एलोपैथी एवं आयुर्वेद की तुलनात्मक समीक्षा
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आचार्य बालकृष्ण
सिम्प्टोमैटिक / सिस्टेमिक ट्रीटमेंट
एलोपैथी से बी.पी., शुगर, कोलेस्ट्रॉल, दर्द के सिम्प्टम्स (लक्षण) अधिकांश रोगियों में तुरन्त ठीक हो जाते हैं, इसलिए ये सिम्प्टोमैटिक ट्रीटमेंट है। आयुर्वेद से सिम्टम्स तो कन्ट्रोल होते ही हैं, साथ में वह सिस्टम भी पूरा ठीक हो जाता है जिसके खराब होने से रोग होते हैं। इसलिए आयुर्वेद का उपचार सिस्टेमिक है।
कारण-कार्य सिद्धान्त:
बी.पी., शुगर, कॉलेस्ट्रॉल, थॉयराइड, दर्द एवं नींद आदि की दवा एवं स्टेरॉइड लेने से एक तरफ रोग तो नियंत्रित दिखता है, लेकिन रोग एवं रोग की एलोपैथिक कैमिकल्स से बनी दवा के कारण इसके कॉम्प्लीकेशंस एवं साइड इफैक्ट बहुत ही खतरनाक होते हैं, जैसे शुगर के कारण कमजोरी, लीवर, किडनी, आँख, हार्ट एवं नाड़ी तन्त्र के रोग होते हैं। इसी प्रकार बी.पी. के कारण किडनी, हार्ट एवं पैरालाइसिस या ब्रेन हैमरेज जैसे रोग हो जाते हैं। कॉलेस्ट्राल की दवा से फैटी लीवर एवं हार्मोनल इम्बैलेंस हो जाता है। नींद, मिर्गी एवं डिप्रेशन की दवा से मैमोरी लॉस एवं इम्युनिटी कमजोर हो जाती है। दमा, दर्द एवं बहुत से अन्य रोगों में स्टेरॉइड लेने से हड्डियाँ कमजोर हो जाती हैं तथा शुगर की बीमारी हो जाती है। ये सब एलोपैथी की खतरनाक रासायनिक दवा लेते-लेते होता है। जबकि आयुर्वेद की दवा मुक्तावटी, मधुनाशिनी, हृदयामृत, मेदोहर, मेधावटी आदि का कोई भी साइड इफैक्ट नहीं है बल्कि रोग के साथ-साथ रोग के कॉम्प्लीकेशंस भी ठीक होते हैं। रोग के कारण का निवारण होता है, जैसे- शुगर का कारण पेन्क्रियाज़ की कम सक्रियता। उसे हम योग, मधुनाशिनी व गिलोय से ठीक कर देते हैं। बी.पी. का कारण किडनी, हार्ट, स्ट्रैस, मोटापा, गुस्सा, अनिद्रा, बुरी आदतें, नशा, आलस्य एवं अव्यवस्थित जीवन पद्धति है, हम आसन, प्राणायाम, ध्यान, मुक्तावटी एवं यौगिक जीवन पद्धति से इन सब कारणों का निवारण कर देते हैं। अनिद्रा, तनाव एवं मस्तिष्क रोगों मेें हम मेधावटी देते हैं। इससे नींद अच्छी आती है, तनाव दूर हो जाता है तथा मैमोरी भी अच्छी हो जाती है। इसी प्रकार हार्ट की बीमारी के कारण कॉलेस्ट्रॉल, स्ट्रैस, शराब व तम्बाकू आदि बुरी आदतें, कम-श्रम, मोटापा, बी.पी., एच.डी.एल. या अच्छे कॉलेस्ट्राल की कमी, अनहैल्दी लाइफ स्टाइल आदि इन सबको योग, हृदयामृत वटी एवं सात्विक आहार, विचार, वाणी, व्यवहार व स्वभाव से हम पूरी तरह ठीक कर देते हैं और हृदय रोगी पूर्ण स्वस्थ हो जाते हैं। इसी प्रकार फेफड़ों को स्वस्थ बनाकर अस्थमा एवं हड्डियों को मजबूत बनाकर हम अर्थराइटिस एवं अन्य हड्डियों के रोगों व दर्दों को योगायुर्वेद के उपचार से क्योर करते हैं। हम कारण का निवारण करते हैं, हम मूल को सींचते हैं जबकि एलोपैथी में रोगों के कारण को ठीक न करके उसके सिम्प्टम्स को कंट्रोल करने की दवा दी जाती है। एलोपैथी में पेड़ की पत्तियों या टहनियों में कोई समस्या है तो वे लोग दवा पत्तियों व डालियों के लिए करते हैं। हम लोग पेड़ के मूल को ही ठीक कर देते हैं। मूल ठीक होने से पूरा तना, पत्तियाँ व डालियाँ, फल-फूल सब कुछ ठीक हो जाता है।
