शिष्य जो रच गए इतिहास!

शिष्य जो रच गए इतिहास!

सौ. आशा सूर्यवंशी मूठे

मैं शरीर हूँ की हमारी गहरी मान्यता पर प्रकाश डालते हुए प्रहार कर इस मान्यता के मजबूत कारागृह से हमें मुक्त करने वाली परम् पावनी सत्ता का नाम गुरु है। धर्मग्रंथों में ब्रह्मा, विष्णु, महेश क्रमश: उत्पत्ति, स्थिति और विनाश के स्वामी हैं, लेकिन गुरु इन सबमें श्रेष्ठ हैं, गुरु में ये तीनों बसे होते हैं। गुरु जन्मदाता, पालनकर्ता और संहारकर्ता है। गुरु एक अलग क्रम से आत्मबोध की प्रणाली को चलाते हैं जिसमें पहले वो अहंकार को नष्ट करते हैं (विनाश-संहार), फिर सत्य का ज्ञान देकर नया जन्म देते हैं (उत्पत्ति) और अंत में उस ज्ञान में जीना सिखाते हैं (स्थिति) अंतिम सत्य और उस सत्य की खोज पर निकला खोजी इसके बीच जो सेतु बना है, वह है गुरु- इस गुरु रूपी सेतु से गुजरकर ही हमारा जीवन अंतिम गन्तव्य तक पहुँच सकता है।
भारत की मिट्टी का अभिन्न अंग कुछ है तो वो है गुरु-शिष्य परंपरा। हर युग में भारत में गुरुओं की सराहना उनके भक्त-शिष्यगणों द्वारा होते आई। आज हम ऐसे ही शौर्य और स्वाभिमान के प्रतीक, जिनको छूने से अग्रि को भी फफोले पड़ जाएँ, जिनकी चाल देखकर तूफान भी शरमा जाए और संगत और शिष्यों पर होने वाली ज्ञानामृत की वर्षा देखकर घने से घने मेघों की भी आँखें फटी की फटी रह जाएँ। ऐसे सिख संप्रदाय के दसवें गुरु- गुरु गोविंद सिंग महाराज की चरणरज: पर प्रकाश डालने की कोशिश करेंगे जिनके स्मरण में 2 जनवरी जयंती रूप में मनाते हैं।
हर तरफ आज यह अजीब सी हलचल उत्तेजना क्यों है? नदी का पानी अपनी गति से अधिक वेगवान क्यों दिख रहा है? पक्षी दाना चुगना क्यों भूल गए हैं? आखिर उन्हें किस घटना के संकेत मिल गए, जो वे अपने घोंसलों में ही दुबक गए हैं? लगता है आज आनंदपुर की धरा पर कुछ विशेष घटने वाला है। समय यही देखने को आगे बढ़ रहा था।
कक्ष में एक सेवक ने प्रवेश किया। सामने आसन पर दुनिया के वली, साहिबे कमाल, दशम पातशाह जी गुरु गोविंद सिंग जी महाराज सुशोभित थे। निजी सेवक ने उन्हें प्रणाम किया और बोला, ‘हे सच्चे पातशाह, आपकी दया अनुकम्पा से सब तैयारियाँ यूँ मुकम्मल हुई हैं, मानो साक्षात देव ही व्यवस्था करने धरा पर उतरे हों। देश-विदेश से आपके भक्त टोलियाँ बना-बना कर नगर में पहुँचे हैं, जिन्हें सुंदर व्यवस्थित पंडालों में ठहरा दिया गया है। गुरुदेव अति गंभीर होकर सब सुन रहे थे, अचानक उन्होंने शमशीर (तलवार) निकाली।
गुरुदेव की प्रकृति से मौन वार्ता शुरू हो गयी, ‘हे सूर्य, आज जरा दिल थामकर रखना, क्योंकि आज जो घटने वाला है, वह कमजोर दिल वाले का खेल नहीं! आज सभा में वही बैठ पाएँगे, जिन्हें नुकीले तीरों की शैय्या पर सोना आता है, लोहे के चने चबाने आता है और सीने पर तीखे भाले खाकर उन भालों को भी मोडऩा आता है। हे पर्वत, क्या तुमने अपने से भी अडोल चौड़े सीने वाले लोगों को कभी देखा है, जिनके पास तुमसे भी अधिक ऊँचाई है और वजन भी। हे आसमाँ, क्या तूने ऐसे भी दिल देखे हैं, जो तुझसे अधिक विराट हों? जो खुद अपने हाथों से अपने सीने पर खंजर चला, अपना जिगर हमें थाली में परोसकर तोहफे के रूप में दे सके। आज मुझे ऐसे ही महान् योद्धाओं की तलाश है, जो हर आँधी-तूफान में अधिक से अधिक दृढ़ता से डटे रह सकें।
