अपनों को दें प्यार दिव्य पुस्तकों का उपहार
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पंकज ‘स्वदेशी’
दिव्य प्रकाशन, पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार
योगिराज भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में कहा है- ‘ ऋते ज्ञानान् न मुक्ति:’ अर्थात् ज्ञान के बिना मुक्ति मिलना सम्भव ही नहीं है। ज्ञान को प्राप्त करने के दो मार्ग है- महान् गुरुओं का ‘सानिध्य’ और साहित्यों पुस्तकों का ‘स्वाध्याय’। महान् गुरु की कृपा मिलना यह परम सौभाग्य की बात है, परन्तु साहित्य सभी स्थानों पर सर्वत्र सहजता से उपलब्ध हैं। ज्ञान का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं-पुस्तकें। प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार अध्ययन करके अपने ज्ञान क्षितिज का विस्तार कर सकता है। हमें ऋषि-मुनियों, दार्शनिकों, चिन्तकों और साहित्यकारों के विचार मुद्रित रूप में उपलब्ध हैं। अत: हम उनका अध्ययन करके अपने जीवन को श्रेष्ठ बना सकते हैं ।
कुसंगति से बुरा हमारे जीवन के लिए कुछ नहीं हो सकता, जीवन की दुर्गति का प्रमुख कारण ही कुसंगति है। इसीलिए कहा भी गया है- Better alone than in a bad company अर्थात् कुसंगति से एकान्त कहीं ज्यादा उत्तम है। पुस्तकें एकान्त की सबसे अच्छी मित्र हैं, जो हमारे जीवन के परम शिखर की राह प्रशस्त करती है और बदले में हम से कुछ भी नहीं चाहती। वे इस लोक का वर्तमान का जीवन सुधारने और परलोक का जीवन संवारने की शिक्षा देती है।
पुस्तकें साहस, धैर्य, ओजस्वी, तेजस्वी, प्रकाशित जीवन प्रदान करती हैं। अन्धकार, निराशा, अवसाद, जीवन के विभिन्न दु:खों में हमारा मार्ग दर्शन कराती हैं। अच्छा साहित्य हमें अमृत की तरह प्राण शक्ति देता है। पुस्तकों के पढऩे से जो आनन्द मिलता है वह परमानंद के ही समान होता है। वेद, शास्त्र, दर्शन, उपनिषद्, भगवत् गीता आदि ग्रन्थ हमारे जीवन की अमूल्य निधि हैं। सृष्टि के आदिकाल से आज तक ये पुस्तकें हमारा मार्ग दर्शन कर रही हैं और हमारी सांस्कृतिक विरासत को कायम रखे हुए हैं।
बुद्धिमान् लोग वे हैं जो अपने खाली समय को अध्ययन और शास्त्र चर्चा में व्यतीत करते हैं। हमें केवल पुस्तकों का अध्ययन ही नहीं करना चाहिए बल्कि अध्ययन के पश्चात् मनन भी करना चाहिए। अध्ययन चिन्तन और मनन में गहरा संबंध है। अध्ययन के बिना चिन्तन परिष्कृत नहीं होता और चिन्तन के बिना अध्ययन का मूल्य नहीं।
पुस्तकें चरित्र निर्माण का सर्वोत्तम साधन हैं। उत्तम विचारों से युक्त पुस्तकों के प्रचार और प्रसार से राष्ट्र के युवा कर्णधारों को नई दिशा दी जा सकती हैं। देश की एकता और अखंडता का पाठ पढ़ाया जा सकता है और एक सबल राष्ट्र का निर्माण किया जा सकता है। सदमार्ग से भटकाने वाली पुस्तकों के अध्ययन से हमें स्वयं बचना चाहिए और दूसरों को भी बचाना चाहिए। जिस प्रकार गरिष्ठ भोजन शरीर को लाभ पहुँचाने के स्थान पर हानि पहुँचाता है उसी प्रकार सदमार्ग से भटकाने वाला साहित्य हमारी मानसिकता को विकृत कर देता है।
योगऋषि परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज एवं आयुर्वेद शिरोमणि परम श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के पावन दिव्य सानिध्य में ‘दिव्य प्रकाशन’अज्ञान रूपी अन्धकार से मनुष्य को निकाल कर ज्ञान रुपी दिव्य प्रकाश में लाने हेतु इन दो महान् युग पुरुषों के द्वारा स्वयं लिखे गए साहित्यों को प्रकाशित करने की दिशा में निरंतर अग्रसर है।
दिव्य प्रकाशन
