गीता-सार

आसुर कर्मों को छोडक़र शास्त्रोक्त कर्म करें

 गीता-सार

श्रीमद्भगवद् गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने भगवन्मुख से अर्जुन को माध्यम बनाकर मानवमात्र के कल्याण के लिए परमात्मा की वाणी का पुन: प्राकट्य किया है। गीता में जो स्थिति अर्जुन की है, वही स्थिति लगभग प्रत्येक मनुष्य की है। अधिकांश व्यक्तियों के मन में जीवन व जगत् के संबंध में बहुत से भ्रम, उलझन अथवा संशय उत्पन्न होते रहते हैं। गीता युगों-युगों से शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, भक्ष्य-अभक्ष्य, सत्य-असत्य, कत्र्तव्य-अकत्र्तव्य से लेकर ईश्वर, जीव, प्रकृति, जीवन-मृत्यु, पूर्वजन्म तथा पुनर्जन्मादि के संशयों से बाहर निकालकर धर्मपूर्वक कर्म का व्यावहारिक मार्ग प्रशस्त करती है। प्रस्तुत है ऐसे सद्ग्रन्थ के स्वाध्याय स्वरूप यह कड़ी- (१६.१३-२४)
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्ï
इदमस्तीदमपि  मे  भविष्यति  पुनर्धनम्ï॥ १३॥
मैंने आज यह पा लिया, कल मन की उस कामना को भी पूर्ण करूँ गा। आज यह धन मेरे पास है, कल वह धन भी मेरा होगा।
असौ  मया  हत:  शत्रुर्हनिष्ये  चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥ १४॥
इस शत्रु को मैंने मार दिया एवं औरों को भी मार दँूगा। मैं ही ईश्वर, मैं ही भोग करने वाला, सिद्ध, बलवान् और सुखी हूँ।
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिता:॥ १५॥
अनेकचित्तविभ्रान्ता  मोहजालसमावृता:।
प्रसक्ता:  कामभोगेषु  पतन्ति  नरकेऽशुचौ॥ १६॥
मैं सम्पन्न और कुलीन (अभिजनवान्) हूँ, मेरे समान सामथ्र्यवान् और कौन है, मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, मौज करूँ गा, इस प्रकार अज्ञान से मोहित, अनेक विचारों व संकल्पों से जिनका चित्त अत्यन्त भ्रमित है, मोह के फंदे से जकड़े हुए और विषयभोगों में डूबे हुए ये (असुर लोग) अपवित्र नरक में गिरते हैं।
आत्मसम्भाविता: स्तब्धा धनमानमदान्विता:।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्ï॥ १७॥
अपने आप को ही श्रेष्ठ मानने वाले, ऐंठकर व्यवहार करने वाले (स्तब्धा:=विनयरहित), धन और मान के मद से युक्त ये लोग शा विधि छोड़कर केवल नाममात्र के यज्ञों द्वारा दम्भपूर्वक यजन-पूजन करते हैं।
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिता:।
मामात्मपरदेहेषु   प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयका:॥ १८॥
तानहं  द्विषत:  क्रूरान्संसारेषु  नराधमान्ï
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव  योनिषु॥ १९॥
अहंकार, बल, दर्प, काम व क्रोध का आश्रय लिए हुए अर्थात्ï अहंकार से, बल से, दर्प से, काम-क्रोध से फूलकर, अपनी और दूसरों की देह में स्थित मुझसे (परमेश्वर से) द्वेष करने वाले (अशुभान) इन निन्दक जनों को और अशुभ कर्म करने वाले इन द्वेषी, क्रूर व नीच पुरुषों को मैं इस संसार की पाप-योनियों में बार-बार डालता हूँ।
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्ï॥ २०॥
हे कौन्तेय! इस प्रकार बार-बार असुर योनि में जन्म लेकर ये मूर्ख लोग मुझे प्राप्त न होकर अधिकाधिक अधोगति में जा पहुँचते हैं।
आसुरीवृत्ति वालों का और उनकी गति का वर्णन हो चुका। अब किस प्रकार वे इससे पार पा सकते हैं, उसका वर्णन है।
त्रिविधं  नरकस्येदं  द्वारं  नाशनमात्मन:।
काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥ २१॥
काम, क्रोध और लोभ, ये तीन नरक के द्वार हैं, ये हमारा सर्वनाश कर डालते हैं, इसलिये इन तीनों का त्याग करना चाहिये।
एतैर्विमुक्त:  कौन्तेय  तमोद्वारैिभिर्नर:।
आचरत्यात्मन: श्रेयस्ततो याति परां गतिम्ï॥ २२॥
य: शाविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत:।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्ï॥ २३॥
हे कौन्तेय! इन तीनों तमोद्वारों (अंधकार या पतन की ओर ले जाने वाले रास्तों) को छोड़कर जो मनुष्य वह आचरण करने लगता है जिसमें उसका भला हो, तो फिर वह उत्तम गति को पाता है।
जो शक्ति विधि छोड़कर मनमाना आचरण करने लगता है, उसे न सिद्धि मिलती है, न सुख और न ही उत्तम गति प्राप्त होती है।
तस्माच्छास्त्र प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शाविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ २४॥
कार्य-अकार्य का निर्णय करने के लिए तुझे शास्त्रों को प्रमाण मानना चाहिए। अत: शास्त्रविधान से कही हुई बात को समझकर शास्त्र द्वारा जो यह आज्ञा दी गयी है कि यह कार्य कर, यह मत कर, यही शास्त्र विधान है। उसे समझकर तदनुसार इस लोक में कर्म करना उचित है।

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