श्रावणी उपाकर्म- स्वाध्याय पर्व

श्रावणी उपाकर्म- स्वाध्याय पर्व

डॉ. महावीर, प्रति-कुलपति,

पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार।

    ऋषियों, मुनियों, योगियों और तपस्वियों के देश भारत की अपनी विलक्षण परम्परायें हैं। हमारे प्रात: स्मरणीय आचार्यों ने अपनी विश्ववारा वैदिक संस्कृति की रक्षा तथा मानव जीवन को उन्नति के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचाने के लिये अनेक अद्भुत परम्परायें स्थापित की और सुदीर्घकाल तक उन परम्पराओं का पूर्ण निष्ठा से परिपालन किया। आज भी संस्कृति की यह गंगा अविरल कल-कल प्रवाहित हो रही है। देश अथवा राष्ट्र केवल भूखण्ड या वहाँ पर निवास करने वाले मनुष्य ही नहीं हैं, अपितु उस स्थान विशेष में निवास करने वाले करोड़ों व्यक्तियों के जीवन में अविच्छिन्नरूप में प्रवाहित होने वाली संस्कारों, आदर्शों एवं जीवन-मूल्यों की धारा है।
यह जीवन केवल हाड-मांस का पिण्ड ही बनकर रह जाये, अपितु मानवता से ऋषित्व और देवत्व-पथ का पथिक बनकर वह अपने मानव जीवन को धन्य, कृतकृत्य अथवा सार्थक कर सके, इसके लिये अनेक साधन उपाय और मार्ग अपनाये गये।
उत्सवप्रिया: मानवा:’ मानव स्वाभाविक रूप में उत्सव प्रिय होता है। अपने प्रियजनों के साथ मिलकर प्रसन्नता और प्रेम बाँटने से और अधिक वृद्धि को प्राप्त होते हैं। इसलिये हमारे देश में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होने वाली उत्सवों, पर्वों की पावनी परम्परा चैत्र मास की अमावस्या पर्यन्त निरन्तर चलती रहती है। संस्कृति से जोडऩे वाले इन अनेक पर्वों में होलीकोत्सव, श्रावणी, विजयादशमी और दीपावली चार ऐसे महान् पर्व हैं, जिन्हें करोड़ो देशवासी अत्यन्त उत्साह, ऊर्जा और हर्षोल्लासपूर्वक मनाते हैं।
इन चार पर्वों में आध्यात्मिकता, साधना और जीवन निर्माण की दृष्टि से श्रावणी पर्व का महत्त्व सर्वातिशायी है। यह विद्याराधना में समर्पित रहने वाले साधकों का पर्व है। भले ही वसन्त को ऋतुराज कहकर सम्मानित किया जाता है किन्तु श्रावण मास की घटा निराली है। प्रकृति नटी हरियाली चुनरिया ओढक़र अत्यन्त हृदयावर्जक रूप धारण कर लेती है। आज से 60 वर्ष पूर्व पढ़ी हुई मराठी कविता के बोल सहसा याद रहे हैं- ‘श्रावण मासी हर्ष मनासि हिरवड़ दाटे चहुंकडे वर्षा के कारण आवागमन अवरूद्ध हो जाने पर एक ही स्थान पर निवास करते हुए अपने मस्तिष्क को ज्ञान संपन्न बनाने का स्वर्णिम अवसर प्राप्त होता है। सात्त्विक, सुरम्य, मनभावन श्रावण पूर्णिमा के अतिपावन दिवस को श्रावणी पर्व के रूप में अत्यन्त उल्लास, उत्साह एवं श्रद्धापूर्वक मनाने की दिव्य परम्परा भारतवर्ष में चली रही है। शोक-नसावन-सावन में इस पर्व का आनन्द अनुपम है। वस्तुत: हमारी वैदिक वर्ण व्यवस्था महान् एवं अतिसमृद्ध होने के साथ राष्ट्र के लिए भी अतीव हितकर है। गुण-कर्म-स्वभाव पर आधारित वर्ण व्यवस्था देश और समाज का कायाकल्प करने वाली है। जन्मना कोई ब्राह्मण और कोई शूद्र होता है- जन्मना जायते शूद्र: संस्काराद् द्विज उच्यते। तथा - शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्।
