त्याग व बलिदान ही आधार है सर्वोत्कृष्ट जीवन का

आचार्य विजयपाल प्रचेता,

 पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार

भारतीय संस्कृति का मूल बिन्दु है- त्याग, अत एव यह त्यागवादी संस्कृति है, भोगवादी नहीं। त्याग भाव इसका मूल स्वर है, जो हमें वेदों से मिलता है- तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा: इसमें सांसारिक पदार्थों के उपभोग के साथ भी त्याग भाव जुड़ा है, अत एव सम्पत्ति शक्तियों का प्रयोग भी त्याग भाव के साथ ही करने का निर्देश भारतीय साहित्य में पद-पद पर मिलता है। भारतीय संस्कृति के इस मूल भाव को हम मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम एवं योगेश्वर श्रीकृष्ण आदि महापुरुषों के जीवन में चरितार्थ हुआ पाते हैं। महाकवि कालिदास ने त्याग के इसी आदर्श को इस प्रकार व्यक्त किया है-
प्रजानामेव भूत्यर्थं ताभ्यो बलिमग्रहीत्।
सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रवि:।। (रघुवंश-.१८)
आदानं हि विसर्गाय सतां वारिमुचामिव।
अर्थात् राजा दिलीप प्रजाओं के कल्याण के लिये ही उनसे कर-संग्रह करते थे। सत्पुरुषों का धनसंग्रह भी उसी प्रकार त्याग के लिये होता है, जिस प्रकार मेघों का समुद्र से जल-ग्रहण वर्षा के लिये होता है। त्याग भाव का ही प्रसार संयम एवं बलिदान के रूप में प्रकट होता है। इस आदर्श को प्रकट करते हुए कालिदास कहते हैं-
अगृध्नुराददे सोऽर्थान् असक्त: सुखमन्वभूत्। (रघुवंश-.२१)
अर्थात् राजा निर्लोभ होकर प्रजाहितार्थ धन संग्रह करता है और इन्द्रिय-विषयों में अनासक्त रहते हुए उचित सुख-सुविधाओं का सदुपयोग करता है। गृहस्थ का आदर्श भी भारतीय परम्परा मे इसी त्याग एवं संयम पर टिका है-
त्यागाय संभृतार्थानाम्, प्रजायै गृहमेधिनाम्। (रघुवंश-.१७)
अर्थात् हमारे पूर्वज त्याग के लिए धन-संग्रह और संतान के लिए गृहस्थ-धर्म को स्वीकार करते थे।
त्याग एवं संयम के इसी आदर्श से बलिदान की भावना प्रकट होती है। बलिदान का अभिप्राय है परमार्थ हेतु सर्वस्व त्याग के लिए तत्पर रहना, आदर्शों की रक्षा के लिए जीवन तक न्यौछावर कर देना। यह भावना त्यागी एवं संयमी में ही दिखाई देती है। रघुवंश के वर्णन में हम देखते हैं कि नन्दिनी गाय की रक्षा के लिए राजा दिलीप सहर्ष अपने शरीर का बलिदान करने के लिए तत्पर हो जाते हैं। पिता के वचन का पालन करने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम सहज भाव से राज्य का परित्याग कर वनवास स्वीकार करते हैं। आदर्श भाई भरत प्राप्त हुए राज्य को तृणवत् त्यागते हुए 14 वर्ष तक तपस्या करते हुए राज्य का दायित्व निभाते हैं। सीता जी पतिव्रता के आदर्श को निभाने के लिए महल की सुख-सुविधाओं को तिलाञ्जलि देकर वनवास में तापसव्रत धारणकर नाना कष्टों को सहर्ष सहती हैं। ये आदर्श त्याग एवं बलिदान के संस्कारों से ओत-प्रोत भारतीय परम्परा में पले-बढ़े महापुरुषों के जीवन में सर्वत्र दिखाई देते हैं।
त्याग एवं संयम का यह आदर्श बहुत ही रोमांचक एवं प्रेरक रूप में भगवान् राम के पुत्र कुश के चरित्र में भी दिखाई देता है। रघुवंश में कालिदास वर्णन करते हैं कि एक बार आधी रात को अयोध्या नगरी की अधिदेवता महल में अचानक कुश के सामने प्रकट हो गई। एकान्त में अपरिचित युवती को देखकर कुश के मुखारविन्द से जो वचन निकले, वे भारतीय युवकों के लिए शाश्वत प्रेरणास्रोत हैं। कुश कहते हैं-
का त्वं शुभे! कस्य परिग्रहो वा किं वा मदभ्यागमकारणं ते।
