शास्त्रों के अनुसार ‘गौ’ सर्वदेवमयी और सर्व तिर्थमयी
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स्वामी अरविन्द देव
पतंजलि संन्यासाश्रम, हरिद्वार
गाव: प्रतिष्ठा: भूतानाम्
गौ माता समस्त प्राणियों का आधार हैं।
गावो विश्वस्य मातर:
गाय अखिल विश्व की माँ हैं।
गौ माता और पृथ्वी ये दोनों गौ के दो स्वरूप हैं। जिस प्रकार पृथ्वी पर रहते हुए मनुष्यों के मल-मूत्रादि के त्यागदिक कुत्सित आचरणों को पृथ्वीमाता सप्रेम सहन करती है उसी प्रकार गौ माता भी मनुष्यों के जीवन का आधार होती हुई उनके वाहन, निरोध एवं ताडऩ आदि कुत्सित आचरणों को सहन करती है। इसलिए वेदों में पृथ्वी और गौ को ‘मही’ शब्द से व्यवहत किया गया है। मनुष्यों में भी जो सहनशील अर्थात क्षमी होते हैं, वे महान माने जाते हैं। संसार में पृथ्वी और गौमाता से अधिक क्षमावान और कोई नहीं है। अत: ये दोनों ही महान हैं।
जहाँ गौमाता का निवास है, वहाँ सर्वदा सुख-शान्ति का पूर्ण साम्राज्य उपस्थित रहता है। शास्त्रों में गौ के सर्वदेवमयी और सर्व तीर्थमयी कहा गया है, अत: गौ के दर्शन से समस्त देवताओं के दर्शन और समस्त तीर्थों की यात्रा करने का पुण्य प्राप्त होता है। शुक्ल यजुर्वेद में गौमाता और पृथ्वी इन दोनों के संबंध में प्रश्न किया है इसका उत्तर अगले मंत्र में गोस्तु मात्रा न विद्यते। ‘23/49’ गौ का परिमाण नहीं है।
जहाँ गौमाता का निवास है, वहाँ सर्वदा सुख-शान्ति का पूर्ण साम्राज्य उपस्थित रहना है।
गायत्रीचे दूध खरे।
अमृताये हेची झरे।।
चार वेद निचे पाय।
वर्णिपात सारे देव।।
गौ-दर्शन, गौ-स्पर्शन, गौ-पूजन, गौ-स्मरण, गौ-गुणानुकीर्तन और गौ-दान करने से मनुष्य सर्वविध पापों से मुक्त होकर अक्षय स्वर्ग का भोग प्राप्त करता है। गौ-माता परिक्रमा से बृहस्पति सबके वन्दनीय, माधव सबके पूज्य और इन्द्र ऐश्वर्यवान हो गये। गौ के गोबर, गौदुग्ध, गौघृत, गौदधि आदि सभी पदार्थ परम् पावन आरोग्यप्रद तेज: प्रद आयुर्वर्धक तथा बलवर्धक माने जाते हैं। यही कारण है कि आर्य जाति के प्रत्येक श्रोत स्मार्तशुभ कर्म से पंचगव्य और का विधान अनादि काल से प्रचलित और मान्य है।
गावोऽस्मांक वयं तासां यतो गावस्ततो वयम्।
(महाभारत अनुशासन पर्व)
गावो मे सर्वतश्चैव गवां मध्ये वसाम्यहम्।।
(महाभारत अनुशासन पर्व)
यह है कि मैं सदा गौओं का दर्शन करूँ और गौएँ मुझ पर कृपा दृष्टि करें गौएँ हमारी और हम गौओं के हैं। जहाँ गौएँ रहें, वहीं हम रहें। गौएँ मेरे आगे रहें, गौएँ मेरे पीछे भी रहें, गौएँ मेरे चारों ओर रहें और मैं गौओं के बीच में निवास करूँ। छन्दोग्य उपनिषद् में गौमाता की महिमा ब्रह्मज्ञान की एक कथा है।
