स्वच्छता ही सच्ची शुद्धिकरण

स्वच्छता ही सच्ची शुद्धिकरण

सुजाता कौर 

प्रधानाचार्या,

आचार्यकुलम्, राँची

शुद्ध परिसर तुषितम् हि जनयति,
कुक्कुरो अपि शुद्धम् कत्वैव तिष्ठति।।
भवति संमार्जनेन देहस्य शुद्धि:,
सत्याचरणोन तु मनसा आत्मन: च।।
हमारी संस्कृति और धर्म में शुचिता पर विशेष ध्यान दिया गया है। फिर बात चाहे शरीर की सफाई की हो या मन की सफाई। दोनों पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है
 जैसे- जल से तन की सफाई होती है। वैसे ही मन की सफाई निर्मल एवं सद्विचारों से होती है। इंद्रियों पर नियंत्रण करने से नि:स्वार्थ भाव से स्वच्छता की वृत्ति बढ़ती है
दया, परोपकार, त्याग, करुणा, दान, सद्भावना, क्षमा, प्रसन्नता और सत्यनिष्ठा से अंत:करण में सत्यगुणी वृत्तियाँ बढ़ती है और तमोगुण विकार दूर होते हैं। ऐसा साधक योग मार्ग से मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होता है। सत्य ही कहा गया है-
स्वच्छता से ईश्वर का वास होता है
स्वच्छता के दो रूप हैं- बाह्य स्वच्छता एवं आंतरिक स्वच्छता।
 

गांधी जी के विचार के अनुसार

बुरा बोलना, बुरा देखना और बुरा सुनना बंद कर देने से आंतरिक स्वच्छता गुण हो जाती है। बाह्य स्वच्छता अपने आस-पास की गंदगी को सभी व्यक्तियों द्वारा दूर करने से पूर्ण होती है। जब भी हम स्वच्छता की बात करते हैंहमारे मन में तुरंत ही बाह्य और आंतरिक दोनों शब्द आते हैं। बाह्य सफाई से प्रयोजन शरीर, वस्त्र और निवास आदि की स्वच्छता से होता है। आंतरिक स्वच्छता से तात्पर्य मानव हृदय की स्वच्छता से है। इन दोनों में से श्रेष्ठ  आंतरिक स्वच्छता है। इसमें आचरण की शुद्धता जरूरी है। आचरण से, मनुष्य के चेहरे से, जो मैं होता है सभी लोग उसको आदर की दृष्टि से देखते हैं, उसमें प्रत्येक व्यक्ति को झुकने का मन करता है। उसके प्रति लोगों में अत्यंत श्रद्धा होती है। बाह्य स्वच्छता में बालों की सफाई, नाखून की सफाई और कपड़ों की सफाई शामिल है। इसकी अवहेलना करके मनुष्य स्वच्छ नहीं रह सकता। मनुष्य रोग ग्रस्त होकर नाना प्रकार के दुखों से पीडि़त रहता है।
 स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखं।
आरोग्यं परमं भाग्यंण् स्वास्थ्ये।।
स्वच्छता एक अध्यात्मिक गुण है। जिसको प्राप्त करने के लिए बाह्य स्वच्छता से अधिक आंतरिक स्वच्छता की आवश्यकता है। जिसके विचार गंदे हैं, भावनाएं दूषित है और संस्कार परिष्कृत है। उसके बाहर वस्त्र आदि के साफ -सुथरा होने पर भी स्वास्थ और पवित्र नहीं माना जा सकता है।
अंत:करण में ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध और लोभ मौजूद रहने पर कोई कितना ही क्यों नहाए, धोए। स्वच्छता को प्राप्त नहीं कर सकता।
सच्ची सफाई तो सामान और काया के साथ शुद्ध और स्वच्छ रहने को ही कहा जाएगा। गंदगी और स्वच्छता निकृष्ट एवं उत्कृष्ट दृष्टिकोण का ही फल है।
जिसका दृष्टिकोण परिष्कृत एवं सुरुचिपूर्ण है। वह किसी स्थान पर किसी प्रकार की बलिंता सहन नहीं कर सकता। वह कहीं पर भी जरा भी गंदगी देखेगा तो तत्काल उसे दूर करने में जुट जाएगा।  प्रिय अनुष्ठानों को छोडक़र जो व्यक्ति सामान्य आचार-विचार के साथ निवास एवं आस-पड़ोस की गंदगी दूर करने में उत्साहपूर्वक तत्पर रहता है। वह एक प्रकार से तपस्वी ही है और उसे वे सारे अध्यात्म आपने आप प्राप्त हो जाते हैं।
जो एक धर्म और कर्म वालों को होते हैं। स्वच्छता एवं पवित्रता दैवीय गुण है। जोकि मनुष्य के भौतिक, आत्मिक एवं आध्यात्मिक सब प्रकार की चुनौतियों के आधार है।
प्रत्येक अभिभावक को तार्किक रूप में स्वच्छता के उद्देश्य, फायदे और जरूरत आदि के बारे में अपने बच्चों से बात करनी चाहिए। उन्हें जरूर बताना चाहिए कि स्वच्छता हमारे जीवन में खाने और पीने की तरह पहली प्राथमिकता है। अपने भविष्य को चमकदार और स्वस्थ बनाने के लिए हमेशा खुद का और अपने आसपास के पर्यावरण का ख्याल रखना चाहिए। स्वच्छता हमें मानसिक, शारीरिक, सामाजिक और बौद्धिक तरीके से स्वस्थ बनाता हैं।
बुद्धि और धर्म की दृष्टि से व्यायाम शरीर के स्वास्थ्य एवं मजबूती के लिए जरूरी है।
 
