आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ जीवन के लिए प्रात:कालीन दिनचर्या
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आचार्य विजयपाल प्रचेता, पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार
महर्षि चरक कहते हैं- धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम। अर्थात् धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष का उत्तम मूल आरोग्य ही है। इसके बिना मनुष्य जीवन के इन अर्थों की सिद्धि सम्भव नहीं है। ऋषियों ने आरोग्य के यथार्थ उपायों का उपदेश किया है। आयुर्वेद दो मुख्य बिन्दुओं पर केन्द्रित है- 'स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी के रोगों का निवारण’। इनमें भी अधिक बल पहले बिन्दु पर दिया गया है। अत एव आयुर्वेद के प्रणेता प्राचीन ऋषियों की सभी संहिताओं के आरम्भ में स्वस्थ व्यक्ति की स्वास्थ्य रक्षा हेतु उत्तम दिनचर्या समुचित आहार-विहार एवं सद्वृत्त (सदाचरण) का उपदेश किया है, क्योंकि इसका अनुसरण करने वाला व्यक्ति सदा रोगों से बचा रहता है और स्वस्थ, सुखी एवं दीर्घ जीवन प्राप्त करता है। प्रस्तुत लेख में ऋषियों द्वारा आयुर्वेद में प्रतिपादित प्रात:कालीन दिनचर्या का संक्षिप्त वर्णन किया जा रहा है।
प्रातर्जागरण
दिनचर्या में सर्वप्रथम प्रात: ब्राह्ममुहूर्त में जागरण का निर्देश है-
ब्राह्मे मुहूत्र्त उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थमायुष:।
शरीरचिन्तां निर्वत्र्य कृतशौचविधिस्तत:।। (अ.हृ.सू.- 2.1)
अर्थात् स्वस्थ व्यक्ति को प्रात: ब्राह्म मुहूर्त में (चार बजे) उठना चाहिए। तदनन्तर शौचविधि अर्थात् मुखप्रक्षालन एवं मल-मूत्र विसर्जन यथोचित रूप में करना चाहिए। इसके साथ ही यह चिन्तन भी करना चाहिए कि मेरी शरीर-स्थिति कैसी है, इसके हित के लिए आज मुझे क्या करना चाहिए? धर्मशास्त्रों में भी ऐसा निर्देश आता है- 'ब्राह्मे मुहूर्त उत्थाय चिन्तबोधात्मनो हितम्’ अर्थात् ब्राह्ममुहूर्त में उठकर अपने हित का चिन्तन करना चाहिए, क्योंकि उस समय उचित निद्रा के अनन्तर प्रसन्न मन से किया गया चिन्तन यथार्थ होता है और जीवन को सही दिशा में आगे बढ़ता है। नीतिकार में भी कहा है-
ब्राह्मे मुहूत्र्त उत्थायेतिकत्र्तव्यतायां समाधिमुपेयात्।
(नीतिवाक्यामृतम्- 25.1)
ब्राह्म मूहूत्र्त (प्रातकाल 4 बजे के समय) में उठकर दिन में करने योग्य कार्यों के प्रति एकाग्रता करनी चाहिए। अर्थात् आज मुझे क्या-क्या आवश्यक व मुख्य कार्य करने हैं, इस बात को ध्यानगत कर लेना चाहिए। सुविधा की दृष्टि से ऐसे कार्यों की लिखित सूची बनाना अधिक उपयोगी रहता है।
सुखनिद्राप्रसन्ने हि मनसि प्रतिफलन्ति यथार्थग्राहिका बुद्धय:।
(नीतिवाक्यामृतम्- 25.2)
क्योंकि रात्रि में सुखपूर्वक ली गई नींद के कारण प्रसन्न हुए मन में यथार्थता का ग्रहण करने वाली सूझ-बूझ प्रकट होती है। अत: यह समय कत्र्तव्यों के चिन्तन व निर्धारण के लिए बहुत उपयोगी होता है।
दन्तधावन
इस प्रकार प्रात: ब्राह्ममुहूत्र्त में जागरण, शौचकृत्य, शरीर-विषयक चिन्तन व अर्थ-चिन्तन करना चाहिए। आगे दिनचर्या का आवश्यक अंग दन्तधावन बताया गया है-
