वृक्क (किडनी) रोग एवं आयुर्वेद चिकित्सा
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डॉ. अभिषेक भूषण शर्मा
एसो. प्रो.-पंतजलि आयुर्वेद महाविद्यालय
बदलती दिनचर्या तथा रसायनयुक्त अशुद्ध आहार से हमारा शरीर व स्वास्थ्य लगातार प्रभावित हो रहा है। किडनी या वृक्क हमारे शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है। हम अपने शरीर की बाहरी सफाई का ध्यान तो रख लेते हैं, लेकिन शरीर के भीतर की सफाई का काम हमारी किडनी का है। किडनी की दुसाध्य बीमारी एक बहुत बड़ी समस्या है जो कि 10 प्रतिशत सामान्य जनसंख्या को प्रभावित करती है। |
किडनी खराब होने की शिकायतें दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं, चिकित्सा जगत में क्रॉनिक किडनी डिजीज का शाब्दिक अर्थ किडनी का फेल होना है। एक अध्ययन के अनुसार देश में औसतन 14 फीसदी महिलाएँ और 12 फीसदी पुरुष किडनी की समस्या से पीडि़त हैं। समय रहते वृक्क रोगों की पहचान होने पर रोगी को डायलेसिस एवं किडनी प्रत्यारोपण (Kidney Transplant) से बचाया जा सकता है। इसके उपद्रव स्वरूप अनेक प्रकार की वृक्क व्याधियाँ जैसे निष्क्रियता की अंतिम अवस्था, हृदय विकार, समय से पूर्व ही मृत्यु दर आदि के लिए उत्तरदायी है। विभिन्न देशों में गुर्दे की असाध्य बीमारी की अवस्था 3-5 का प्रसार दर 5-7 प्रतिशत है जिसमें की मुख्यत: 65 वर्ष एवं उससे अधिक उम्र के लोग प्रभावित होते हैं।
किडनी के कार्य
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शरीर के रक्त संचार का नियंत्रण करना।
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शरीर से अपशिष्ट पदार्थों जैसे यूरिया, यूरिक एसिड आदि का मूत्र के साथ निष्कासन करना।
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विटामिन-डी को सक्रिय कर शरीर में कैल्शियम का अवशोषण (Absorption) करना।
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रक्त में अम्ल-क्षार संतुलन को बनाए रखना।
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शरीर में K, Na, Ca आदि जैसे electrolyte का संतुलन करना जो हृदय गति को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण होते हैं।
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Erythropoietin नामक हार्मोन का स्राव करना जो RBC के निर्माण में आवश्यक है।
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भोजन से जरूरी मिनरल्स को सोखती हैं।
क्या है क्रोनिक किडनी डिजीज?
किडनी हमारे शरीर का महत्त्वपूर्ण अंग है। किडनी में किसी भी प्रकार की क्षति या किडनी का जी.एफ.आर. (Glomerular Filtration Rate) में कमी हो तो इसे क्रोनिक किडनी डिजीज कहा जाता है। इस रोग में किडनी की कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है।
रोग के लक्षण
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पेशाब कम होना।
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पीठ में दर्द, ज्यादा थकान, पेशाब में खून आना या झाग आना।
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भूख कम लगना, चिड़चिड़ापन, कम उम्र में हाई ब्लड प्रेशर।
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एकाग्रता में कमी, एनीमिया, कमजोरी।
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चक्कर आना तथा दौरे पडऩा, साँस लेने में दिक्कत व सीने में दर्द।
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पाण्डु (Anaemia) यानि रक्त निर्माण प्रक्रिया कम हो जाती है जिस कारण शरीर का रंग फीका पडऩा, थकावट महसूस होना एवं क्षमता से अधिक कार्य करने पर सांस फूलना।
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त्वचा में चकते पडऩा तथा शरीर में खुजली होना।
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भूख कम लगना, जी मिचलाना, उल्टी आना तथा दस्त लगना।
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रक्तचाप बढ़ा रहना जिसके कारण हृदय निष्क्रियता (Heart Failure) की सम्भावना बढ़ जाती है।
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किडनी की मूत्र निर्माण प्रक्रिया का सही न होने के कारण शरीर में पानी एवं नमक का संग्रह होने से हाथ-पैर, टखने, चेहरे या शरीर में सूजन आना, अचानक ब्लड प्रेशर कम होना आदि।
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हड्डियों एवं पसलियों में पीड़ा तथा हड्डियों का कमजोर होना।