गुरुदेव की प्रकृति से मौन वार्ता चल रही थी। एक सेवक ने गुरुदेव को प्रणाम कर कहा- ‘पूरी संगत पंडाल में आकर बैठ चुकी है। सभी कीर्तन श्रवण कर रहे हैं, लेकिन सभी के नयन आपके दर्शन के प्यासे हैं गुरुदेव। गुरुदेव ने शमशीर को म्यान में डाला और एक पल के लिए बिना नेत्र बंद किए आने वाले इतिहास को अपने मानसपटल पर गढ़ा और फिर पंडाल की तरफ बढ़ चले।
जैसे ही गुरुदेव सभा में पहुँचे, उनके नूरानी जलाल को देखकर संगत ने जयकारों और पूजा से अपनी श्रद्धा और प्रेम का इजहार किया, गुरुदेव सिंहासन पर विराजमान हो गए। गुरुदेव की नजर चारों और दौड़ रही थी। अचानक गुरुदेव सिंहासन से उठे और गरज पड़े, ‘बस बहुत हो चुकी वीरों की गाथाएँ... वर्तमान चाहता है कि तुम ऐतिहासिक गाथा बनो। आने वाला कल तुम्हें बड़ी आस से देख रहा है, मौसम अब बसंत और बहार का नहीं होगा, कुर्बानी का होगा, तुम्हें शहीदी का इतिहास रचना है।
अरे, यह क्या अब तक का शोर सन्नाटे में क्यों बदल गया? संगत का तो मुख खुला का खुला ही रह गया। गुरुदेव ने फिर हुंकार भरी।
उपहार में आज शीश चाहिए। क्या तुममें से कोई ऐसा है जो मुझे आज अपना शीश अर्पण कर सके।गुरुदेव के मुख का जलाल (तेज) देखकर और उनकी गर्जना सुनकर अब सबको विश्वास हो गया कि गुरुदेव वास्तव में ही शीश माँग रहे हैं, इसलिए ही कोई उठ पा रहा था और ही बैठ पा रहा था क्योंकि उठने का मतलब था इस जहान से ही उठ जाना और बैठे रहने का मतलब था, गुरु की नजरों में हमेशा बैठ जाना। द्वंद् सभी के दिलों में था, कोई गुरुदेव से मुख नहीं मोडऩा चाहता था और शीश कटवाने का साहस भी नहीं जुटा पा रहा था।
शिष्यत्व की परख कभी भी अनुकूल परिस्थितियों में नहीं होती, नदी के बहाव के साथ जो बह जाए, वह उम्दा तैराक कैसा? उसने तो बस अपने आपको बहाव के साथ मोड़ दिया। दम का तो पता तब चलता है, जब पानी के बहाव के विपरीत तैरकर दिखाए। प्रात:स्मरणीय परम पूज्य गुरुवर की गाथा मेंवह पथ क्या, पथिक की कुशलता क्या, जिस पथ पर बिखरे शूल हों, नाविक की धैर्य परीक्षा क्या जब धारा ही प्रतिकूल हो।ये है सच्चे (उम्दा) तैराक की निशानी।
पर यह क्या? अनुकूल परिस्थितियाँ हों, तो गुरू नाम के खूब जयघोष, सिंहनाद। लेकिन जरा सी प्रतिकूलता की उल्टी हवा चली, तो सब खत्म। यह कैसा शिष्यत्व? क्योंकि यह अटल सिद्धांत है कि जो गुरुदेव को अर्पित नहीं होगा, वह १०० प्रतिशत यमराज की अमानत बनेगा।
तभी संगत से बड़ी आवाज आई, ‘हे गुरुदेव, आपकी जय हो कि आपने मुझे अवसर दिया शीश अर्पित कर अमर होने का... मैं दयाराम खत्री लाहौर से, आपको अपना शीश अर्पित करता हूँ।
