जीवन की उत्पत्ति सनातन, सनातन धर्म और भारतीय एवं पाश्चात्य दर्शन

जीवन की उत्पत्ति सनातन, सनातन धर्म और भारतीय एवं पाश्चात्य दर्शन

डॉ. चंद्र बहादुर थापा 
वित्त एवं विधि सलाहकार-
भारतीय शिक्षा बोर्ड एवं विधि परामर्शदाता पतंजलि समूह

सनातन धर्म
धर्म को सम्प्रदाय या पन्थ से जोडक़र देखना वास्तव में धर्म की समझ को सीमित करना है, चूँकि पश्चिमी-जगत का सम्बद्ध केवल सम्प्रदाय याविश्वाससे है अत: वह भारतीय-दृष्टि से अनभिज्ञ रहते हुएधर्मको भीमज़हबबताता रहता है जो नितान्त गलत है, वास्तव में विशुद्ध धर्म तो केवलसनातन-धर्मही है बाकी सब उसकी शाखाएँ मात्र हैं यानीसम्प्रदायऔरपन्थ धर्म केवल मनुष्यों तक ही सीमित नहीं वह तो अखिल-विश्व/ब्रह्माण्ड में व्याप्त है; सजीव-निर्जीव सहित पशु-पक्षियों और वृक्षों के अतिरिक्त पंच महाभूत भी धर्म से ही संचालित हैं, वास्तव में धर्म प्रकृति की संचालिका-शक्ति है! धर्म वह पवित्र अनुष्ठान है जिससे चेतना का शुद्धिकरण होता है। धर्म वह तत्व है जिसके आचरण से व्यक्ति अपने जीवन को चरितार्थ कर पाता है। यह मनुष्य में मानवीय गुणों के विकास की प्रभावना है, सार्वभौम चेतना का सत्संकल्प है। मध्ययुगीन धर्म के व्याख्याताओं ने संसार के प्रत्येक क्रियाकलाप को ईश्वर की इच्छा माना, दार्शनिकों ने व्यक्ति के वर्तमान जीवन की विपन्नता का हेतुकर्म-सिद्धान्तके सूत्र में प्रतिपादित किया। इसकी परिणति मध्ययुग में यह हुई कि वर्तमान की सारी मुसीबतों का कारणभाग्यअथवा ईश्वर की मर्जी को मान लिया गया। समाज या देश की विपन्नता को उसकी नियति मान लिया गया। समाज स्वयं भी भाग्यवादी बनकर अपनी सुख-दु:खात्मक स्थितियों से सन्तोष करता रहा।
आज के युग ने यह चेतना प्रदान की है कि विकास का रास्ता मानव ने स्वयं बनाना है। किसी समाज या देश की समस्याओं का समाधान कौशल, व्यवस्था-परिवर्तन, वैज्ञानिक तथा तकनीकी विकास, परिश्रम तथा निष्ठा से सम्भव है। आज के मनुष्य की रुचि अपने वर्तमान जीवन को सँवारने में अधिक है। उसका ध्यानभविष्योन्मुखी होकर वर्तमान में है। वह दिव्यताओं को अपनी ही धरती पर उतार लाने के प्रयास में लगा हुआ है। वह पृथ्वी को ही स्वर्ग बना देने के लिए बेताब है। अर्थात सनातन के वास्तविकता के तरफ बढ़ रहा है।
वर्तमान के सनातन से निश्रित शाखाएं हिन्दू सबसे पुरातन-सनातन का तना