आपोथिताग्रं द्वौ कालौ कषाबाकटुतिक्तकम्।
भक्षयेद्दन्तपवनं दन्तमांसान्यबाधयन्।।
(चरकसंहिता, सूत्रस्थान- 5.71)
तत्रदौ दन्तपवनं द्वादशांगुलमायतम्।
कनिष्कापरीणाहमृज्वग्रन्थितमव्रणम्।।
(सुश्रुतसंहिता, चिकित्सास्थान-24.4)
प्रतिदिन दोनों समय- प्रात: जागरण के उपरान्त और रात्रि में शयन से पूर्व दन्तधावन (दातुन) करें। यह कषाय (कसैला), कटु (चरपरा) एवं तिक्त (कडुवा) रस वाली वृक्षशाख की होनी चाहिए। दन्तधावन (दातुन) 12 अंगुल लम्बी और कनिष्ठिका अंगुली जितनी मोटी होनी चाहिए।
निम्बश्च तिक्तके श्रेष्ठ: कषाये खदिरस्तथा।
मधूको मधुरे श्रेष्ठ: करञ्ज: कटुके तथा।।
(सुश्रुतसंहिता, चिकित्सास्थान- 24.6)
तिक्त (कडुवा) रस वाले वृक्षों में नीम की दातुन श्रेष्ठ होती है। कषाय रस वाले वृक्षों में बबूल की दातुन श्रेष्ठ मानी गई है। इसी प्रकार कटु (चरपरे) रस वाले वृक्षों में करञ्ज और मधुररस वाले वृक्षों में मधूक (महुवा) की दातुन उत्तम होती है।
एकैकं घर्षबोद्दन्तं मृदुना कूर्चकेन च।
दन्तशोधनचूर्णेन दन्तमांसान्यबाधबान्।।
(सुश्रुतसंहिता, चिकित्सास्थान- 24.8)
इसके सिरे को अच्छी तरह चबाकर कोमल कूँची बना लेनी चाहिए और दन्तमांस (मसूढ़ों) को बाधित न करते हुए एक-एक दाँत पर घर्षण कर उसका शोधन करना चाहिए।
क्षौद्रव्योषत्रिवर्गाक्तं सतैलं सैन्धवेन च।
चूर्णेन तेजोवत्याश्च दन्तान्नित्यं विशोधयेत्।।
(सुश्रुतसंहिता, चिकित्सास्थान- 24.7)
दातुन के विकल्प के रूप में आयुर्वेद में बताया गया है कि त्रिकटु व त्रिफला के चूर्ण में थोड़ा मधु मिलाकर उससे भी दन्त शोधन किया जा सकता है। इसी प्रकार सैन्धव लवण में सरसों का तैल मिलाकर इससे भी दन्तशोधन किया जा सकता है। तेजोवती के चूर्ण से मञ्जन करने पर भी अच्छी प्रकार से दन्तशुद्धि हो जाती है।
आजकल आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों से निर्मित स्वदेशी टूथपेस्ट भी प्रचलित हैं, जिनमें पतञ्जलि आयुर्वेद का 'दन्तकान्ति’ प्रमुख है। दन्तशुद्धि के लिए इस प्रकार के टूथपेस्ट का उपयोग भी किया जा सकता है, परन्तु दाँतों व मसूड़ों की स्वच्छता एवं दृढ़ता के लिए दातुन अनुपम प्राकृतिक साधन हैं। इसका अभ्यास बनाए रखना चाहिए।
तद्दौर्गन्ध्योपदेहौ तु श्लेष्माणं चापकर्षति।
वैशद्यमन्नाभिरुचिं सौमनस्यं करोति च।।
(सुश्रुतसंहिता, चिकित्सास्थान-24.9)
दन्तधावन करने से जिह्वा, दाँत और मुख का मल, दुर्गन्ध और कफ दूर होता है। यह स्वच्छता, अपाभिरुचि (भोजन के प्रति रुचि) एवं सौमनस्य (मन की प्रसन्नता) को बढ़ाती है।
जिह्वानिर्लेखन
दातुन के बाद जिह्वानिर्लेखन (जीभ के शोधन) का विधान इस प्रकार है-
सुवर्णरूप्यताम्राणि त्रपुरीतिमयानि च।
जिह्वानिर्लेखनानि स्युरतीक्ष्णान्यनृजूनि च।।
जिह्वामूलगतं यच्च मलमुच्छ्वासरोधि च।
दौर्गन्ध्यं भजते तेन तस्माज्जिह्वां विनिर्लिखेत्।।
(चरकसंहिता, सूत्रस्थान- 5.74-75)
जीभ के मैल को खुरचकर निकालने वाली जिह्वानिर्लेखनी (जीभी) सोना, चाँदी, ताँबा, राँगा अथवा पीतल की बनानी चाहिए, जो तीखी धार वाली न हो और कुछ टेढ़ी (वक्र) हो । जिह्वा के मूल में जो मैल जमा रहता है, वह मुख में दुर्गन्ध उत्पन्न करता है, इसलिए प्रतिदिन जिह्वा को जीभी से रगड़ कर स्वच्छ करना चाहिए ।