दिव्य शब्द को जब हम सुनते है या इस शब्द पर विचार करते है तो हमारे मस्तिष्क में चमक, आलैकिक, दीप्ति युक्त, प्रकाशमान चित्र व चरित्र की सहज अनुभूति होती है। दिव्य हमें ऐसा प्रतीत होता है कोई हमारे जीवन को आनंद व खुशी से प्रकाशित करने वाला है और प्रकाशन शब्द के लिए कहें तो इसका शाब्दिक अर्थ है ‘प्रकाश में लाना’। यह संस्कृत की ‘प्रकश’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है फैलाना, विकसित करना। कहने का अभिप्राय है परम पूज्य स्वामी जी एवं परम श्रद्धेय आचार्य श्री जी द्वारा स्वयं लिखित दिव्य साहित्य को जिसमें हमारे महान् ऋषियों-पूर्वजों के महान् ज्ञान को प्रकाशित किया गया है, इस विद्या को हम जन-जन तक दिव्य प्रकाशन के माध्यम से उपलब्ध करवाने हेतु संकल्पित है। योग, आयुर्वेद एवं आध्यात्मिक विद्या का महासंगम है दिव्य प्रकाशन जिसके अंतर्गत सटीक जीवन शैली, सर्वोत्तम आहार विधि, योग-प्राणायाम एवं आयुर्वेद की वैज्ञानिक दृष्टिकोण से व्याख्या, रोगों के अनुसार उपचार-आहार-औषधी, दुखों के प्रमुख कारण राग-द्वेष-काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार को जीवन में समाप्त करने से लेकर जीवन के अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करने, आदि विभिन्न ज्ञानवर्धक विषयों पर 200 से भी अधिक पुस्तकों का भारत की लगभग प्रत्येक भाषा में बहुत ही सुन्दर अद्वितीय लेखन किया गया है। जो हमारे परिवार के प्रत्येक सदस्य छोटे बच्चों से लेकर पूज्य माता-पिता, वरिष्ठों, प्रिय परिजनों मित्रों सभी का मार्गदर्शन करने में समर्थ है।
विशेष त्योहारों (दीपावली, होली, रक्षा बंधन, विजयदशमी, ईद, क्रिसमस आदि) एवं विशेष अवसरों (जन्म दिन, विवाह, शादी की सालगिरह, गृहप्रवेश, प्रेग्नेंट बहनों हेतु आदि विशेष अवसरों) पर पुस्तकों से अच्छा उपहार कोई दूसरा हो ही नहीं सकता।
प्यारे बच्चों के जन्म दिन पर उपहार ऐसा
जो आपके प्यारे बच्चों के जीवन को शुभ संस्कारों, श्रेष्ठ उत्तम विचारों तथा जीवन में सदा सकारात्मक दृष्टिकोण से प्रकाशित करता रहे, जो उनके जीवन को नित नई ऊँचाइयाँ प्रदान करे।
प्यारे परिजनों एवं मित्रों को विशेष अवसरों पर उपहार ऐसा
जो उनके परिवार के प्रत्येक सदस्य का दिव्य मार्गदर्शन करें, उनके घर मंदिर की शोभा बढ़ाए, जो उनको मिलकर प्रेम से रहना तो सिखाएंगीं ही साथ-ही-साथ परिवार के प्रत्येक सदस्य को निरोगी स्वस्थ जीवन प्रदान करने में सहायक हो।
विवाह या विवाह की वर्षगाँठ उपहार ऐसा
जो उनके जीवन को आदर्श गृहस्थ जीवन जीने की दिशा व परस्पर दिव्य प्रेम से जीने के लिए मार्गदर्शन करें तथा उनके जीवन में आंतरिक दिव्य नित्य सात्त्विक खुशियों, प्रगति में सहायक हो। जो उनके जीवन में आकस्मिक उत्पन्न हुए दु:खों व समस्याओं में उनका मार्ग प्रशस्थ कर सके।
पूज्य माता-पिता एवं आदरणीय वरिष्ठों को उपहार ऐसा
जो उन्हें स्वस्थ, निरोगी व आनंदित जीवन प्रदान कर सके। जो उनके अकेलेपन में उनकी सबसे अच्छा व सच्चा मित्र बने। जो उनका अध्यात्म के रहस्यों से आसानी से परिचय करवा सके।
दिव्य प्रकाशन के अंतर्गत परम पूज्य स्वामी जी महाराज एवं परम श्रद्धेय आचार्य श्री जी द्वारा स्वयं लिखित ज्ञान वर्धक साहित्य आप हमारे पतंजलि मेगा स्टोर, चिकित्सालय एवं आरोग्य केंद्रों से प्राप्त कर सकते हैं। इन दिव्य साहित्यों एवं पुस्तकों का सम्पूर्ण विवरण आप हमारी वेबसाइट में देख सकते हैं तथा पुस्तकें हमारी वेबसाइट www.divyaprakashan.com से Online भी मंगवा सकते हैं। दिव्य प्रकाशन विभाग हरिद्वार में भी यदि आप साहित्य मंगवाना चाहते हैं तो आप हमसे दिए गए मोबाइल नंबरों (7302732334 - 7302732335) पर संपर्क कर सकते हैं। हरिद्वार से आपके द्वार तक साहित्य उपलब्ध करवाने में हमें अत्यंत प्रसन्नता की अनुभूति होगी।
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01 Mar 2025 17:58:05
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