आंतरिक शक्तियों को कैसे प्रकट करें

आंतरिक शक्तियों को कैसे प्रकट करें

साध्वी आचार्या देवप्रिया

हम कहते हैं कि ईश्वर हम सबमें निहित है। वो हमारे अन्दर भी है, बाहर भी है, सब जगह विद्यमान है। किन्तु वह अभिव्यक्त क्यों नहीं हो रहा, दिखाई क्यों नहीं दे रहा? वाद्य यंत्रों में सभी स्वर मौजूद हैं किन्तु उन्हें वही बजा सकता है, जिसने उनका अयास किया हो। अयास के अभाव में वाद्य यंत्रों से बेसुरा स्वर ही निकलेगा।
श्वर हमारे भीतर है, मैं पूर्ण हूँ किन्तु यह अभिव्यक्त नहीं हो रहा। 'सहोऽसि सहो मयि धेहि’ मेरी सहनशक्ति कम क्यों है, जबकि ईश्वर तो महान् सहनशील, क्षमाशील, न्यायकारी, परमपुरुषार्थी है। विष्णो: कर्माणि पश्यत। यह सारा कर्म ईश्वर का ही तो है। क्योंकि हमने भागवत शक्तियों को, ईश्वरीय शक्तियों को अभिव्यक्त करने का अभ्यास ही नहीं किया, इसलिए ईश्वर हमारे अंदर होते हुए भी हम उसे अभिव्यक्त नहीं कर पाये। ये अभिव्यक्त होते हैं महर्षि दयानन्द के व्यक्तित्व से। क्योंकि महर्षि दयानन्द ने उन गुणों को अभिव्यक्त करने का घण्टों-घण्टों नहीं, प्रतिपल अभ्यास किया है। वे अपने सभी व्यायानों में 'विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव, यद भद्रं तन्न आसुव’ इस वेदवाक्य का उद्धरण देते थे। वे कहते थे कि इस दुनिया में जो भी अच्छा है, वह हमें ग्रहण करने का अयास करना चाहिए।
हम कहीं जाते हैं तो वहाँ कमियाँ ढूँढऩे लगते हैं, जैसे उदाहरण के तौर पर यदि हम न्यू-मुल्तान नगर आर्य समाज, दिल्ली गये तो वहीं कमियाँ ढूँढऩे लगते हैं। कहते हैं कि वहाँ सब कुछ तो ठीक था किन्तु पानी के गिलास सभी जगह बिखरे पड़े थे। पतंजलि योगपीठ गये थे, वहाँ सब कुछ तो ठीक था किन्तु जो पंखे लगे थे, वे विदेशी कम्पनियों के थे। अरे भाई! वो पंखे यदि २० वर्ष पूर्व किसी दानदाता ने दान दिये थे तो अब क्या उन्हें फेंक दें। किसी के घर जाते हैं तो कहते हैं कि उन सास-बहू की आपस में बनती नहीं है। वैसे तो दोनों मुस्कुरा रहे थे किन्तु वह सब बनावटीपन था। ये जो व्यक्ति बयान कर रहा है, ये आर्य समाज, पतंजलि योगपीठ या उस अमुक व्यक्ति के घर की स्थिति को बयान नहीं कर रहा अपितु अपनी दृष्टि को बयाँ कर रहा है कि इस संसार को देखने की उसकी दृष्टि कैसी है। संसार को देखने का उसका अभ्यास कैसा है। जिसका देखने का अभ्यास सुन्दर है, उसे कीचड़ में भी कमल दिखाई देता है। उसे कीचड़ दिखाई देता ही नहीं है। और जिसका देखने का अभ्यास सुन्दर नहीं है, उसे चन्द्रमा में भी दाग दिखाई देता है। ये सब हमारे अभ्यास का ही परिणाम है।
सफलता को पचाने का अभ्यास
अभ्यासों की इस कड़ी में हमें सफलता पाने पर न इतराने का अभ्यास और प्रतिकूलता आने पर न घबराने का अभ्यास करना है। व्यक्ति को जब थोड़ी सी सफलता प्राप्त होती है, थोड़ी अनुकूलता आती है, यश मिलता है, सुकीर्ति मिल जाती है तो वह भूल जाता है कि मैं कहाँ से चला था। वह भूल जाता है कि जो मुझे मिला है, वह कहाँ से मिला है, कैसे मिला है, और अभी भी मुझे जो मिल रहा है, उसके पीछे कितने लोगों का आशीर्वाद है? वह अपनी सफलता की कहानी भूल जाता है। वह एरोगेन्ट हो जाता है और थोड़े दिन में लोग उसे अपने जीवन से बाहर कर देते हैं।
अत: व्यक्ति को सफलता पचाने का अभ्यास भी होना चाहिए। अनुकूलताओं में भी अपने आप को स्थिर रखने का अभ्यास होना चाहिए। क्योंकि पौधे के ऊपर जो पुष्प खिला है, वह तभी खिला जब तक जड़ से जुड़ा है। यदि वह जड़ की परवाह न करे और सोच ले कि जड़ का क्या अस्तित्व है, वह तो मिट्टी में दबी पड़ी है, लोग तो मेरी वाह-वाह करते हैं। और जिस दिन वह अपनी जड़ों से कट जायेगा, उसी दिन सूख जायेगा। उस पुष्प की सुन्दरता और वाह-वाही के पीछे मिट्टी में दबी वो जड़ें हैं, जो कभी दिखती नहीं हैं। यही है अनुकूलताओं में अपने को स्थिर रखने का अभ्यास।
