कैसा हो आहार?

कैसा हो आहार?

डॉ. रीना अग्रवाल
(हिंदी वैज्ञानिक-बी) पतंजलि हर्बल अनुसंधान विभाग, हरिद्वार

  भोजन हमारे लिए कई कारणों से महत्त्वपूर्ण है, जो हमें कार्य करने के साथ-साथ दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रदान करता है। भोजन, हड्डियों एवं मांसपेशियों को मज़बूत बनाता है। शरीर की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की मरम्मत करता है और शारीरिक विकास कर बाहरी हानिकारक तत्वों से रक्षा कर प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करता है। भोजन से एक प्रकार की संतुष्टि मिलती है जो हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। प्रत्येक आयु वर्ग को संतुलित भोजन का ज्ञान होना चाहिए क्योंकि भोजन ही हमारा वर्षों तक रोग-मुक्त एवं स्वस्थ जीवन सुनिश्चित करता है।
बात महिलाओं द्वारा दैनिक कार्य करने से संबंधित
बीमारियों से बचने, सुरक्षित एवं स्वस्थ प्रसव के लिए संतुलित भोजन या आहार की आवश्यकता होती है परंतु विश्व भर की महिला स्वास्थ्य संबंधित मुद्दों पर दृष्टि डालने से ज्ञात होता है कि किसी भी अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की तुलना में उनमें कुपोषण होने की संभावना अधिक रहती है। इससे थकान, कमज़ोरी, दुर्बलता हो सकती हैं। लंबे समय तक उनके भूखे रहने एवं पौष्टिक भोजन उपलब्ध न होने के कई कारण हो सकते हैं। ग्रामीण महिलाओं के आहार संबंधित कारणों में आर्थिक कमी मुख्य कारण हो सकती है जिसका सर्वाधिक प्रभाव महिलाओं पर ही पड़ता है। क्योंकि अक्सर महिलाएँ तभी भोजन ग्रहण करती हैं जब पुरुष और बाकी सदस्य कर चुके होते हैं। महिलाओं में कुपोषण की समस्या का तब तक कोई निदान नहीं किया जा सकता जब तक कि संसाधनों का उचित वितरण न किया जाए! इन सबके बावजूद कुछ ऐसे खाद्य पदार्थ भी हैं जिनसे कम कीमत में बेहतर पोषण प्राप्त किया जा सकता है। इसमें मौसमी फल, सब्जियाँ, अंकुरित अनाज, मोटा अनाज, मूँगफली-गुड़, सूखे मेवे, फलों का रस, सब्जियों का सूप, शहद, खजूर, छुहारे आदि श्रेष्ठ आहार के विकल्प हैं। आहार का सुपाच्य व हल्का होना बहुत आवश्यक होता है। नशीले व तले-भुने पदार्थों से दूर ही रहना चाहिए। भारत के अधिकांश परिवार लगभग प्रत्येक भोजन में कुछ मुख्य अन्न शामिल करते हैं। क्षेत्र के आधार पर इसमें गेहूँ, चावल, मक्का, बाजरा, कुटकी या आलू इत्यादि हो सकते हैं जो शरीरिक व दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। अन्यसहायकखाद्य पदार्र्थों में प्रोटीन, विटामिन, खनिज, वसा, फल-सब्जियाँ इत्यादि आवश्यक हैं। अत: स्वस्थ रहने के लिए अपनी रुचि के अनुसार स्थानीय रूप से उपलब्धसहायक भोज्य पदार्थसम्मिलित करने चाहिए।

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अब बात गर्भवती महिलाओं के संबंध मेंउनका आहार कैसा हो!’
