लोकमङ्गल से आत्ममङ्गल

लोकमङ्गल से आत्ममङ्गल

श्रद्धेय गुरुदेव आचार्य प्रद्युन जी महाराज 

शास्त्र में अविनाशी परमात्मतत्त्व के स्वरूप को दर्शाने के लिए निषेधवाचक शब्दों का प्रयोग ही प्राय: मिलता है। उसका कारण यही है कि व्यक्ति की इस अज्ञान अवस्था में उस अक्षर अविनाशी तत्त्व का समस्त दृश्य के साथ तादात्म्य हुआ है, उस तादात्म्य को हटाने या तोडऩे के लिए यह एक युक्ति या मार्ग निकाला गया। इस प्रक्रिया से साधक अपने उस केवल निज स्वरूप में पहुँच जाता है, जहाँ दूसरा विषय, वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, नाम तथा रूप, कुछ भी नहीं रहता।
प्रश्नोपनिषद् में भी उसके षोडश (सोलह) कला वाले स्वरूप का वर्णन करके उसके निष्कल (कलाओं से रहित) शुद्ध स्वरूप का दर्शन कराया गया है। प्राण, श्रद्धा, पंचभूत, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मंत्र, कर्म, लोक और नाम, इन कलाओं ने ब्रह्म के पारमार्थिक स्वरूप को ढक रखा है, इसलिए इन्हें कला कहते हैं (कं ब्रह्म लीयते आच्छाद्यते यया सा कला) व्यक्ति का आत्ममङ्गल तो उस शुद्ध स्वरूप की उपलब्धि में ही निहित है। लोकमङ्गल से जीवन का आधा लक्ष्य ही पूरा होता है। अर्थात् लोकमङ्गल अपने से बाहर कुछ करने से सम्बद्ध है और आत्ममङ्गल अपने भीतर जानने से, यह दोनों की स्थिति है। आत्ममङ्गल का कोई और भी उपाय, मार्ग या साधन है अथवा केवल एक ही रास्ता है कि व्यक्ति किसी से कुछ न चाहे, कुछ न देखे, कुछ न सुने, कुछ न बोले, समस्त मन व इन्द्रियों के व्यापार से उपरत हो जाए और इस प्रकार बाहर से सर्वथा विमुख होकर आत्म-केन्द्रित हो जाए। हाँ! और भी है। जीव जब मनुष्य शरीर में इस संसार में आता है, तो ऐसी असहाय अवस्था में होता है कि एक-एक क्षण उसकी देखभाल की आवश्यकता होती है। आरम्भ में तो माता-पिता, परिवार, कुटुम्ब सब मिलकर मनुष्य को अपने प्रेम व साधनों से बढ़ाते हैं। धीरे-धीरे गुरुजन या समाज जैसे भी उसे मिलते हैं, उनसे कुछ शुभ, कुछ अशुभ सीखता हुआ कुछ करने लायक हो जाता है। यदि उसमें अज्ञान अधिक होता है, तो उसके अनुपात में भोग-इच्छाएँ ही बलवती होती हैं। भोग रुचि के प्रबल होने पर व्यक्ति अधर्मपूर्वक भी अपनी उस भोग-रुचि को पूरा करने में लगा रहता है और इस प्रकार न चाहते हुए भी पाप संचय करता हुआ अपना अमङ्गल करता रहता है। यह एक सर्वमान्य सिद्धान्त है कि भोग की रुचि को लेकर अशुभ और पुण्य की रुचि को लेकर शुभ कार्य होते हैं, किन्तु यदि उसे सौभाग्यवश उत्तम कोटि के माता-पिता, परिवार, मित्रगण, समाज या गुरुजन मिल जाते हैं, तो उसकी बुद्धि धर्म की ओर अधिक अभिमुख रहती है और वह धर्मपूर्वक ही अपनी भोग-इच्छाओं को पूरा करना चाहता है। इस प्रक्रिया से पुण्य का संचय बढ़ते-बढ़ते आत्ममङ्गल की ओर अग्रसर होता रहता है।
