पतंजलि के 24वें स्थापना दिवस पर ‘पतंजलि परिधान’ स्टोर का उद्घाटन

पतंजलि के 24वें स्थापना दिवस पर ‘पतंजलि परिधान’ स्टोर का उद्घाटन

  • सशक्त स्वदेशी विकल्प के तौर पर पतंजलि परिधान देश को समर्पित : पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज
  • 'पतंजलि परिधान’ भारतीय वेश-परिवेश में परिवर्तन की नवीन क्रांति : श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज
5 जनवरी, 1995 को परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज व श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने जनसेवा व राष्ट्रसेवा के उद्देश्य से पतंजलि योगपीठ संस्थान की स्थापना की थी। संस्थान के 24वें स्थापना दिवस पर पतंजलि योगपीठ परिवार ने 'पतंजलि परिधान’ स्टोर के रूप में और एक कदम आगे बढ़ाया है, जिसका उद्घाटन पतंजलि योगपीठ स्थित आयुर्वेद भवन में परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज तथा परम श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के कर-कमलों द्वारा सम्पन्न हुआ।
07 लाख करोड़ के टेक्सटाइल बाजार पर विदेशी ब्राण्ड्स का कब्जा : पूज्य स्वामी जी महाराज
पतंजलि विश्वस्तरीय गुणवत्ता, न्यूनतम मूल्य तथा लाभांश से सेवा के अपने आधारभूत सिद्धांतों पर अडिग : श्रद्धेय आचार्य जी महाराज
इस अवसर पर पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज ने कहा कि पतंजलि परिवार के साधना, सेवा व संघर्ष, योग व कर्मयोग और मानव सेवा से राष्ट्र सेवा के 24 वर्ष पूर्ण हुए हैं। 24 वर्षों की इस सतत साधना एवं सेवा को आगे बढ़ाते हुए आने वाले 50 वर्षों के लिए हम तैयार हैं। वर्ष 2050 तक भारत को विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक, आध्यात्मिक महाशक्ति बनाने के लिए हम संकल्पित हैं। इसके लिए व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की एक बहुत बड़ी भूमिका पतंजलि की रही है। हमारी अब तक की यात्रा से करोड़ों लोगों को स्वास्थ्य मिला, उन्हें रोगमुक्त, तनावमुक्त, व्यसनमुक्त व्यक्ति बना कर एक दिव्य आध्यात्मिक जीवन जीने की पद्धति पतंजलि ने सिखाई, इसमें लाखों कार्यकर्ताओं और करोड़ों समर्थकों ने हमें ताकत देकर यहाँ तक पहुँचाया है। विश्व का सबसे बड़ा योग, आयुर्वेद, प्राकृतिक-चिकित्सा व अनुसंधान का केन्द्र पतंजलि ने बनाया। विश्व के नये कीर्तिमान हरिद्वार की इसी पावन धरा से बने हैं। स्वामी जी महाराज ने कहा कि लगभग 7 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का बाजार टेक्सटाइल सेक्टर का है। इसमें से 90 प्रतिशत से ज्यादा अन-ऑर्गेनाइज्ड सेक्टर में हैं। ऑर्गेनाइज्ड सेक्टर में जो ब्राण्डेड कपड़े मिलते हैं, उन पर भी विदेशी कम्पनियों का कब्जा है। विदेशी ब्राण्ड ने भारत में अपने पैर ऐसे पसारे, कि स्वदेशी ब्राण्ड का खड़ा होना ही बहुत मुश्किल था। हमने पतंजलि परिधान को एक सशक्त स्वदेशी विकल्प के तौर पर देश को समर्पित किया है।  स्वामी जी ने कहा कि आज टेक्सटाइल इण्डस्ट्री दम तोड़ रही है, बुनकरों के पास काम नहीं है। इस पूरे अभियान में हमारा संकल्प है कि बुनकरों के हाथों को काम मिले, उनको उनकी मेहनत का पूरा दाम मिले, उनको सम्मान व स्वाभिमान के साथ जीने का हक मिले।
इस अवसर पर श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने कहा कि भारतवर्ष एक सांस्कृतिक विरासत का देश है, हमारे कपड़ों और पहनावे का एक समृद्ध इतिहास है, जो विविधता में एकता को दर्शाता है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक प्रत्येक राज्य का एक अनूठा पहनावा है। उन्होंने कहा कि हमें भारत के शिल्पकारों तथा बुनकरों पर गर्व है, जो इतनी कुशलता से सामान्य से दिखने वाले कपड़े पर अपनी कलाकारी, कढ़ाई, बुनाई और छपाई की तकनीकों से उन्हें एक अनूठा रूप देने में सक्षम हैं। आचार्य जी ने बताया कि पतंजलि परिधान में 1100 से अधिक विकल्प तथा 3500 से अधिक एस.यू.के. की विशाल वैरायटी है, जिनमें पुरुषों, महिलाओं तथा बच्चों के लिए एथनिक-वीयर, इनर-वीयर एसेसरीज की पूरी रेंज है। उन्होंने बताया कि पतंजलि परिधान की तीन रेंज हैं- आस्था, संस्कार तथा लिवफिट। लिवफिट ब्रांड में स्पोट्र्स-वीयर व योग-वीयर, आस्था ब्रांड में वुमेंस-वीयर और संस्कार ब्रांड में मेंस-वीयर आदि की व्यवस्था रहेगी। आचार्य जी ने कहा कि पतंजलि ने पतंजलि परिधान के रूप में भारतीय वेश और परिवेश में परिवर्तन के लिए एक नवीन क्रांति का सूत्रपात किया है। पतंजलि ने विश्वस्तरीय गुणवत्ता, न्यूनतम मूल्य तथा लाभांश से सेवा के अपने आधारभूत सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए हर भारतीय के लिए परिधान की व्यवस्था की है।
उन्होंने कहा कि पतंजलि परिधान स्वदेशी के गौरव के साथ महिलाओं, पुरुषों, बच्चों, खिलाडिय़ों तथा योगी भाई-बहनों के लिए परंपरागत वस्त्रों के अलावा आधुनिक भारतीयों की जरूरतों, इच्छाओं और महत्त्वाकांक्षाओं को भी पूरा करेगा। कार्यक्रम में पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज तथा श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज ने सहयोगियों व समर्थकों से मुलाकात की।

