नेत्र रोग
लक्षण, कारण, बचाव, घरेलू उपचार व निवारण
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डॉ. अरुण पाण्डेय
पतंजलि आयुर्वेद कॉलेज, हरिद्वार
आँखें सजीवों को भगवान द्वारा प्रदान किया गया एक अनुपम व अमूल्य उपहार है। यह एक जटिल संवेदी अंग है। हमारी ज्ञानेन्द्रियों में आँखें सबसे महत्वपूर्ण हैं। आँखों से हम अपने आस-पास के वातावरण को देख और अनुभव कर सकते हैं। यह अंग जितना महत्वपूर्ण है उतना ही संवेदनशील भी है। आँखों की देखरेख बहुत ध्यान से करनी चाहिए अन्यथा नेत्र विकार बड़ी असुविधाएँ पैदा कर सकता है। नेत्र रोग कई प्रकार के हो सकते हैं। सामान्यत: काला या सफेद मोतिया सबसे ज्यादा पाया जाता है। आंखों की स्थिति के शुरुआती निदान के लिए नियमित आंखों की जांच महत्वपूर्ण है। आँखों का सही प्रकार ध्यान न रखने की स्थिति में नेत्र सम्बंधी बड़ी विकृति या अंधापन भी हो सकता है।
नेत्र रोग का कारण
नेत्र रोग के अनेकों कारण हैं जिनमें धुएं या धूलयुक्त स्थान में रहना, बार-बार आंखों को रगडऩा, असमय नींद टूट जाना, आंख में चोट लग जाना, आंखों में गर्मी या आग की लपट पहुंचना, ऋतु-विपर्यय होना, अधिक रोना, गर्म प्रकृति के व्यक्ति का ठण्डे पानी से नहाना, गर्मी से एकदम ठंडे स्थान में पहुंचना आदि कारण प्रमुख समझे जाते हैं। इनके अतिरिक्त माता के आहार-विहार की गड़बड़ी से उसका दूध दूषित हो जाये अथवा माता के नेत्रों में कोई रोग उत्पन्न हो जाये तो दूध पीते बच्चों को भी नेत्र रोग हो सकता है।
नेत्र रोग के प्रकार
आंख दुखने को आयुर्वेद की भाषा में अभिष्यन्द कहते हैं। यह चार प्रकार का होता है- (1) रक्तज, (2) वातज, (3) पित्तज और (4) कफज। रक्तज में ललोई युक्त पानी आंखों से निकलता है तथा आंखें और पलक भी लाल हो जाती हैं। पित्तज अभिष्यन्द में भी प्राय: यही लक्षण होते हैं। नेत्रों में दाह, पाक, धुंआ सा निकलना, ठण्डे पानी के लगने से चैन मालूम पडऩा तथा नेत्रों का पीले हो जाना आदि पित्तज अभिष्यन्द के लक्षण हैं।
वाताभिष्यन्द में सुई चुभने जैसी पीड़ा होती है। नेत्रों में भारीपन और रोमहर्ष, कंकड़ जैसे चुभने का अनुभव (खडक़), रूखापन, शिर-दर्द, नेत्रों में ठण्डे आंसू गिरना आदि लक्षण होते हैं।
कफाभिष्यन्द में नेत्रों में भारीपन, शोध, खुजली, छटपटाहट आदि रहना तथा गर्म पानी या गर्म वस्तु लगने से आनन्द प्रतीत होना, चिकना पानी बहना आदि लक्षण होते हैं।
कुछ व्यक्तियों में एक प्रकार का अभिष्यन्द रोग और होता है जिसमें नीचे की पलक की कला पर आलपिन के सिरे के समान आकार के कूपक उत्पन्न हो जाते हैं जो कि थोड़े दिनों के बाद मिट जाते हैं। किन्तु अभिष्यन्द रोग फिर भी बना रहता है।
नेत्र के पलकों में गुसेरी (पोथकी) होने की भी व्याधि मिलती है। इनमें बड़ा दर्द होता है तथा स्त्राव, खुजली आदि उपसर्ग भी हो जाते हैं। पलकों पर भारीपन तथा गुहेरी का दाना लाल सरसों के समान होता है और वही पक जाने पर पीवयुक्त भी हो जाता है।
माता का दूषित दूध पीने के कारण बच्चों को कुकूणक रोग हो जाता है। इससे आंखों में खुजली चलती और कीचड़ बहती है। इसमें बच्चे अपने माथे, आंख और नाक को रगड़ते रहते हैं। इस स्थिति में बच्चे सूर्य या धूप की ओर नहीं देख सकते और न ही पलकों को ही खोल सकते हैं। इसे कुकूणक रोग कहते हैं।
पित्त के प्रकोप से पक्ष्मपात नामक एक रोग होता है। उसमें पलकों के बाल गिरते हैं तथा खुजली व जलन होती है।
