मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम
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डॉ. आचार्य महावीर
प्रति-कुलपति,
पतंजलि विश्वविद्यालय,
हरिद्वार।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम स्वर्णमयी लंका पर विजय प्राप्त कर विभीषण को वहां का राज्य समर्पित कर, पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर अपनी प्राण प्रिया सीताजी तथा प्राण प्रिय भाई लक्ष्मण के साथ-
अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।।
इस पद्य के अनुसार अपनी जन्मभूमि अयोध्या और अपनी जननी माता कौशल्या का स्नेहपूर्ण पावन स्मरण करते हुए जब अयोध्या पहुँचे तो अयोध्या नगरी को असंख्य दीपों, वन्दनवारों और नाना प्रकार की रंगोलियों से सजाया गया था। ठीक वही स्थिति आज है। सैकड़ों वर्षों के संघर्षों और सहस्रों हुतात्माओं के बलिदानों एवं समस्त देशवासियों के दृढ़ संकल्प से भगवान् श्रीराम बन्धन मुक्त हो गये हैं। विश्व के सर्वश्रेष्ठ, विशाल, दिव्य, भव्य श्रीराम मन्दिर का निर्माण कार्य प्रारम्भ हो गया है। ऐसे समय में श्रीराम भक्तों का पावन कर्तव्य है कि वे प्रभु श्रीराम के पावन जीवन चरित्र का अध्ययन कर अपने जीवन को राममय बनायें। राजसत्ता का सुख भोगने वाले राजनेताओं का धर्म है कि वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस, रघुवंश महाकाव्य और उत्तर रामचरित आदि अमर रचनाओं मे स्वर्णाक्षरों में अमृतमयी भाषा में चित्रित चारू चरित्र का पुन:-पुन: स्मरण कर रामराज्य की स्थापना का संकल्प पूर्ण करें। भारत के करोड़ों देशवासियों के लिए रामकथा एक ऐसा रसायन है कि इसका आस्वादन कर श्रद्धालु जन आनन्द सरोवर में आकण्ठ डूब जाते हैं। इक्ष्वाकु वंश अथवा रघुवंश की परम पावनी गौरवगाथा सुनकर जीवन धन्य और पवित्र हो जाता है। महाकवि कालिदास ने रघुवंश महाकाव्य के प्रारम्भ में लिखा-
क्व सूर्यप्रभवो वंश: क्व चाल्पविषया मति:।
तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम्।।
कहाँ समुद्र सम सूर्यवंश और कहाँ मेरी सामान्य बुद्धि। मेरे लिए सूर्यवंश का वर्णन करना ऐसा ही है जैसे कोई छोटी सी नौका से विशाल सागर को पार करना चाहता हो।
परमात्मा के अजर अमर महाकाव्य वेदों में जो कुछ कहा गया है वह सूर्य वंशीय राजाओं और श्री रामचन्द्र जी के जीवन में अक्षरश: चरितार्थ हो रहा है। कविकुलगुरु कालिदास लिखते हैं-
शैशवेऽभ्यस्तविद्यानां, यौवने विषयैषिणाम्।
वार्धक्ये मुनिवृत्तीनां, योगेनान्ते तनुत्यजाम्।।
भारतवर्ष की आश्रम व्यवस्था का ये महान् राजा पूर्णरूप से परिपालन करते थे। उन्हें प्रजा से जो कुछ कर के रूप में प्राप्त होता था, उसे वे हजारों गुणा करके अपनी प्रिय प्रजा को ही लौटा देते थे-
प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत्।
सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रवि:।।
इक्ष्वाकुवंश के भूपालों के इसी उदात्त गुण को श्रीराम के धवल जीवन में प्रतिपादित करते हुए महाकवि भवभूति उत्तररामचरित के प्रारम्भ में ही उन्हीं के मुखारविन्द से उद्घोषणा कराते हैं-
‘स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि।
आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा।।
अर्थात्- प्रजानुरंजन के लिये स्नेह, दया, सौख्य और यदि प्राणप्रिया जानकी का भी परित्याग करना पड़े तो मुझे कोई कष्ट नहीं होगा। प्रजानुरंजन के लिये सर्वस्व न्यौछावर कर देना ही रामराज्य की सर्वोत्कृष्ट संकल्पना है। आदि कवि वाल्मीकि ने श्रीराम को ‘विग्रहवान् धर्म:’ (अरण्यकाण्ड 38/13) कहा है। रामकथा में श्रीरामचन्द्र जी को राज्याभिषेक के लिये निमन्त्रित किया जाना, और कैकेयी के कहने पर राज्याभिषेक के स्थान पर पिता द्वारा चौदह वर्ष के वनवास का आदेश देना, विश्व इतिहास की आश्चर्यचकित कर देने वाली घटना है। इसमें भी और अधिक चौंकाने वाली बात है श्रीरामचन्द्र जी का दोनों अवस्थाओं में सर्वथा सम रहना। आदिकवि लिखते हैं-
न वनं गन्तुकामस्य त्यजतश्च वसुन्धराम्,
सर्वलोकातिगस्येव लक्ष्यते चित्तविक्रिया।।
(अयोध्याकाण्ड 19/33)
आहूतस्याभिषेकाय विसृष्टस्य वनाय च।
न मया लक्षितस्तस्य मनागप्याकार विभ्रम:।।
(अयोध्याकाण्ड)