कैमिकल्स/प्राकृतिक तत्त्व
एलोपैथी की दवाइयाँ कैमिकल्स से बनी होती हैं जबकि आयुर्वेद की दवा पूरी तरह प्राकृतिक होती हैं, अत: पूर्ण सुरक्षित हैं। एलोपैथी की प्रत्येक छोटी से छोटी दवा के भी साइड इफैक्ट उसके लेबल पर ही लिखे होते हैं, हम ये कोई आरोप नहीं लगा रहे हैं। नीम, तुलसी, हल्दी, एलोवेरा, गिलोय, हरड़, बहेड़ा, आँवला, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, मेथी, अजवाइन एवं अन्य सभी आयुर्वेद की जड़ी-बूटियाँ पूर्णत: कुदरती हैं और इनका कोई भी दुष्प्रभाव नहीं है। इसीलिए अब पूरी दुनिया नेचुरल मेडिसिन, नेचुरल फूड एवं नेचुरल कॉस्मेटिक की तरफ आ रही है।
सनातन एवं नूतन
किसी भी विषय की प्राथमिकता में वह बात कब अस्तित्व में आई, इसका बड़ा महत्व होता है। आयुर्वेद सृष्टि के आदिकाल अर्थात् लगभग २०० करोड़ (१,९६,०८,५३,१२०) वर्षों से अस्तित्व या प्रैक्टिस में है। एलोपैथी लगभग २०० वर्ष पुरानी है तथा प्रतिवर्ष सैकड़ों दवाइयों पर दुनिया में प्रतिबंध लग जाता है। कुछ दवाओं के कुछ महीने या कुछ वर्ष निरन्तर प्रयोग से भयंकर दुष्प्रभाव देखने को मिलते हैं। जबकि आयुर्वेद में आँवला, हल्दी, तुलसी, एलोवेरा, ब्राह्मी, शंखपुष्पी आदि का लाखों-करोड़ों वर्ष से उपयोग होता आ रहा है तथा वर्तमान में भी हमने शोध किया है कि ये सभी जड़ी-बूटियाँ पूर्णत: निर्दोष हैं। एलोपैथी में बी.पी., शुगर, कॉलेस्ट्राल, दर्द, बुखार व एन्टीबाइटिक्स की दवा के खतरनाक दुष्प्रभाव देखे गए हैं। कई बार तो बुखार की दवा से किडनी फेल व मृत्यु तक हो जाती है। ये सारी बातें एलोपैथी के बड़े डॉक्टर्स एवं वैज्ञानिकों की कही हुई बातें मैं कह रहा हूँ। अमेरिका के कुछ बड़े डॉक्टर्स व वैज्ञानिकों ने एलोपैथी पर कुछ प्रामाणिक किताबें लिखी हैं, उनमें निष्कर्ष निकाला गया कि जितने लोग दवा न मिलने के कारण दुनिया में मरते हैं उनसे ज्यादा लोग एलोपैथी की दवा खाकर मरते हैं। आप अपने जवान बच्चों से यह तथ्य इंटरनेट के माध्यम से पढ़ सकते हैं।
भ्रमजाल, भ्रान्तियाँ एवं प्रत्यक्ष सत्य
योग, आयुर्वेद एवं हमारे परम्परागत ज्ञान को बदनाम करने के लिए बहुत प्रकार के षड्यंत्र, दुष्प्रचार, भ्रान्तियाँ व अफवाहें फैलाई जाती हैं, जैसे- आयुर्वेद से तुरन्त लाभ नहीं होता, आयुर्वेद की दवाओं से किडनी फेल हो जाती है, आयुर्वेद की दवाओं में भस्में व पारा (मरकरी) होता है, आयुर्वेद में रिसर्च व एविडेंस बेस्ड मेडिसिन नहीं है आदि-आदि।
हम पूरी प्रामाणिकता, रिसर्च एवं अनुभव के साथ कुछ बड़ी बातें लिख व कह रहे हैं। हमारे पास सैकड़ों वैज्ञानिकों की टीम है जो दिन-रात एक करके आयुर्वेद में रिसर्च कर रही है। दुनिया का सबसे बड़ा रिसर्च सेन्टर पतंजलि में पतंजलि अनुसंधान संस्थान (पी.आर.आई.) है। इसके कुछ निष्कर्ष हम आप तक सम्प्रेषित कर रहे हैं-