‘‘व्यायामात् लभते स्वास्थ्यं दीर्घा युष्यं बलं सुखं।
आरोग्यं परमं भाग्यं, स्वास्थ्ये।।’’
जिस व्यक्ति का शरीर स्वास्थ्य शक्तिशाली एवं तरोताजा नहीं है। वह बुद्धि और सही विचार का उपयोग कम ही कर पाता है।
स्वस्थ बुद्धि स्वस्थ शरीर में होती है।
इसीलिए मन एवं शरीर का परस्पर प्रभाव पुष्ट एवं निर्विरोध विषय है।
आलस्य एवं शारीरिक निष्क्रियता शरीर को कमजोर करती है। ऐसे लोग मानसिक रूप से शांत एवं प्रफुल्लित नहीं रह सकते हैं।
 
आलस्यं हि मनुष्याणां
शरीरस्शो महा रिपु:
स्वास्थ्य के अतिरिक्त बाह्य सफाई से क्षेत्र को प्रसन्नता भी मिलती है। जब कोई मनुष्य गंदे वस्त्र पहनता है, तब उसका मन भी मलिन बना रहता है। परंतु यदि मनुष्य स्वच्छ वस्त्र धारण कर लेता है, तो उसमें एक प्रकार की स्फुर्ति और प्रसन्नता का संचालन हो जाता है। बाह्य स्वच्छता से सौंदर्य में भी वृद्धि होती है।
मनुष्य मात्र में स्वच्छता का विचार उत्पन्न करने के लिए शिक्षा का प्रचार करना अनिवार्य है। शिक्षा पाने से व्यक्ति स्वस्थ एवं स्वच्छता की ओर परिवर्तित हो जाता है।
श्री नरेंद्र मोदी जी ने इस अभियान की शुरुआत 2 अक्टूबर 2014 को की थी। यह गांधी जी का सपना था, स्वच्छ भारत यह केवल एक इंसान के जरिए सफल नहीं होगा, इसके लिए सभी भारतीयों को अपने-अपने स्तर पर प्रयास करना होगा। स्वच्छता सबकी जिम्मेदारी है। स्वच्छता हमारे शरीर और हमारे मानस पटल पर असर डालती है। स्वच्छता भक्ति के समान होती है।
स्वच्छता अपनाओ, अपने घर को सुंदर बनाओ।
अपना देश भी साफ  हो,
इसमें हम सब का हाथ हो।
स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत,
जहाँ है सफाई, वही है पढ़ाई,
स्वच्छता का रखना हमेशा ध्यान तभी तो बनेगा, हमारा भारत महान।
स्वच्छता अपनाना है, समाज में, खुशियाँ लाना है।
गांधी जी का यही इरादा, स्वच्छ हो देश हमारा।
गांधी जी ने दिया संदेश, स्वच्छ रखो भारत देश।
अब हमने यह ठाना है, भारत स्वच्छ बनाना है।
 
