महाकुम्भ पर दैवीय शक्तियों से प्रार्थना राष्ट्र का मंगल हो व सनातन धर्म युगधर्म बने
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144 वर्ष बाद तीर्थराज प्रयागराज में महाकुम्भ का महायोग बना है, जो एक दिव्य संयोग है। इस महायोग के अवसर पर त्रिवेणी में स्नान कर पुण्य लाभ के लिए लगभग 50 करोड़ लोगों ने देश-विदेश से सहभागिता की। परम पूज्य योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज ने भी श्रीगुरुकाष्र्णि कुम्भ मेला शिविर, प्रयागराज में योग का महाकुम्भ चलाया जिसमें श्रद्धालुओं ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया। महाकुम्भ में जहाँ एक ओर देश के शीर्ष संतों ने अमृत स्नान किया तो वहीं केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह सहित अनेक राजनेताओं तथा देश की बड़ी हस्तियों ने आस्था की डुबकी लगाई।
यह सनातन का गौरव काल, अमृत काल है
इस अवसर पर परम पूज्य स्वामी जी महाराज ने कहा कि देश के यशस्वी गृहमंत्री आदरणीय श्री अमित शाह जी की रग-रग में हिन्दुत्व बसा हुआ है। सनातन के इस महापर्व पर जिस श्रद्धा भक्ति के अभिलेख से सनातन को गौरव देते हुए उन्होंने अपने हिन्दुत्व व सनातन को सार्वजनिक रूप से भी अभिव्यक्त किया है।
उन्होंने कहा कि पहले लोग ऐसे सार्वजनिक अनुष्ठानों में देश के प्रशासक, देश के राजा कहो या रूलर कहो, वो सामने नहीं आते थे, वो इन अनुष्ठानों में भाग लेने में कतराते थे, अपने आप में शर्म महसूस करते थे। हमारे देश के प्रधानमंत्री श्रद्धेय श्री मोदी जी और आदरणीय अमित शाह जी ने उस पूरी कुण्ठा, आत्मग्लानि की परम्परा को तोड़ा है और अपने आप को सनातन धर्म से जोड़ते हुए बड़े गर्व के साथ कहा है कि मैं हिन्दू हूँ, मैं सनातनी, ऋषियों का वंशधर हूँ । उन्होंने अपनी आस्था को भी सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है। यह सनातन का गौरव काल, अमृत काल है।
राष्ट्र का मंगल हो व हमारा सनातन धर्म युगधर्म बने
महाकुम्भ में दैवीय शक्तियों के आशीष के रूप में जो अमृत बरस रहा है, उनकी कृपा बरस रही है उस कृपा से अपने आप को माननीय गृह मंत्री ने अभिसिंचित किया। श्री शाह ने सभी श्रद्धेय आचार्य महामण्डलेश्वरों के साथ संगम में स्नान व पूजा अर्चना की। उन्होंने प्रार्थना की कि पूरे राष्ट्र का मंगल हो व हमारा सनातन धर्म युगधर्म बने। सब संत महापुरुषों ने श्री अमित शाह को अपने आशीषों से अभिशिक्त किया।
महाकुम्भ मात्र जल से स्नान नहीं अपितु ज्ञानयोग, भक्तियोग, प्रेम, करूणा और मैत्री का संगम है
महाकुम्भ मात्र जल से स्नान नहीं अपितु योग, ध्यान, सेवा-सुमिरन और जप-तप से अपनी ऊर्जा का उध्र्वारोहण करना है। यही संगम है, ज्ञानयोग, भक्तियोग, प्रेम, करूणा और मैत्री का। ये संगम ऋग्, साम, यर्जु की जो त्रै विद्या है और मनसा-वाचा-कर्मणा पवित्र रह करके शरीर से, इंद्रियों से, मन से, आत्मा को उस परमात्मा से मिला देना इसका यह महा संयोग है। केवल मात्र स्नान ही नहीं स्नान करते-करते यह संकल्प लें कि मैं अपने जीवन से कम से कम किसी एक बड़े दोष को त्यागने का संकल्प लेता हँू। साथ ही किसी एक बड़े सद्गुण को धारण करने का संकल्प लें। व्रतों और संकल्पों के साथ कुम्भ में स्नान करें। अन्यथा तो लोग आते हैं और नहा कर चले जाते हैं। कुछ कुप्रथाएँ भी हैं जिनमें हमें सुधार करना है, कोई चिलम आदि पीकर व्यसन में लिप्त है, कोई ऐसे कार्य कर रहा है जो हमारी सनातनी संस्कृति एवं हमारी मूल प्रकृति, और हमारी सात्विकता के अनुरूप नहीं है। हमें इन सब पर ध्यान नहीं देना है। पूरे संसार में सात्विक, तामसिक एवं राजसिक तीनों प्रकार के दृश्य मिलेंगे लेकिन आपको अपनी ग्राह्यता पर केन्द्रित रहना है। यहाँ इस कुम्भ में दैवियों शक्तियों का एक दिव्य संयोग सैकड़ों वर्ष के बाद बना है और उस दैवी संयोग को, उस स्पर्श करके उसे अनुग्रहित करें तो आपको इस कुम्भ में आने का लाभ प्राप्त होगा।