हिन्दू सनातन समूह का मानना है कि सारे संसार में धर्म केवल एक ही है, शाश्वत सनातन धर्म। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति से जो धर्म चला रहा है, उसी का नाम सनातन धर्म है। इसके अतिरिक्त सब पन्थ, रिलीजन, मजहब, संप्रदाय, मात्र है। हिन्दुओं की धार्मिक पुस्तक वेद, अरण्यक, उपनिषद, श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण, पुराण, महाभारत आदि हैं। वेद विशुद्ध अध्यात्मिक और वैज्ञानिक ग्रंथ हैं। वेद पश्चिमी धर्म की परिभाषा तथा पंथ, संप्रदाय के विश्वास तथा दर्शन से परे शाश्वत सत्य ज्ञान सागर हैं। वेदों की रचना मानव को सत्य ज्ञान से परिचित कराने के लिए की गई है। वेद पंथ, संप्रदाय, मजहब, रिलीजन आदि का प्रतिनिधित्व करके, केवल और केवल मानव के लिए हैं।
 जैन-सनातन तना का प्रथम शाखा
जैन सनातन समूह का मानना है कि यह संसार, जो एक बिंदु है, अनादिकाल से चला रहा है, और अनंत काल तक चलता रहेगा एवं सभ्यता का निरंतर विकास होता रहेगा। जिन्होंने स्वयं को जीत लिया हो अर्थात् मोह, राग, द्वेष को जीत लिया हो वो जैन अर्थात् उनका अनुसरण करने वाले हैं। भगवान कोई अलग से नहीं होते वरन व्यक्ति निज शुद्धात्मा की साधना से भगवान बन सकता है। भगवान कुछ नहीं करता मात्र जानता है, सब अपने कर्मों के उदय से होता है। कोई बंधन नहीं है, तुम सोचो समझो विचारो, फिर तुम्हें जैसा लगे वैसा शीघ्रातिशीघ्र करो। जैन सनातन विचार संसार का एक मात्र ऐसा विचार है जो व्यक्ति को स्वतंत्रता प्रदान करता है। जैन सनातन विचार में भगवान को नमस्कार नहीं है अपितु उनके गुणों को नमस्कार है।
बौद्ध-सनातन तना का द्वितीय शाखा
बौद्ध सनातन समूह एक सत्य अनादि, श्रमण परंपरा से निकला हुआ पद्धति है। यह माना जाता है कि इसी सनातन के माध्यम से बाकी के सब पन्थ, सम्प्रदाय, उत्पन्न हुये हैं, (एस धम्मो सनंतनो- धम्मपद मैं भगवान का उपदेश) इसे ही शुद्ध सत्यसद्धम्म मार्ग कहा गया है, भगवान गौतम बुद्ध से पहले भी बुद्ध हुए हैं, बौद्ध समूह के संस्थापक स्वयं बुद्धत्व है, कि भगवान गौतम बुद्ध इन्होंने तो धम्मचक्कपरिवर्तत करके महान उपदेश दिया है और बुद्धो  की अनादि परंपरा आगे बढ़ाई है, बौद्ध समूह ईश्वर के अस्तित्व को नकारता और इस समूह का केन्द्र बिन्दु मानव है। बौद्ध धर्म और कर्म के सिद्धान्तों को मानते हैं, जिनको तथागत भगवान गौतम बुद्ध ने प्रचारित किया था। बौद्ध भगवान गौतम बुद्ध को नमन करते हैं। त्रिपीटक बौद्ध धर्म ग्रंथ है।
इब्राहीमी- सनातन का पाश्चात्य उपशाखा
इब्राहीमी, सनातन का पाश्चात्य उपशाखा पंथ एक ईश्वर को मानते हैं एवं इब्राहीम (अरबी- إِبْرَاهِيْمُ)) को ईश्वर का पैग़म्बर (ईश्वर का संदेशवाहक) मानते हैं। इनमें यहूदी, ईसाई, इस्लाम और बहाई विचारधारा, आदि शामिल हैं। ये विचारधारायें मध्य पूर्व में पनपे थे और एकेश्वरवादी हैं। यहूदी परम्परा विश्व के प्राचीनतम विचारधाराओं में से है।
