परम पूज्य योगऋषि श्रद्धेय स्वामी जी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य

परम पूज्य योगऋषि श्रद्धेय स्वामी जी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य

||ॐ||

ज्ञान श्रद्धा युक्त पुरुषार्थ की पराकाष्ठा का सातव्य ही सफलता का मूलमंत्र है।
इच्छा होने पर अपने साधन, स्वकर्म, स्वधर्म, अपने योगधर्म, मानवधर्म, सेवाधर्म, अध्यात्मधर्म, राष्ट्रधर्म एवं समष्टिधर्म का पालन या निर्वहन पूरी प्रामाणिकता, कुशलता, दिव्यता या सात्विकता के साथ करना। प्रारब्ध, संस्कार, वासना, अभ्यास दोष अथवा अज्ञान, आग्रह, स्वार्थ, अहंकार या रागद्वेषादि के कारण इच्छा होने पर भी एक क्षण के लिए भी अज्ञान, अश्रद्धा, अकर्मण्यता, अशुभ या किसी भी दुर्गुण, दोष, दुर्बलता या पराधीनता का शिकार नहीं होना।
हमारी योगनिष्ठा, ज्ञान योग, भक्तियोग, कर्मयोग एवं अष्टांग योग निष्ठा, गुरुनिष्ठा, ऋषिनिष्ठा, शास्त्रनिष्ठा, वेदनिष्ठा, आत्मनिष्ठा, ब्रह्मनिष्ठा, सेवानिष्ठा, मातृ-पितृनिष्ठा एवं राष्ट्रनिष्ठा सदा अखण्ड, अटल, अविचलित, विकल्प रहित होनी चाहिए। जब हम एकनिष्ठ एवं ध्येयनिष्ठ होकर दिव्य चेतना में सदा प्रतिष्ठित रहेंगे तो जीवन में सर्वविध सफलता, समृद्धि, विजय, सुख-शान्ति एवं पूर्ण संतुष्टि होगी।
योगमय आध्यात्मिक जीवन, परिवार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व का निर्माण ही हमारा एकमात्र लक्ष्य एवं संकल्प है। जब राष्ट्र एवं विश्व योगमय होगा तो संसार में रोग, नशा, हिंसा, अनीति एवं कोई भी अमानवीय कृत्य नहीं होगा। ड्रग माफिया, नशा माफिया, मजहबी माफिया साथ ही अश्लीलता एवं हिंसा या युद्ध नफरत का कारोबार करने वालों की लूट भी स्वत: ही बंद हो जाएगी और एक बहुत सुन्दर, स्वस्थ, समृद्ध, खुशहाल दुनिया होगी।
चंद बुरे लोग समाज में हिंसा, घृणा, अराजकता, अनीति एवं अनाचार फैलाकर समाज, राष्ट्र एवं विश्व में अशान्ति फैल रहे हैं तो राष्ट्र एवं विश्व की सभी सात्विक शक्तियों को वेदानुसार संगच्छध्वं संवदध्वं संवोमनांसिजानताम् (ऋग्वेद) संगठित होकर समाज, राष्ट्र एवं विश्व को एक दिव्य नेतृत्व प्रदान करना चाहिए। इसका मूल सिद्धान्त है निर्वाण मूलक निर्माण, निवृत्तिमूलक प्रवृत्ति, अभ्युदय आधारित नि:श्रेयस, प्रेयमूलक श्रेय, अपराविद्या आधारित पराविद्या, भौतिकता एवं आध्यात्मिकता का समन्वित विकास एवं गौरव।
   आइये! हम सब मिलकर स्वयं इस ऋषि पथ पर चलें और संसार को चलाएँ।
स्वामी रामदेव

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