इसी प्रसंग में धर्म की सर्वोच्च स्थिति को जीवन में धारण करने वाले महानायक श्रीराम कहते हैं-
नाहमर्थपरो देवि लोकमावस्तुमुत्सहे।
विद्धि मामृषिभिस्तुल्यं विमलं धर्ममास्थितम्।।
(अयोध्याकाण्ड 19/20)
क्षात्र धर्म के उदात्त स्वरूप को अभिव्यक्त करते हुए श्रीराम का यह वचन सदैव राजाओं को प्रेरणा देता रहेगा-
क्षत्रियैर्धार्यते चापो नार्तशब्दो भवेदिति।
(अरण्य 10/3)
आदि कवि ने श्रीराम को धर्मज्ञ, धर्मिष्ठ, धर्मभृतांवर, धर्मवृक्ष आदि विशेषणों से विभूषित किया है। भगवान् श्रीराम जहाँ धर्म के साकार रूप हैं, वहाँ वे सत्य में ही प्रतिष्ठित हैं। वे कभी सत्य का परित्याग नहीं करते ‘रामो द्विर्नाभिभाषते’स्वयं आदिकवि ने उनके मुख से कहलवाया है-
नैव लोभान्न मोहाद् वा न चाज्ञानात्तमोऽन्वित:।
सेतुं सत्यस्य भेत्स्यामि गुरो: सत्यप्रतिश्रव:।।
(अयोध्या 109/17)
समग्र वैदिक वाङ्मय में धर्म और सत्य की जो महिमा प्रतिपादित की गई है, वह समग्र रूप में श्रीराम के आदर्श जीवन में पूर्ण भव्यता से दृष्टिगोचर होती है। मानव जीवन में क्या-क्या उत्तमोत्तम हो सकता है, इसकी यदि सूची बनाई जाये तो वे समस्त गुण मर्यादा पुरुषोत्तम के जीवन में कूट-कूटकर भरे हुए है। वे दुष्टों के लिये वज्र के समान कठोर हैं तो सज्जनों के लिए पुष्प के समान कोमल हैं-
वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि।
लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुमर्हति।।
(उत्तररामचरित)
वे, जीवन के किसी भी मोड़ पर किसी के भी द्वारा किये गये उपकार को कभी विस्मृत नहीं करते और किसी के अपकारों को एकक्षण भी याद नहीं करते-
कदाचिदुपकारेण कृतेनैकेन तुष्यति।
न स्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तया।।
भगवान् श्रीराम कितने दयालु हैं, कितने क्षमावान् हैं, कितने विशाल हृदय हैं, इसका प्रत्यक्षीकरण होता है रावण के भाई विभीषण को स्नेहपूर्वक गले लगाने के प्रसंग में। पक्ष के शुभचिन्तकों द्वारा शत्रुपक्ष के विभीषण के विषय में शंका प्रकट करने पर दया के महासागर श्रीराम कहते हैं-
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम।।
अर्थात्- जो एक बार शरणागत होकर प्रार्थना करते हैं कि मैं आपका हूँ, ऐसे सभी प्राणियों को अभय प्रदान करना मेरा जीवनव्रत है।
ऐसे अनन्त गुणों के सागर, आदर्श राजा, आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श पति और आदर्श मित्र, श्री रामचन्द्र के गुणों का वर्णन करते हुए महर्षि वाल्मीकि ने लिखा है-
स हि रूपोपपन्नश्च वीर्यवाननसूयक:।
भूमावनुपम: सूनुर्गुणैर्दशरथोपम:।।
सर्वविद्याव्रतस्नातो यथावत् साङ्गवेदवित्।
इष्वस्रे च पितु: श्रेष्ठो बभूव भरताग्रज:।।
दृढ़भक्ति: स्थिरप्रज्ञो नासद्ग्राही न दुर्वच:।
निस्तन्द्रीरप्रमत्तश्च स्वदोषपरदोषवित्।।
यमशक्रसमो वीर्ये बृहस्पतिसमो मतौ।
महीधरसमो धृत्यां मत्तश्च गुणवत्तर:।।
रामो लोकाभिरामोऽयं शौर्यवीर्यपराक्रमै:।
प्रजापालनसंयुक्तो न रागोपहतेन्द्रिय:।।
अर्थात्- वे अद्वितीय सौन्दर्ययुक्त, वीर्यवान् किसी से असूया न करने वाले, भूमण्डल में अनुपम और असंख्य गुणनिधान थे। वे समस्त विद्याओं में निपुण, व्रतपालक अंगोसहित वैदिक साहित्य के विद्वान्, शस्त्र और शास्त्र में पिता से भी श्रेष्ठ थे। दृढभक्ति, स्थिरप्रज्ञ, असत्य को कभी न अपनाने वाले, कभी दुर्वचनों का प्रयोग न करने वाले, तन्द्रा, प्रमाद रहित, अपने और दूसरों के दोषों को जानने वाले यमराज एवं इन्द्र के समान पराक्रमी, बृहस्पति के समान बुद्धिमान, पृथ्वी के समान धैर्यवान्, गुण श्रेष्ठ थे। शौर्य, वीर्य और पराक्रम से श्रीराम संसार में अभिराम थे, प्रजापालन में संलग्न रहते हुए उनकी इन्द्रियाँ कभी आसक्त नहीं थीं।
ऐसे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का आदर्श जीवन हम भारतवासियों का अनुपम प्रेरणा स्रोत है। रामनवमी का पावन पर्व एवं श्री राम मन्दिर के निर्माण का पावन संकल्प, जन-जन के जीवन में नई ऊर्जा, नया उत्साह उत्पन्न कर विश्वगुरु भारत, भ्रष्टाचार, अत्याचार, दुराचार और रोगों से मुक्त, योग युक्त, वैभवशाली, शक्ति संपन्न भारत बनाने की संकल्पना को पूर्ण करें, यही प्रार्थना है।
लेखक
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