आंखों में रोहे पड़ जाते हैं। यह रोग भी बच्चों और वयस्कों सभी को होता है। इनके अतिरिक्त और भी अनेक उपसर्ग उत्पन्न हो जाते हैं, जिनकी लक्षणानुसार चिकित्सा करनी चाहिए।
नेत्र रोगों की सूची और वे आपकी दृष्टि को कैसे प्रभावित कर सकते हैं
ग्लूकोमा ( Glaucoma)
ग्लूकोमा ( Glaucoma)आंखों में बने दबाव से होने वाला एक नेत्र विकार है, जो मस्तिष्क को संकेत भेजने के लिए जिम्मेदार ऑप्टिक तंत्रिकाओं को क्षति पहुंचाता है। यदि शुरूआत में ग्लूकोमा का पता नहीं चलता है, तो यह कुछ वर्षों में स्थायी नेत्र रोग का कारण बन सकता है।
ग्लूकोमा के लक्षणों का पता लगाना थोड़ा कठिन है। यदि आपको निम्नलिखित में से कोई भी समस्या हो, तो तुरंत नेत्र रोग विशेषज्ञ से परामर्श करना चाहिए-
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सिर दर्द
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आंखों का लाल होना
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संकीर्ण दृष्टिकोण
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आँख में दर्द
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उल्टी या जी मिचलाना
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धुंधली आँखें
नेत्र विकार
मोतियाबिंद
मोतियाबिंद में पुतली और परितारिका के पीछे स्थित आंख का लेंस धुंधला हो जाता है। 40 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में इस नेत्र विकार के होने की सम्भावना रहती है। मोतियाबिंद विश्व में अंधेपन का प्रमुख कारण है।
मधुमेह संबंधी रेटिनोपैथी
मधुमेह के रोगियों में रक्त शर्करा का ऊंचा स्तर रक्त वाहिकाओं के रिसाव या सूजन का कारण बन जाता है, जिससे रक्त का प्रवाह ठीक से नहीं हो पाता है। इससे दृष्टि हानि हो सकती है। मधुमेह संबंधी रेटिनोपैथी के लक्षण निम्रवत हैं-
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धुंधली दृष्टि
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खराब नाइट विजन
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धुले हुए रंग
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दृष्टि के क्षेत्र में अंधेरे क्षेत्रों की दृश्यता
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दृष्टिवैषय
इसमें आंखों की वक्रता में अपूर्णता हो जाती है। यह स्थिति एक निश्चित सीमा तक होती है। यह आंखों की दृष्टि में हस्तक्षेप नहीं करता है लेकिन कभी-कभी आंखों पर पडऩे वाली रोशनी ठीक से मुड़ती नहीं है, जिससे धुंधली या धुंधली दृष्टि होती है। हालांकि, इसे आंखों की सर्जरी या कॉन्टैक्ट लेंस या चश्मे से आसानी से ठीक किया जा सकता है।
मंददृष्टि
यह बच्चों में दृष्टि दोष का एक बहुत ही सामान्य प्रकार है। इस स्थिति में, एक आंख की दृष्टि कम हो जाती है क्योंकि मस्तिष्क को आंखों से उचित दृश्य उत्तेजना प्राप्त नहीं होती है।
कॉर्निया का घर्षण
यह आमतौर पर तब होता है जब आंख में कोई बाहरी वस्तु गिर जाती है। और जब आप अपनी आंखों को रगड़ते हैं, तो धूल आपकी आंखों पर खरोंच का कारण बन सकती है। इसलिए, यह सुझाव दिया जाता है कि आप अपनी आँखों को बहुत अधिक न रगड़ें, उन्हें अपने नाखूनों से न पोछें, या गंदे कॉन्टैक्ट लेंस न पहनें।
सूखी आंखें (Dry Eye)
यह बहुत ही सामान्य नेत्र रोग है। यह तब होता है जब आपके आंसू आपकी आंखों को ठीक से लुब्रिकेट नहीं कर पाते हैं। आंसुओं के कम होने के लिए कई कारण हो सकते हैं। यह स्थिति बहुत ही असहज हो सकती है और जलन या चुभन पैदा कर सकती है।
