बाल्यावस्था में शिष्य के कर्तव्य
वंदना बरनवाल, राज्य प्रभारी
महिला पतंजलि योग समिति - उ.प्र.(मध्य)
भारतीय आध्यात्मिक इतिहास की एक अत्यंत रोचक एवं प्रेरक घटना है। राजा शुद्धोधन, सिद्धार्थ गौतम के पिता थे, जिन्हें बाद में गौतम बुद्ध के नाम से जाना गया। एक बार की बात है उन्होंने अपने पुत्र अर्थात् गौतम बुद्ध के ज्ञान से प्रभावित होकर उनसे पूछा कि क्या मैं भी आपसे ज्ञान प्राप्त कर सकता हूँ, आपका शिष्य बन सकता हूँ। बुद्ध ने उत्तर दिया, हाँ आप शिष्य अवश्य बन सकते हैं और साथ ही ज्ञान भी प्राप्त कर सकते हैं किन्तु जब आप आयें तो आपको एक बात का ध्यान रखना होगा कि आप पिता बनकर नहीं अपितु शिष्य बनकर के ही आयें। आप यह सोचकर मत आइयेगा कि आप पिता हैं और मैं आपका पुत्र बल्कि आप यह धारणा बनाकर आइयेगा कि एक जलते हुए दीपक के समक्ष एक बुझा हुआ दीपक आ रहा है और वह बुझा हुआ दीपक स्वयं के भीतर एक नये प्रकाश को धारण करने की उत्कट इच्छा रखता है। उन्होंने कहा कि जब आपका मन स्वयं को प्रकाशित करने के लिए दृढ़ता के साथ बन जाए तो आप मेरे पास अवश्य आयें, मैं आपको शिष्य बनाकर ज्ञान प्राप्ति की आपकी इच्छा को अवश्य पूर्ण करूँगा। किन्तु आप यदि इस अहंकार के साथ आयेंगे कि आप पिता हैं और मैं आपका पुत्र हूँ तो आप ‘आ’ तो सकते हैं लेकिन ‘पा’ नहीं सकते।
बुद्ध और उनके पिता के बीच घटित यह छोटी सी घटना हमें ज्ञान और कर्तव्य दोनों का मिश्रित दर्शन करवाती है। अगर ज्ञान दर्शन में ज्ञान प्राप्ति के लिए जहाँ हमें अपने भीतर के ‘मैं’ को हटाकर शिष्यत्व के भाव के साथ स्वयं को शिष्य बनाना होता है तो वहीं एक पिता और साथ ही एक राजा होने के बावजूद भी जीवन भर सीखने और सीख को धारण करने की प्रक्रिया शिष्य होने के कर्तव्य के दर्शन को प्रकट करती है। इसके साथ ही यह घटना इस बात को भी स्थापित करती है कि सीखने की कोई उम्र सीमा निर्धारित नहीं पर इतना अवश्य है कि ज्ञान की प्राप्ति के लिए मन की अवस्था को शिष्यत्व का भाव लिए बाल्यावस्था के मन की तरह निर्मल होना चाहिए।
जीवन का अनोखा काल
वास्तव में बाल्यावस्था जीवन का अनोखा काल है और यही जीवन का निर्माण काल भी है। मनोवैज्ञानिकों ने ज्ञान की दृष्टि से बाल विकास को तीन अवस्थाओं शैशवावस्था, बाल्यावस्था एवं किशोरावस्था में बाँटा है। शैशवावस्था में संस्कारों के जिस बीज को रोपा जाता है, बाल्यावस्था में वही बीज अंकुरित होने लगते हैं जिससे बालक के व्यक्तित्व के निर्माण की शुरुआत हो जाती है। शैशवावस्था के बाद बाल्यावस्था का आरंभ होता है। और इसका काल 6 से 12 वर्ष की आयु का माना जाता है। बालक में इस अवस्था में ही विभिन्न आदतों, रुचियों एवं इच्छाओं के प्रतिरूपों का निर्माण होता है। बाल्यावस्था को भी दो भागों में बांटा गया है, प्रथम 6 से 9 वर्ष तक की अवस्था जिसको कि पूर्व बाल्यावस्था कहते हैं एवं द्वितीय 9 से 12 वर्ष तक की अवस्था जिसको उत्तर बाल्यावस्था कहा गया है। एक बच्चा जैसे जैसे शैशवावस्था से बाल्यावस्था में प्रवेश करता है, वह अपने आसपास के वातावरण को समझने लगता है और साथ ही स्वयं में आत्मनिर्भर महसूस करने लगता है। इस अवस्था में आने के साथ ही बालक के जीवन में स्थायित्व आने लगती है और बच्चे में कुछ ऐसे परिवर्तन आते हैं जिन्हें सरलता से समझ पाना आसान नहीं