विद्या-बल, शौर्य-बल, धन-बल अथवा अज्ञान अन्याय और अभाव को मिटाने का संकल्प लेकर अपना समग्र जीवन इस कार्य के लिए न्यौछावर करने वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कहे जाते हैं, किन्तु व्यापक दृष्टि से देखने पर हम सबके भीतर ये चारों वर्ण विद्यमान रहते हैं। जब हम विद्या प्राप्त करते हैं या वितरित करते हैं, वेदादि का अध्ययन, अध्यापन करते हैं, तब हम ब्राह्मण हैं। जब हम अन्याय, अत्याचार के विरूद्ध संघर्ष करते हैं, ब्रह्मचर्य, सदाचार-व्यायाम प्राणायाम आदि से अपने शरीर को सुदृढ़ और बलवान बनाते हैं, तब हम क्षत्रिय हैं। नौकरी, उद्योग, व्यापार, कृषि, पशुपालन आदि से अधिकाधिक धनार्जन कर अपने और सामाजिक जीवन से दरिद्रता और अभाव को दूर भगाते हैं, तब हम वैश्य हैं। अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति में न्यूनाधिक मात्रा में ये सभी वर्ण रहते हैं। प्राधान्येन व्यपदेशा: भवन्तिइस नियम के अनुसार जो जो जिसका प्रधान कर्म होता है उसे उसी ब्राह्मण आदि नाम से सम्बोधित किया जाता है। वस्तुत: प्रत्येक व्यक्ति में चारों वर्ण विद्यमान रहते हैं। इनमें भी ब्राह्मण प्रधान है। शरीर में इसे उत्तमांग कहा जाता है। गर्दन से ऊपर का भाग ब्राह्मण है, यह परम तपस्वी होता है, भयानक से भयानक शीत, आतप में यह खुला रहकर कठोर तप करता है। नेत्र, कर्ण, नासिक, जिह्वा, त्वचा आदि में हम जितना-जितना देवत्व स्थापित कर पाते हैं, उतने-उतने अंश में हम मानवत्व से देवत्व की ओर अग्रसर होते हैं। इन सब इन्द्रियों, मन आदि से उत्कृष्टतम तत्त्व है- बुद्धि। विमल बुद्धि से ग्रहण किया जाने वाला ज्ञान, मनुष्य को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर और श्रेष्ठतम बनाता है। ऋते ज्ञानान्न मुक्ति:’ ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते, ‘विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्आदि वचन इसी ओर संकेत करते हैं। संसार के विज्ञान, दर्शन, धर्मशास्त्र, उपनिषद्, श्रीमद्भगवद्गीता में प्रतिपादित सूक्ष्मतम चिन्तन या आविष्कार बुद्धि या विद्या का ही वैभव है।
श्रावणी का पर्व बुद्धि, विद्या, ज्ञान से जुड़ा हुआ महान् उत्सव है। वेद के अध्ययन, अध्यापन से जुड़े हुए इस पर्व के दिन गुरुकुलों, आचार्यकुलों, विश्वविद्यालयों और तपोवनों में वेद मन्त्रों का मधुर स्वर, समग्र वातावरण को सात्त्विक भावों से ओतप्रोत कर देता है।
स्थान-स्थान पर यज्ञ, स्वाहा, स्वधाकार, वैदिक ऋचाओं का मधुर गान स्वर्ग सदृश दृश्य उपस्थित करता है। शिष्यगण, आचार्य चरणों में उपस्थित होकर यज्ञोपवीत धारण करते हुए व्रती बनकर संकल्प लेते हैं कि हम ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, गुरु चरणों में परम श्रद्धावान् रहकर यज्ञ संध्या वन्दनादि शुभ कर्म करते हुए अपने मस्तिष्क को ज्ञानाग्नि से सदैव प्रकाशमान रखेंगे। यह गुरु-शिष्य परम्परा भारतवासियों की अमूल्य धरोहर है। जब शिष्य गुरुकुल में प्रविष्ट होता है, तब आचार्य उसका वेदारम्भ संस्कार करते हुए आशीर्वाद के ये वचन कहता है-
हे बालक! त्वमीश्वर कृपया विद्वान् शरीरात्मबलयुक्त: कुशंली वीर्यवानरोग: सर्वाविद्या अधीत्याऽस्मान् दिदृक्षु: सन्नागम्या:’
वेद का अमृतवचन है-
आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्त:
तं रात्रीस्तिस्र उदरे बिभर्ति तं जातं द्रष्टुमभिसंयन्ति देवा:
                                                                             अथर्व. 11-5-3
जब ब्रह्मचारी गुरु चरणों में बैठकर विद्यामधु का पान करते हुए संयमी, जितेन्द्रिय, बलवान्, विद्वान् स्नातक बनकर गुरुकुल से प्रस्थान करता है, तब दीक्षान्त समारोह में अपने प्रिय शिष्य को दीक्षित करते हुए आचार्य समावर्तन संस्कार के माध्यम से उपदेश देता है- सत्यं वद। धर्मंचर। मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्य देवो भव- आदि।