एक सदाचारिणी ब्राह्मिणी थी उसका नाम जबाला था, उसका एक पुत्र सत्यकाम था। जब वह विद्याध्ययन करने के योग्य हुआ तब एक दिन अपनी माता से कहने लगा ‘‘माँ मैं गुरुकुल् में निवास करना चाहता हूँ, मुझसे नाम, गौत्र पूछेगें तो मैं अपना कौन गौत्र बताऊंगा? इस पर माता ने कहा कि पुत्र मुझे तेरे पिता से गौत्र पूछने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ क्योंकि उन दिनों में सदा अतिथियों की सेवा करने में ही व्यस्त रहती थी, अतएव जब आचार्य तुमसे गौत्रादि पूछें तब तुम इतना ही कहना कि मैं जबाला का पुत्र सत्यकाम हूँ । माता की आज्ञा लेकर सत्यकाम हारिद्रुमत गौतम ऋषि के यहाँ गया और बोला मैं श्रीमान के यहाँ ब्रह्मचर्य पूर्वक सेवा करने आया हूँ । आचार्य जी ने पूछा-वत्स तुम्हारा गौत्र क्या है? सत्यकाम ने कहा- भगवन मेरा गौत्र क्या है? इसे मैं नहीं जानता हूँ मैं सत्यकाम जबाला हूँ, बस इतना ही इस संबंध में जानता हूँ । उस पर गौतम ऋषि ने कहा कि वत्स ब्राह्मण को छोडक़र ऐसे कोई भी इस प्रकार सरल भाव से सच्ची बात नहीं कह सकता। जा थोड़ी समिधा ले आ, मैं तेरा उपनयन संस्कार करूँगा। सत्यकाम का उपनयन करके चार सौ दुर्बल गायों को उसके सामने लाकर गौतम ऋषि ने कहा कि तू इनको वन में चराने ले जा जब तक इनकी संख्या एक हजार न हो जाए इन्हें वापस न लाना। उसने कहा भगवन इनकी संख्या एक हजार हुए बिना मैं नहीं लौटूंगा। सत्यकाम गौमाता को लेकर वन में गया और वहाँ वह कुटिया बनाकर रहने लगा और तन-मन से गौमाता की सेवा करने लगा। धीरे-धीरे गौमाता की संख्या एक हजार हो गयी। तब एक दिन एक सांड ने सत्यकाम के पास आकर कहा, ‘‘वत्स, हमारी संख्या एक हजार हो गयी है, अब तू हमें आचार्यकुल में पहँुचा दे। साथ ही ब्रह्मतत्व के संबंध में तुझे एक चरण का मैं उपदेश देता हूँ वह प्रकाशस्वरूप है। इसका दूसरा चरण अग्नि बतलायेंगे।’
सत्यकाम गौमाता को लेकर आगे चला। संध्या होने पर उसने गायों को रोक दिया और उन्हें जल पिलाकर वही रात्रि विश्राम की व्यवस्था की। तत्पश्चात् लकड़ी जलाकर उसने अग्नि जलायी। अग्नि ने कहा ‘सत्यकाम’ मैं तुझे ब्रह्मा का द्वितीय पद बतलाता हूँ वह अनन्त लक्षणात्मक हे अगला उपदेश तुझे हंस करेगा।
दूसरे दिन सत्यकाम ने एक वटवृक्ष के नीचे गौमाता के रात्रि विश्राम की व्यवस्था की। अग्नि जलाकर वह बैठ ही रहा था कि एक जलमुर्ग ने आकर पुकारा और कहा वत्स मैं तुझे ब्रह्म के चतुर्थ पद का उपदेश देता हूँ, वह आयतन स्वरूप है।
इस प्रकार उन-उन देवताओं से सच्चिदानन्द धनलक्षण परमात्मा बोध प्राप्त कर एक सहस्त्र गौमाता के साथ सत्यकाम आचार्य गौतम के यहाँ पहँुचा। आचार्य जी ने उसकी चिंतारहित, तेजपूर्ण दिव्य मुखकान्ति को देखकर कहा, ‘वत्स तू ब्रह्मज्ञानी के सदृश दिखलायी पड़ता है। सत्यकाम ने कहा कि भगवन मुझे मनुष्येतरों से विद्या मिली है, मैंने सुना है कि आपके सदृश आचार्य के द्वारा प्राप्त हुई विद्या ही श्रेष्ठ होती है, अत: आप ही मुझे पूर्ण रूप से उपदेश कीजिए। आचार्य बड़े प्रसन्न हुए और बोले वत्स तूने जो प्राप्त