सम्पूर्ण रूप से आत्ममङ्गल तो तभी होता है, जब व्यक्ति को कोई ज्ञानी पथ प्रदर्शक गुरु मिल जाए। वह गुरु किसी को माँ के रूप में, किसी को पिता, मित्र, साक्षात् गुरु या किसी भी रूप में मिल सकता है। वह गुरु अपने शिष्य का शास्त्र से भी परिचय करा देता है। इस प्रकार शास्त्र और गुरु दोनों मिलकर शिष्य की बुद्धि में ज्ञान का बीज बोते हैं। आगे चलकर यही बीज विकसित होता हुआ शिष्य की सत्ता के ऊपर छा जाता है। उसके हृदय में शुद्धि, पवित्रता, मुक्ति, अमरत्व, परम शान्ति की प्यास दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है। बढ़ती हुई यह प्यास स्वयं मार्ग खोजती हुई साधक की उस माँग को पूरा कर देती है, जो वह व्यग्र होकर परम उत्कण्ठा के साथ खोज रहा होता है या चाह रहा होता है।
शास्त्र व गुरुजन साधक का मार्गदर्शन करते हैं कि तुम्हारे पास विधान के अनुसार जो कुछ भी संचित हो गया है, उसके बदले में कुछ भी न चाहते हुए इच्छुक लोगों में उदारतापूर्वक बाँटते रहो, जिसमें तुम्हारे विवेक व सामथ्र्य का कुछ विरोध भी न हो। ऐसा करने से तुम्हारे चित्त की वह भूमि तैयार हो जाएगी, जिसमें भागवत ज्ञान-ज्योति-प्रकाश-आनन्द-परमरस-परमतृप्ति अवतरित होगी। इस प्रकार निष्काम कर्म (सेवा) भी चित्तशुद्धि परम्परा से तुम्हारे आत्ममङ्गल के साधन बन जाएँगे। इस तरह निरन्तर चलते-चलते एक दिन तुम्हारा परम कल्याण हो जाएगा। साधक भी संचित पुण्यों के कारण प्राप्त उत्तम बुद्धि, प्रज्ञा या मेधा के द्वारा शास्त्र या गुरुवाणी में पूर्ण विश्वास करता हुआ निर्दिष्ट पथ पर धैर्य से चलता रहता है।
भक्ति के माध्यम से भी आत्ममङ्गल घटित हो सकता है। तदर्थ दो शक्तियों का संयोग या मिलन आवश्यक है, साधक की अभीप्सा और भागवत कृपा। बाह्य गुरु व शास्त्र दोनों के सहयोग से साधक की प्यास सतेज होती जाती है। यह प्यास तत्त्व और भी अधिक तीव्र व बलवती हो जाती है, जब साधक अपनी प्राप्त विवेकबुद्धि के द्वारा इस संसार की अनित्यता या असारता का, क्षणिक सुखों से मिलने वाली अतृप्ति का, अहं की पूर्ति करने में झेले गए अनन्त दु:खों का विचार करने में सक्षम होता है। इन सब के सहयोग से भगवत् प्राप्ति के लिए साधक में अनन्य प्रेम जाग्रत हो जाता है। यह प्रेम साधक की सभी अन्य इच्छाओं को खा जाता है। विषयों से भरा हुआ यह समग्र संसार, जो कभी पहले उसे रस से परिपूर्ण दिखाई देता था, अब वह उसके लिए एकदम उल्टा हो जाता है, सब कुछ नीरसता में बदल जाता है। भगवान् के सिवाय उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। न किसी से बात करना चाहता है, न कोई खाने-पीने में रुचि है, न कहीं घूमने की इच्छा होती है, न किसी सम्मान की ही चाह है, वह इस तरह का दीवाना जैसा हो जाता है। बस, इस व्याकुलतापूर्ण स्थिति या अवस्था की उत्तर अवस्था ही भगवत्प्राप्ति है। भगवत्प्राप्ति होने पर व्यक्ति शान्त, समता में स्थित, समबुद्धि, सर्वात्मभाव, सरल (अहंमुक्त) हो जाता है। ऐसे व्यक्ति को शास्त्रकारों ने 'कुशल’ या ब्रह्म को जानने वाला 'ब्राह्मण’ यह सार्थक नाम दिया है। बृहदारण्यक श्रुति में याज्ञवल्क्य गार्गी को समझाते हुए कहते हैं कि जो इस अक्षर अविनाशी तत्त्व को बिना जाने इस संसार से प्रयाण करता है, वह कृपण है, बेचारा है, बहुत ही दीन है।