उसकी कोख में भावी शिशु आकार ले रहा होता है। गर्भ धारण के बाद महिला को नियमित रूप से विटामिन लेना शुरू कर देना चाहिए। यह भी सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि पूरक आहार में फोलिक एसिड हो जो गर्भावस्था के आरंभ में भ्रूण के मस्तिष्क एवं रीढ़ की हड्डी की असामान्यताओं को रोकने में मदद करता है। यहाँ महिलाओं से शराब, कैफीन, निकोटिन एवं नशीले पदार्थों से बचने का हमारा व्यक्तिगत परामर्श है। यदि उन्हें उच्च रक्तचाप, मधुमेह या थायरॉयड जैसी कोई भी समस्या है तो नियमित रूप से चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। गर्भवती या शिशु को दुग्धपान कराने वाली महिलाओं को विटामिन और खनिज की अधिक आवश्यकता होती है। इसमें विटामिन, खनिज आयरन, कैल्शियम, आयोडीन, फोलिक एसिड, विटामिनमुख्य हैं। मासिक धर्म या गर्भवती महिला को एनीमिया से बचने और गर्भस्थ शिशु के समुचित विकास के लिए पर्याप्त फोलिक एसिड लेना चाहिए। अपने आहार में आयरन से भरपूर भोज्य पदार्थ मटर, फलियाँ, रागी, पत्तेदार सब्जियाँ, हरे रंग की गोभी, गुड़, मूँगफली, आलू, शलजम, सूरजमुखी व कद्दू के बीज, अनानास, सूखे मेवे, बेर, खजूर, आड़ू, मशरूम, किशमिश, साबुत अनाज इत्यादि का समावेश करना चाहिए। यदि आप लोहे के बर्तनों में भोजन बनाती हैं तो इससे अधिक लौह तत्व या आयरन प्राप्त होता है। व्यंजन बनाते समय विटामिनसीकी अधिकतम मात्रा के लिए टमाटर या नींबू का रस मिला देने से लोहे के बर्तनों की तुलना में भोज्य पदार्थों में लौह तत्व की अधिक मात्रा बढ़ जाती है। गर्भावस्था में गर्भस्थ शिशु और भावी माता की हड्डियाँ एवं दाँतों के लिए पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम की आवश्यकता होती है। माता के दूध में वृद्धि के लिए भी कैल्शियम की आवश्यकता होती है। कैल्शियम से भरपूर खाद्य पदार्थ जैसे दूध, दही, पनीर, बादाम, सरसों, तिल, बाजरा, फलियाँ, विशेषकर सोयाबीन, गहरी हरी पत्तेदार सब्जियाँ, जिसमें पालक, बथुवा, सोया, सरसों, रागी इत्यादि हैं। आयोडीन का सर्वाधिक उत्तम माध्यम साधारण नमक के बजाय आयोडीन युक्त नमक का उपयोग करना है।
विटामिनरतौंधी की रोकथाम कर शरीर का कुछ संक्रमणों से बचाव करता है। गर्भावस्था में विटामिनयुक्त खाद्य पदार्थों से स्तनपान के जरिये भावी शिशु को पर्याप्त विटामिनका पोषण मिलता है-
·         भावी माता को पर्याप्त पोषण के लिए प्रतिदिन हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन करना चाहिए। ये विटामिन, खनिज तथा फाइबर का अच्छा माध्यम हैं। कुछ कच्ची सब्जियाँ जैसे मूली, गाजर, टमाटर, शलजम, खीरा का नियमित रूप से सेवन आवश्यक है।
·         रोटी बनाने के लिए चोकर सहित आटे का उपयोग करने से पौष्टिकता बढ़ जाती है। चावल बनाते समय उसमें उतना ही जल समावेशन हो ताकि अतिरिक्त जल माण्ड के रूप में निकालना न पड़े। यदि फिर भी अतिरिक्त जल के रूप में माण्ड निकालना पड़ ही जाए तो उसका उपयोग दाल-सब्जी या रोटी गूँथने में किया जा सकता है।
·         दूध एवं दुग्ध उत्पाद ठंडे स्थान पर रखें। ये प्रोटीन और कैल्शियम से भरपूर होने के कारण शारीरिक विकारों को दूर करने में लाभप्रद होते हैं।
·         सोयाबीन, फलियाँ, बींस, दालें प्रोटीन के अच्छे साधन हैं। यदि इन्हें खाने से पहले अंकुरित कर लिए जाए तो विटामिंस एवं पोषक तत्व अधिक बढ़ जाते हैं।
·         फल-सब्जियों का उपयोग काटने के तुरंत बाद ही करना चाहिए इससे पौष्टिकता बनी रहती है। सब्जियाँ पकाते समय कम से कम पानी का उपयोग करें इससे सब्जियों के विटामिन पानी में घुल जाते हैं। अतिरिक्त पानी को फेंकें नहीं उसका उपयोग सूप के रूप में किया जा सकता है। पत्तागोभी, गाजर, मूली की बाहरी कठोर सतह में विटामिंस होते हैं इनका उपयोग स्वास्थ्यवर्धक सूप बनाने में किया जा सकता है।
·         मुख्य खाद्य पदार्थों एवं सहायक खाद्य पदार्थों जैसे अनाज, दाल-चावल, इडली, खिचड़ी आदि का संयोजन अधिक पौष्टिक होता है। इनका सेवन गर्भवती महिलाओं द्वारा दिन में कई बार किया जा सकता है।
·         डिब्बा बंद भोजन या संरक्षित भोजन, विटामिन सप्लीमेंट, मिठाई, शीतल पेय, सोडा जैसे अस्वास्थ्यकर उत्पादों से बचें। गर्भावस्था में इन सब बातों का पालन करने से हीएक स्वस्थ जननी, स्वस्थ संतति को जन्म दे सकेगी।
 अब बात आती है कि हमारे बच्चों का आहार कैसा हो!
