मन का नियंत्रण अभ्यास और वैराग्य

मन का नियंत्रण  अभ्यास और वैराग्य

प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज

   गीता ज्ञान के अधिकारी वे हैं, जिनकी गीता में श्रद्धा है, सनातन धर्म में श्रद्धा है, भारतवर्ष में श्रद्धा है, अपने पूर्वजों के शौर्य और पराक्रम, धर्मनिष्ठा और विद्वत्ता में श्रद्धा है। वही इसके अधिकारी हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा - पहले बुद्धि को एकाग्र करना सीखो।
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरूनन्दन।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।। (2/41)
एकाग्र बुद्धि नहीं हो तो अनन्त प्रकार से चित्त में विचारों का तूफान उठता रहेगा, बहुत सी शाखाएँ उनमें से प्रत्येक विचार की फूटेंगी। पुष्पिता वाणी सुनकर भांति-भांति के विषयों में चित्त की आसक्ति बढ़ती रहेगी। अत: पहले बुद्धि को एकाग्र करना सीखें। व्यवसायात्मिका बुद्धि। प्रयोजन पर एकाग्र बुद्धि।
पर ऐसी बुद्धि कैसे हो? मन एकाग्र कैसे हो? मन तो चंचल है, उसकी चंचलता वेगवान है, बलयुक्त है और चित्त को मथती रहती है। भगवान कहते हैं, हाँ, निश्चय ही मन चंचल है। इसका निग्रह बहुत कठिन है।
‘‘अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण गृह्यते।।’’(6/35)
अभ्यास और वैराग्य से ही इस पर वश पाया जा सकता है। बारम्बार मन को एकाग्र एवं वशवर्ती करने का अभ्यास। यह योग-साधना का प्रथम चरण है। जो विगत जन्मों के संस्कारों से सम्पन्न ज्ञानी हैं, संत हैं, भक्त हैं, उनका मन सहज ही वश में होता है। तो वे इस जन्म में योग साधना का यह प्रारंभिक चरण, प्राथमिक अभ्यास करते नहीं दिखते। क्योंकि पूर्वजन्म में वे योग-साधना कर चुके हैं। अभ्यास कर चुके हैं। इतनी योग-साधना प्रत्येक साधना-मार्ग में आधारभूत है, अनिवार्य है। सबमें ज्ञान-मार्ग हो, भक्ति-मार्ग हो, कर्म-मार्ग हो।
इसीलिए पुन: स्मरण कर लें कि अर्जुन की बस एक ही शंका है, जिसे सुनते ही भगवान ने कह दिया कि-
‘‘असंशयं महाबाहो, मनो दुर्निग्रहं चलं।’’
निस्संदेह हे महाबाहु अर्जुन, तेरी यह शंका सही है। एकमात्र शंका जिसको सुनते ही भगवान कह देते हैं कि हां, सही है। तो ये जो दुर्गम और चंचल मन है, इसके विषय में गीता क्या कहती है? अभ्यास करो और वैराग्य दृढ़ करो।
अभ्यास से क्या अर्थ है? वैराग्य से क्या अर्थ है? अगर वैराग्य से वह प्रचलित अर्थ हम लोग लें कि उसके बाद लंगोटी धारण करके निकल पडऩा चाहिए तो अर्जुन भी यही करता। कहता है कि हमको तो अब मन को पक्का करना है तो जाते हैं, गांडीव तो रख ही दिया। बस। उस समय तो संन्यास की प्रशस्त परंपरा थी। एक से एक आश्रम थे। कहीं चला जाता संन्यासी बनके। पर वो तो नहीं गया ना? इसका अर्थ है कि भगवद्गीता में वैराग्य और अभ्यास का जो प्रतिपादन है, भगवद्गीता जिस वैराग्य को सिखाती है, भगवान श्री कृष्ण का वैराग्य से जो आशय है, उससे व्यक्ति युद्ध करने में समर्थ होता है, शत्रु को ठीक से