नशे की लत- अभिशप्त होता जीवन
On
वंदना बरनवाल राज्य प्रभारी
महिला पतंजलि योग समिति - उ.प्र.(मध्य)
नशे की लत जीवन को सिर्फ शापित ही नहीं करती बल्कि जीवनभर घुन की भांति लगकर नशा करने वाले के साथ ही साथ उसके परिवार को भी अभिशप्त करती रहती है। कभी बदलती हुई जीवनचर्या के कारण तो कभी किसी पारिवारिक या सामाजिक परिस्थियों का सामना करने में आने वाली चुनौतियों के कारण और कभी शौक ही शौक में ली जाने वाली नशे की पहली घूंट या फिर सिगरेट का पहला कश देखते ही देखते कब एक युवा को अपनी गिरफ्त में ले लेती है उसे स्वयं को भी पता नहीं चलता और फिर अचानक एक दिन ऐसा आता है जब वह स्वयं को नशे की एक ऐसी दुनियां में शामिल पाता है जो अभिशाप बनकर उसके जीवन में ग्रहण डाल देता है। जब तक यह सब कुछ उसे समझ आता है तब तक जीवन का बहुमूल्य समय बर्बाद हो चुका होता है, अगर हम अपने आस-पास नशा करने वाले जितने भी लोग हैं उनके जीवन को गहराई से देखें तो पायेंगे समस्याओं का समाधान ढूंढते-ढूंढते जिन लोगों ने नशे का सहारा लिया, नशे ने उनके जीवन को और बर्बाद कर दिया। मतलब साफ है, ऐसे लोग बर्बादी में समाधान ढूंढते फिर रहे थे। ध्यान रहे! नशे को यूँ ही बर्बादी का घर नहीं कहा जाता। नशा चाहे कैसा भी हो, कोई भी हो और कोई भी करें। व्यक्ति और उसके परिवार दोनों के ही जीवन में जहर ही नहीं घोलता बल्कि उसे नर्क बना देता है।
समाधान नहीं मौत का सामान
वैसे तो दुनियांभर में लाखों लोग नशे की लत से परेशान है और इस लत के कारण हर साल लाखों लोग अपनी जान गवाते हैं। गत् वर्ष भारत की वित्तीय राजधानी और फिल्मी चकाचौंध के लिए मशहूर शहर मुंबई में एक मशहूर अभिनेता के पुत्र का नाम क्रूज ड्रग्स पार्टी में आने के कारण पूरे देश में नशे को लेकर चर्चाएं हुई थी। उन चर्चाओं के बीच राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ने भारत में नशे की वजह से मरने वालों के आंकड़े सामने रखे, जिसमें से कुछ आंकड़े चौकाने वाले खुलासे कर रहे थे, जैसे कि देश में साल 2017 से 2019 के बीच बहुत ज्यादा नशा करने से 2,300 से भी ज्यादा लोगों की मौत हुई जिसमें वर्ष 2018 में सबसे ज्यादा 875 लोगों की जान गई। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक नशे की वजह से मरने वालों में 30-45 आयु वर्ग के लोगों की संख्या 784 थी, जबकि 18 से 30 साल आयु वर्ग के 624 लोग, 45 से 60 वर्ष आयु वर्ग के 550 और 60 साल या उससे अधिक आयु वर्ग के 241 लोगों ने नशे की वजह से अपनी जान गवाई, यानि मरने वालों में सबसे ज्यादा 30 से 45 आयु वर्ग के लोग थे। यही नहीं मरने वालों में 14 साल से कम उम्र के 55 बच्चे भी शामिल थे जबकि 14-18 साल के आयु वर्ग वाले 70 किशोरों की भी मौत ज्यादा नशा करने की वजह से हुई। मतलब साफ़ है कि एक बार छोटी सी उम्र से ही नशे की जो लत शुरू हो जाती है बड़े होने पर उससे बाहर निकल पाना आसान नहीं होता है। इन आंकड़ों में बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू या शराब के सेवन से बीमार होकर मरने वाले लोग शामिल नहीं है बल्कि ये आंकड़े अधिक मात्रा में गांजा, कोकीन, अफीम, स्मैक और नशीले इंजेक्शन आदि लेने वाले लोगों के हैं। अगर बात करें धूम्रपान से होने वाली मौतों की तो विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनियांभर में प्रतिदिन करीब ग्यारह हजार व्यक्ति अर्थात् हर साल चालीस लाख लोग धूम्रपान के कारण काल का ग्रास बनते हैं, जिनमें से करीब एक तिहाई लोगों की मौत केवल भारत में ही होती है। इसी तरह देश में हर साल करीब तेरह लाख से भी ज्यादा मौतें तंबाकू जनित कैंसर, दमा, हृदय रोग जैसी विभिन्न बीमारियों के कारण होती हैं।
प्राकृतिक बनाम सिंथेटिक ड्रग्स
आमतौर पर नशीले पदार्थों को प्राकृतिक, अर्ध सिंथेटिक और सिंथेटिक ड्रग्स के नाम से तीन भागों में बांटा जा सकता हैं। प्राकृतिक नशे के अंतर्गत अफीम, गांजा, चरस एवं तम्बाकू जैसे पदार्थ आते हैं जबकि अर्ध सिंथेटिक के लिए इन पदार्थों को प्रोसेस कर दिया जाता है जैसे कि अफीम से बने मारफिन, कोडीन, हेरोइन व ब्राउन शुगर, गांजा व गांजे से बने चरस व हशीश, कोकीन आदि, जबकि सिंथेटिक ड्रग्स में एलएसडी, मैंड्रोक्स व पीसीपी नाम से नशे वाले पदार्थ आते हैं। इन पदार्थों की सीमित मात्राएँ औषधि के रूप में भी प्रयोग में लायी जाती हैं मात्रा के बढ़ते ही मौत के खतरे बढ़ जाते हैं। जैसे कि अफीम, पैपेवर सोमनिफेरम नामक पौधे के दूध अर्थात् लेटेक्स को सुखा कर बनाई जाती है। इसका उपयोग कई प्रकार की दवाइयां बनाने में भी किया जाता है पर यदि कोई व्यक्ति तीस ग्राम या उससे अधिक अफीम खा लें तो वह मौत के मुंह में भी जा सकता है। गांजे के पौधे को भी कई नाम से जाना जाता है जैसे मैरीजुआना, केनेबीस। इसका सबसे लोकप्रिय नाम है वीड है। गांजे और होली की भांग में ज्यादा अंतर नहीं होता है। इसी प्रकार चरस भी गांजे के पेड़ से निकला हुआ एक प्रकार का गोंद होता है जिसके अधिक मात्रा में इस्तेमाल से दिमाग के काम करने और सोचने-समझने की शक्ति खत्म हो सकती है, इसी प्रकार शराब की लत भी कम खतरनाक नहीं है। जब तक सीमित मात्रा में ली जाए, नकारात्मक प्रभाव ज्यादा नहीं होगा या बल्कि कुछ बीमारियों में तो अल्कोहल बेस्ड दवाओं का इस्तेमाल भी होता है पर यदि लत लग जाये तो किडनी और लीवर पर असर पडऩा तय मानिये।
युवाओं द्वारा नशे की तरफ बढऩे के कारण
एक बहुत ही पुरानी एक कहावत है दूर के ढोल सुहावने होते हैं यानि जो चीज़ आपके पास नहीं होती आपसे दूर होती है, वो चीज़ आपको ज्यादा पसंद आती है। संभवत: इसी कहावत का रंग युवा पीढ़ी को चढ़ा हुआ है। युवाओं में नशे को लेकर बढ़ते रुझान के कई कारण गिनाये जा सकते हैं। इन सबमें एक प्रमुख कारण है पश्चिमी सभ्यता और उसके प्रति बढ़ता रुझान। कपड़े-लत्ते से लेकर खाने-पीने, चलने-फिरने और बोलने-बतियाने हर जगह पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव देखने