रेटिना डिटैचमेंट (रेटिना का अलग होना)
रेटिनल डिटैचमेंट एक गंभीर नेत्र विकार है। इसमें आंखों के पीछे का रेटिना आसपास के ऊतकों से अलग हो जाता है। रेटिना प्रकाश को संसाधित करता है, इसलिए रेटिना का क्षतिग्रस्त होना आँखों की रोशनी को स्थायी रूप से नुकसान पहुँचा सकता है। इस नेत्र विकार का सामान्यत: कोई लक्षण नहीं होता, लेकिन नेत्र सम्बंधी कुछ परिवर्तन हैं जो इसके कारण हो सकते हैं-
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प्रकाश की चमक
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बहुत सारे फ्लोटर्स की दृश्यता
एक खराब पक्ष या परिधीय दृष्टि
आयु से संबंधित धब्बेदार अध:पतन (एएमडी)
यह आंखों के बिगडऩे के कारण होता है। सूर्य का कलंक, रेटिना का मध्य क्षेत्र जो दृश्य तीक्ष्णता को नियंत्रित करता है। इस आंख की स्थिति के कुछ लक्षण इस प्रकार हैं-
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कम कंट्रास्ट संवेदनशीलता
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कम दृश्य तीक्ष्णता
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केंद्र में विकृत छवियों की दृश्यता
यूवाइटिस
अवधि यूवेइटिस कई नेत्र स्थितियों में हो सकता है जो मुख्य रूप से यूवीए को प्रभावित करते हैं। इससे आंख में सूजन हो सकती है और यह ऊतकों को नष्ट कर सकता है। इससे दृष्टि खराब हो सकती है या अंधापन भी हो सकता है। यूवाइटिस के कई प्रकार हैं-
पूर्वकाल यूवाइटिस- आंख के सामने के हिस्से को प्रभावित करता है।
इंटरमीडिएट यूवाइटिस- सिलीरी बॉडी को प्रभावित करता है।
पोस्टीरियर यूवाइटिस- आंख के पिछले हिस्से को प्रभावित करता है।
हाइपहेमा
यह ऐसी स्थिति है जिसमें आंखों में रक्त जमा हो जाता है। यह ज्यादातर परितारिका और कॉर्निया के बीच एकत्र होता है। हाइपहेमा तब होता है जब चोट लगने से रक्त वाहिकाएं फट जाती हैं। ऐसी स्थिति में नेत्र रोग विशेषज्ञ से तुरंत परामर्श किया जाना चाहिए।
नेत्र रोगों में आयुर्वेदिक उपचार
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दारुहल्दी, नागरमोथा और गेरु समान भाग लेकर बकरी के दूध के साथ पीसें और आंखों के बाहर लेप करें तो बालकों के सभी नेत्र रोगों में लाभ होता है।
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सोंठ, भांगरा, हल्दी और सेंधा नमक का कल्क करें और पुटपाक विधि से पकाकर रस निचोड़ लें। इसे रोगी की आंखों में टपकाने से कुकूणक एवं अन्य नेत्र रोग दूर होते हैं।
छोटी हरड़ को पानी के साथ घिसकर लगाने से शीघ्र लाभ होता है।
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दारुहल्दी के रस से निर्मित रसौत को माता के दूध में मिला कर अक्षिपूरण करने से आंखों में दाह, दर्द तथा अश्रु स्राव आदि में लाभ होता है।
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काली हरड़ को पीसकर घी में मिलावें और आंखों पर लेप करें तो सब प्रकार अभिष्यन्द ठीक होते हैं।
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नीम के पत्तों में कल्क में लोध को पीसकर रखें और आग पर स्वेदन कर माता का दूध मिलावें तथा छानकर नेत्रों में टपकावें। इससे पित्तजन्य अभिष्यन्द में लाभ होता है।
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वृहत्पंचमूल का क्वाथ छानकर आंखों में गुनगुना डालना चाहिए। इससे वातज अभिष्यन्द में लाभ होता है।
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सुगन्धबाला, देवदारु, कूट और सोंठ को पानी के साथ पीसकर लेप करने से कफज अभिष्यन्द में लाभ होता है।
