गीता वाक्य

गीता वाक्य

प्रफुल्ल चंद्र कुँवरबागी

रेशमी शहर, भागलपुर, बिहार

पार्थ धर्म जब भूलते, बन जाते निरुपाय।
योगेश्वर सुमिरन करें, गीता के अध्याय।।१।।
 
जीवन के प्रतिदिन नए, उलझन चक्कर-व्यूह।
शिथिल करे मस्तिष्क को, स्मरण होता दुरूह।।2।।
 
‘‘लाइफ  मैनेजमेण्ट’’हित, भगवद् गीता ज्ञान।
श्रीकृष्ण ने दिया था, कुरुक्षेत्र मैदान।।३।।
 
दुनियाभर की हर बला, सुलझाता यह गान।
बनी समस्या विस्मरण, देता सुलभ निदान।।४।।
 
करें ईश को समर्पित, अपने सारे कर्म।
फल की चिंता मत करें, गीतायन युगधर्म।।५।।
 
मानस निर्मल, संतुलित, नित सात्विक आहार।
स्थिर चित्त स्वामी बने, मानव इस संसार।।६।।
 
कर्म मात्र अधिकार तव, करें मान कर्तव्य।
फल तज आलस सहज, गीता का मन्तव्य।।७।।
 (अध्याय 2/47)
 
जीव मात्र से मित्रता, सबपर करुणावान।
अहं और ममता रहित, सुख-दुख सम, क्षमवान।।८।।
(अध्याय 12/13)
आयु, बल, आरोग्य, सुख, शुद्धि, प्रीतिकर अन्न।
रसा, स्निग्ध, सात्विक अशन, मन स्थिर, रहे प्रसन्न।।९।।
(अध्याय 17/8)
 
करें कर्तव्य मानकर, यदि हम अपने काम।
मन थिर होते शांत जब, दे बढिय़ा परिणाम।।१०।।
 
जीवन से संतुष्ट मन, सबसे मृदु व्यवहार।
मनोचिकित्सक सब कहें, विस्मरण के उपचार।।११।।
 
मन को करते हैं व्यथित, दोनों हर्ष-विषाद।
मनस-पटल धूमिल करें, भूले-बिसरे ‘‘याद’’ ।।१२।।
 
अतिसंग्रह की कामना, मनमाफिक परिणाम।
क्षमता हर मस्तिष्क की, देते दुष्परिणाम।।१३।।
 
ईश समर्पित कर्म से, रहते स्थिर जब चित्त।
मानस सेहत वृद्धि कर, आशंका निर्लिप्त।।१४।। 
 
 
 

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