आचक्ष्व मत्वा वशिनां रघूणां मन: परस्त्रीविमुखप्रवृत्ति।।
(रघुवंश-16.8)
अर्थात् हे शुभे! तुम कौन हो? किसकी पत्नी हो? इस समय मेरे पास आने का क्या कारण है? इन प्रश्नों का उत्तर यह मानकर देना कि जितेन्द्रिय रघुवंशी सदा पर स्त्री से विमुख रहते हैं। वे परनारी को माता-बहन एवं पुत्री के रूप में ही देखते हैं। त्याग एवं संयम की भावना जिन्हें घुट्टी में मिलती है, उनके मुख से ही ऐसे उद्गार प्रकट होते हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज का ऐसा ही उदाहरण जगत्-प्रसिद्ध है। वे सैनिकों द्वारा बन्दी बनाकर लाई गई शत्रु पक्ष की सुन्दरी को माता कहकर सम्बोधित करते हैं और ससम्मान सुरक्षित उसके घर पहुँचाते हैं, क्योंकि उन्हें बाल्यकाल से माता जीजाबाई एवं अपने गुरु से रामायण-महाभारत के उच्च आदर्शों के संस्कार मिले थे।
योगेश्वर कृष्ण के अमर उपदेश गीता में इसी त्याग और बलिदान का संदेश दिया गया है। भगवान् कृष्ण अर्जुन को यही समझाते हैं कि कर्मफल, कामनाओं एवं भोगों का त्याग करने वाला मनुष्य ही कर्तव्य को पूर्ण करने के लिए बलिदान दे सकता है। गीता तो आसक्ति के त्यागने और बलिदान के लिए प्रेरित करने वाला अमर गीत है। अर्जुन को निमित्त मानकर गीता द्वारा प्रत्येक व्यक्ति के लिए त्याग बलिदान का संदेश दिया गया है। बलिदान की भावना को दृढ़ करने के लिए ही गीता में पुरुषार्थ को उद्दीप्त करने की प्रेरणा दी है-
क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।। (गीता-2.3)
अर्थात् हे अर्जुन! संग्राम से विमुख होना कायरपन है। हृदय की इस क्षुद्र दुर्बलता को छोडक़र युद्ध के लिए सन्नद्ध हो जाओ। स्वधर्म की रक्षा बलिदान की भावना को जगाने के लिए ही गीता में शरीर की नश्वरता एवं आत्मा की अमरता का संदेश दिया गया है-
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ता: शरीरिण:
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद् युद्धस्व भारत।।
(गीता- 2.18)
अर्थात् नित्य अविनाशी आत्मा के ये शरीर विनाशशील है, इसलिए शरीर के नाश की चिन्ता को छोडक़र कर्तव्य पालन के लिए युद्ध कर। मरने के भय से अथवा सांसारिक सम्पत्ति छूट जाने के भय से मनुष्य त्याग एवं बलिदान के मार्ग से विमुख हो सकता है, परन्तु गीता में अनासक्ति, कर्मफल-त्याग, शरीर की नश्वरता एवं आत्मा की अमरता का उपदेश कर धर्म के लिए बलिदान करने के मार्ग को प्रशस्त (श्रेष्ठ) बताया गया है। अनेक युक्तियों एवं तर्कों द्वारा आत्मा की अमरता एवं शरीर की नश्वरता का विस्तृत प्रतिपादन इसीलिए किया गया है कि हम भौतिक सम्पत्ति एवं शरीर के मोह का त्याग कर कर्तव्य पथ पर अग्रसर होते रहें और सर्वस्व बलिदान करने में भी पीछे हटें। इसी प्रसंग में भगवान् श्रीकृष्ण ने भोग एवं ऐश्वर्य की आसक्ति की निन्दा की है, क्योंकि वही मनुष्य को त्याग बलिदान से विमुख करती है-
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।
व्यवसायात्मिका बुद्धि: समाधौ विधीयते।।
(गीता- 2.44)
अर्थात् सुख-भोग एवं ऐश्वर्य में आसक्त पुरुषों की बुद्धि कर्तव्य एवं धर्म के विषय में निश्चयात्मिका एवं स्थिर नहीं रह पाती है। अत: भोगैश्वर्य में अनासक्त रहते हुए ही व्यक्ति त्याग एवं बलिदान के भाव को धारण कर सकता है। गीता के इसी आदर्श से प्रेरित थे देशबन्धु चितरंजन दास। वे नित्य प्रति गीता का पारायण करते थे। इसी से ऊर्जा प्राप्त कर उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया और इसके लिए उन्होंने अतुलनीय योगदान दिया। गीता के मर्मज्ञ लोकमान्य तिलक इसी आदर्श से अनुप्राणित होकर स्वातन्त्र्य-संग्राम के अमर योद्धा बने। इसी आदर्श से प्रेरित होकर चन्द्रशेखर आजाद, सरदार भगतसिंह, पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल जैसे अगणित वीरों ने देश के लिए सहर्ष अपना बलिदान दिया। पण्डित बिस्मिल अपनी आत्मकथा में गीता के श्लोकों को उद्धृत करते हुए बलिदान की आकांक्षा इस प्रकार प्रकट करते हैं-
