सर्दी के मौसम में कैसे रहे स्वस्थ ?

सर्दी के मौसम में कैसे रहे स्वस्थ ?

डॉ. नागेन्द्र कुमारनीरज 

निर्देशक - योगग्राम

गर्मी शर्मायी ऐसी भागी/ सर्दी की भाग्य है जागी/ दबी पाव धीरे से आयी/ आस्ते-आस्ते जोर लगायी/ घर-घर लायी रंग-बिरंगी रजाई/ सर्दी आई सर्दी आयी/ बुढ़े बच्चे जवान सयाने करते नहीं मनमाने/ आग तापते/ रह-रहकर के आहें भरते/ रूक-रूक कर सदा ठिठुरते/ हाथ पैर सब ठण्डे-ठण्डे गरम-गरम कुछ खिला पिलादें/ ठण्डी सर्दी सदा टर्र टर्राते/ बात बनती दाँत किट किटाते/ मुँह से सदा भाप निकलती/ रह-रहकर भूख खूब लगती/ सुबह मखमल रूपहली ठण्डी हवा/ सौ रोगों की यह है एक दवा/ लेकिन भाले जैसी चुभती है/ तीरों जैसी भेदती है/ पंखा कुलर दुम दबाकर भागे/ अलाव के किस्मत है जागे/ .सी. डर कर दुबका रूम हीटर का भाग्य है चमका/ सर्द समीर लगे शमशीर/ मोती जैसी ओस साफ पारदर्शी रजत नीर/ फिर भी दे रहे है पीड़/ कोइ सुने हमारी हाय/ कैसे हम नहायें/ अंग-अंग को धोयें/ या बैठकर रोंये/ स्नान तो दुश्मन सा लगे/ आलस्य प्रमाद से जागें/ शिशिर ऋतुचर्या अपना कर/ सम्यक आहार-विहार-विचार कर/ शिशिर ऋतु सुखद है/ सदा स्वास्थ्य को देय बार-बार याद दिलाये/ तन-मन को कभी भाये/ सभी रोग हैं हेय/ आरोग्य इच्छित आहार को खाकर/ स्वास्थ्य सुख का भाग्य जगाकर/ स्वस्थ दीर्घ जीवी होय/ मत बिता सुन्दर जीवन को रोय/ अब अच्छा ही अच्छा होय/ अब श्रेष्ठ विचार बीज को बोय/ यह हम सबकी मंगल मैत्री भावना होय।
उपर्युक्त काव्यात्मक लेख शिशिर ऋतु की सटीक वर्णन एवं व्याख्या करता है। सर्दी के मौसम में सही ढंग से सजगता के साथ जीया जाये तो यह स्वास्थ्य सुख का मौसम साबित होता है। सर्दी के मौसम में कुछ बीमारियाँ एवं रोग लक्षण उभरते हैं। आरोग्यपूर्ण दीर्घायु का विज्ञान आयुर्वेद ने मुख्य रूप से काल को तीन ऋतुओं में विभक्त किया है- शीत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु तथा वर्षा ऋतु मुख्य है।
जब सूर्य की गति उत्तर की ओर होती है, उसे उत्तरायण या आदान काल तथा सूर्य की गति दक्षिण की ओर होती है, उस दक्षिणायन या विसर्गकाल कहते हैं। पूरे वर्ष को दो काल खण्ड में रखा गया है। (1) आदान काल में शिशिर ऋतु माघ, फाल्गुन अर्थात् मध्य जनवरी से मध्य मार्च, (2) वसन्तऋतु चैत-वैशाख मध्य मार्च से मध्य मई तथा (3) ग्रीष्म ऋतु ज्येष्ठ-आसाढ़ मध्य मई से मध्य जुलाई तक माने। आदान काल यानि उत्तरायन की प्रकृति स्वभाव आग्नेय तथा इसमें तिक्त, कटु एवं कषाय रस की वृद्धि होती है। अदान काल में प्रचण्ड मार्तण्ड की रश्मियाँ एवं समीर शुष्क एवं रूक्ष होती है। पृथ्वी के समस्त वनस्पति प्राणियों जलाशय एवं समुद्रों के कुछ जलीय अंश, कफ एवं ऊर्जा सोख लिए जाते हैं, परिणामत: शक्ति हीनता महसूस होती है।
दक्षिणायन में सूर्य की गति (अयन) दक्षिण की ओर होती है, इसे विसर्ग काल भी कहते है इसके अन्तर्गत (1) वर्षा ऋतु श्रावन एवं भाद्रपद अर्थात् मध्य जुलाई से मध्य सितम्बर (2) शरद ऋतु-अश्विनी (कुआर) कार्तिक मध्य सितम्बर से मध्य नवम्बर तथा (3) हेमन्त मार्गशिर्ष पौष मध्य नवम्बर से मध्य जनवरी तक माना गया है। इसकी प्रकृति एवं स्वभाव सौम्य तथा इसमें अम्ल, लवण एवं मधुर रस की अधिकता होती है। दक्षिणायन यानि विसर्गकाल में वातावरण रसयुक्त जलीय तत्व से भरपूर होता है। चन्द्र यानि शीतल तत्व की प्रधानता होने से ताप कम होता है, अर्थात् दक्षिणायण के अन्त एवं उत्तरायण के प्रारम्भ तथा उत्तरायण के अन्त और विसर्ग के प्रारम्भ संतुलन काल होता है। उस समय प्राणियों के रस रसायन हार्मोन एन्जाइम एवं बल संतुलन में होता है।
वैसे शीत ऋतु का प्रारम्भ दीपावली से शुरू होकर होली तक माना जाता है। आयुर्वेद में हरितकी ऑवला पिप्पल, लहसुन आदि को रसायन माना गया है। इनका प्रयोग शीतऋतु में करें। जैसे शीतऋतु के प्रारम्भ का माह हेमन्त में आधा चम्मच हरित की तथा सम मात्रा में सोठ चूर्ण उत्तर कालीन शीत ऋतु में आधी चम्मच हरित की एवं सम मात्रा में पिप्पली चूर्ण वसन्त ऋतु में हरित की चूर्ण तथा शहद सम मात्रा में यानि मध्य नवम्बर से मध्य मार्च तक हरितकी चूर्ण का विशेष प्रयोग शक्ति प्रदान करता है।