होता। इसीलिए यह माना जाता है कि बाल्यावस्था ही वह समय है जब व्यक्ति के आधारभूत दृष्टिकोण व मूल्यों और आदर्शों का बहुत सीमा तक निर्माण हो जाता है। इसीलिए संस्कार एवं ज्ञानार्जन के दृष्टिकोण से जीवन चक्र में बाल्यावस्था सर्वाधिक महत्वपूर्ण अवस्था मानी गयी है जिसकी अपनी अलग विशेषता, गुण और कर्तव्य है। अपनी इन्हीं विशेषताओं के साथ जब बालक वयस्क बन जाता है तो वह केवल स्वयं के लिए ही नहीं अपितु परिवार, समाज और साथ ही साथ राष्ट्र के निर्माण में भी अहम भूमिका निभाता है।
बाल्यावस्था की विशेषताएं एवं गुण -
बाल्यावस्था तो स्वयं में ही विशेषताओं और गुणों से भरी हुई होती है। यह अवस्था एक बच्चे के विकास की कहानी गढ़ रही होती है क्योंकि शैशवावस्था के अंतिम वर्ष से ही उसके भीतर सामाजिक भावना के विकास का प्रारंभ होने लगता है जो कि बाल्यावस्था में पहुँचते-पहुँचते काफी हद तक निखर कर सामने आता है। इस निखार के पश्चात बालक समाज में रहने एवं बोलने का ढंग, आदर-सम्मान, प्रतिष्ठा आदि को समझने लगता है और स्वयं को स्वतंत्र एवं निश्चित व्यक्तित्व में ढ़ालने लगता है। शैशवावस्था में बालक जहाँ नैतिकता के अभाव में रहता है, सही गलत के अंतर को नहीं जानता तो वहीं बाल्यावस्था के आरंभ से ही बालक में नैतिक गुणों का विकास होने लगता है। इस प्रकार देखा जाये तो बाल्यावस्था मानव जीवन के विकास की एक अहम किन्तु नाजुक अवस्था है। अहम इसलिए क्योंकि यह बीज के अंकुरण का समय होता है और नाजुक इसलिए क्योंकि जरा सी असावधानी उसके विकास की दिशा बदल सकती है। इस अवस्था में बालक के मूल्य, उसके आदर्शों और दृष्टिकोणों का निर्माण भी होता है और ये सब मिलकर उसके भविष्य को निर्धारित करते हैं। अत: शैक्षिक दृष्टि से यह अवस्था अत्यंत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि प्राप्त शिक्षा और ज्ञान से ही बच्चे का उचित रूप से सर्वांगीण विकास हो पाता है। भारत के प्राचीन इतिहास में गुरुकुलों में प्रवेश से लेकर वर्तमान में विद्यालय में प्रवेश तक बाल्यावस्था को इसीलिए केंद्र में रखा गया और इसी अवस्था से ही बालक को उसके कर्तव्यों का बोध करवाया जाता है क्योंकि इस अवस्था में एक बालक का मन नदी कि तरह पवित्र तथा सरल होता है।
कत्र्तव्य-बोध से तात्पर्य -
कत्र्तव्य-बोध से तात्पर्य है आत्मप्रेरणा से संवेदनापूर्वक अपने दायित्वों का निर्वहन करना। कत्र्तव्य का बोध उन्नति की ओर ले जाने का माध्यम तो है ही साथ ही यह परिवार, समाज और देश के लिए कुछ अच्छा करने का मार्ग भी प्रशस्त करता है। कल्पना कीजिए कि यदि शिक्षक-विद्यार्थी, गुरु-शिष्य अपने-अपने कत्र्तव्यों से कतराने लगें तो इसमें कैसी विशृंखलता की सृष्टि होगी, इसका सहज ही अनुमान किया जा सकता है। कत्र्तव्य का पालन ही तो हमें जीवन की मर्यादाओं का पालन करते हुए जीवन जीने की कला सिखाती है जिसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण रामायण और श्रीमद्भगवद्गीता जैसे ग्रन्थ हैं। रामायण हमें जहाँ मर्यादित जीवन जीने का पाठ पढ़ाती है तो वहीं श्रीमद्भगवद्गीता जीवन जीने की कला सिखाती है। वैसे तो श्रीकृष्ण और अर्जुन मित्रों की भाँति साथ-साथ खेलते-कूदते बड़े हुए परन्तु कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में जब अर्जुन पूर्णत: उद्विग्न हो गए और उनके भीतर का शिष्य जाग उठा, तब उन्होंने श्रीकृष्ण को गुरु रूप में स्वीकार किया और तब श्रीकृष्ण ने युद्ध मैदान के बीचोबीच रथ खड़ाकर उपदेश देकर अर्जुन को कत्र्तव्य का पथ दिखाया। यह घटना हमें सिखाती है कि ज्ञान प्राप्ति के लिए हमें अपने भीतर एक शिष्य का भाव जागृत करना होता है। अर्जुन के भीतर शिष्यत्व के जागने पर ही श्रीकृष्ण ने उन्हें गीतोपदेश दिया। संवाद के दौरान अर्जुन यह भी कहते हैं कि भगवन मैं केवल शिष्य ही नहीं हूँ आपके शरण में भी हूँ। अर्थात् निष्कर्ष यही है कि शिष्यत्व के लिए अपने कत्र्तव्य पथ पर चलते हुए अनन्य शरणत्व की भावना जगानी होती है।
शिष्यत्व के मायने -
गुरु और उनके बारे में तो हम सभी बहुधा चर्चा करते रहते हैं क्योंकि गुरु के बगैर गुरुत्व और गुरुत्व के बगैर गुरुत्वाकर्षण का कोई मतलब नहीं अर्थात् जीवन ही शून्य हो जाता है। परन्तु शिष्य और शिष्यत्व पर हम उतनी चर्चा नहीं करते। शिष्यत्व गहन विनम्रता का ही दूसरा नाम है। शिष्य का अर्थ है, जो सीखने के लिए राजी हो, झुकने को तैयार हो। जिसके लिए ज्ञान, अहंकार से कहीं ज्यादा मूल्यवान हो और वह इस भावदशा में जीता हो कि शिष्यत्व की साधना के लिए सब कुछ खोने के लिए तैयार रहे, यहाँ तक कि अपने आप को भी देने के लिए तैयार रहे। अर्थात् शिष्य वही है जो अपने को झुकाकर, स्वयं को पात्र बना लेता है। गुरु और शिष्य के संबंधों को भारत ने सदियों से जिया और देखा है। हमारी संस्कृति ने इसे अध्यात्म के गहरे अर्थों में हासिल किया है और इसमें शिष्यत्व को शिवत्व तक से जोडक़र देखा है। शिवत्व अर्थात् अपने भीतर के शिव का आत्मसाक्षात्कार करना। शिवत्व अर्थात सायं का अनुभव, परम लक्ष्य की प्राप्ति। शिष्यत्व का अर्थ समर्पण भी है, गहन विनम्रता भी है और शरणत्व भी है। शिष्य संजीवनी शिष्यों के लिए प्राणदायिनी औषधि है। इसीलिए जीवन में सबसे बड़ी साधना शिष्यत्व की होती है और इसे सिद्ध करने के लिए समर्पण की आवश्यकता होती है। समर्पण का तात्पर्य अपने सर्वस्व के समर्पण से है और यह तभी संभव है जब बाल्यावस्था से ही एक शिष्य को उसके गुणों के अनुरूप उसके कर्तव्य का बोध करवाया जाये।
शिष्यत्व कैसे आता है -
गुरु बनाना सरल है पर स्वयं को शिष्य बनाना कठिन है और उससे भी कठिन है स्वयं के भीतर शिष्यत्व को जागृत कर देना। हमारे पौराणिक ग्रन्थ शिष्य और उनकी विशेषताओं से भरे पड़े हैं। राम के दल में अनेक लोग थे, पर सभी राम की निजता के अनुरागी थे, क्योंकि वे राम को महामानव रूप में देखते हैं, लेकिन हनुमान को राम से अधिक राम का काज प्रिय था। गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते भी हैं, ‘राम काज करिबे को आतुर’। उन्होंने ऐसा इसलिए लिखा क्योंकि हनुमान में राम के प्रति गहरी श्रद्धा और शिष्यत्व दोनों ही थी। हनुमान श्रद्धा के बल पर साहसी थे, सद्संकल्प एवं समर्पण के धनी थे यानि वह एक ऐसे शिष्य थे जिनमें लेश मात्र का कर्तृत्व अभिमान नहीं था। प्रभु स्मरण, प्रभु समर्पण, प्रभु कार्य ही उनके जीवन का सार था, जीवन का लक्ष्य था। इसी श्रद्धामय समर्पण के बल पर उन्होंने अपनी भावना को राम के प्रति गुरुत्वमय पराकाष्ठा पर पहुंचाया। जब गुरु के प्रति श्रद्धा की यह सीमा आ जाये तो वह स्वत: ही शिष्य को उच्च आध्यात्मिकता तक पहुंचा