को मिलता है। दूर से पश्चिमी सभ्यता आकृर्षित करती है और आज के इस प्रतिस्पर्धात्मक युग में दुनियां में हर चीज का ज्ञान होना, बाहर की दुनियां की समझ होना, ये सब जरूरी है, परंतु नकल सिर्फ गलत चीजों की ही क्यों? पश्चिमी सभ्यता की नकल के अतिरिक्त नशे की दुनियां में प्रवेश के और भी कई कारण हो सकते हैं मसलन तनाव, अकेलापन, लोगों की बढ़ती अपेक्षाएं, जीवन में लगातार मिल रही असफलता आदि। कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि कुछ घरों में किसी बच्चे द्वारा नशे की शुरुआत तब होती है जब वह अपने ही घर में या अपने आसपास किसी को नशा करता देखता है। बच्चे को इसके लाभ-हानि का पता नहीं होता और वह उससे प्रभावित होकर खुद भी इसमें शामिल होना चाहता है। बच्चे वैसे भी चीजों को बहुत गौर से देखते और समझते हैं। इसके अतिरिक्त कभी-कभी माता-पिता द्वारा बच्चों को बात बात पर टोकना या डांटना, पढ़ाई का अतिरिक्त दबाव, बात-बात पर दूसरे बच्चों के साथ उनकी तुलना करना, बिना वजह व्यक्तिगत जीवन में दखल, नौकरी की चिंता, स्वास्थ्य की समस्या, अकेलापन एवं भावनाओं का कोई साझीदार नहीं होना जैसे अनेकों और कारण गिनाये जा सकते हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि ये कारण बच्चों को नशे की तरफ ले जा रही है बहरहाल कारण कुछ भी हो ध्यान रहे नशे की दुनिया में सिर्फ और सिर्फ विनाश ही हैं और इस बात को जितना जल्दी सभी समझ लें उसी में सबकी भलाई है।
एक साथ दो गलती
नशे की गिरफ्त में आये ज्यादातर युवा अक्सर यही कहते फिरते हैं कि जीवन में एक के बाद एक आ रही समस्याओं के समाधान ने उनको इस दुनियां में जाने को मजबूर किया जबकि सत्य तो यह है कि समस्या किस के जीवन में नहीं और यदि जीवन में समस्याएं नहीं हों तो शायद हमारा जीवन नीरस ही नहीं जड़ भी हो जाए। इसलिए समस्याओं के होने का मतलब यह तो नहीं हो जाता कि समाधान ढूंढते-ढूंढते एक नयी और पहले से भी विकट समस्या को निमंत्रण दिया जाये। जीवन में सम-विषम परिस्थितियाँ तो आती और जाती रहती हैं। एक छोटे बच्चे को लगता है कि विद्यालय से निकलने और महाविद्यालय पहुँचने के बाद समस्या दूर हो जायेगी। महाविद्यालय वाले को लगता है कि पढ़ाई पूर्ण करने के पश्चात अच्छी नौकरी या व्यवसाय के शुरू होते ही समस्याएं दूर होनी शुरू हो जायेंगी, पर ऐसा होता कहाँ है। सच तो यही है कि बाल्यावस्था से लेकर युवावस्था तक, युवावस्था से लेकर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने तक और फिर गृहस्थाश्रम से लेकर वानप्रस्थ आश्रम तक हर व्यक्ति को बहुत सी परिस्थितियों का सामना करना ही पड़ता है। ये परिस्थितियां कभी हमारी आशाओं के अनुरूप होती है तो कभी विरुद्ध भी जिनका सामना न चाहते हुए भी सभी को करना ही होता है। ऐसे में यदि कोई इन परिस्थियों को समस्या का नाम देता है तो दरअसल समस्या उस विषम परिस्थिति में नहीं बल्कि व्यक्ति की सोच में है। दरअसल जिस स्थिति या परिस्थिति को हमारा मन जटिल मानता है और जिसमें अनुकूलित नहीं हो पाता उस परिस्थिति को हम समस्या मान बैठते हैं और फिर उससे छुटकारा पाने के नाम पर बहुत से लोग नशे की राह पकड़ लेते हैं। ऐसे लोग एक साथ दो गलती करते हैं, पहली यह कि विषम परिस्थिति को समस्या के तौर पर लेते हैं जबकि समस्या तो दृष्टि आधारित होती है और दूसरी यह कि समाधान की तलाश में नशे की राह पकड़ लेते हैं।