शीत काल में लक्षण-

वातावरण में शीतल पवन के ठण्ड प्रभाव के कारण त्वचा एवं रक्तवाहिनियों के संकोचक प्रभाव से शारीरिक उष्मा अन्दर रूक जाती है। जठराग्नि प्रबल हो जाती है, पाचन शक्ति में वृद्धि होती है। भारी एवं गरिष्ट भोजन भी पचने लग जाता है। इस मौसम में उष्ण वीर्य वाले मरीच, हल्दी, बादाम, अखरोट, मूंगफली, तिल, सोंठ, अदरक, उड़द की दाल एवं व्यंजन गूड़, अजवाइन, जीरा, लौंग का प्रयोग करें। मनुष्य उष्ण रक्त वाला है। शरीर में रक्त प्रवाह द्वारा शरीर के व्यवस्था सम होमियोस्टेशिस अवस्था में रहता है। शरीर के तापमान पर मेटाबॉलिज्म, एन्जाइम सक्रियता, भोजन का अवशोषण, सात्म्यीकरण, पाचन, एनाबॉलिज्म एवं केटोबॉलिज्म निर्भर करता है। इन सभी के लिए एक निश्चित विशेष तापमान भी होता है। तापमान बढऩे पर ज्वर हाइपरथर्मिया तथा कम होने पर हाइपोथर्मिया हो जाता है। शरीर मेटाबॉलिज्म अस्त-व्यस्त हो जाता है। अत: इन्हे संतुलन में रखने के लिए संतुलित आहार लें।