1- आयुर्वेद की दवा अब तक हमने करोड़ों लोगों को दी है, अभी तक एक भी रोगी हमें नहीं मिला जिसकी आयुर्वेद की दवाओं से किडनी फेल हुई हो। जबकि एलोपैथी की दवाओं से हर दिन बड़े-बड़े हॉस्पिटल्स में डॉक्टरों की आँखों के सामने एलोपैथी की दवाओं के साइड इफैक्ट से रोगियों के किडनी खराब होने के साथ लीवर व हार्ट फैलियर तक हो रहे हैं।
2- हमने मॉडर्न मेडिकल साइंस की तरह आयुर्वेद में क्लीनिकल कन्ट्रोल ट्रायल किए हैं। चूहे, खरगोशों एवं अन्य जानवरों से लेकर आदमी पर दवाओं के प्रयोग किए हैं। मुक्तावटी, मधुनाशिनी, हृदयामृत से लेकर भस्मों व पारे पर रिसर्च किया है। इनका कोई भी दुष्प्रभाव (साइड इफैक्ट) हमें देखने को नहीं मिला। आयुर्वेद की लगभग ९०त्न दवाओं में तथा जड़ी-बूटियों में पारा व भस्म भी नहीं होती। एक कोरा झूठ व भय फैलाकर लोगों को आयुर्वेद से दूर करने का स्वार्थपूर्ण षड्यंत्र है।
3- आयुर्वेद की मुक्तावटी का बी.पी. में, मधुनाशिनी व गिलोय घनवटी का शुगर में, लौकी के रस का कॉलेस्ट्राल, बी.पी., एसिडिटी व वेट में तुरन्त असर होता है। इसी प्रकार बुखार व प्लेट्लेट्स की कमी में गिलोय, पपीते के पत्तों का रस, एलोवेरा व अनार का तुरन्त असर होता है। यहाँ तक कि डेंगु का रोगी मरने से बच जाता है। इसी प्रकार त्रिफला व हरड़ का कब्ज़ में, त्रिकटु, श्वासारि, शिलाजीत व च्यवप्राश का कफ में, एलोवेरा, गिलोय व निर्गुण्डी आदि का दर्द में तुरंत लाभ होता है। आयुर्वेद को बदनाम करने व लोगों को सच से दूर कर उपचार के नाम पर व्यापार, लूटमार, अत्याचार व यहाँ तक की मौत का व्यापार करने के लिए ये भ्रान्तियाँ फैलाई जा रही हैं। सत्यता का इन बातों से कोई सम्बंध नहीं है।
4- आयुर्वेद में हमने एलोपैथी की तरह एविडेंस बेस्ड रिसर्च का बहुत बड़ा सेन्टर बनाया हैै। स्वयं प्रधानमंत्री मोदी जी ने उसका उद्घाटन किया है तथा हम सैकड़ों आयुर्वेदिक दवा व जड़ी-बूटियों पर रिसर्च कर रहे हैं तथा इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि आयुर्वेद सनातन भी है और नूतन भी। यह विश्व का प्राचीनतम ज्ञान पूरी तरह वैज्ञानिक, सार्वभौमिक, सार्वकालिक एवं सर्वहितकारी है। आयुर्वेद का विरोध करने वाले रोगियों के एवं मानवता के दुश्मन तथा स्वार्थी व शरारती तत्त्व हैं।
अन्त में हम वैज्ञानिक सोच व दृष्टिकोण रखने वाले सभी डॉक्टर्स एवं सभी सात्विक आत्माओं से आह्वान करते हैं कि पूर्वाग्रह, दुराग्रह, हठ, स्वार्थ एवं भ्रान्तियों से बचकर योगायुर्वेद, स्वदेशी एवं वैदिक संस्कृति के स्वाभिमान के इस दिव्य व पुण्य अभियान से खुद जुड़ें और औरों को जोड़ें। दुष्प्रभाव व षड्यंत्र को दूर करके आप खुद भगवान् के तथा अपने पूर्वज ऋषियों के यंत्र बनकर इस अभियान या आंदोलन को सफल बनाएँ। हमने जो कुछ लिखा है उसे खुद आजमाएँ, खुद पर योग व आयुर्वेद के प्रयोग करें। सच आपकी आँखों के सामने प्रत्यक्ष होगा। फिर आप भी वही कहेंगे व करेंगे जो हम कह रहे हैं व कर रहे हैं।
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01 Mar 2025 17:58:05
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