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तुलसी के रस को गुनगुना करके आंखों में टपकावें इससे भी कफजन्य अभिष्यन्द ठीक होता है।
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एरण्ड की छाल, पत्ते और जड़ का कल्क करके उसके साथ बकरी का दूध सिद्ध करके छान लें और आंखों में गुनगुना ही डालें तो वातज अभिष्यन्द ठीक हो जाता है।
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आंखों में केवल गुलाब जल डालें तो उससे पित्तज अभिष्यन्द में लाभ होता है।
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त्रिफला, लोध, मुलहठी, शर्करा और नागरमोथा को पीसकर ठण्डे पानी में मिलाकर आंखों पर सेक करें तो रक्तज अभिष्यन्द ठीक होता है।
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सफेद लोध को चूर्ण घृत के साथ भूनकर कपड़छन करें और गर्म पानी मिलाकर आंखों पर सेक करें अथवा इसकी पोटली बनाकर सेकें तो आंखों का दर्द दूर होता है।
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त्रिफला को रात्रि के समय पानी में भिगो दें और प्रात:काल छानकर आंखों में टपकावें तो सब प्रकार के अभिष्यन्द में लाभ होता है।
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नींबू के रस को लौह पात्र में डालकर लोहे की ही मूसली से घोटें और जब कुछ गाढ़ापन आ जाये, तब उसे आंखों के बाहर लेप करें। इससे सब प्रकार की नेत्र पीड़ा नष्ट हो जाती है।
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आंवले के बीज का 1 भाग, बहेड़े की मिंगी 2 भाग और हरड़ की मिंगी 3 भाग, पानी के साथ पीसकर बत्ती बना लें तथा पानी के साथ घिसकर आंखों में आंजें। इससे आंखों से पानी का बहना और वात-रक्तज पीड़ा में शीघ्र लाभ होता है।
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बबूल के पत्तों का क्वाथ बनाकर छानें और पुन: आग पर चढ़ाकर लेही के समान गाढ़ा कर लें तथा उतारकर ठण्डा होने पर उसमें शहद मिलावें और आंखों में अंजन करें, इससे नेत्र स्राव (आंखों में पानी बहने) में लाभ होता है।
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समुद्रफल को पानी के साथ घिसकर नित्य प्रति आंखों में आंजने से नेत्रस्राव नष्ट होता है।
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आंखों में दर्द, लाली, स्राव आदि की स्थिति हो तो गर्म पानी सेंक करना हितकर है।
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कफजन्य नेत्र-विकारों में श्वेत फिटकरी को फुलाकर गुलाबजल के साथ मिलावें और आंखों में टपकावें तो शीघ्र ही लाभ सम्भव है।
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सेंधा नमक और शहद 1-1 ग्राम तथा गिलोय का स्वरस 12 ग्राम एकत्र घोंटकर आंजने से पिप्लार्म, तिमिर, काज, खाज तथा श्वेत और काले भाग के रोग दूर हो जाते हैं।
पतंजलि में उपचार
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आइग्रिट गोल्ड, इम्यूनोग्रिट, गिलोय घनवटी, महात्रिफलादि घृत, आइग्रिट आई-ड्राप आदि अत्यंत गुणकारी, शोधपरक व प्रामाणिक औषधियाँ हैं।
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रोगानुसार तर्पण, पुट पक्का, अंजन, सेक, अस्च्योतन, पिंडी विडालक आदि चिकित्सा विधियाँ हैं।
नोट : उपचार से पहले चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।
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