 सर्दी के मौसम में होने वाले प्रमुख उपद्रव-

प्राय: सर्दी के कारण हाथ-पैर ठण्ड, नाड़ी गति, हृदय गति का बढऩा, शरीर का तापमान कम होना, हाइपोथर्मिया, जोड़ो में दर्द, आर्थराइटिस, गठिया, घुटने तथा टखने में दर्द, सांस की तकलीफ, गले संबंधी रोग, टॉन्सिलाइटिस, आवाज बैठना, सर्दी-जुकाम, खांसी, गले में दर्द, अस्थमा, वेल्सपॉल्सी या चेहरे का लकवा, जबान लडख़ड़ाना, आँख से पानी आना, ठण्डे पानी या अति ठण्ड से बचें, हार्ट-अटैक, लकवा, ब्रेनस्ट्रोक हो सकता है। पैर-हाथ की अंगूलियों में ठण्ड लगना, पैर-हाथ की अंगुलियाँ लाल से बैगन और नीलापन, दर्द, खुजली, फ्लू, तेज ज्वर, बदन दर्द, सिर दर्द, सांस लेने में तकलीफ, दमा, जीर्ण खांसी का उग्र होना, रात्रि को सोने में दिक्कत, सुस्ती, सीने में जकडऩ, ठण्ड जन्य न्यूमोनिया आदि के लक्षण दिखते हैं।

 बचने के उपाय

इनसे बचने के लिए ठण्डे से बचें, स्वेटर, ऊनी चादर, मफलर आदि गरम वस्त्र का उपयोग करें। तुलसी, अदरक, पुदीना, अजवाइन, जीरा, धनिया, हल्दी आदि की चाय पीयें। हल्दी, एलोवेरा, नमक एवं मेथी को उबाल कर गरारा करें। इस महीने प्राय: सर्दी या पाला पडऩे, शीत दंश के कारण चिलब्लेइन (Chilblain) हो जाता है। जिनका वजन कम होता है, विशेष रूप से महिलाओं में देखने को मिलता है। रेनॉडस रोग उग्र हो जाते है। हाथ-पैर नीले पड़ जाते हैं। पैरों में बिवाई हो जाती है। ऐसी स्थिति में पैर तथा हाथ को गरम पानी में शलगम तथा चुकन्दर को दो-तीन टुकड़े करके डालें, उसमें दो चम्मच इप्समसाल्ट तथा नमक डालें। पैर-हाथ को उस पानी में डालकर शलगम तथा चुकन्दर के टुकड़ो से रगड़े पुन: हाथ पैर धोकर मोजा तथा दस्ताने पहनें, ठण्ड से बचें। नंगे पैर नहीं घूमें, कपड़े का आरामदेह जूता पहन कर टहलें। हाथ पैरों में ठण्ड लगने वाली पीड़ा से बचने के लिए मोजा एवं दस्ताने का प्रयोग करें। सर्दी, जुकाम-खांसी के लिए जीरा अजवाइन, सौंफ, मेथी का भाप चेहरे पर लें। अजवाइन में कार्बाक्रोल, थायमाल, गामाटर्पेन आदि रोगाणुनाशी सक्रिय जैव रसायन होते हैं। अजवाइन का थायमाँल तथा कार्बाक्रोल बोर्डस्पेक्टूम एण्टीबायोटिक क्लोरेनफेनिकॉल को प्रभाव में टक्कर देता है।

 सर्दी के मौसम के पथ्य

पुराने जौ, गेहूँ, ज्वार, बाजरा, मक्का, मूंग, मोठ, मसूर, मटर, अरहर, चने की दालें, मेवे-खजूर, मुन्नका, किशमिश, गूड़, मूंगफली, गोंद, मेथी, मगज, सोंठ की मिठाइयाँ, बीज, बादाम, अखरोट, काजू, गन्ने का रस, उड़द के बने पदार्थ, शीत से लडऩे में तिल के लड्डू, गुड़ के साथ भीगा अंकुरित चना, मूँग, मसूर, गेहूँ आदि लें। धूप का सेवन, पीठ एवं अन्य अंगों पर लें। दूध में हल्दी सोंठ डालकर पीना, अस्थमा वाले रोगी लौंग, काली मिर्च, अदरख, हल्दी इत्यादि प्रयोग नियंत्रित मात्रा में अवश्य करें।