सृष्टि की निर्मात्री है दृष्टि
जीवन में सम विषम परिस्थितियों का आना तो तय है और अगर कोई विषम परिस्थिति को समस्या मानता है तो उसके लिए समस्याओं का आना भी तय है। वैसे भी धनवान हो या निर्धन, युवा हो या बुजुर्ग, महिला हो अथवा पुरुष समस्या विहीन जीवन की कल्पना तो कोई भी नहीं कर सकता। समझदारी तो इसमें है कि हम इन समस्याओं को किस प्रकार लेते हैं और इनका समाधान किस प्रकार से करते हैं। इतना तो तय है कि नशे की राह पर चलकर किसी को भी कभी समाधान प्राप्त नहीं हुआ है। समाधान के लिए समस्या को देखने और समझने के तरीके में बदलाव लाना होगा। पूरी सृष्टि में दिन-रात अनेकों घटनाएँ घटित हो रही हैं जो हमारे नियंत्रण में नहीं हैं तो क्या उनको समस्या मान लिया जाना चाहिए। पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगा रही है, चन्द्रमा पृथ्वी के चक्कर काट रहा है और पृथ्वी अपनी धुरी पर घूम रही है, इनके आपस की गतिशीलता के कारण कहीं कभी दिन तो कहीं रात होती है। इसी गतिशीलता के कारण मौसम में भी फेर-बदल होता है। कभी तेज गर्मी तो कभी बारिश और कभी शीत लहर, इसमें से कुछ भी हमारे हमारे वश में नहीं है तो फिर समस्या क्या है। पर बहुत से लोगों कभी गर्मी समस्या लगती है तो कभी बारिश और कभी ठंडक, यह जानते हुए भी कि मौसम के इस परिवर्तन के कारण ही सृष्टि टिकी हुई है यदि मौसम परिवर्तन को समस्या के तौर पर कोई देखे तो समस्या दरअसल सृष्टि में नहीं बल्कि दृष्टि में है। जीवन में भी इसी प्रकार परिवर्तन होते रहते हैं इन परिवर्तनों को लेकर हमारी दृष्टि कैसी है, हमारा जीवन भी हमारी इसी दृष्टि पर निर्भर करता है। यानि हमारी दृष्टि ही सृष्टि की निर्मात्री है।
समस्या और समाधान दोनों ही मनोवैज्ञानिक
किसी भी समस्या को और उसके समाधान को एक जटिल मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया की तरह लिया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया के माध्यम से ही किसी बाधा को समझा जा सकता है एवं साथ ही साथ उसको दूर करने और चुनौती का सामना करने के तरीके को भी निकला जा सकता है। यह प्रक्रिया कभी जटिल तो कभी आसान हो सकती है बल्कि कभी कभी बहुत ही कठिन रास्तों का अनुसरण करते हुए यह मनोवैज्ञानिक पीड़ा भी दे सकती है। ऐसे में जो लोग इस पीड़ा से अपने आपको उबार ले जाते हैं वे ना सिर्फ सौभाग्यशाली होते हैं बल्कि विजेता कहलाते हैं। अन्यथा बहुत से लोग परिस्थियों की दुहाई देकर इस पीड़ा से बचने के लिए स्वयं को नशे के हवाले भी कर देते