कौन धरा पर खड़ा सामने मौन साधकर
On
प्रफुल्ल चंद्र कुँवर ‘बागी’
रेशमी शहर, भागलपुर, बिहार
कौन धरा पर खड़ा सामने, मौन साधकर?
पनप अकेले, आगे बढ़ता।
नहीं अपेक्षा कोई रखता।
अपने ही जड़ से जल पीता,
निरपेक्ष सदा जीवन जीता।।1।।
ऐसे जैसे साधक-ध्यानी,
कुदरत से पा दाना-पानी।
केवल चाह रखे परमेश्वर
सिर्फ प्रकृति पर होते निर्भर।।2।।
जीवन का सकल विषम प्रवाह,
स्वीकार करे वरदान रूप।
अपने स्वधर्म पर अटल-अडिग,
विकसित हों निज प्रकृति अनुरूप।।3।।
ऐसे ही पादप सिर्फ बढ़े,
माटी से पानी-खाद कढ़े।
ले सूर्यातप, वायव्य प्राण,
धरती पर थिर, नित सावधान।।4।।
आकाश तले पोषण पाता,
सर्वस्व ग्रहण-धारण गाता।
अंगीकृत कर होता विकसित,
भू पर फलता, होता पुष्पित।।5।।
तरु अपने अस्तिव मात्र से,
करता सारे जग को कृतार्थ।
सिर्फ दूसरों के हित जीता,
उसका अपना कुछ नहीं स्वार्थ।।6।।
तरुवर तत्पर महादान हित, हाथ बाँधकर।
कौन धरा पर खड़ा सामने, मौन साधकर?
तरुवर की जड़, तने, पत्तियाँ,
मूल-छाल की जड़ी-बूटियाँ।
छाया, शीतलता, हरियाली
देता, पत्तों से झुक डाली।।7।।
रंग-बिरंगे खिले प्रसून,
सुन्दरता से देते सुकुन।
शुष्क-सरस फल, छीमियाँ, बीज,
खग-मृग-जग हित पोषण लजीज।।8।।
करते जनहित के सभी काम,
बदले ना लेते तनिक दाम।
पादप चारों ओर हमारे,
विशिष्ट घटक प्राकृतिक सारे।।9।।
घास-पत्तियाँ, लकड़ी-ईंधन,
प्रतिदिन बाँटे प्राण ओसजन।
प्राणिमात्र होते कृतकृत्य,
सब स्मरण करते उन्हें नित्य।।10।।
देते वृक्ष अनगिन अनुदान,
वसुंधरा के वृक्ष वरदान।
वृक्ष बिना धरती पर जीवन,
टिका नहीं रह सकता इक क्षण।।11।।
जनहित में कालकूट पीता,
त्राता बनकर जगहित जीता।
सुन्दरता, समृद्धि, संभावना,
भव्यता की असफल कामना।।12।।
निज निधि औषधि, महादान कर, नजर व्याधि पर।
कौन धरा पर खड़ा सामने, मौन साधकर?
लेखक
Related Posts
Latest News
01 Jan 2025 17:59:59
India of our dreams 1. Become a true Sanatani All of us, the descendants of Rishis and Rishikas, should follow,...