 सर्दी के मौसम के अपथ्य

दिन में सोना, लम्बे समय तक बैठना, मीठा, नमकीन, देर रात तक जागना, सुबह तक सोये रहना, व्यायाम नहीं करना, जंक-फूड, ज्यादा तले हुए आहार, खट्टी-दही, आम-अचार, कटू, तिक्त, कषाय, रसवाले आहार, फास्ट फूड, अल्कोहल एवं कैफिन युक्त पेय इत्यादि।

 ठण्ड ऋतु से लडऩे वाली सब्जियाँ, अनाज, दाल एवं फल

गाजर हर रोग पर रखता है घातक नजर, कैंसर, फेफड़ा, आँख, त्वचादि रोगों को करता है जर्जर लाल, पीले, नारंगी, काले, बैगनी एवं सफेद रंग के गाजर ठण्ड के दिनों में पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। प्रत्येक गाजर विटामिन का खजाना है इसमें कैल्शियम, पोटाशियम, मैग्निेशियम, आयरन, विटामिन बी1, बी2, बी3, बी6 पर्याप्त मात्रा में होता है। लाल रंग के गाजर में लाइकोपिन, पीले रंग के गाजर में बीटा कैरोटिन, अल्फाकैरोटिन नारंगी रंग के गाजर में जेन्थोफिल ल्यूटीन जियाक्सन्थिन बैगनी रंग के गाजर में एन्थोसायनिन, माल्विडिन, सायनिडिन, पियोनिडिन, डेल्फिनिडिन, पेटुनिडिन आदि फल्वेनायड्स होते हैं। ये सभी बायोएक्टिव माइक्रोन्यूटिएन्ट हैं, जो एन्जियाटेन्सिनन कनवर्टिंग एन्जाइम को नियंत्रित कर एण्टी हाइपरटेंसिव एक्टिविटी को रोक देते हैं। रक्त चाप बढ़ने नही देते हैं। इतना ही नहीं नीले, बैगनी रंग की सब्जियाँ तथा फल NF-KB (Nuclear Factor Kappa Beta) पाथवेज को ब्लॉक कर के एण्टी इन्फ्लामेटरी प्रभाव डालते हैं। सभी प्रकार के गाजर तथा गाजर रस का एण्टीवायरल, एण्टी बैक्टीरियल, एण्टी फंगल, एण्टी कोरानरी वस्कुलर डिज़ीज तथा एण्टी कैन्सरस होता है। इसमें विटामिन के तथा कैल्शियम पर्याप्त मात्रा में होता है जो हड्डियों को मजबूत बनाता है। ग्लाइसेमिक इन्डेक्स सामान्य अपक्व गाजर का 16 कूक्ड गाजर का 60 तथा रस का 65 हो जाता है। मधुमेही गाजर का सलाद खा सकते हैं। पक्व गाजर, गाजर का रस या हलवा आदि व्यंजन नही खा सकते हैं। गाजर में घुलनशील पेक्टिन फाइबर्स होता है जो आइ.बी.एस., आइ.बी.डी. तथा एस.आइ.बी.. (Small Intestinal Bacterial Overgrowth) मधुमेह के रोगियों के लिए फायदेमंद है। यह प्रीबायोटिक्स होता है जो आँतों में गूड गट बैक्टीरिया को बढ़ाकर शार्ट चैन फैटीएसिड फार्मेट, व्यूटीरेट, प्रीपियोनेट का उत्पादन करते हैं, जो मधुमेह तथा पेट की अनेक रोगों से रक्षा एवं उपचार करता है। इतना ही नही गाजर के विभिन्न कैरोटिन लीवर की सहायता से विटामिन- में रूपान्तरित होकर फेफड़े, त्वचा, हड्डियों