उष:पान
आयुर्वेद में सूर्योदय से पहले जल पीने का चमत्कारी प्रभाव बताया गया है-
अम्भस: प्रसृतीरष्टौ रवावनुदिते पिबेत्।
वातपित्तकफान् जीत्वा जीवेद् वर्षशतं नर:।।
अर्थात् सूर्योदय से पहले आठ प्रसृति (लगभग डेढ़ गिलास) जल पीना चाहिए। इससे वात-पित्त-कफ के सभी विकार दूर हो जाते हैं और व्यक्ति आरोग्य प्राप्त कर सौ वर्ष तक जीता है। अत: हमें प्रात: जल पीने का नियम दिनचर्या में अनिवार्य रूप से रखना चाहिए। अजीर्ण, कफ-वातविकार एवं स्थूलता दूर करने के लिए उष्ण जल हितकर होता है।
अभ्यङ्ग एवं व्यायाम
अभ्यङ्ग (तेल-मालिश) एवं व्यायाम को आयुर्वेद में दिनचर्या का आवश्यक अंग बताया है-
अभ्यङ्गमाचरेन्नित्यं स जराश्रमवातहा।
दृष्टिप्रसादपुष्ट्यायु:स्वप्नसुत्वक्त्वदाढ्यकृत्।।
शिर:श्रवणपादेषु तं विशेषेण शीलयेत्।
वज्र्योभ्यङ्ग कफग्रस्तकृतसंशुद्धयजीर्णिभि:।।
(अष्टाङ्गहृदय, सूत्रस्थान- 2.8-9)
व्यक्ति को नित्य अभ्यङ्ग करना चाहिए। वह जरा (वृद्धावस्था के प्रभाव), थकान और वातविकारों को दूर करता है। अभ्यङ्ग करने वाले की नेत्रदृष्टि उत्तम रहती है। शरीर का रंग निखरता है। कृश व्यक्ति पुष्ट हो जाता है। त्वचा की कान्ति बढ़ती है और शरीर में दृढ़ता आती है। अभ्यङ्ग के लिए तिल का तैल सभी ऋतुओं में उपयोगी है। शीतकाल में सरसों का तैल अधिक उपयोगी है, क्योंकि वह अधिक उष्ण गुण वाला होता है।
शरीरचेष्टा या चैष स्थैर्यार्र्था बलवद्र्धिनी।
देहव्यायामसंख्याता मात्रया तां समाचरेत्।।
(चरकसंहिता, सूत्रस्थान- 7.31)
जो शरीर की चेष्टा इच्छापूर्वक की जाती है और शरीर में दृढ़ता एवं बल को बढ़ाती है, उसे 'व्यायाम’ कहते हैं। व्यायाम को उचित मात्रा में ही करना चाहिए। सामथ्र्य से अधिक व्यायाम हानिकारक होता है।
लाघवं कर्मसामथ्र्ये स्थैर्यं दु:खसहिष्णुता।
दोषक्षयोऽग्निवृद्धिश्च व्यायामादुपजायते।।
(चरकसंहिता, सूत्रस्थान-7.32)
व्यायाम करने से शरीर में लाघव (हलकापन), कार्बा करने का सामथ्र्य, शरीर में स्थिरता (दृढ़ता), कष्ट सहने की शक्ति, बढ़े हुए दोषों की क्षीणता और जठराग्नि की वृद्धि होती है।
श्रम: क्लम: क्षयस्तृष्णा रक्तपित्तं प्रतामक:।
अतिव्यायामत: कासो ज्वरश्छर्दिश्च जायते।।
(चरकसंहिता, सूत्रस्थान- 7.33)
अधिक व्यायाम करने से थकावट, मन और इन्द्रियों में शिथिलता, रसादि धातुओं का क्षय, प्यास की अधिकता, रक्तपित्तरोग, श्वास रोग, ज्वर और वमन आदि रोग होते हैं।
स्नान
स्नान दिनचर्या का आवश्यक अंग है। सुश्रुतसंहिता में स्नान-विषयक आवश्यक जानकारी इस प्रकार दी है-
निद्रादाहश्रमहरं स्वेदकण्डूतृषापहम्।
हृद्यं मलहरं श्रेष्ठं सर्वेन्द्रियविबोधनम्।।
तन्द्रापाप्मोपशमनं तुष्टिदं पुंस्त्ववर्धनम्।
रक्तप्रसादनं चापि स्नानमग्नेश्च दीपनम्।।
(सुश्रुतसंहिता, चिकित्सा स्थान- 24.57-58)