किया है वह ब्रह्म तत्व है और उस सम्पूर्ण तत्व का पुन: उन्होंने ठीक उसी प्रकार उपदेश किया। शास्त्रों में गौरक्षार्थ गौ-यज्ञ भी एक मुख्य साधन कहा गया है। वैदिक काल में बड़े-बड़े गौ-यज्ञ और गौ-महोत्सव हुआ करते थे। भगवान श्रीकृष्ण ने भी गौवर्धन पूजन के अवसर पर ‘गौ-यज्ञ’ किया था। गौ-यज्ञ में वेदोक्त गौसूक्त से गौपुष्टयार्थ और गौरक्षार्थ हवन, गौपूजन, वृषभ-पूजन आदि कार्य किये जाते थे जिसे गौ संरक्षण, गौ-संर्वधन, गौ-प्रख्यापन और गौ-संगाति आदि में विशेष लाभ होता है। आज वर्तमान समय में वास्तविक परिस्थिति देखते हुए गौ-प्रधान भारतभूमि में सर्वत्र गौ-यज्ञ की अथवा गौ-रक्षा महायज्ञ की विशेष आवश्यकता है। अत: गौवर्धनधारी भगवान श्रीकृष्ण नंद से प्रार्थना करते हैं कि वे गौ-रक्षा हेतु यज्ञ का आयोजन करें और सभी देशवासियों का आह्वान करें। सभी भारतवासी धर्मप्रेमी व गौ सेवक हैं। हिन्दुओं के हदयों में गौरक्षार्थ ‘गौ-यज्ञ’ हो और उन गौ-यज्ञो के फलस्वरूप प्रत्येक हिन्दू भाई की जिसमें इन महाभारत पुण्यमय श्लोकद्वय की मधुर ध्वनि सर्वदा नि:सृत होती रहे, जिससे देश और समाज का सर्वविध कल्याण हो।
गा वै पश्याम्यहं नित्यं गाव: पश्यान्तु मां सदा।।
गौ के जब बछड़ी-बछड़े पैदा होते हैं तब सर्वप्रथम वे केवल अपनी माता के दुग्ध का पान करते हैं और तत्क्षण वायु के वेग से सदृश्य दौडऩे लगते हैं। संसार में गौवत्स के अतिरिक्त अन्य किसी भी मनुष्य से लेकर कीट-पतंगादि तक के प्राणी के नवजाती शिशु में इस प्रकार की विचित्र शक्ति और स्फूर्ति नहीं पायी जो गौवत्स की तरह उत्पन्न होते ही इतसात: दौडऩे लग जाये। इसीलिए मानव जाति में जब बालक पैदा होते हैं तब उन्हें सर्वप्रथम मेधा जन्म के लिए ‘‘मधुघृते प्राश्यतिघृतं वा’’ इस सूत्र के अनुसार मधु और गौघृत स्वर्ण घिस कर अथवा केवल गौघृत में स्वर्ण घिसकर वह पदार्थ बालक को चटाया जाता है तत्पश्चात् उसे गौ का दुग्ध पिलाया जाता है। अतएव गौ को माता कहा जाता है।
हमारी माताएँ हमें बाल्यावस्था में ही अधिक से अधिक दो-ढ़ाई साल तक अपना दुग्ध पिलाकर हमारा इहलोक में कल्याण करती है किन्तु गौ-माता हमें आजीवन अपना अमृतमय दुग्ध पिलाकर हमारा इहलोक में पालन-पोषण करती है और हमारी मृत्यु के बाद वह हमें स्वर्ग में पहुँचती है जैसा कि अथर्ववेद में भी कहा गया है-
अयं ते गौपिस्तमं जषस्य स्वर्ग लोकमधि रोहयेनम।।
(28/3/4)
।। धमं च गौधनं प्राहु।।
इस वाक्य के अनुसार विद्वान ‘‘गौ को ही उसकी धन कहा है’’।
‘‘धेनुं: सदनं रचीयाम्’’। (अथर्व 1/1/35)
गौ सम्पति का घर है।
माता रूद्राणां दुहितां वसूना स्वसादित्या नाममृश्रस्य नाभि:
(ऋक् 2/1०2/25)
गौ एकादश रूद्रों की माता, अष्टादश वसुओं की कन्या और दवादश आदित्यों की बहन है, तथा अमृतरूप दुग्ध देने वाली है।
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