के रोग से बचाते हैं। यही आँखों की रोशनी रोडेप्सिन पिगमेन्ट बन जाता है। गाजर में विटामिन- पर्याप्त मात्रा में होता है, जो हृदय रोग एवं सेक्सुअल बीमारियों से रक्षा करता है। प्रतिदिन एक या दो ग्लास गाजर का रस पीयें। रस इसलिए आवश्यक है कि आधा-एक किलो गाजर खाने में काफी समय लगता है, लेकिन उतने ही वजन के गाजर के रस को कुछ क्षणों में आसानी से पीया जा सकता है। इसमें बायोटिन या विटामिन बी7 या विटामिन-एच पाया जाता है जो फैट तथा प्रोटीन मेटाबॉलिज्म में मुख्य भूमिका निभाता है। यह बालों को सशक्त बनाता है। यह बालों नाखून, चेहरा को सुन्दर एवं स्वस्थ बनाने वाला विटामिन है। बायोटिन, ब्रेवर्स यीस्ट, चुकन्दर, एवोकोडो, आँवला, शकरकन्द, पालक, ब्रोकोली, मशरूम, मटर, बीन्स, मसूर, सोयाबीन, तिल, सूर्यमुखी, विनौला, पम्पकिन के बीज तथा बादाम में पर्याप्त मात्रा में होता है। 
गाजर मित्र गुड गट बैक्टोरिया का शानदार आहार है। इससे पेट का वातावरण स्वस्थ एवं सही होता है। इसमें अघुलनशील सेल्युलोज, हेमिसेल्युलोज तथा लिग्निन्स होते हैं। अंतडिय़ों के गति को सही रखते हैं। कब्ज को दूर करते हैं। इसमें मौजूद बीटा कैरोटिन, अल्फा कैरोटिन लाइकोपिन विभिन्न अंगों के कैंसर तथा पॉली एसेटाइलिन रक्त कैंसर बीटाकैरोटिन तथा ल्यूटीन आँखों के हर प्रकार के रोगों का उपचार एवं उनसे बचाव करता है। वजन कम करने से लेकर जुकाम खांसी, फेफड़े के रोग हृदय रोग, गर्भावस्था के रोग से बचाव एवं उपचार में गाजर सहायक हैं। 
जो खाता चुकन्दर सेहत ही उसका मुकद्दर, हर क्षेत्र का होता है सफल सिकन्दर, मस्तमौला कलन्दर नष्ट हो जाते हॉइपरटेन्सन, हृदय रोग, बवासीर भगन्दर चुकन्दर में अल्फालिपोइक एसिड पाया जाता है, जो ग्लूकोज लेवल को सही कर इन्सुलिन संवेदनशीलता को बढ़ाकर मधुमेह तथा डायबिटिक, न्यूरोपेथी को ठीक करता है। चुकन्दर में उच्चस्तरीय नाइट्रेट पाया जाता है, क्वीन मेरी यूनिवर्सिटी तथा वाशिंग्टन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के एक शोध के अनुसार प्रतिदिन एक ग्लास चुकन्दर रस (250 मिली) पीने से हृदय रोग, उच्च रक्तचाप नियंत्रित होता है। हृदय की मांसपेशियाँ शक्तिशाली बन जाती हैं। इसके अलावा बच्चों की बीमारी, आँख का दर्द, सिर दर्द, पेट दर्द तथा यकृत शूल में फायदा करता है। चुकन्दर में सभी प्रकार के विटामिन बी, मैग्नेशियम, पोटेशियम बी, फॉलेट तथा ट्रिप्टोफेन पाया जाता है। इसके लाल रंग में मौजूद बीटे्इन जो टायरोसिन से निर्मित होता है। यह मन-मस्तिष्क को शान्त रखता है। प्रोस्टेट तथा ब्रेस्ट कैंसर के विकास को रोक देता है। कैंसर ट्यूमर सिकुड़ कर छोटे होने लगते हैं।