अन्त में साररूप में संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि यदि उचित दृष्टि मिल जाए, तो लोकमङ्गल व आत्ममङ्गल न तो एक-दूसरे के विरोधी हैं और न असहयोगी, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। साधक को यह दृष्टि मिल जाती है कि यह सृष्टि उस सृष्टिकर्ता का निवास स्थान है और सृष्टिकर्ता ही उसका प्रभु है। समस्त जीवगण अपने प्रभु के सेवक हैं या उसकी सन्तानें हैं। उन सबमें मनुष्य की स्थिति यह है कि वह अपने प्रभु का या अपने पिता का ही प्रतिरूप है। मनुष्य का यही सर्वोत्तम कत्र्तव्य है कि उसका यह शरीर विश्ववाटिका की खाद बन जाए और हृदय अपने प्रभु के लिए प्रेम से भर जाए और अहं अभिमान शून्य हो जाए अर्थात् अपने लिए किसी से कुछ न चाहे। इस समझ के साथ यदि कोई अपने जीवन को चलाए, तो स्वत: ही उभयविध मङ्गल साधित हो जाता है। इस दृष्टि में कर्मयोग, ज्ञानयोग व भक्तियोग तीनों ही इक्कठे हो जाते हैं।
शरीर से (स्थूल व सूक्ष्म शरीर दोनों से ही) कर्मयोग, बुद्धि से ज्ञानयोग, मन व अपने से भक्तियोग सम्पन्न होता है। ये तीनों योग भी सर्वथा एक-दूसरे से पृथक् नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। केवल इतनी सी बात है कि एक की प्रमुखता रहती है और दूसरे दो सहयोगी। मनुष्यों का प्रारब्ध (कर्मप्रवाह) पृथक्-पृथक् होने से किसी में क्रिया के वेग की, किसी में विचार की, तो किसी में भाव की प्रमुखता होती है। कर्मयोगी का साधन उदारता और कत्र्तव्यपरायणता है। वह प्राप्त सामथ्र्य को या तो भगवान् की समझता है या जगत् की। यदि वह इसे भगवान् की समझता है, तो भगवान् के नाते और जगत् की समझता है तो जगत् के नाते अपनी सम्पूर्ण सामथ्र्य को सेवा में अर्पित कर देता है। साथ में अपने लिए किसी से कुछ चाहता नहीं; क्योंकि जिस स्वाधीनता, स्वराज्य, अमरत्व की उसे माँग है, वह किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के अधीन होकर नहीं मिल सकती, वे तो पहले ही अपने में मौजूद हैं, अत: अपनी माँग को अपने में ही पाकर सन्तुष्ट हो जाता है। इसी का नाम है- ज्ञानयोग। सुने हुए प्रभु को अपना मानकर उसे अपने हृदय का प्यार अर्पित करने का नाम है भक्तियोग। अर्थात् प्रभु को अपना प्रेमास्पद स्वीकार करके अपने हृदय में उसकी अखण्ड स्मृति जगाकर नित्य प्रेम का दान करना ही भक्तियोग है।
संक्षेप में मेरे पास जो कुछ है, वह जगत् का है, इस बुद्धि से जगत् की सेवा का नाम कर्मयोग, किन्तु जगत् पति का समझकर जगत् की सेवा का नाम भक्तियोग और किसी का भी न समझकर अपने में अचाह हो जाने का नाम है ज्ञानयोग। ज्ञानयोगी भी कर्म करता है, किन्तु 'गुण ही गुणों में वर्त रहे हैं और मैं गुणों से असङ्ग हूँ’ इस भाव के साथ करता है। मनुष्य को जगत् के लिए भी उपयोगी होना है, अपने लिए भी और प्रभु के लिए भी। वस्तुत: जिसका आत्ममङ्गल हो गया, वही सच्चे अर्थ में लोकमङ्गल कर सकता है। साक्षात् सच्चिदानन्द बनकर जीना ही आत्ममङ्गल का स्वरूप है, ऐसी स्थिति में जीवन का निर्दोष हो जाना स्वाभाविक है। निर्दोष जीवन में लोकमङ्गल निहित ही है।

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