बच्चों के आहार के मूल तत्व वयस्कों के पोषक तत्वों के समान ही हैं जिसमें विटामिंस, कार्बोहाइड्रेट, खनिज, प्रोटीन, वसा का समावेश हो। बढ़ते बच्चों को अलग-अलग आयु में पोषक तत्वों की पृथक-पृथक मात्रा की आवश्यकता होती है-
·         बढ़ते बच्चों को वसा रहित या कम वसा के दुग्ध उत्पाद जैसे दूध, दही- मठ्ठा, पनीर आदि दूध से बने उत्पाद खाने के लिए प्रोत्साहित करें। उनके भोजन में ऊर्जा प्रदान करने वाले साबुत अनाज, अंकुरित दालें या फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ जैसे गेहूँ की रोटी, दलिया, हलवा, इडली, खीर, पोहा, पास्ता, मक्का के दाने या शष्टि का चावल, फलियाँ, सोया उत्पाद, मटर, बीज इत्यादि का समावेश करना चाहिए।
·         फलों के रस की तुलना में बच्चों को तरह-तरह के ताजे या सूखे मेवे खाने के लिए प्रोत्साहित करें। इसमें अंकुरित अनाज, रात में भिगोकर रखे गए मूँगफली के दाने, बादाम, मुनक्का इत्यादि का समावेश करें।
·         यदि आप अपने बच्चे को जूस देती हैं तो यह निश्चित रूप से सुनिश्चित कर लें कि उसमें अतिरिक्त शर्करा का समावेश न हो, डिब्बा बंद या संरक्षित जूस के उपयोग से सदैव बचाव करना चाहिए। स्मरण रहे कि एक चौथाई कप सूखे फल, एक कप ताजे फलों के बराबर होते हैं।
·         विभिन्न रंग-बिरंगी तरकारियाँ जैसे हरी गोभी, गाजर, शिमला मिर्च, बींस, मटर इत्यादि देनी चाहिए। 
·         माता-पिता को चाहिए कि डिब्बा बंद अथवा पैकेज फूड, विटामिंस सप्लीमेंट, सोडा, शीतल पेय जैसे उत्पादों पर धन खर्च न करके पौष्टिक तत्वों पर ही खर्च करें तो उनके बच्चे अधिक स्वस्थ रह सकेंगे। हरी सब्जियाँ, फल, अंकुरित श्रीअन्न, सूखे मेवे, फलों का रस, सब्जियों का सूप, शहद, गुड़ इत्यादि श्रेष्ठ आहार के विकल्प हैं।
·         बच्चों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और अच्छी आदतें माता-पिता द्वारा बचपन से ही डाली जानी चाहिए। ये आदतें अच्छी शिक्षा, ध्यान, योग-व्यायाम समग्र विकास को बढ़ावा देती हैं। यहाँ अभिभावकों के लिए सलाह है कि वे अपने बच्चों को खूब करें प्यार, मगर उन्हें घर का पौष्टिक आहार ही दें।
अब बात बुजुर्गों की पोषण आवश्यकताओं के संदर्भ में!