चुकन्दर शरीर के रंग निखारने एवं सफेद दाग को दूर करने में उपयोगी है। दिमागी न्यूरॉन्स के पुनर्जनन में सहयोगी है तथा उन्हें स्वस्थ एवं सशक्त बनाता है। चुकन्दर में फ्रूक्टेन्स (Fructans) जिसे  FODMAPS के शार्टचेन कार्बोहाइड्रेट के रूप में वर्गीकृत किया है। यह अच्छी तरह पचता नहीं है। इसका ग्लाइसेमिक इन्डेक्स 61 होता है जो मध्य स्तर का माना जाता है, ग्लाइसेमिक लोड सिर्फ 5 होता है जो कि अत्यन्त कम है। अत: मधुमेही रोगी इसका प्रयोग कम मात्रा में कर सकते हैं। इसमें डायटरी फाइबर्स 3% तक होता है। चुकन्दर के अलग-अलग रंगों जैसे लाल, बैंगनी रंग में बीटासायनिन, लाल रंग में बीटानाइन तथा पीले, लाल चुकन्दर में वल्गाजेन्थिन पाया जाता है। चुकन्दर में मौजुद नाइट्रेटस के साथ नाइट्राइटस तथा नाइट्रिक आक्साइड भी संलग्न है। प्रोसेस्ड मांस एवं अन्य आहारों के साथ भी नाइट्रेट मिलता है वह कृत्रिम नाइट्रेट कैंसरकारी होती है जबकि चुकन्दर पालक तथा अन्य पत्तेवाली सब्जियों के साथ मिलने वाला प्लान्ट नाइट्रेट रक्तचाप को नियंत्रित रखता है। प्लान्ट नाइट्रेटस रक्तवाहिनियों के स्मूथ मसल्स सेल्स को शान्त विस्फारित एवं शिथिल कर हृदय एवं मस्तिष्क स्ट्रोक आदि रोगों से बचाता है।
यह व्यायाम, आसन, श्रम से उत्पन्न थकान से रक्षा करता है। चुकन्दर नाइट्रेटस माइट्रोकॉड्रियल एक्टिविटी को बढ़ाकर ऊर्जा तथा ऑक्सीजन की आपूर्ति पर्याप्त मात्रा में करता है। जिससे थकान नहीं होती है। चुकन्दर में मौजूद शार्टचेन काब्र्स फर्मेन्टेड ऑलिगोसैकराइड्स डाइसैकराइड्स मोनोसैकराइडस एण्ड पॉलीओल्स (FODMAPS) गूड गट बैक्टीरिया का शानदार भोजन है, जिसके चलते पेट संबंधी समस्त बीमारियों में विशेष रूप से आइ.बी.डी., आइ.बी.एस. तथा एस.आइ.बी.. में फायदा करता है। इससे बीमारी पैदा करने वाले पैथोजेनिक बैक्टीरिया का ओवर ग्रोथ रूक जाता है, किन्तु पचने में ज्यादा संवेदशील में होता है। कुछ लोगों में चुकन्दर खाने से पेशाब तथा पाखाना लाल होने लगता है। यह सामान्य बात है। लाल चुकन्दर में मौजूद बीटासायनीन बीटानाइन तथा इनके पत्तों में एन्थोसायनिन होते हैं। ये रंग कैंसर ट्यूमर के विकास को बाधित करते हैं। कैंसर से मुक्त होने में चुकन्दर अत्यन्त प्रभावकारी औषधी आहार है।