पहचानने में और उसे पराजित करने में समर्थ होता है, शस्त्रों और शास्त्रों के अधिकाधिक ज्ञान में समर्थ होता है, युद्ध कला में निपुण होता है, स्वधर्म पालन में समर्थ होता है, उसमें ओज आता है, बल आता है, तेज आता है, संकल्प आता है, धर्म पालन की दृढ़ता आती है, वीरता आती है, शौर्य आता है। यह ऐसा वैराग्य है। भगवद्गीता ऐसे वैराग्य का उपदेश करती है, ऐसे वैराग्य का शासन करती है, अनुशासन देती है, जो वैराग्य व्यक्ति के तेज को उद्दीप्त करता है, व्यक्ति की बुद्धि को तेजस्वी बनाता है, व्यक्ति के विवेक को सजग करता है। उसके मोह को दूर करता है और कत्र्तव्य पालन के प्रति उसे अडिग निष्कंप बनाता है। अपने लिए। अपनी आत्म सत्ता के लिए समर्थ बनाता है। अपने स्वधर्म पालन के लिए, अपने कुल और अपनी जाति और अपने समाज के लिए, अपने राष्ट्र के लिए और इस संपूर्ण सृष्टि के लिए। जाति का मूल अर्थ है राष्ट्र यानी समान पूर्वज-परम्परा।
सृष्टि चक्र का जो प्रवर्तन है, उसके लिए भगवान कहते हैं:-
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह :
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ   जीवति।।
                                                                       (3/16)
भगवान ने सावधान किया है कि जो प्रवर्तित सृष्टि चक्र चल रहा है, वह मेरे द्वारा प्रवर्तित है, उसका अनुवर्तन करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है अन्यथा वह व्यर्थ ही जीता है। तो वैराग्य का अर्थ है इस सृष्टि चक्र के प्रवर्तन में अपनी भूमिका को ठीक-ठीक जानना। उससे इधर-उधर नहीं भटकना। इतरेतर विषयों में चित्त-भ्रमण करें, लिप्साएँ जगें, मोह और लोभ ग्रसें, उनसे विरक्ति हों, यही वैराग्य है। उसके लिए आवश्यक तप और बल का साधन, ज्ञान की साधना, स्मृति का जागरण करना। इसी अभ्यास और वैराग्य के द्वारा मन पर नियंत्रण हो सकता है। स्वधर्म का ज्ञान होकर स्वधर्म का पालन हो सकता है।

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मन की चंचलता को वशवर्ती बनाने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने गीता में क्या कहा है? क्योंकि बिना मन की चंचलता को वशवर्ती बनाए, बिना मन को एकाग्र किए, बिना मन को सजग और समर्थ बनाए, आप कोई भी ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। सुनेंगे और भूल जाएंगे। और अगर आपका मन चंचल नहीं है, आप युधिष्ठिर की तरह हैं तो एक वाक्य के आधार पर भी आपको बहुत कुछ ज्ञान प्राप्त हो सकता है। इसीलिए किसी भी ज्ञान की चर्चा से पहले आवश्यक है कि इस विषय पर हम चर्चा कर लें कि मन को दृढ़ और बलवान कैसे बनाया जाता है। एकाग्र कैसे बनाया जा सकता है। विषय पर एकाग्र कैसे रहा जा सकता है। चित्त को शांत कैसे किया जाता है।  