देती है। ऐसे शिष्यत्व की कोई डिग्री नहीं होती जिसे दुनिया के सम्मुख प्रदर्शित किया जा सके और ऐसे शिष्य में कोई चाहत भी नहीं होती कि लोग उसे उसके अपने गुरु के शिष्य के अतिरिक्त किसी अन्य रूप में पहचानें। ऐसा शिष्यत्व तभी जाग्रत होता है जब गुरु और गुरु कार्य में अपार श्रद्धा, अपार विश्वास और अपार समर्पण की भावना होती है। एकलव्य को जब द्रोणाचार्य ने शिष्य मानने से इंकार कर दिया तो एकलव्य ने कहा, ‘ठीक है आपने मना कर दिया गुरु बनने से, मैं तो शिष्य बन चुका’। एकलव्य ने अपनी सारी बुद्धि और तर्क को एक तरफ रख कर द्रोणाचार्य की मिट्टी की प्रतिमा को गुरु मानकर वह सब कुछ सीख लिया जो अर्जुन भी उनसे साक्षात नहीं सीख सके। एक शिष्य द्वारा श्रद्धापूर्वक अपनी समझ शक्ति और निर्णय शक्ति को अपने गुरु के प्रति समर्पित करने का ही परिणाम था जिसके कारण गुरु का सम्पूर्ण आयाम शिष्य में फलीभूत होता दिखलाई पड़ता है।
श्रद्धावान लभते ज्ञानं -
गुरु अपने शिष्य में सर्वप्रथम जो गुण देखते हैं वो है शिष्य की पात्रता। पात्रता के बाद उसकी शरणागति और फिर श्रद्धा। ये तीन ऐसे गुण हैं जो एक गुरु अपने शिष्य के भीतर देखना चाहते हैं। इसलिए जब बात हो शिष्य के कर्तव्यों और उसके पालन की तो उसे अपने मूल में हमेशा इन तीन सूत्रों को लेकर चलना चाहिए। पात्र कैसे बना जाये इसके लिए क्या सीखना हैं, क्यों सीखना है और कैसे सीखना है इसकी समझ विकसित करनी होगी। यदि किसी का अपने शरीर के ऊपर ही केवल ध्यान है तो उस प्रकार की पात्रता तैयार करनी होती है। यदि कोई मानसिक शक्तियों को समझना चाहता है जो मन से सम्बन्ध रखते हों तो उस प्रकार की पात्रता तैयार करनी होगी। जबकि अध्यात्म के लिए अध्यात्मिक पात्रता तैयार करनी होती है। जब तक आप पात्र नहीं होंगे तब तक आप ज्ञान को ले ही नहीं पाएंगे। इसलिए बाल्यावस्था में एक शिष्य का सबसे पहला कर्तव्य है कि वह गुरु के सानिध्य में रहकर स्वयं को पात्र के रूप में विकसित करे क्योंकि पात्र होना सबसे महत्वपूर्ण है। मटका बनाने के बाद उसको ठीक से पकाया नहीं जाए और या फिर उसमें छेद हो, दोनों ही परिस्थितियों में उसमें कितना भी पानी डाला जाये, मटका कभी नहीं भर सकता। इसलिए एक शिष्य को स्वयं को ऐसे पात्र के रूप में ढालना चाहिए जिसमें कोई रिसाव नहीं हो अन्यथा गुरु से प्राप्त होने वाला ज्ञान व्यर्थ चला जायेगा। संत कबीर ने अपने दोहे में कहा भी है, ‘गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढि़ गढि़ काढ़ै खोट, अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट’।
सिख परंपरा में एक शब्द चलता है गुरुमुख होना जिसका अर्थ होता है ऐसा व्यक्ति जिसका मुख गुरु की ओर हो। अर्थात् सार बस यही है कि बाल्यावस्था से ही अपने आपको गुरुमुखी बनाया जाये, एक शिष्य का यही सबसे बड़ा कर्तव्य है। क्योंकि जब बालक गुरुमुखी हो जायेगा तो शेष तो गुरु स्वयं संभाल ही लेंगे। जीवन भर गुरु विमुख करने वाले तो बहुत से लोग मिलते रहेंगे परन्तु गुरु सम्मुख करने वाले लोग बहुत कम ही मिलेंगे। इसलिए जैसे सूरजमुखी के फूल अपना मुख उधर करके ही खड़े रहते हैं जिधर से सूरज निकलता है उसी प्रकार बाल्यावस्था से ही स्वयं को एक ऐसे शिष्य के रूप में ढालें जिसका मुख गुरु की ओर हो, सफलता का यही मूल मन्त्र है।