गुरुदेव ने दयाराम को साथ लिया और मंच के पीछे चले गए। सभी की धडक़ने मानो रूक सी गई। कुछ ही देर बाद गुरुदेव रक्त से नहाई तलवार हाथ में लेकर मंच पर लौटे। संगत की आँखें फटी सी रह गई। फिर से गुरुदेव की नजरें शीश ढूँढने लगी। तभी पंडाल से दूसरे वीर की आवाज गूँजी, ‘गुरुदेव! मैं धर्मदास। आपके वन्दनीय चरणों में शीश अर्पण करता हूँ। गुरुवर ने कहा- धर्मदास, अच्छी तरह सोचा है ना, नहीं तो पीछे हट जा।धर्मदास ने कहा- ‘मेरी खेती तो स्वार्थ की खेती है गुरुवर! लेकिन आप जो फसल तैयार कर रहे हैं, उस फसल का बीज बनने का सौभाग्य मुझे मिलने दो गुरुवर।गुरुवर उसे भी मंच के पीछे ले गए और खून से लथपथ तलवार के साथ अकेले ही मंच पर लौटे। वापस आते ही तीसरे सिर की माँग की। लोग पीछे हटने लगे। डर के मारे काँपने लगे कि कहीं गुरुदेव मुझे देख लें, कईयों ने अपनी पोटली उठाई और तुरंत पंडाल से भाग खड़े हुए। इस खौफजदा संगत में अभी भी दिलेर बचे थे। बाँई तरफ से उठामोहकम चंद’, द्वारका नगरी का निवासी, दाहिनी तरफ से जगन्नाथपुरी का निवासीहिम्मत रायउठा और 5वें बिदर केसाहब चंदगुरुवर इन सबको लेकर मंच के पीछे चल गए। पर यह क्या? इतना समय गया वो अब तक वापस क्यों नहीं लौट रहे हैं? संगत की नजरें मंच पर टिकी हुई थी। जिज्ञासा का ज्वर चढ़ता जा रहा था। क्या होगा अब? अचानक फिर से रणभेरियाँ बज उठीं। चारों ओर जयकारों की गूँज फैल गई। श्री गुरुदेव पाँच-पाँच महान् विभूतियों को साथ मंच पर खड़े हुए जिनके गुरुवर ने शीश काटे थे। पर यह क्या? वे सब तो जिंदा हैं। सबके प्रश्न का उत्तर देते हुए गुरुवर बोले, ‘हाँ, ये वही पाँच वीर हैं जिन्होंने स्वयं से स्वयं की इच्छाओं से प्रेम कर मेरे चरणों से प्रेम किया। ये आज अमर हो गए। आज के बाद इतिहास इन्हें खालसा कहकर पूजेगा। आज कि तारीख इतिहास के पन्नों में दर्ज होगी और उसमें इन पाँचों का नाम मेरे साथ स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। मुझे गर्व है कि ये पाँच मुझे मिल गए। ये ही मेरी कमाई है, ये मेरी दौलत है, मेरी शान है, मेरा मान है।
आनंदपुर का यही दिवसखालसा स्थापना दिवसके रूप में स्मरण किया जाता है जिसके संस्थापक श्री गुरु गोविंद साहब हैं, जिनकी जयंती 2 जनवरी को पूरे देशभर में मनाई जाती है। यह वह भारत की पावनी माटी (रज) है, जिसमें ऐसे अलौकिक गुरु और समर्पित शिष्यों ने सदैव जन्म लिया है।
वाहे गुरुजी का खालसा।
वाहे गुरुजी की फतह!!
इतने श्रेष्ठ गुरु और समर्पित शिष्यों की शौर्य गाथा मात्र उपोत्यकल्पित मिथ्या नहीं बल्कि वही भारत का सच्चा इतिहास है। इसकी गवाही देता है वर्तमान युग का पतंजलि योगपीठ और परम श्रद्धेय गुरुदेव स्वामी रामदेव जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज का दिव्य जीवन!
 
गुरुनानक देव जी का उपदेश
कीरत करो, नाम जपो, वंड छको 

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