यह औपचारिक रूप से स्थापित कोई पंथ नहीं है, ना इसके कोई अनुयायी हैं और ना ही इसकी कोई नींव है। विशेषज्ञों का यहां तक कहना है कि यह सिर्फ एक आध्यात्मिक प्रोजेक्ट है जिसका मकसद इस्लाम, ईसाई और यहूदी पंथ के बीच समानता को देखते हुए  इनके बीच के मतभेदों को मिटाना है और सामान्यतया: इन तीनों पंथों को अब्राहमी पंथ की श्रेणी में ही रखा जाता है। यहूदी परंपरा का दावा है कि इजऱाइल की बारह जनजातियाँ इब्राहीम से उनके बेटे इसहाक और पोते जैकब के वंशज हैं, जिनके बेटों ने सामूहिक रूप से कनान में इजऱाइलियों का राष्ट्र बनाया; इस्लामी परंपरा का दावा है कि इश्माएलियों के रूप में जानी जाने वाली बारह अरब जनजातियां इब्राहीम से अरब में अपने बेटे इश्माएल के माध्यम से निकली हैं; बहाई परंपरा का दावा है कि बहाउल्लाह अपनी पत्नी केतुरा के माध्यम से अब्राहम के वंशज थे। पुरातात्विक जांच की एक सदी के बाद भी, इन ऐतिहासिक कुलपुरूषों के कोई सबूत नहीं मिला है। अधिकांश विद्वानों का मानना है कि इब्राहीम की कहानी छठी शताब्दी ईसा पूर्व में उत्पन्न हुई थी, और इनकी उत्पत्ति की पुस्तक ऐतिहासिक घटनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती है।
ईसाई पन्थ - जैन और बुद्ध के बाद यूरोप के भूमध्य सागरीय क्षेत्र के भूभागों में प्रतिपादित विचार पद्धति
सनातन में पश्चिम अर्थात् मध्य-एशिया और यूरोप के भूमध्य सागरीय क्षेत्र के भू-भागों में जैन और बुद्ध के बाद आज से 2024 वर्ष पूर्व येसु ख्रीस्त (Jesus Christ) द्वारा प्रतिपादित विचार पद्धति, ईसाइयत के रूप में विश्व के अधिकतम जनसंख्या द्वारा अनुसरित 43,000 से अधिक फिरकों में बंटा हुआ पंथ है। इस पन्थ की मान्यता है कि परमेश्वर आत्मा है और आत्मा का हड्डी और मांस नहीं होता है, जिसे हम देख नहीं सकते उसकी प्रतिमा कैसे बना सकते हैं? उस सर्वशक्तिमान परमेश्वर को कभी किसी ने भी शारीरिक आंखों से नही देखा। पर परमेश्वर ने मानवजाति पर अपनी प्रेम इस रीति प्रकट किया कि उसने मनुष्य रूप धारण किया। वह पराकर्मी परमेश्वर जिसने काल, समय और मनुष्य को बनाया। वह स्वयं अपने काल, समय में सिमटकर आया, ताकि मानवजाति उसके द्वारा अपने अपने पापों से छुटकारा पा सके। चौथी सदी तक यह पन्थ किसी क्रांति की तरह फैला, किंतु इसके बाद ईसाई पन्थ में अत्यधिक कर्मकांडों की प्रधानता तथा पन्थ सत्ता ने दुनिया को अंधकार युग में धकेल दिया था। फलस्वरूप पुनर्जागरण के बाद से इसमें रीति-रिवाजों के बजाय आत्मिक परिवर्तन पर अधिक जोर दिया जाता है। ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल में दो भाग हैं। पहला भाग पुराना नियम कहलाता है, जो कि यहूदियों के धर्मग्रंथ तनख़ का ही संस्करण है। दूसरा भाग नया नियम कहलाता तथा ईसा मसीह के उपदेश, चमत्कार और उनके शिष्यों के कामों का वर्णन करता है।
