अपनी प्राथमिकताओं को पहचानें

अपनी प्राथमिकताओं को पहचानें

स्वामी अथर्वदेव 

प्रभु-अनुग्रह से यह मानव-जीवन सबसे श्रेष्ठ है और इसकी श्रेष्ठता का भान जिस समय व्यक्ति को होता है, उसी समय से जीवन अप्रतिरोध के साथ निरन्तर उन्नति करता है। ईश्वर की अनुकपा से मानव को अप्रतिम कुशलता व क्षमता का अमूल्य भंडार मिला है, लेकिन इस भंडार को पाने के लिए मनुष्य को क्या करना चाहिए, जिससे वह जीवन में कुशल बन सके, स्वयं के साथ-साथ संपूर्ण समाज व राष्ट्र की उन्नति कर सके।
मारे ऋषियों ने, हमारे शुभचिन्तक महापुरुषों ने जीवन की उलझी गुत्थियों को सुलझाकर हमें निरन्तर प्रगति की राह दिखाई। उन्होंने अनेक मार्ग बतलाए, लेकिन कुछ मार्ग, कुछ दिशाएँ सभी ने समान रूप से दिखलाई, उनमें से कुछ दिशाएँ तो विश्व के प्रत्येक मनुष्य के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं, यदि वह भौतिक या आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करना चाहता है।