हैं। आगे चलकर जीवन की यह एक बहुत बड़ी भूल साबित होती है। हमें यह समझना और युवाओं को खासतौर पर यह समझाना होगा कि समस्या समाधान के किसी भी चरण में नशे का कोई स्थान नहीं होता है। अलबत्ता किसी भी समस्या के समाधान का सबसे महत्वपूर्ण चरण है उस समस्या की पहचान कर लेना, सुनने में यह चरण मामूली भले लगे लेकिन तथ्य यह है कि ज्यादातर मामलों में यही सबसे दुष्कर होता है, परन्तु इसका मतलब ये तो नहीं कि समाधान को ढूंढने के लिए खुद को भुलावा देकर नशे की दुनिया में प्रवेश कर लिया जाये, नशा असल में जीवन बर्बाद करने का साधन है और इससे बर्बाद हुए परिवारों की व्यथा किसी से भी छुपी नहीं है। ऐसे में जो लोग इसमें समाधान ढूंढ़ रहे हैं उन्हें कभी मिलेगा नहीं और नशा करने वाला व्यक्ति भी इसे जानता है।
तो फिर क्यों ना मारें नशे की लत को लात
जब नशे से नुकसान के सिवा कुछ भी हासिल नहीं होना तो फिर आखिर इसके नजदीक जाना ही क्यों क्योंकि एक बार अगर नशे की लत लग गयी तो फिर उसको लात मारना आसान नहीं रह जाता पर इसे आप नामुमकिन भी मत मानिये। आवश्यकता है बस एक ईमानदार कोशिश की और अपने प्रति थोड़ा कठोर बनने की, इसके साथ ही यदि थोड़ा माहौल परिवार के सदस्यों ने भी बना दिया तो फिर यह मुश्किल-मुश्किल नहीं रह जाती है। ध्यान रहे ऐसी समस्याओं का यदि चिर स्थाई समाधान निकालना है तो उसके लिए मेडिकल के उपायों से कहीं ज्यादा पारिवारिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक उपाय कारगर साबित होगा और यह बहुत मुश्किल भी नहीं।
हमें यह समझना और युवाओं को खासतौर पर यह समझाना होगा कि समस्या समाधान के किसी भी चरण में नशे का कोई स्थान नहीं होता है। अलबत्ता किसी भी समस्या के समाधान का सबसे महत्वपूर्ण चरण है उस समस्या की पहचान कर लेना। |
ध्यान रहे, जीवन का समाधान नशे में नहीं, ज्ञान में है जीवन में जो अंधेरा है, वो ज्ञान की रोशनी से ही दूर हो सकता है। इसलिए ज्ञान पथ का पथिक बनिये, जीवन सुगम हो जाएगा और फिर नशे के लिए कोई स्थान नहीं बचेगा। नशा अगर कुछ समय के लिए सांसारिक बंधनों से मुक्ति देता है, तो अध्यात्म सभी तरह की सांसारिक समस्याओं से बेहतर तरीके से हल करने का रास्ता बताता है। परम श्रद्धेय गुरुवर तो शुरुआत से ही कहते चले आ रहे हैं योग में समस्त समस्याओं का समाधान है। भारत तो वैसे भी ज्ञानियों, तीर्थकरों, संतों और महात्माओं की धरा है, इसलिए जीवन का आनंद लेने के लिए किसी पदार्थ का नहीं बल्कि योग का नशा अपनाएं क्योंकि जीने की कला हमें यहीं से प्राप्त हो सकती है।
माना पीने के बाद इंसान बहक जाता है,
पर जब पीने जाता है तब तो होश में रहता है।
सनद रहे, जीवन है बहुत ख़ास और नशा है सर्वनाश,
छूट जाए तो ही अच्छा वर्ना शरीर है जिन्दा लाश।
लेखक
Related Posts
Latest News
01 Mar 2025 17:58:05
With divine inspiration, I want to draw your attention towards 11 important facts. I am sure that you will