हे ईश! भारतवर्ष में शत बार मेरा जन्म हो।
कारण सदा ही मृत्यु का लोकोपकारक कर्म हो।।
सर्वस्व त्यागी वीतराग महर्षि दयानन्द ने देश की कुरीतियों के निवारण एवं वेदधर्म का पुनरुद्धार करने के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया। कर्तव्य पर डटे रहने वाले महर्षि ने अकेले ही विरोधियों का सामना किया। ईंट-पत्थर सहे, विष पिया, परन्तु कभी कर्तव्य से पराङ्मुख नहीं हुए। अन्तत: अपने जीवन का बलिदान कर दिया और ऋषि-मुनियों की पावन ज्ञान ज्योति जला गये। महर्षि दयानन्द के शिष्य स्वामी श्रद्धानन्द ने भी त्याग एवं बलिदान के इसी आदर्श को अपनाया। उन्होंने ऋषि-प्रतिपादित गुरुकुल शिक्षा प्रणाली का पुनरुद्धार करने के लिए अपनी कोठी, सम्पत्ति यहाँ तक कि दोनों पुत्रों को भी गुरुकुल के लिए समर्पित कर दिया और हरिद्वार में गंगा तट पर प्राचीन गुरुकुल प्रणाली का आदर्श रूप प्रस्तुत कर ऐतिहासिक कार्य कर दिखाया, जो शिक्षा-जगत में एक क्रांतिकारी पहल थी। इसके अनन्तर देश की स्वतंत्रता के लिए कार्यक्षेत्र में उतरकर संन्यासी स्वामी श्रद्धानन्द ने स्वातन्त्र्य आंदोलन में बढ़-चढक़र भाग लिया। देश की एकता अखण्डता के लिए शुद्धि आंदोलन चलाया और अंत में आततायी की गोलियों का शिकार होकर वीरगति को प्राप्त हुए। उनका जीवन त्याग एवं बलिदान का ज्वलंत उदाहरण है।
इसी परम्परा में वर्तमान युग पुरुष योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज का आदर्श हमारे सामने है। वैदिक संस्कृति के पुनरुद्धार योग, आयुर्वेद, स्वदेशी एवं भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रचार हेतु आपका क्षण-क्षण देश की सेवा में अर्पित है। ईश्वर ने आपको अपरिमित प्रतिभा, कर्म- सामर्थ्य, ऊर्जा एवं संसाधन दिए हैं। उनसे आप भारत को समर्थ शक्तिसम्पन्न एवं आदर्श आध्यात्मिक राष्ट्र बनाने में जुटे हुए हैं।
आपका व्यक्तिगत जीवन त्याग का मूर्त रूप है। साधारण वस्त्र, सादा भोजन, योगमय जीवनचर्या एवं उच्च आदर्श, वर्तमान पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत हैं। भूमण्डल पर योगक्रान्ति के जनक के रूप में मानवता के प्रति आपका अतुलनीय योगदान है। रोग-शोक से मुक्त करने वाली योग विद्या के प्रशिक्षण एवं प्रचार से आपने करोड़ों लोगों को आरोग्य प्रदान किया है और सुखी जीवन जीने का सच्चा मार्ग प्रशस्त किया है। राष्ट्र-निर्माण के लिए संस्कार सहित शिक्षा ही सर्वोत्तम उपाय है, इस दृष्टि से आपने वैदिक गुरुकुलम् आचार्यकुलम् नामक शिक्षण संस्थानों की शृंखला स्थापित की है, जहाँ बड़ी संख्या में भारत के भावी कर्णधार तैयार किये जा रहे हैं। भारत सरकार के सहयोग से आपने जो भारतीय शिक्षा बोर्ड की स्थापना की है, वह शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक एवं युगान्तरकारी कदम है। त्याग एवं परमार्थ के लिए सर्वस्व समर्पण की भावना से ओत-प्रोत आपका जीवन हमारे लिए आदर्श प्रेरणा स्रोत है। वस्तुत: ये गुण ही आदर्श जीवन का आधार हैं।
 

Related Posts