इस उपदेश में प्रत्येक उपदेश एक-एक बार दिया गया है, किन्तु एक उपदेश दो बार दिया है-
स्वाध्यायान्मा प्रमद:’ ‘स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां प्रमदितव्यम्।
अर्थात् स्वाध्यायशील रहना। जीवनपर्यन्त वेदादि का स्वाध्याय छोडऩा, यह आचार्योपदेश का अति महत्त्वपूर्ण अंश है। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ के पश्चात् संन्यास आश्रम में शिखा, सूत्र, यज्ञोपवीत आदि का परित्याग किया जा सकता है। लेकिन स्वाध्याय कभी नहीं छूटता। कहा भी है - ‘संन्यसेत्सर्वकर्माणि वेदमेकन्न संन्यसेत्अर्थात् संन्यासी सब कर्मों को त्याग सकता है किन्तु वेद का त्याग करें।
श्रावणी पर्व इसी स्वाध्याय की भावना को जागृत करने वाला महोत्सव है। चातुर्मास्य अर्थात् वर्षा ऋतु की समाप्ति पर्यन्त एकान्त, शान्त स्थान पर किसी महान् आचार्य के चरणों में रहते हुए जप, तप, योगाभ्यास करते हुए वेदादि शास्त्रों के स्वाध्याय से ज्ञान कोष को समृद्ध करना ही सर्वोत्तम धर्म है।
वर्तमान युग में हम बहुल सौभाग्यशाली हैं कि हिमालय के चरणों में, भगवती भागीरथी के पावन तट पर योगऋषि परम पूज्य स्वामी रामदेवजी महाराज की कर्मस्थली, साधना स्थली में प्राचीनकाल का यह अद्भुत दृश्य पतंजलि योगपीठ में प्रत्यक्ष देखकर आज भी अपने जीवन को दिव्य प्रेरणाओं से भरा जा सकता है। भाग्यशाली हैं वे ऋषिकुमार एवं ऋषि कुमारियाँ जो वैदिक गुरुकुलम् कन्या गुरुकुलम्, आचार्यकुलम् एवं पतंजलि विश्वविद्यालय में परम पूज्य स्वामीजी एवं परम श्रद्धेय आचार्यश्री का सतत् स्नेह, आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
मनुस्मृत्यादि ग्रन्थ श्रावणी पर्व एवं वेदों की महिमा से भरे पड़े हैं। श्रावणी उपाकर्म का सन्देश देते हुए मनु महाराज कहते हैं -
श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वाप्युपाकृत्य यथाविधि।
युक्तश्छन्दांस्यधीयीत, मासान् विप्रोऽर्धपंचमान्।।
                                                                   मनुस्मृति 4-15
श्रवण नक्षत्र से युक्त पूर्णिमा के इस दिन की महिमा से हमारा प्राचीन साहित्य भरा पड़ा है। यदि राष्ट्र का विद्वान्, तपस्वी, योगी, संयमी, देशभक्त, ब्राह्मण जाग जाये तो देश और समाज महान् बनेगा, इसमें कोई सन्देह नहीं।
पर्यावरण प्रदूषण, राग-द्वेष, अशान्ति, अराजकता, भ्रष्टाचार, दुराचार, आतंकवाद एवं इन सबसे भयानक वैश्विक महामारी से मानवता की रक्षा करने वाले अमोघ साधन हैं- वेद, योग, यज्ञ, आयुर्वेद, गुरुकुल परम्परा, गुरु-शिष्य का पावन सम्बन्ध और ये सब जुड़े हुए हैं- श्रावणी पर्व से।
श्रावणी पर्व के इसी महनीय दिवस के साथ रक्षाबन्धन भी परम पावन उत्सव है। बहन द्वारा भाई की कलाई पर रक्षासूत्र (राखी) बांधना, स्मरण कराता है वेद के सन्देश को-
मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा।।
माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी ये कुछ ऐसे पावन सम्बन्ध हैं, जिनकी आधारशिला पर वैदिक संस्कृति का भव्य प्रासाद खड़ा है।
आज समय की पुकार है कि संसार की समस्त समस्याओं के समाधान के लिए हम वेद-तरू की छाया का आश्रय लें। योग-यज्ञादि के द्वारा अपने तन-मन-बुद्धि-आत्मा का परिष्कार करें और ऋषि संस्कृति के प्रमुख स्तम्भ-श्रावण्यादि पर्वों से नया सन्देश, नव प्रेरणा एवं नवजीवन का संचार करें।

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