अनुकूलताओं के साथ-साथ जीवन में प्रतिकूलताएँ भी आती हैं। प्रतिकूलताओं में न घबराने का अभ्यास भी हमें होना चाहिए, नहीं तो व्यक्ति अवसाद में चला जाता है, टूट जाता है। यह हम सबकी समस्या है। हम सब अच्छी-अच्छी बातें जानते हैं, बोलते हैं किन्तु जब हमारे जीवन में प्रतिकूलताएँ आती हैं तो रोने लगते हैं। यदि थोड़े समझदार हैं तो दूसरों के सामने मुस्कुराते हैं और अन्दर एकांत में जाकर रो लेते हैं। किन्तु सहनशक्ति तो नहीं है ना। अन्दर रोयें या बाहर रोयें, ये हमारी कमजोरी का प्रतीक तो है ही। शक्ति वही है, अन्दर भी ईश्वर है, बाहर भी ईश्वर है किन्तु सत्संग, ध्यान, उपासना उस अन्दर वाले अव्यक्त को सक्रिय कर देते हैं, अभिव्यक्त कर देते हैं। अत: सत्संग, ध्यान, उपासना का भी अभ्यास हमें होना चाहिए।
अपना अभिनय सही प्रकार से करने का अभ्यास
हम सभी जीवन में अभिनय कर रहे हैं। एक उदाहरण के तौर पर एक प्रसंग प्रस्तुत है- एक व्यक्ति मंच पर अभिनय कर रहा था। उस अभिनय में उसका किरदार था, कि उसका जहाज पानी में डूब गया। उसके बीवी-बच्चे मर गये, उसका व्यापार नष्ट हो गया। इन सब घटनाओं से उसे हृदयाघात (हार्ट-अटैक) होता है और वह मर जाता है। वह व्यक्ति उस अभिनय को पूरी तन्मयता के साथ निभाता है। अब वह मंच पर मरणासन अवस्था में पड़ा है। उसके सगे संबंधी उसे चारों ओर से घेरे हुए हैं तथा रो रहे हैं, बिलख रहे हैं, उस व्यक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कुछ लोग उसे उठाकर ले जाते हैं, तब भी वह उसी अवस्था में रहता है। किन्तु नाटक समाप्ति के थोड़ी देर बाद देखा तो वह मंच के नीचे खड़ा चाय पी रहा है। एक व्यक्ति ने बड़े अचरज से पूछा कि अभी कुछ देर पहले तो आप मर गये थे, और अभी हँस रहे हैं। अभिनेता ने उस व्यक्ति को समझाया कि मैं तो मंच पर अभिनय कर रहा था, वह कहानी मेरी नहीं थी। फिर वह उस व्यक्ति को अपना परिचय देते हुए कहता है कि मैं तो अमुक स्थान पर रहता हूँ, मेरा पूरा परिवार है, बीवी-बच्चे हैं, जिनके भरण-पोषण के लिए मैं यह सब कर रहा हूँ। मेरी कहानी तो दूसरी है। किन्तु यदि महर्षि दयानन्द की दृष्टि से देखें तो पता चलेगा कि वह कहानी भी उसकी नहीं है, वहाँ भी वह किरदार ही निभा रहा है। कहीं पति का, कहीं बेटे का, कहीं भाई का तो कहीं बिजनेसमैन का। असली कहानी तो यह है कि मैं एक विशुद्ध आत्मा हूँ। इसमें न तो कुछ जोड़ा जा सकता है और न ही घटाया जा सकता है। आज से ५०-१०० साल पहले कोई और अभिनय करके चले गये, कोई और प्रधान थे, आज आप प्रधान हैं। आज से १०० साल पहले बोलने वाले कोई और थे, आज बोलने वाले कोई और हैं, कल कोई और होंगे। सब अभिनय कर रहे हैं। मंच पर ३ घंटे की कहानी वाला अभिनय तो बहुत अच्छा कर लेते हैं और अभिनय करने वाले को भी संतुष्टि मिलती है कि मैंने बहुत अच्छा अभिनय किया। दूसरे भी सराहना करते हैं, लेकिन यह सारा जीवन, यह संसार भी तो उस ईश्वर का ही रंगमंच है। हम इस मंच पर अभिनय कर रहे हैं, ये हम भूल जाते हैं। तब हमें लगता है कि मेरा सदा से यही अस्तित्व है। आप सोचें की बचपन से अभी तक हमने कितने अभिनय किए, कभी छोटे बच्चे का, कभी युवा का, कभी विद्यार्थी का, कभी वक्ता का, कभी पति का, कभी पत्नी का, कितने दोस्त हमें छोड़कर चले गए, कितने नए दोस्त हमारे साथ आए, ये सब चलता रहता है। ये सब अभ्यास हमें करने हैं, अच्छी सास, अच्छी बहू, अच्छा पति, अच्छी पत्नी, अच्छा पुत्र बनने का अभिनय करने का अभ्यास हमें करना है।
 

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