इस्लाम पंथ- सनातन का अरब और उत्तर अफ्रीकी शाखा
इस्लाम (अरबी- अल-इस्लाम) एक प्रेषित परम्परा से निकला एकेश्वररवादी इब्राहीमी पन्थ है। इसकी शुरुआत 7वीं सदी के प्रारम्भ में, आज से हिजरी 1445 पूर्व अर्थात 622AD के आसपास अरबी प्रायद्वीप में हुई। इस्लामी परम्परा के अनुसार, इस्लाम अल्लाह के अन्तिम पैगम्बर मुहम्मद के द्वारा मनुष्यों तक पहुँचाई गई अवतरित किताब कुरान की शिक्षा पर आधारित है, तथा इसमें हदीस, सीरत उन-नबी शरीयत ग्रन्थ शामिल हैं। इस्लाम में सुन्नी, शिया, सूफ़ी अहमदिया समुदाय प्रमुख हैं। इस्लाम की मज़हबी स्थल मस्जिद कहलाती हैं। अनुयाइयों की कुल आबादी के अनुसार इस्लाम विश्व का दूसरा सबसे बड़ा पन्थ है। इस्लाम क़ुरान पर आधारित है। इसके अनुयाइयों को मुसलमान कहा जाता है। इस्लाम केवल एक ही ईश्वर को मानता है, जिसे मुसलमान अल्लाह कहते हैं। हजऱत मुहम्मद अल्लाह के अन्तिम और सबसे महान सन्देशवाहक (पैग़म्बर या रसूल) माने जाते हैं। इस्लाम में देवताओं की और मूर्तियों की पूजा करना मना है। इस्लाम शब्द अरबी भाषा का (सल्म) से उच्चारण है। इसका मतलब शान्त होना है, अथवा समर्पित होना है; व्यक्ति ईश्वर प्रति समर्पित होकर ही वास्तविक शान्ति प्राप्त करता है। इस्लामी विचारों के अनुसार- ईश्वर द्वारा प्रथम मानव (आदम) की रचनाकर इस धरती पर अवतरित किया और उन्हीं से उनकाजोड़ाबनाया, जिससे सन्तानोत्पत्ति का क्रमारम्भ हुआ! यह सन्तानोत्पत्ति निर्बाध जारी है। और यह विश्व का दूसरा सबसे  अधिक जनसँख्या वाला 72 फिरकों और 533 सम्प्रदायों में बंटी हुई विचारधारा है। इस्लामों के लिये अल्लाह द्वारा रसूलों को प्रदान की गयी सभी मज़हबी किताबें वैध हैं। इस्लामों के अनुसार क़ुरआन ईश्वर द्वारा मनुष्य को प्रदान की गयी अन्तिम मज़हबी किताब है। क़ुरआन में चार और किताबों का महत्त्व है- (1) सहूफ़ इब्राहीमी जो कि हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को प्रदान की गयी थी, (2) तोराह जो कि हजरत मूसा अलैहिस्सलाम को प्रदान की गयी थी, (3) ज़बूर जो कि राजा दाउद अलैहिस्सलाम को प्रदान की गयी थी, (4) इंजील जो कि हजरत ईसा अलैहिस्सलाम को प्रदान की गयी थी। मुसलमान यह मानते हैं कि यहूदियों और ईसाइयों ने अपनी किताबों के सन्देशों में बदलाव कर दिये हैं। मुसलमान के धारणाओं के अनुसार मानव जाति प्रमुख दो भागो में विभक्त हो गई- (1) एक समूह ईश्वरीय दूतों के बताए हुए सिद्धांतों (ज्ञान) के द्वारा अपना जीवन समर्पित (मुस्लिम) होकर संचालित करते, (2) दूसरा समूह जो अपने सीमित ज्ञान (अटकल, अनुमान) की प्रवृत्ति ग्रहण करके ईश्वरीय दूतों से विमुख (काफिर) होने की नीति अपनाकर जीवन व्यतीत करते।
