शास्त्रों में प्राणायाम के लक्षण

शास्त्रों में प्राणायाम के लक्षण

प्रो. साध्वी देवप्रिया

संकायाध्यक्षा- मानविकी एवं प्राच्य विद्या संकाय

पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार

प्राणायाम शब्द की निष्पत्ति- अर्थात् प्राणस्य आयाम: प्राण+आङ्+यम+घञ्= प्राणायाम। यम- संयमने धातु से घञ् प्रत्यय करने पर प्राणायाम शब्द की निष्पत्ति होती है।
योगदर्शन-
योग के आठ अङ्गों में आसन की सिद्धि हो जाने के पश्चात् प्राणायाम का क्रमश: अनुष्ठान किया जाता है। महर्षि पतंजलि जी प्राणायाम का लक्षण बताते हुए कहते हैं-
तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम:।। 2.49।।
अर्थात् आसन के सिद्ध हो जाने पर श्वास-प्रश्वास की गति का विच्छेद = क्रम भङ्ग = अर्थात्  गते: प्रवाहस्य भङ्ग:- छेदनम् इति प्राणायाम: अर्थात् श्वास-प्रश्वास की स्वाभाविक गति का भेद (छेदन) हो जाना ही प्राणायाम है।
 
अग्नि पुराण-
नासिकापुटमङ्गुल्याऽपीड्यैव परेण च। 
औदरं रेचयेद्वायुं रेचनाद्रेचक: स्मृत:।।7।।
बाह्येन वायुना देहं दृतिवत्पूरयेद्यथा। 
तथा पूर्णश्च सन्तिष्ठेत्पूरणात्पूरक: स्मृत:।।8।।
मुञ्चति गृति वायुमन्तर्बहि: स्थितम्। सम्पूर्णकुम्भवत्तिष्ठेदचल: तु कुम्भक:।।9।।
शरीर के अन्दर रहने वाली वायु को प्राण कहते हैं। उसे रोकने का नाम आयाम है। अत: प्रणायाम का अर्थ हुआ प्राणवायु को रोकना। उसकी विधि इस प्रकार है- अपनी अंगुलि से नासिका के एक छिद्र को दबाकर दूसरे छिद्र से उदरस्थित वायु को बाहर निकालें। रेचन अर्थात् बाहर निकालने के कारण इस क्रिया को रेचक कहते हैं। तत्पश्चात् धौंकनी के समान शरीर को बाहरी वायु से भरें और कुछ समय तक रोकें, इस क्रिया को पूरक कहते हैं। जब अन्त:स्थित वायु को छोड़ा जाये, ही बाहर स्थित वायु को अन्दर लिया जाये, अपितु परिपूर्ण कुम्भ के समान निश्चल रहा जाए, उसे कुम्भक कहते हैं।
 
स्कन्दपुराण-
एवं संसाध्य नियमान् सयमांश्च विचक्षण: 
प्राणायामाय सन्दध्यान्नान्यथा योगसाधक:।।26।।
यतोऽशुचिशरीरस्य वायुकोपो महान्भवेत्। 
वायुकोपात्कुष्ठता जड़त्वादीनुपाश्नुते।।27।।
तस्माद्विचक्षण: शुद्धं कृत्वा देहं यतेत्परम्।
प्राणायामस्य वक्ष्यामि लक्षणं शृणु पाण्डव।।28।।
प्राणापाननिरोधश्च प्राणायाम: प्रकीर्तित:
लघुमध्योत्तरीयाख्य: धीरैस्त्रिधोदित:।।29।।
लघुर्द्वादशमात्रस्तु मात्र निमिष उन्मिष:
द्विगुणो मध्यमश्चोक्तस्त्रिगुणश्चोत्तम: स्मृत:।।30।।
बुद्धिमान् व्यक्ति यम-नियमों का पालन कर आसन-प्राणायाम का अभ्यास करे। अन्यथा योगसाधना में प्रगति नहीं होती। अशुचि देह से योगाभ्यास आरम्भ करने पर वायु का प्रकोप होता है। इससे कुष्ठ रोग तथा जड़तादि विकार हो जाते हैं। अत: विचक्षण व्यक्ति देहशोधनोपरान्त ही प्राणायाम में प्रवृत्त हो। हे अर्जुन! प्राणायाम का लक्षण सुनो- प्राण अपान नामक वायु का रोध करना ही प्राणायाम है। धीर जन इसे भी लघु मध्य तथा उत्तम भेद से त्रिविध कहते हैं। एक निमिष मात्र को एक मात्र कहते हैं। द्वादश-मात्रत्मक प्राणायाम लघु, इसका दुगुना होने पर (24 मात्रा) मध्यम तथा तिगुना हो जाने पर उसे उत्तम (36 मात्रा) कहते हैं।
 