अपनी प्राथमिकताओं को पहचानें

कुछ प्राथमिकताएँ ऐसी हैं, जो सभी मनुष्यों के लिए आवश्यक हैं, जैसे-
चरित्र
मानव जीवन को श्रेष्ठ बनाने में, सर्वहित समर्पित बनाने में सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान 'चरित्र’ का होता है। कोई भी मनुष्य चाहे किसी भी जाति, मत, पंथ, सम्प्रदाय से संबंध रखता हो, उसका चरित्र निष्कलंक व निष्कपट होना चाहिए। अपनी शालीनता, विनम्रता, भद्रता को कभी भी न्यून नहीं होने देना चाहिए। इस तरह चरित्र हमारी सबसे पहली प्राथमिकता है। श्रद्धेय स्वामी जी महाराज एक बात को बार-बार कहते हैं कि विद्वान् हर कोई नहीं बन सकता, परन्तु धर्मात्मा, चरित्रवान् तो सभी बन सकते हैं, क्योंकि किसी भी संत को उसका चरित्र ही संत बनाता है। हमें चरित्र विकास में स्वयं का अधिकांश समय लगाना चाहिए, क्योंकि चरित्र बहुत व्यापक शब्द है। इसमें हमारी समस्त चेष्टाएँ, हमारे समस्त कर्तव्य समाहित हो जाते हैं। हमारा संपूर्ण व्यवहार, चाहे वह वाणी से हो या शरीर से, हमारी बौद्धिक गतिविधि हो या शारीरिक, इन समस्त चेष्टाओं का परिणाम हमारा चरित्र होता है। इसलिए शुद्ध चरित्र निर्माण को अपनी प्राथमिकता बनाकर उसे अपने अतीत से बेहतर बनाना चाहिए।
अभ्यास
अभ्यास भी चरित्र की तरह बहुत व्यापक शब्द है। हमारी सारी चेष्टाएँ हमारे पुराने अभ्यासों का ही परिणाम हैं। यहाँ तक कि हमारे विचार भी हमारे अभ्यासों का ही नतीजा हैं। सभी महापुरुषों या श्रेष्ठ व्यक्तियों के जीवन को यदि आप देखें, तो आप पाएँगे कि सभी के अभ्यास कितने कुशल हैं। उनके एक-एक अभ्यास में, पूर्ण प्रामाणिकता, पूर्ण निष्ठा व पूर्ण कत्र्तव्य परायणता दृष्टिगोचर होती है।
हमारा संपूर्ण व्यवहार, चाहे वह वाणी से हो या शरीर से, हमारी बौद्धिक गतिविधि हो या शारीरिक, इन समस्त चेष्टाओं का परिणाम हमारा चरित्र होता है। इसलिए शुद्ध चरित्र निर्माण को अपनी प्राथमिकता बनाकर उसे अपने अतीत से बेहतर बनाना चाहिए।
प्रत्येक मनुष्य की प्रकृति पृथक् होती है, क्योंकि सभी के अभ्यास व पुरुषार्थ पृथक् होते हैं। यदि कोई भी एक बुरा अभ्यास या गलत जगह किया हुआ पुरुषार्थ दृढ़ हो जाता है अर्थात् वह हमारे स्वभाव में आ जाता है, तो जीवन अवनति की राह पर आरूढ़ हो जाता है। फिर उस गलत अभ्यास के हम इतने आदी हो जाते हैं कि वह सामान्य जागरुकता से खत्म नहीं होता। इसके लिए हमें परम पुरुषार्थ व परम जागरुकता रखनी पड़ती है। प्रत्येक मनुष्य की हर समय कुछ प्राथमिकताएँ होती हैं, वे प्राथमिकताएँ हर एक  व्यक्ति की अलग-अलग होती हैं। वेे बहुत ही श्रेष्ठ या अनुकरणीय भी हो सकती हैं या फिर हीन व अशोभनीय भी हो सकती हैं। अत: मनसा-वाचा-कर्मणा हमारे अभ्यास अत्यंत पवित्र हों, आसुरी सम्पदा से मुक्त हों। आसुरी सम्पदा, जो कि गीता (१६/४) में वर्णित है-
भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोध: पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सपदमासुरीम्।।
इन आसुरी सम्पदाओं से पूर्णतया मुक्त होकर जीने के अभ्यास को हमें प्राथमिकता देनी चाहिए, क्योंकि ये मानव जीवन को जड़ बना देती हैं। उसके जीवन का सारा चैतन्य छीन लेती हैं तथा व्यक्ति एक यंत्र की भाँति कार्य करता है, जो कि पूर्ण रूप से पराधीन होता है। इसलिए अभ्यास को पूर्ण रूप से शुद्ध व कुशल बनाना हमारी प्राथमिकता है। वह अभ्यास चाहे ब्रह्म मुहूर्त में उठने का हो या वरिष्ठों केअभिवादन का, हमारा छोटे से छोटा अभ्यास भी संपूर्णतया परिमार्जित व संस्कारित होना चाहिए।
समय प्रबंधन व सदुपयोग
किसी भी क्षेत्र (Field) का व्यक्ति हो, चाहे वह आध्यात्मिक पथ का पथिक हो या वह भौतिकता के मार्ग का चयनकर्ता, यदि उसे उस क्षेत्र के श्रेष्ठ शिखर पर आरोहण कर उसे पाना है, तो चरित्र व अभ्यासों के साथ उसे समय प्रबंधन व उसका सदुपयोग भी करना होगा। यह भी एक अभ्यास ही है, पर प्रधानता के कारण पृथक् रूप से इसका वर्णन आवश्यक है, क्योंकि बिना समय प्रबंधन के व्यक्ति का निर्माण कदापि नहीं हो सकता है, साथ ही प्रत्येक कुशलता को पाने के लिए, सम्पूर्णता को पाने के लिए एक निश्चित समय में निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है, जो कि बिना समय प्रबंधन के नहीं हो सकता है। अब इसमें एक समस्या यह
भी आती है कि समय का प्रबंधन तो कर लिया, पर सदुपयोग नहीं हो पाता। उसके लिए हमें ही जागरूक होना पड़ेगा, क्योंकि शिखर भी तो हमें ही चाहिए।
वर्तमान को उपजाऊ बनाओ
यदि हम ईमानदारी से स्वयं का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि हमारा अधिकांश समय या तो अतीत की चिन्ताओं में बीतता है या भविष्य की कल्पनाओं में। हमने वर्तमान को नहीं संभाला, उसे उपजाऊ नहीं बनाया। यही हमारे सारे दु:खों का, हमारी आत्मग्लानि का मुख्य कारण है और आत्मग्लानि को शास्त्रों में मृत्यु कहा गया है। जो हम सोचते हैं और कर नहीं पाते, तो तत्क्षण हमारे अंदर मृत्यु घटित होती है। हमारे संकल्पों की मृत्यु ही हमारी मृत्यु है। इसलिए यदि इस मृत्यु से पार जाना है, तो वर्तमान को बाँझ होने से बचाना होगा। वर्तमान को हमें सींचना होगा, तब जाकर हमारे संकल्पों की चेतना जीवित रह सकती है, अन्यथा मृत्यु़ सदैव प्रतीक्षारत है। अत: वर्तमान की जागरुकता, सजगता हमारी प्राथमिकता है। इसे जीवन में धारण कर हम आत्मोन्नति का सफल मार्ग चयन कर सकते हैं।
इस प्रकार हमें जीवन में इसी तरह की प्राथमिकताएँ तय करनी पड़ेंगी, जो सार्वभौमिक व सार्वकालिक हों, क्योंकि जीवन इतना विराट है कि यदि मनुष्य केवल चिंतन करे, तो उम्र भर का समय जीवन के क्षेत्रों के चिंतन मात्र में निकल सकता है। अत: चाणक्य नीति के श्लोक में जिस तरह सारभूत अमृत की उपासना की बात कही, उसी तरह हम अपनी प्राथमिकताओं की भी उपासना करें अर्थात् उनका वरण करें।
अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्या,
अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च।
यत्सारभूतं तदुपासनीयं
हंसो यथा क्षीरमिवाबुमध्यात्।।

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