स्नान अतिनिद्रा, दाह (जलन), थकान, स्वेद (पसीना), खुजली और प्यास को दूर करता है। यह हृदय को प्रसन्न करने वाला और मल का निवारण करने वाला श्रेष्ट साधन है। स्नान करने पर सभी इन्द्रियों में चैतन्य का संचार हो जाता है। अत: मनुष्य विशेषरूप से ताजगी अनुभव करता है। स्नान से तन्द्रा (आलस्य) एवं तन-मन की मलिनता का निवारण होता है। मन में प्रसन्नता आती है और पुंस्त्वशक्ति (प्रजनन शक्ति) बढ़ती है। स्नान से रक्तशुद्धि होती है और जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है अर्थात् अच्छी भूख लगती है।
उष्णेन शिरस: स्नानमहितं चक्षुष: सदा।
शीतेन शिरस: स्नानं चक्षुष्बामिति निर्दिशेत्।।
(सुश्रुतसंहिता, चिकित्सा स्थान- 24.59)
अतिशीताम्बु शीते च श्लेष्ममारुतकोपनम्।
अत्युष्णमुष्णकाले च पित्तशोणितकोपनम्।।
(सुश्रुतसंहिता, चिकित्सा स्थान- 24.61)
शीतकाल में गर्म जल से स्नान करना चाहिए, परन्तु सिर पर उष्ण जल नहीं डालना चाहिए। समशीतोष्ण जल से ही सिर का स्नान करना चाहिए। शेष शरीर पर गर्म जल का प्रयोग करना चाहिए। शीतकाल के अतिरिक्त अन्य ऋतु में ताजा शीतल जल से स्नान करना चाहिए। शीतकाल में अति शीतल जल से स्नान करने पर कफ एवं वात के विकार बढ़ जाते हैं। इसी प्रकार गर्मी में अधिक उष्ण जल स्नान करने पर पित्त एवं रक्त के विकार बढ़ जाते हैं, अत: शीतकाल में अति शीतल और ग्रीष्मकाल में अति उष्ण जल से स्नान कदापि नहीं करना चाहिए।
आयुर्वेदीय ग्रन्थों में स्नान से जठराग्नि-दीपन होना बताया गया है, इसका रहस्य इस प्रकार है-
बाह्यैश्च सेकै: शीताद्यैरूष्मान्तर्याति पीडित:।
नरस्य स्नातमात्रस्य दीप्यते तेन पावक:।।
(भावप्रकाश, पूर्वभाग- 4.81)
जब शरीर पर बाह्य शीतल जल आदि से सेचन किया जाता है, तब शरीर की उष्णता अन्दर पहुँच जाती है। अत एव स्नान करते ही व्यक्ति को विशेषरूप से भूख लगती है। इसलिए स्नान सदैव भोजन से पूर्व ही करना चाहिए, बाद में नहीं।
स्नानस्यानन्तरं सम्यग् वस्त्रेणाङ्गस्य मार्जनम्।
कान्तिप्रदं शरीरस्य कण्डूत्वग्दोषनाशनम्।।
(भावप्रकाश, पूर्वभाग- 4.87)
स्नान के अनन्तर शरीर को स्वच्छ खुरदरे वस्त्र से पौंछना चाहिए। इससे खुजली एवं त्वचा के दोषों का निवारण होता है और शरीर की कान्ति बढ़ती है।
संध्या-हवन
स्नान से तन-मन की निर्मलता के उपरान्त जप, संध्या एवं अग्निहोत्र का विधान है- नाजपित्वा नाहुत्वा अपमाददीत (चरकसंहिता, सूत्रस्थान- 8.20) अर्थात् जप, संध्यावन्दन एवं अग्निहोत्र के बिना अप ग्रहण नहीं करना चाहिए। मनुस्मृति में भी कहा-
उत्थायावश्यकं कृत्वा कृतशौच: समाहित:।
पूर्वां सन्ध्यां जपंस्तिष्ठेत्स्वकाले चापरां चिरम्।।
(मनु.- 4.93)
अर्थात् प्रात: शौच, व्यायाम, स्नान आदि आवश्यक कार्यों के अनन्तर एकाग्रचित्त होकर सन्ध्या करनी चाहिए।
ऋषयो दीर्घसन्ध्यत्वाद्दीर्घमायुरवाग्नुयु:।
प्रज्ञां यशश्च कीॄत्त च ब्रह्मवर्चसमेव च।।
(मनु.- 4.94)
ऋषियों ने दीर्घसन्ध्या (दीर्घ काल तक ध्यान-भजन) से दीर्घायु को प्राप्त किया था। इसी के प्रभाव से उन्होंने प्रज्ञा, यश, कीर्ति व ब्रह्मवर्चस को भी प्राप्त किया था। इस प्रकार प्रात: सात्विक दिनचर्या के उपरान्त व्यक्ति अपने दैनिक कार्य सम्पन्न करे। ऐसा करने से तन-मन स्वस्थ एवं प्रसन्न रहते हैं और व्यक्ति अपने कत्र्तव्यों का निर्वाह अच्छी तरह कर पाता है।
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