रोग के कारण और परहेज
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मधुमेह 40%, उच्च रक्तचाप 27%, वृक्कशोथ 11%, अन्य 18% जैसे सिस्ट विकार, जन्मजात विकार, अर्बुद, स्व-प्रतिरक्षित विकार, यकृत निष्क्रियता, त्वग्काठिन्य तथा दवा विषाक्तता आदि वृक्कदोषों के मुख्य कारण हैं।
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पानी की कमी : सही मात्रा में पानी नहीं पीना वृक्क रोगों का मुख्य कारण है। किडनी का सबसे जरूरी काम रक्त को फिल्टर करके उसमें से वेस्ट मैटेरियल और विषाक्त पदार्थों को पेशाब के रास्ते बाहर निकालना है। पानी की कमी से विषाक्त पदार्थ शरीर से बाहर नहीं निकल पाते जिसके फलस्वरूप शरीर में विषाक्तता बढ़ जाती है।
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सोडियम की अधिक मात्रा : शरीर के लिए सोडियम अत्यंत आवश्यक तत्व है किन्तु इसका प्रयोग एक निश्चित मात्रा तक ही करना चाहिए। बहुत से लोग भोजन में नमक अधिक मात्रा में लेते हैं जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है और वृक्क पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। एक दिन में कुल मिलाकर 5 ग्राम से अधिक नमक का सेवन शरीर के लिए हानिकारक है।
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पेशाब को रोककर न रखें : हम कई बार अपने कामकाज में व्यस्तता के चलते पेशाब करना टालने लगते हैं। बार-बार पेशाब रोकने से मूत्र संस्थान पर अतिरिक्त भार बढऩे लगता है। इससे वृक्क में पथरी होने से लेकर किडनी फेल तक की संभावना बढ़ जाती है।
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मांसाहार : प्रोटीन, विशेष रूप से मांस का अधिक सेवन किडनियों पर मेटाबोलिक प्रेशर बनने लगता है।
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कम सोना : लंबे समय तक कम सोने की आदत से भी किडनी से जुड़े रोग होते हैं।
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पेनकिलर्स व एलोपैथिक दवाओं का अधिक उपयोग: बिना चिकित्सकीय परामर्श के लिए जाने वाले पेनकिलर्स, एलोपैथिक दवाओं तथा फलों व सब्जियों में रसायनों का बढ़ता प्रयोग इस रोग का बड़ा कारण है।
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पथ्य
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आहार- पुराण शाली चावल, कुल्थी की दाल किडनी स्टोन गलाने में बहुत कारगर है।
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सब्जी- सब्जियों में सहजन, परवल, लौकी, पपीता, टिण्डा, गाजर, तोरी चौलाई, करेला, शिमला मिर्च, आलू, मूली, बथुआ, अरबी, नींबू, अदरक, पालक, फूलगोभी, पत्तागोभी, अति लाभकारी है।
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फल- सेब, पपीता, अंगूर, जामुन, ककड़ी, खीरा, गाजर, तरबूज, नारियल, अनानास आदि फल का सेवन लाभकारी है।
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मसाले- मसाले और जड़ी बूटियों में दालचीनी, पान, कुट्टू अनाज, तुलसी, अपामार्ग की जड़, गोखुर, बड़ी इलायची, काला जीरा, लहसुन, अजवाईन का सेवन लाभकारी है।
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द्रव्य पदार्थ- पानी, गोदुग्ध, काढ़ा (सभी मिलाकर दिन भर में 1-1.5 लीटर तक लें।)
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नियमित व्यायाम व जौगिंग करें। अपने वजन को नियंत्रण में रखें। मधुमेह व उच्च रक्तचाप पर नियंत्रण रखें।
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विहार- बस्ति, विरेचन
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प्राणायाम- अनुलोम-विलोम।
अपथ्य
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आहार- लवण (नमक) का कम प्रयोग, उष्ण तथा तीक्ष्ण मसालेदार भोजन, मांस-मछली, दालें, चना, उड़द, नमक, मदिरा आदि हानिकारक हैं।
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धूम्रपान व जंक फूड का सेवन न करें।
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विहार- परिश्रम, अतिधूप सेवन, अतिव्यायाम, वेगधारण नहीं करना चाहिए।
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रेडीमेड सूप, मैदे से बनी चीजें जैसे ब्रेड, बिस्किट, कोल्ड ड्रिंक्स, ब्राउन राइस, खुबानी, चिकनाईयुक्त भोजन, दूध से बनी चीजें जैसे- दही, पनीर आदि, प्रोसेस्ड मीट, अचार, टमाटर, खजूर, फलों में केला, संतरा, किशमिश का सेवन न करें।
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