स्वच्छता कोई काम नहीं है, जो पैसे कमाने के लिए किया जाए। बल्कि यह एक अच्छी आदत है। जिससे हम अच्छे स्वास्थ्य और स्वस्थ जीवन के लिए अपनाते हैं। स्वच्छता पुण्य का काम है। जिससे जीवन का सार बढ़ाने के लिए एक बड़ी जिम्मेदारी के रूप में हर व्यक्ति को इसका अनुकरण करना चाहिए।
 उपर्युक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हम अपने जीवन में स्वच्छता को अपनाकर, साथ ही लोगों को भी जिम्मेदारियाँ तय करते हुए एक स्वस्थ और निरोगी रूपी राष्ट्र की ओर अग्रसर करते हुए बापू जी के सपनों को पूरा करना चाहिए।
जब हमारा समाज स्वच्छ होगा, तभी हमारा राष्ट्र स्वास्थ्य होगा और सभी लोग राष्ट्र के निर्माण में अपनी भागीदारी दे पाएंगे। स्वच्छता एक भक्ति की तरह होती है। जिससे हम सभी को जरूर ही करना चाहिए।
एक बार गांधी जी ने कहा था कि जब तक आप झाडू और बाल्टी अपने हाथों में नहीं लेते, तब तक आप अपने गांव और कस्बे को स्वस्थ नहीं रखते। स्वच्छता हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
स्वच्छता का दीप जलाएं चारों ओर उजाला फैलाएं।
स्वच्छ भारत अर्थात् स्वस्थ भारत।
हम यह कह सकते हैं, स्वच्छता हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है। और स्वच्छता संबंधी आदतों से हम स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। हमें बच्चों में छोटे समय से स्वच्छता संबंधी आदतें डालने चाहिए, क्योंकि वह देश के उज्ज्वल भविष्य हैं।
यह अच्छी आदत देश में बदलाव ला सकता है। देश के बच्चे सामाजिक, वैचारिक और व्यक्तिगत रूप से स्वस्थ होंगे। उस देश को आगे बढऩे से कोई नहीं रोक सकता।
हमारे धार्मिक ग्रंथों में साफ -सफाई और स्वच्छता से जुड़े हुए बहुत से निर्देश दिए गए हैं। स्वच्छता को जीवन की आधारशिला के रूप में देखा जाता है। इसमें मनुष्य की गरिमा, शालीनता और आवश्यकता से रूबरू करवाया जाता है। स्वच्छता हमें शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और बौद्धिक रूप से स्वस्थ करता है। अपनी व्यक्तिगत स्वच्छता के साथ-साथ पालतू पशुओं की स्वच्छता, पर्यावरण की स्वच्छता, आसपास की सफाई के साथ कार्य स्थल की सफाई का ध्यान रखना चाहिए। स्वच्छ रखने के लिए हमें पेड़ -पौधों को काटना नहीं चाहिए। स्वच्छता लोगों की दिनचर्या में शामिल होना चाहिए।
 गांधी जी ने कहा था- स्वच्छता ही सेवा है। हमारे देश और हमारे जीवन में स्वच्छता की बहुत जरूरत है, क्योंकि आज के समय में बहुत तरह की बीमारियाँ गंदगी की वजह से फैल रही है। हम सभी स्वच्छता को अपना कर  बीमारियों को दूर भगा सकते हैं।
मैं सभी से आग्रह करती हूँ कि आप सभी स्वच्छता को अपनाएं और अपने देश के विकास में सहयोगात्मक भूमिका निभाएं |   
 

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