 शकरकंद ऊर्जा आरोग्य, आनन्द, मुस्कान का है मकरन्द

शकरकंद (Sweet Potato) कई रंगों में सफेद, क्रीम, पीला, बैगनी, गुलाबी, लाल तम्बइ तथा भूरे रंग में पाये जाते हैं। पूरे विश्व में सैकड़ों प्रकार की शकरकंद की किस्में एवं प्रजातियाँ उगायी जाती हैं। इसे विभिन्न रूचि के अनुसार आग में भूनकर, सेक कर तथा उबालकर खाया जाता है। इसमें प्रर्याप्त मात्रा में बीटा कैरोटिन के रूप में विटामिन के साथ-साथ बी1, बी2, बी3, बी6, बी9, विटामिन सी पोटेशियम तथा फाइबर पाये जाते हैं। शकरकंद के बैगनी रंग में एन्थोसायनिन, पीले तथा नारंगी रंग में बीटाकैरोटिन पाये जाते हैं। ये रोगों के रोकथाम तथा स्वास्थ्य संरक्षण एवं सम्वद्धेन में खास भूमिका निभाते हैं। पेक्टीन नामक हाइफाइबर होने के कारण यह मधुमेह, मैग्नेशियम होने से तनाव तथा एन्जाइटी को कम करता है। इसमें कोलिन होने के कारण यह शक्तिशाली एण्टीइन्फ्लामेटरी होने से दर्द, जलन, सूजन तथा गर्म लालिमा को दूर करता है। ड्राइ आई सिण्ड्रोम में फायदा करता है। इसमें मौजूद एन्थोसाइनिन पेट तथा ब्रेस्ट कैंसर को ठीक करता है। इसका बीटाकैरोटिन प्रोस्टेट कैंसर में लाभदायी है। यह आँत एवं पेट के अल्सर में बहुत उपयोगी होता है। इनको पत्तियों में उच्च कोटि का पॉलीफेनॉल्स होता है तथा इसके कन्द में मौजूद एन्थोसाइनिन हृदय एवं रक्तवाहिनियों के उपचार एवं रोकथाम में उपयोगी है। इनकी पत्तियों में एण्टीमाइक्रोबियल गुण होने के कारण न्यूमोनिया तथा टॉयफॉयद में उपयोगी है। इनके कन्द फूडब्रोन बैक्टीरिया का खात्मा करते हैं। ये सालमोनेल्सा टायफी, ईकोलाइ तथा क्लेबसीलान्यूमोनी को खत्म करने वाला एण्टीमाइक्रोबियल है। यह बालों तथा त्वचा के स्वास्थ्य एवं सौन्दर्य की वृद्धि करते हैं। सूर्य की हानिकारक किरणें यू.वी. के दुष्प्रभाव से बचाते हैं। शकरकन्द का ग्लाइसेमिक इन्डेक्स 70 यानि आलू के ग्लाइसेमिक इन्डेक्स (82-111) से कम होता है। कभी-कभी मधुमेही इसे खा सकते हैं। 