बुजुर्गों को उच्च कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों के सेवन से बचना चाहिए। उनके आहार में संतुलित फल-सब्जियाँ, साबुत अनाज, फलियाँ, वसा रहित दूध के उत्पाद, चावल, खिचड़ी, मीठा-नमकीन दलिया, इडली, नरम फल, ताजे फलों का रस आदि होने चाहिए। भोजन सुपाच्य होने के साथ-साथ अच्छी तरह से पका होना चाहिए ताकि पाचन क्षमता प्रभावित न हो। मांसपेशियों को स्वस्थ बनाए रखने के लिए उच्च प्रोटीन, चाहे वह दालें, अनाज, सोया अच्छी मात्रा में दही या बींस हों, इनका नियमित सेवन करना लाभप्रद है।
बुजुर्ग ओमेगा से भरपूर खाद्य पदार्थ ले सकते हैं जैसे मेवे, वनस्पति तेल, हरी पत्तेदार सब्जियाँ इत्यादि। इनमें सूजनरोधी गुण पाए जाते हैं, कोलेस्ट्रॉल व हृदय रोगों का खतरा कम होता है और स्मरण शक्ति बढ़ती है।
वृद्धावस्था में अस्थि रोगों से बचने के लिए कैल्शियम की पूर्ति आवश्यक है। इसके लिए अनाज और जड़ वाली सब्जियाँ कार्बोहाइड्रेट के अच्छे साधन हैं जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में लाभप्रद होते हैं।
दूध से बने उत्पाद विटामिन बी12 को बढ़ाते हैं जो तंत्रिका कोशिकाओं को स्वस्थ रखने एवं पाचन में सहायक होते हैं। बुजुर्गों की हड्डियों और दाँतों की रक्षा के लिए वसा रहित दूध लाभदायक होता है। उन्हें घी-तेल, मक्खन, खजूर, मुनक्का, मेवे और सूखे मेवे कम मात्रा में ही लेने चाहिए।
ताजे फल, पत्तेदार सब्जियाँ, दूध, विटामिन, खनिज ऑक्सीकरणरोधी (एंटीऑक्सीडेंट) के अच्छे साधन हैं। हालाँकि, कम मात्रा में ही इनकी आवश्यकता होती है परंतु आजकल पोषण विशेषज्ञ बुजुर्गों को इनके अधिक सेवन की सलाह देते हैं क्योंकि ये मधुमेह, मोटापा कैंसर, स्ट्रोक जैसी बीमारियों से लडऩे में उपयोगी होते हैं और बुजुर्गों के निद्रा-चक्रमें सुधार करते हैं।
इसके अलावा, कुछ खाद्य पदार्थ मधुमेह-रक्तचाप जैसी बीमारियों से बचाव करते हैं। जंक फ़ूड में अधिक मात्रा में नमक, चीनी, तेल-वसा आदि होता है जो मोटापा व उच्च रक्तचाप जैसी व्याधियों का कारण बनता है। इसलिए बुजुर्गों को डिब्बा बंद भोजन या जंक फूड से सदैव बचना चाहिए।
स्वास्थ्य के प्रतिहमारा दृष्टिकोणमेरा स्वास्थ्य, मेरा अधिकारसे परिपूर्ण होना चाहिए। हमें सभी आयु एवं अवस्थाओं में विभिन्न भोज्य पदार्थ अपने स्वभाव, उपलब्धता एवं आदतों के अनुरूप जितना संभव हो उतना ग्रहण करना चाहिए। हमें यह भी समझना चाहिए कि कुछ पदार्थ लुभावने प्रतीक होते हैं, उनकी कीमत भी अधिक होती है, एक ऐसी कीमत जिसे चुकाना बहुत मुश्किल होता है। अत: लुभावने प्रलोभनों से बचना चाहिए। ऐसा हो हमारा आहार, जिसमें सभी पौष्टिक तत्वों का समावेश हो और जो स्वास्थ्य के लिए औषधि सरीखा हो। इसलिए अपने भोजन थाल में संतुलित पोषक तत्वों का समावेश कर सरल, सहज एवं सुंदर जीवन की कामना करनी चाहिए। कहा भी गया है- ‘स्वास्थ्य ही सुंदरता है और फिटनेस इसकी कुँजी है।
अंत में, इस उक्ति के साथ विषय का समापन करते हैं किआहार ही तुम्हारी औषधि हो, और औषधि ही तुम्हारा आहार हो!’
 

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