सिख- सनातन के तना हिन्दू के संरक्षण के लिए बना हुआ शाखा
सिख पन्थ समूह (खालसा या सिखमत; पंजाबी), 15वीं सदी में गुरु नानक देव जी द्वारा दक्षिण एशिया पर मुग़लिया सल्तनत के दौरान (1556-1707), लोगों के मानवाधिकार की हिफ़ाज़त हेतु प्रारम्भ किया हुआ विचारधारा है। सिखों के धार्मिक ग्रन्थ श्री आदि ग्रंथ साहिब या गुरु ग्रन्थ साहिब तथा दसम ग्रन्थ हैं। सिख धर्म में इनके धार्मिक स्थल को गुरुद्वारा कहते हैं। सामान्यत: सिखों के दस सतगुरु माने जाते हैं, परन्तु सिखों के धार्मिक ग्रंथ में : गुरुओं सहित तीस भगतों की बानी है, जिन की शिक्षाओं को सिख मार्ग पर चलने के लिए महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
 चार्वाक और साम्यवाद (कम्युनिज्म) -सनातन में ईश्वर को मानने वालों के समूह
वैदिक काल से ही वेदों को और ईश्वर को मानने वाले समूह को चार्वाक के विचारधारा माना जाता है। इस विचारधारा सम्बन्धी ग्रन्थ लगभग अप्राप्य हैं। पर्सिया, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, इत्यादि यूरोपीय देशों में औद्योगिक क्रांति के समय कृषि और औद्योगिक मजदूरों के अमानवीय शोषण एवं अत्याचार के कारण कार्लमाक्र्स और फ्रेडेरिक एंजेल्स द्वारा प्रतिपादित कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र (मैनिफेस्ट डेर कोमुनिस्टिशेन पार्टी) मूल रूप से 1848 में लंदन में प्रकाशित किया गया था।दुनिया के मजदूरों, एकजुट हो जाओ! आपके पास खोने के लिए अपनी जंजीरों के अलावा कुछ नहीं हैनारे के साथ, घोषणापत्र एकजुटता के लिए एक निर्णायक और प्रसिद्ध आह्वान के साथ समाप्त होता है, जिसका निष्कर्ष है, (1)  पूंजीवाद मानवता को आत्म-साक्षात्कार की संभावना प्रदान नहीं करता है, इसके बजाय यह सुनिश्चित करता है कि मनुष्य हमेशा के लिए पिछड़ा और अलग-थलग रहे, (2) पूंजीवाद सर्वहारा वर्ग को ध्रुवीकृत और एकीकृत करके अपना विनाश लाएगा, और एक क्रांति साम्यवाद के उद्भव की ओर ले जाएगी, (3)  एक वर्गहीन समाज जिसमेंप्रत्येक का स्वतंत्र विकास सभी के स्वतंत्र विकास की शर्त है माक्र्स और एंगेल्स निम्नलिखित संक्रमणकालीन नीतियों का प्रस्ताव करते हैं- (1) भूमि और विरासत में निजी संपत्ति का उन्मूलन; (2) एक प्रगतिशील आयकर की शुरूआत; (3) विद्रोहियों की संपत्ति की जब्ती; (4) ऋण, संचार और परिवहन का राष्ट्रीयकरण; (5) उद्योग और कृषि का विस्तार और एकीकरण; (6) श्रम के सार्वभौमिक दायित्व का प्रवर्तन; और (7) सार्वभौमिक शिक्षा का प्रावधान और बाल श्रम का उन्मूलन। इस नवीनतम सनातन के शाखा के एक तिहाई से ज्यादा जनसँख्या है।
तो मानव कौन?