इस विषय में सर्वोपरि जानने योग्य यह है कि मन के जिस नियंत्रण की बात गीता में कही गई है, उसका स्वरूप क्या है? सामान्यत: लोग यह पढक़र कि मन को नियंत्रण में रखने के विषय में गीता में उपदेश है, सोच लेते हैं कि पढऩे में मन नहीं लगता या किसी अन्य क्रिया में मन नहीं लगता या ध्यान में मन नहीं लगता या गणित, दर्शन अथवा विज्ञान में एकाग्र होने का सूत्र चाहिये तो गीता का सहारा लो। निश्चय ही गीता इन सब विषयों में भी सहायक होगी। पर जिस विशिष्ट एकाग्रता की बात यहाँ गीता में है, वह प्रक्रिया कठिन है, सरल नहीं है, यह जानना चाहिये। क्योंकि योग के विषय में भगवान का उपदेश सुनकर अर्जुन कहता है-
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्त: साम्येन मधुसूदन।
एतस्याहं पश्चामि चन्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्।। (6/33)
हे कृष्ण! आपने जिस योग का उपदेश दिया है उसमें मन कैसे स्थिर हो? मन तो चंचल है।
यहाँ यह ध्यान रखना चाहिये कि यह बात कौन कह रहा है? यह बात वह वीर अर्जुन कह रहा है जिसने जब गुरू द्रोणाचार्य ने परीक्षा ली थी चिडिय़ा की आँख भेदने के लिये तो उसे केवल चिडिय़ा की आँख ही दिख रही थी। अन्य लोगों को तो पेड़ दिख रहा था, फिर उसमें बैठी हुई चिडिय़ा दिख रही थी और साथ में उसकी आँख भी दिख रही थी। परंतु अर्जुन ने कहा कि मुझे केवल चिडिय़ा की आँख दिख रही थी और शरसंधान कर दिया।
इसी प्रकार पांचाली को जिस यज्ञ में अर्जुन ने जीता था, उसमें नीचे कड़ाह के तेल में प्रतिबिंब देखते हुये ऊपर संधान करके मछली की आँख में तीर मारना था। स्पष्ट है कि अर्जुन की एकाग्रता तो अद्वितीय थी। इसलिये सामान्य मनुष्यों का मन जिस प्रकार चंचल हो रहा है, वैसी किसी चंचलता की बात अर्जुन नहीं कह रहा है।
इसीलिये जब हम कोई शास्त्र पढ़ते हैं तो सदा ही उसकी पृष्ठभूमि और उसके तत्वज्ञान का सार जो बताया गया हो, वह अवश्य पढऩा चाहिये। कोई आधुनिक पुस्तक भी पढ़े तो पहले उसकी भूमिका पढऩी चाहिये, जहाँ लेखक पुस्तक के विषय में साररूप में बताते हैं।
अत: यह ध्यान रखकर कि अर्जुन बहुश्रुत है, श्रेष्ठ संस्कारों वाला है, धर्मबुद्धि से सम्पन्न है, गुणी है, गंभीर है, परमवीर है, उदात्त और धीर है, अद्वितीय धनुर्धर है, धर्मशास्त्रों का ज्ञाता है। तो उसकी जो शंका है वह बहुत व्यापक है। चित्त में संस्कार और ज्ञान की पृष्ठभूमि है और तब किसी विशेष लक्ष्य की दृष्टि से मन चंचल हो रहा है, इसकी बात अर्जुन कर रहा है। उसके संशय का एक निश्चित संदर्भ है। अत: ऐसे समय चित्त को शांत करने के लिये व्यापक और विस्तृत ज्ञान की आवश्यकता है। उस ज्ञान के बिना केवल किसी एक सामान्य अभ्यास से चित्त शांत नहीं हो सकता। सामान्य अभ्यास से तो केवल मूढ़ चित्त ही शांत हो सकता है। जिसको कभी जगतगति व्यापती ही नहीं, उसके लिए सामान्य अभ्यास पर्याप्त है। परंतु विराट बौद्धिक चेतना से सम्पन्न व्यक्ति के लिए विराट ज्ञान ही चित्त की शांति का कारक बन सकता है। अत: इस संदर्भ में अभ्यास का अर्थ है- बारम्बार स्वाध्याय। ज्ञान के मूल जो शास्त्र हैं, उनका बारम्बार स्वाध्याय ही अभ्यास है।