विष्णुपुराण-
प्राणाख्यमनिलं वश्यमभ्यासात्कुरुते तु यत्।
प्राणयामस्य विज्ञेयस्सबीजोऽबीज एव च।।40।।
अभ्यास के द्वारा प्राण नामक वायु को जो अपने अधीन कर लेता है उसे ही प्राणायाम कहते हैं। उसके दो भेद होते हैं, सबीज और अबीज।
परस्परेणाभिभवं प्राणापानौ यथानिलौ।
कुरुतस्साद्विधानेन तृतीयस्संयमात्तयो:।।41।।
जब योगी सद्गुरु के उपदेश से प्राणायाम करते समय प्राण तथा अपान वायुओं का परस्पर में एक दूसरे से निरोध करता है, उस समय पूरक एवं रेचक नामक दो प्राणायामों का संयम होता है और जब वह दोनों का एक साथ संयोग करता है उस समय तीसरा कुम्भक प्राणायाम हो जाता है।
 
महाशिवपुराण-
मन्त्रयोग: स्पर्शयोगो भावयोगस्तथापर:
अभावयोग: सर्वेभ्यो महायोग: परो मत:।।7।।
मन्त्रयोग, स्पर्शयोग, अभावयोग तथा सबसे बड़ा महायोग माना गया है।
मन्त्रभ्यासवशेनैव मन्त्रवाच्यार्थगोचर:
अव्याक्षेपा मनोवृत्तिर्मन्त्रयोग उदाहृत:।।8।।
मन्त्र के अभ्यास से मन्त्र वाच्यार्थ गोचर होकर जो मन्त्र की वृत्ति स्थिर हो जाती है, उसी का नाम मन्त्रयोग है।
प्राणायाममुखा: सैव स्पर्शयोगोऽभिधीयते।
मन्त्रस्पर्शनिर्मुक्तो भावयोग: प्रकीर्तित:।।9।।
प्राणायामयुक्त वही मनोवृत्ति स्पर्शयोग कही जाती है। वही मन्त्र-स्पर्श से मुक्त प्राणायाम भावयोग कहा जाता है।।
 
बृहन्नारदीयपुराण-
एषामेकतमं बद्धवा गुरुभक्तिपरायण:
उपासको जयेत्प्राणान् द्वन्द्वातीतो विमत्सर:।।116।।
प्रामुखोदमुखो वापि तथा प्रत्यमुखोऽपि वा।
अभ्यासेन जयेत्प्राणान्नि:शब्दे जनवजर्जते।।117।।
प्राणो वायु: शरीरस्थ आयामस्तस्य निग्रह:
प्राणायाम इति प्रोक्तो द्विविध: प्रकीत्र्तित:।।118।।
इनमें से किसी एक आसन का चयन कर साधक को अभ्यास करना चाहिये। इससे गुरुभक्तिपरायण साधक प्राणजयी, द्वन्द्वातीत एवं मात्सर्य-रहित हो जाता है। एकान्त-निर्जन स्थल में पूर्वाभिमुख, उत्तराभिमुख अथवा पश्चिमाभिमुख आसन लगाकर निरन्तर अभ्यास करता हुआ प्राणवायु को वश में करे।
छान्दोग्य उपनिषद् के ऋषि कहते हैं-
प्राणो पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता।
प्राण: स्वसा प्राण आचार्य: प्राणो ब्राह्मण:।। (छान्दोग्य- 7.15.1)
दैहिक परिवर्तनों के साथ-साथ योग अर्थात् प्राण के विविध आयामों के द्वारा व्यक्ति के मन में जो भावनात्मक परिवर्तन आते हैं वे भी उतने ही प्रामाणिक एवं वैज्ञानिक हैं जितने कि भौतिक परिवर्तन।
शारीरिक रोगों के साथ डिप्रेशन (depression) स्किज़ोफे्रनिया (schizophrenia) जैसे भयंकर मनोरोगों से आक्रान्त व्यक्ति के लिए योग परम्परा के ऋषि कहते हैं:- मानव! तू प्राण की शरण में , प्राणायाम कर। यह प्राण पिता है, प्राण माता है, यह भ्राता स्वसा है। प्राण आचार्य ब्राह्मण है। यहां प्राणों का रूपकालंकार में वर्णन है।
 
 
 

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