सभ्यता के उद्भव और पराभव के लिए मानव ही जिम्मेदार है चाहे ईश्वर को मानें या मानें। शाश्वत् सत्य तो यह है की मानव नौं महीने माता के गर्भ में रहकर निरीह नंगा जन्म लेता है, लगभग 100 वर्ष के पूर्ण जीवन काल में लगभग 10 से 15 वर्ष माता-पिता के संरक्षण में रहकर कुछ जीवनयापन के तौर-तरीके को परिस्थिति अनुरूप सीखता, देखता, अनुभव करता है, 16 से 20 वर्ष के उम्र तक में कुछ करने और विपरीत लिङ्ग के तरफ प्रकृति के वंशानुक्रम के नियम अनुरूप आकर्षित हो कर जोड़ी बनाने की भाव प्रारम्भ करता है, 50-60 के उम्र तक धन-संसाधनों के उपार्जन और परिवार बनाने और पालन करने में लगता है, 60-70 के उम्र तक अपने संतानों के उद्भव-पराभव देखता है और धीरे-धीरे बुढ़ापा महसूस करने लगता है, 70-100 के मध्य मृत्यु आता है, कितने भी सामथ्र्य अथवा सम्पदावान हो, मृत्यु ने उसको जन्म के समय के स्थिति से भी निरीह बनाते हुए कहाँ ले जाता है, नहीं मालूम। इस प्रक्रिया को जानने के कोशिश में वेदों से लेकर कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो तक के अनगिनत ग्रन्थ लिखे, बनाये गए, बनाये जा रहे हैं परन्तु मृत्यु भय सृष्टि के प्रत्येक जीव (वनस्पति भी शामिल है) को रहता है, कोई महसूस करता है परन्तु कुछ नहीं कर पाता, कोई किसी का प्राकृतिक आहार बनता है और उससे अलग पदार्थ बनकर निकलता है, मानव सभी प्रक्रिया को देखते हुए शोध-अनुसन्धान करता रहता है। प्रत्येक मृतक अपने-अपने समूह के बीज के रूप में पिता के वीर्य बनकर माता के रज से मिलकर फिर अज्ञात स्थान में अज्ञात परिस्थिति में पैदा हो कर फिर लगभग अधिकतम 100 वर्ष के जीवन यात्रा प्रारम्भ करता है, फिर से मृत्यु वरण कर, हिन्दू के अनुसार  फिर जन्म  लेने के लिए अथवा इस्लाम के अनुसार $कयामत तक कब्र में इंतजार करने के लिए। जरुरी नहीं है की मानव ने जन्म लिया तो 100 वर्ष जियेगा, गर्भ में ही समापन भी हो सकता है, जन्म लेते ही मर भी सकता है, बालपन में अथवा युवा अथवा वृद्ध अवस्था में कभी भी और कहीं भी मर सकता है। इसको क्यों आया है नहीं मालूम, क्या करने आया है नहीं मालूम, किसने भेजा है नहीं मालूम, अगले पल में क्या होगा नहीं मालूम, फिर भी जब तक श्वास-प्रश्वास चलता है, सोचता, विचरता, विचारता, लड़ता, झगड़ता, सोता, जागता, कुछ कुछ निर्देशित अथवा स्वेच्छा से कार्य करता रहता है और फिर अज्ञात में विलीन हो जाता है, यह ही सनातन है, बाकी सब तो मानव ने अरबों वर्ष पहले से बीज रूप में संजोय अपरिमित ज्ञान और व्यवस्था शृंखलाओं के काल और परिस्थिति जन्य अनुभवों के संस्मरण के संरेखित छोड़े हुए पद्चिन्ह ही तो हैं! तो फिर सभी सनातन, हिन्दू, जैन, बुद्ध, ईसाई, मुसलमान, चार्वाक, कम्युनिस्ट! सभी के सभी उस परम सत्ता के संतान जो एक कोशीय जैव से परिस्कृत होते-होते मानव और देवत्व के अनवरत आवागमन चक्र में अज्ञात समय से आते-जाते रहे हैं और अज्ञात समय तक आते जाते रहेंगे! अस्तु।। 

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