिन्न राज्यों ने अपने यहाँ चर्च की भूमि पर कब्जा कर लिया। फ्रांस से लेकर जर्मनी तक अनेक बौद्धिकों ने चर्च के विरोध में नये राजनैतिक घटनाक्रमों का स्वामित्व किया। इस प्रकार विश्व के, विशेषकर भारत के ज्ञान के बल पर और उस ज्ञान को ईसाई रंगत देते हुये 19वीं शताब्दी ईस्वी में क्रमश: राष्ट्रवाद यूरोप में विकसित हुआ और चर्च के अत्याचारों के विरोध में सक्रिय लोगों ने नेशन स्टेट की धारणा विकसित की जो निरंतर बदलाव के दौर में है। क्योंकि अनेक अन्तर्राष्ट्रीय संस्थायें नेशन स्टेट की प्रभुसत्ता को सीमित करने के लिये बनाई गई हैं और इसके लिये बहुत से अन्तर्राष्ट्रीय करार किये गये हैं तथा नियम बनाये गये हैं। सार रूप में यह विश्व के विविध सबल समुदायों और व्यक्तियों के द्वारा वर्चस्व की योजना का ही एक अंग हैं। यूरोप में कोई भी विचार आज तक सचमुच विश्व के किसी सत्य को जानने के प्रयोजन से विकसित नहीं हुआ है। क्योंकि वहाँ परमसत्ता के ज्ञान की साधना की कोई परंपरा ही विकसित नहीं हो पाई है। जो भी विचार वहाँ प्रस्तुत और पोषित किये जाते हैं, वे किसी किसी भौतिक और राजनैतिक अर्थात सत्तापरक प्रयोजन से। ये प्रयोजन इतने क्षुद्र होते हैं कि इनको ढकने के लिये मोहक विचारों और नारों का आवरण रचा जाता है।

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