गुरु समर्पण

गुरु समर्पण

ब्रह्मचारिणी दिव्या, वैदिक कन्या गुरुकुलम्

हे प्रभु! मुझे दे प्रतिपल, धीरता गम्भीरता।
अधर्म से मैं डँरू, भर दे प्रभु मुझमे वीरता।।
एक क्षण को भी मैं डिगूँ नहीं, विवेक से वैराग्य से।
गुरु मुझे जो हैं मिले, बहु प्रतिभा सौभाग्य से।।
भ्रष्ट हो पाए गुरु से तन, मन और जीवन मेरा।
संन्यासी हो तन-मन प्रभु, है काया दो दिन का डेरा।।
स्मर्तव्य मर्यादा हो, मर्यादा पुरुषोत्तम राम की।
ध्यान में मैं रहूँ निरन्तर, बस लगन हो श्री राम की।।
जी प्रभु! कृपा से आपकी, चरणों में मैं हूँ आसीन।
बन जाऊँ निमित्त मैं, स्वभाव मेरा हो उदासीन।।
बस ध्येय को पाना, निरन्तर लक्ष्य हो कर्तव्य हो।
साध्य की फिर चिन्ता क्या, यदि साधन मन्तव्य हो।।
जिस ज्ञान से गति सृष्टि की, उस ज्ञान का बोद्धा बना दो।
जो प्रभु का ही प्रतिरूप हो, वो कर्मठ योद्धा बना दो।।
विनीत हो विनती प्रभु, रहे मुझे कोई कामना।
कर्म करूँ तेरे अर्पित, शेष रहे मेरा नाम न।।
गुरु मुझमें हो हर पल, समर्पित कभी दम्भ, द्वेष मान हो।
गुरु दे रहे प्रतिपल जो, उस ज्ञान का मुझे भान हो।।
अन्त: प्रेरित हो आत्मा, मैं गुरु का प्रियाचरण करूँ।
माता-पिता गुरु और प्रभु, इनके चरणों में मैं शीष धरूँ।।

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