क्या चाहते है हम
शुद्धता-सार्थकता सब चाहते हैं
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जब हम अपने अंतर्मन की गहराइयों में झाँकते हैं, तब अपने स्वभाव के बारे में ये भी जान जाते हैं कि मैं शुद्ध घी-दूध, हवा-पानी चाहता हूं। मैं अपने विचार, व्यवहार और आसपास का वातावरण, सब कुछ शुद्ध ही चाहता हूं, अशुद्ध कुछ भी नहीं। शुद्ध यानी साफ-सुथरा, स्वच्छ-निर्मल, सही-सार्थक, धर्म-संगत और न्याय-सम्मत।
शुद्ध-सार्थक जीवन के आदर्श के रूप में कोई भी पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज के जीवन को देख सकता है कि जब भी उनके किसी सहयोगी ने बेईमानी-धोखेबाजी की, उन्होंने उसे तत्काल अपने से दूर कर दिया। जब कभी उनके सामने धन प्राप्ति के लिए, धर्म की राह छोडऩे की नौबत आई, उन्होंनेे ऐसे धन को ही छोड़ दिया। फिर जब अवसर आया कुछ करने का, तो योग और आयुर्वेद को बढ़ावा देने जैसे बड़े ही सार्थक और महान् लक्ष्यों की पूर्ति के लिए उन्होंने पतंजलि योगपीठ और पतंजलि आयुर्वेद की स्थापना की। यह सब देखकर और जानकर हम इस निष्कर्ष पर पहुचते हैं कि हम लौकिक सुख-साधनों को चाहते तो जरूर हैं, लेकिन सिर्फ उनके शुद्धतम रूप में और इन शुद्ध सुख-साधनों को भी हम अपने शुद्ध-व्यवहार के द्वारा ही अर्जित करना चाहते हैं।

ऐसा इसलिए भी, क्योंकि जो जितना ज्यादा शुद्ध होगा, वो परिणाम में उतना ही ज्यादा फलदायी और सुखदायी होगा। इसके ठीक विपरीत, जो जितना ज्यादा अशुद्ध होगा, वो उतना ही ज्यादा दुखदायी होगा। शुद्धता... यही हमारी दूसरी इच्छा है। शुद्धता में सार्थकता है, इसलिए हम विचारों, कर्मों और चीजों को उनके शुद्ध रूप में अपनाकर 'निर्मल-जीवन’ प्राप्ति की अपनी इच्छा पूरी किया करते हैं।
स्वामित्व सब चाहते हैं
हम यह भी देखते हैं या जानते हैं कि लोग सुखद व शुद्ध चीजों पर स्वयं का पूरा स्वामित्व, वर्चस्व या अधिकार चाहते हैं, जैसे किराए का नहीं, खुद का मकान चाहते हैं, पति-पत्नी एक-दूसरे पर पूरा अधिकार चाहते हैं, मालिक, नौकरों को अपने अधीन रखना चाहते हैं, सबको अपना प्रशंसक भी बनाना चाहते हैं और सहयोगी भी। वे सभी ऐसा इसलिए चाहते हैं ताकि बिना किसी बाधा के उनसे सुख और लाभ प्राप्त कर सकें और एक आज़ाद जि़न्दगी भी जी सकें। दूसरों का स्वामी बनने में ही प्राय: उन्हें स्वयं का विकास होता हुआ नजर आता है। ये स्वामित्व की इच्छा ही हमारी तीसरी इच्छा है, जिसमें हम घर-परिवार सहित सुख के सारे साधनों पर अपना पूर्ण 'स्वामित्व’ बनाए रखना चाहते हैं। आप अपनी संस्था या कंपनी पर पूर्ण अधिकार रखें ताकि समाज हित में उसका उपयोग पूर्ण स्वतंत्रता से कर सकें।
स्थायित्व सब चाहते हैं
जीवन पथ पर बढ़ते हुए हम यह भी देखते हैं कि हम जिन चीजों का प्रयोग करते हैं, वे यदि सुखद हों, शुद्ध हों और हमारे आधिपत्य में भी हों, तो ऐसी स्थिति में हमारी तीनों 'चाहतें’ तो जरूर पूरी हो जाती हैं, लेकिन एक चाहत फिर भी बाकी रह जाती है। और वो है, स्थायित्व या स्थिरता। हम हमेशा चाहते हैं, कि जब तक हम जीवित हैं, तब तक हमारी सारी सुखद व शुद्ध चीजें, हमारे ही पास बनी रहें, वे कभी भी हमसे अलग न हों और न ही कभी नष्ट हों। ऐसा इसलिए ताकि हम लम्बे समय तक उनका उपभोग कर उनसे सुख व लाभ लेते रहें। तभी तो लोग प्राइवेट नहीं, सरकारी नौकरी चाहते हैं, कच्चा नहीं, पक्का मकान चाहते हैं, कुछ अज्ञानी व्यक्ति तो यहाँ तक भी चाहने लगते हंै कि उनका नश्वर शरीर सदा जीवित रहे।
नौकरी, मकान या व्यवहार आदि साधन कोई भी हों, लेकिन यहाँ चाह तो स्थायित्व प्राप्ति की ही होती है। 'स्थायित्वÓ की चाह, यही हमारी चौथी इच्छा है, जिसे पूरा करने के लिए हम अपने जीवन में स्थायित्व-स्थिरता देने वाली वस्तुओंं, व्यवहारों और विचारों को अपनाते हैं।
मित्रों! इस संदर्भ में पूज्य स्वामी जी का एक महत्त्वपूर्ण संदेश यही है कि हमें अपने जीवन में शांति के लिए मन को स्थिर बनाना चाहिए, जबकि राष्ट्र में स्थिरता के लिए जन-जन में प्रेम व स्वदेशी की भावना विकसित करने और कानून व्यवस्था बनाए रखने का प्रयत्न करना चाहिए।
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01 Mar 2025 17:58:05
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