श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...
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मनुष्य का मूल स्वभाव
1. मूल प्रकृति- मूल स्वभाव यह शब्द बार-बार सुनते रहते हैं। जैसे अग्नि की मूल प्रकृति दाहकत्व व ऊर्ध्वगमन की है, जल की मूल प्रकृति द्रवत्व अर्थात् बहना व शीतलता है।
जल के संयोग, संसर्ग या आरोप से अग्नि को शान्त किया जा सकता है, लेकिन उसके मूल स्वभाव को बदला नहीं जा सकता, इसी तरह जल के मूल स्वभाव द्रवत्व को फ्रीजर आदि से व इसके शीतलता गुण को अग्नि के संसर्ग से कुछ समय के लिए बाधित किया जा सकता है, कालान्तर में वह अपने मूल स्वभाव में लौट ही आता है। ऐसे ही मनुष्य की मूल प्रकृति या मूल स्वभाव क्या है? यह बहुत बड़ा प्रश्न सभी मनोवैज्ञानिकों, विचारकों व ऋषियों के सामने भी बार-बार आता है।
2. इस प्रश्न का उत्तर वेदों ने भी दिया-
'दृष्ट्वा रूपे व्याकरोत् सत्यानृते प्रजापति:।
अश्रद्धामनृतेऽदधाच्छ्रद्धाइ सत्ये प्रजापति:।।
(प्रजापति:) सब जगत् का अध्यक्ष जो ईश्वर है, सो (सत्यानृते) सत्य अर्थात् धर्म और असत्य अर्थात् अधर्म जिनके प्रकट और गुप्त लक्षण है। (व्याकरोत्) उनको ईश्वर ने अपनी सर्वज्ञ विद्या से, विचार से देख कर सत्य और झूठ को अलग-अलग किया है। जो इस प्रकार है कि (अश्रद्धाम्) हे मनुष्य लोगों! तुम सब दिन अनृत अर्थात् झूठ अन्याय के करने में श्रद्धा अर्थात् प्रीति कभी मत करो। वैसे ही (श्रद्धां स.) सत्य अर्थात् जो वेद शास्त्रोक्त, और जिसकी प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से परीक्षा की गई हो या की जाय, वही पक्षपात से अलग न्यायरूप धर्म है, उसके आचरण में सब दिन प्रीति रखो और जो-जो तुम लोगों के लिये मेरी आज्ञा है, उस-उस में अपने आत्मा, प्राण और मन को सब पुरुषार्थ तथा कोमल स्वभाव से युक्त करके सदा सत्य ही में प्रवृत्त करो।
महर्षि दयानन्द सरस्वती भी कहते हैं प्रत्येक मनुष्य की आत्मा सत्य-असत्य को जानने वाली है।
उपनिषदों में ऋषियों ने कहा है- तत्त्वमसि श्वेतकेतो।
प्रज्ञानं अयमात्मा, अहंब्रह्मस्मि, शिवोऽहम् शिवोऽहम्।
सब शास्त्रों व ऋषियों की एक जैसी ही मान्यता व सिद्धान्त है कि मनुष्य की मूल प्रकृति या मूल स्वभाव नित्य शुद्ध-बुद्ध आनन्दमय, शान्तिमय व दिव्य है।
3. सामान्य रूप से एक साधारण, बिना पढ़े-लिखे व्यक्ति से लेकर विद्वान् तक सबके अनुभव में एक बात आती है कि प्रत्येक मनुष्य की आत्मा में परमात्मा सदा ही सत्य प्रेरणा या शुभ दिव्य प्रेरणा देता है तथा प्रत्येक व्यक्ति उस प्रेरणा के अनुरूप ही जीना भी चाहता है। यदि अज्ञान या अशुभ के प्रभाव के कारण कोई अपनी अन्तरात्मा की आवाज, पुकार या प्रेरणा के विपरीत आचरण करता है, तो उसकी आत्मा उसको धिक्कारती है।
अत: हम सबका मूल स्वभाव या मूल प्रकृति शुभ या दिव्यता ही है। योग, अध्यात्मिकता, आस्तिकता, शुभ, दिव्यता, सदाचार, साधना, सेवा, योग, कर्मयोग, पुरुषार्थ, तप, कृतज्ञता, सत्यनिष्ठा व सत्याचरण ही हमारा मूल स्वभाव, सहज स्वभाव या मूल प्रकृति है।
बार-बार इस शाश्वत या नित्य सत्य पर हमारा ध्यान जाना चाहिए, इसके प्रति पूर्ण सजगता या जागरुकता होनी ही चाहिए। भोग, आत्मविमुखता, अशुभ, अदिव्यता, असत्य, कृतघ्नता, हिंसा, झूठ, अनाचार व असत्याचरण ये संसर्ग से बसे हैं, इन सबसे भी दु:ख पाकर अन्तत: हमें अपने मूल स्वभाव, सहज सम्पर्क में ही लौटना पड़ेगा।
भगवान् से मानव मात्र के लिए यही प्रार्थना है कि सभी दिव्य आत्माएं अपने दिव्य स्वभाव या सहज स्वभाव, दिव्य मूल प्रकृति को पहचान कर पूर्ण दिव्यता का जीवन जीएं, स्वयं पूर्ण सुखी रहें और संसार में सबके सुख, शान्ति, समृद्धि व सुरक्षा के लिए पुरुषार्थ करें। चारों ओर शुभ व दिव्यता का साम्राज्य हो।
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