'सद्वृत्त’

आरोग्य की प्राप्ति के लिए आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ 'चरक संहिता’ के सूत्रस्थान के अन्तर्गत सद्वृत्त प्रकरण के महत्त्वपूर्ण अंश-
देवगोब्राह्मणगुरुवृद्धसिद्धाचार्यानर्चयेत्। अग्निमुपचरेत्। ओषधी: प्रशस्ता धारयेत्। द्वौ कालावुपस्पृशेत्। मलायनेष्वभीक्ष्णं पादयोश्च वैमल्यमादध्यात्। त्रिपक्षस्य केशश्मश्रुलोमनखान् संहारयेत्। नित्यमनुपहतवासा: सुमना: सुगन्धि स्यात्। साधुवेश:, प्रसिद्धकेश:, मूर्धश्रोत्रघ्राणपादतैलनित्य:, पूर्वाभिभाषी, सुमुख:।
(सू. 8.१8)
दे, गौ, ब्राह्मण, गुरुजन, सिद्धजन और आचार्यों की पूजा एवं आदर-सत्कार करना चाहिए। अग्नि में प्रात: सायं हवन करे। उत्तम औषधि धारण करे। प्रात: सायं शरीर को जल स्पर्श करावे अर्थात् स्नान करे। मलमार्गों (नौ छिद्रों) और पैरों को बार-बार स्वच्छ करता रहे। एक पक्ष में तीन बार (प्रति पाँचवे दिन) केश, दाढ़ी, मूँछ, लोम और नखों को कटवाता रहे। सदा निर्मल और बिना फटे वस्त्र पहने। सदा प्रसन्न रहे और सुगन्ध (इत्र आदि) से सुगन्धित बना रहे। सज्जनों जैसा वेश धारण करे। बालों को सँवार कर रखे। शिर पर, कानों में, नासिका में और पैरों में नित्य तेल डाले। किसी से मिलने पर उसके बोलने के पहले ही कुशल-क्षेम पूछे। प्रसन्नवदन रहे।

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