ऑल गुणों से भरपूर-आलू

आलू साउथ अफ्रिका की आदिवासी सब्जी है जो अपने स्वादिष्ट गुणों के कारण विश्व में प्रसिद्ध है। इसे विविध रूपों में खाया जाता है। इसमें न्यून भाग में सुक्रोज, ग्लूकोज, फ्रूक्टोज तथा विभिन्न प्रकार के रेजिस्टेन्ट स्टार्च होते हैं। इसके अतिरिक्त पेक्टिन, सेल्युलोज, हेमिसेल्युलोज नामक फाइबर्स होते हैं। रेजिस्टेन्ट स्टार्च गट गुड बैक्टीरिया का शानदार भोजन होते हैं जो इरीटेब्ल बावेलसिण्ड्रोम (IBS) तथा स्माल इन्टेसटाइनल बैक्टोरियल ओवरग्रोथ (SIBO) रोग में फायदा करता है। इन रोगों में खतरनाक किस्म के बैक्टीरिया ऑतों में अपना अड्डा जमाकर पेट रोगों की वृद्धि करते हैं। आलू को उबाल कर 10-12 घंटे छोड़ दें तो उसमें रेजिस्टेन्ट स्टार्च बढ़ जाता है। अति भूख को शान्त करता है। ग्लाइसेमिक इन्डेक्स उबला सफेद आलू का 82, बेक्ड भूरे रंग के आलू 111, तैयार पैक्ड (Instant mashed) आलू का जी.आइ. 87 होता है। आलू में टमाटर, बथुआ, पालक, लौकी, तोरइ आदि डालकर सब्जी बनाने से काफी मात्रा में फाइबर्स की मात्रा बढ़ जाती है जिससे ग्लाइसेमिक इन्डेक्स कम हो जाता है। इसमें कम मात्रा में 1-1.5 प्रतिशत उच्च गुणवता का पेटेटिन नामक प्रोटीन होता है। इसमें पोटेशियम काफी मात्रा में बिटामिन सी, विटामिन बी9 (फालेट) तथा बी6 कॉम्पलेक्स (पायरिडॉक्सिन) पाया जाता है, जो लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण, होमोसिस्टिन को नियंत्रित करने तथा रक्तचाप को नियंत्रित करने में कमाल का काम करते हैं।
इसमें मौजूद ल्यूटीन आँखों के सेन्ट्रल विजन को सही रखने में सक्षम है। इसमें क्लोरोजेनिक एसिड तथा कैटेचिन नामक पॉली फेनॉल्स पाया जाता है, जो कॉनजुगेटेड शक्तिशाली एण्टी ऑक्सीडेन्ट है एमल्सीफायर बनाते हैं। ये मेटाबॉलिज्म को उन्नत करते हैं, लिपिड मेटाबॉलिज्म, मोतियाबिन्द एवं घाव भरने में उपयोगी है। ये अनेक रोगों से रक्षा करते हैं।
आलू कीटों से अपनी रक्षा के लिए ग्लाइकोएल्केलॉयड्स पैदा करता है। अत: ज्यादा मात्रा में खाने से आलू का प्रभाव हानिकारक होता है तथा मधुमेह पैदा करता है, पेट में गैस बनता है। आलू में मौजूद पोटेशियम क्लोरोजेनिक एसिड तथा कुकोएमिन्स ब्लड प्रेशर को नियंत्रित एवं नियमित करता है। इसका रेजिस्टेन्ट स्टार्च शीघ्र पेट को फूल होने की सूचना देकर मोटापा कम करता है। आलू में मौजूद प्रोटीनेस इन्हिबिटर-2 (PI-2) भूख को नियंत्रित करके वजन कम करता है। कुछ लोगों में आलू का पेटेटिन प्रोटीन एलर्जी पैदा करता है। इसमें मौजुद सोलानिन (Solonine) तथा चाकोनिन (Chaconine) नामक ग्लाइकोएल्केलॉयड़स टॉक्सिक फाइटोन्यूट्रिएन्ट होते हैं जो कुछ लोगों एवं जानवरों में टॉक्सिक प्रभाव डालते हैं। सिरदर्द, अतिसार, मिचली, उल्टी  तथा पेट दर्द इसके लक्षण हैं। कुछ लोगों में इसका उग्र लक्षण जैसे तेजी से सांस चलना, छाती में जलन तीव्र धडक़न, लो-ब्लड प्रेशर, ज्वर तथा अन्य तंत्रिका जन्य लक्ष्ण दिखते हैं। कम मात्रा में खाने से कोई दुष्प्रभाव नहीं होता है। आलू को अधिक तापमान पर तन्दूर, बेकिंग, फ्रांइग तथा रोएस्टिंग करने पर उसमें मौजूद कार्बन तथा एक प्रोटीन मिलकर जहरीला एक्रिलोमाइड बनाते है। फ्रेंचफ्राइस, पोटेटो चिप्स में एकीलोमायड का लेवल ज्यादा होता है। यह दिमाग तथा तंत्रिका संस्थान के लिए खतरनाक है। एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार एकिलोमाइड खास करके ब्रेस्ट, ओवरी, गला, मुँह तथा किडनी का कैंसर पैदा करता है। आलू खायें लेकिन सावधानी एवं सजगता के साथ खायें। एक साथ 100-250 ग्राम से ज्यादा नहीं खायें, कोई हानिकारक प्रभाव नहीं होगा।
-क्रमश:

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