इसी प्रकार वैराग्य को भी अच्छी तरह समझना चाहिये। वैराग्य का अर्थ है- चित्त की  सर्वोच्च लक्ष्य में एकाग्रता, स्वधर्म में एकाग्रता, व्यवसायात्मिका बुद्धि। इस बुद्धि के साथ कर्तव्य कर्म का संपादन। यही वास्तविक वैराग्य है। स्वयं भगवान कहते हैं-
अनाश्रित: कर्मफलं कार्यं कर्मं करोति :
संन्यासी योगी निरग्नि: चाक्रिय:।। (6/1)
(जो कर्मफल के आश्रित हुये बिना कर्तव्य कर्म को करता है, वही संन्यासी और योगी है। केवल यज्ञादि कर्म या लौकिक कर्म छोड़ देने वाला संन्यासी नहीं है।)
अगर संन्यासी संन्यास का वेश धारण करने के बाद आत्मज्ञान और स्वधर्मपालन का विशेष पुरूषार्थ नहीं करते तो फिर वह वैराग्य नहीं है अपितु संन्यास आश्रम की बाहरी क्रियाओं में सुख प्रतीत होने के कारण उसके प्रति उपजा आकर्षण मात्र है। अनेक लोग हैं जिनको सामान्य लौकिक या गृहस्थ जीवन की लालसायें नहीं होतीं और संन्यासियों या मठ में रह रहे लोगों का जीवन देखकर उसमें आकर्षण प्रतीत होता है। उनमें कोई अन्य कामभावना आदि नहीं होती, परंतु मस्ती का जीवन दिखता है और उसका आकर्षण होने से संन्यास यदि ले लिया तो उसे वैराग्य नहीं कहते। क्योंकि यदि वैसे वैराग्य का उपदेश होता तो अर्जुन गीता के अंत में यही कहता कि आपका सम्पूर्ण उपदेश शिरोधार्य है। अब मैं वैराग्य लेता हूँ और संन्यासी बनकर नित्य शास्त्रों का अभ्यास करूँगा। पर उसने अभ्यास और वैराग्य का उपदेश सुनने के बाद अंत में कहा यह कि आपका उपदेश सुनकर आपके आशीर्वाद से मेरे समस्त संदेह दूर हो गये, मोह समाप्त हो गया, कत्र्तव्य की स्मृति जग गई और अब मैं युद्ध करूँगा-
नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव।। (18/73)
अत: स्पष्ट है कि यह वैराग्य धर्मपालन की दृढ़ता देता है। जिनका स्वधर्म केवल आत्मज्ञान है और जो तीनों ऋणों - देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण से उऋण हो चुके हैं, अपने सभी शेष कर्तव्य सम्पन्न कर चुके हैं, वे केवल आत्मज्ञान की साधना में निरत हो सकते हैं। परंतु यदि तीनों ऋण शेष हैं तो वैराग्य का अर्थ है- धर्मपालन में एकाग्रता और व्यवसायत्मिका बुद्धि की साधना।
यहाँ एक बात और स्मरणीय है, कर्मफल के अनाश्रित रहकर कर्म करना है। इसका अर्थ यह नहीं है कि कर्मफल के विषय में कोई विचार ही नहीं करना है, कर्मफल का ध्यान ही नहीं रखना है। यह भगवान ने कहीं नहीं कहा है। कर्मफल का ध्यान तो सदा रखना ही पड़ेगा। क्योंकि सत्कर्म का सत्परिणाम होगा और असत् कर्म का असत्परिणाम होगा।
अत: यह तो सदा चिंतन करना ही है कि मैं जो कर्म करने जा रहा हूँ वह सत् है, श्रेष्ठ है, धर्म है, कर्तव्य है। कर्मफल की चिंता ही नहीं करना प्रमाद है। कर्मफल पर अपना अधिकार मानना दम्भ है। अत: तो प्रमाद करना है और ही दम्भ। कर्तव्य कर्म करना है और यह कर्मफल के आश्रित रहकर नहीं करना है। कर्मफल दैव के हाथ में है। उसके विषय में आगामी अंक में विमर्श होगा।
 
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